Wednesday, January 20, 2010

खेलों से खिलबाड़ कब बंद होगा?



बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा को विश्वकप व राष्ट्रमंडल खेलों की टीम से बाहर किया जाना घोर निंदनीय है। भारतीय राष्ट्रीय रायफल संघ (एनआरएआई) से यह पूछा जाना चाहिए कि उसने क्या सोचकर यह बेतुका फरमान जारी किया है? महज इस आधार पर बिंद्रा को टीम से बाहर नहीं किया जा सकता कि उन्होंने एनआरएआई के 'ट्रायल' में हिस्सा नहीं लिया। जिस खिलाड़ी ने ओलंपिक में दुनिया के धुरंधर निशानेबाजों को पछाड़ते हुए स्वर्ण पदक जीता हो, उसकी योग्यता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। रही बात नियमों की तो एनआरएआई किस मुंह से इनकी बात कर रही है? इसकी कार्यप्रणाली पर आए दिन अंगुलियां उठती रहती हैं। न्यायालय भी इस पर टिप्पणी कर चुका है। एनआरएआई ने खेल के विकास पर ध्यान दिया होता तो बिंद्रा को प्रशिक्षण के लिए जर्मनी जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बिंद्रा के साथ हुए बर्ताव के लिए खेल मंत्रालय भी कम दोषी नहीं है। दरअसल, एनआरएआई भारतीय ओलंपिक संघ की प्राथमिकता सूची में आता है और सरकार उसकी प्रतियोगिताओं से लेकर विदेशी दौरों तक का पूरा खर्च उठाती है। खेल मंत्रालय की ओर से ऐसे सभी खेल संघों को आदेश दे रखा है कि टीमें ट्रायल से चुनी जाएं। ऐसे में एनआरएआई ने खुद को खेल मंत्रालय का वफादार साबित करने के लिए ट्रायल पर नहीं आए बिंद्रा को टीम से बाहर कर दिया। उसने यह भी नहीं सोचा कि यह वही अभिनव है, जिसने ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत के स्वर्ण पदक जीतने के इंतजार को खत्म कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।
इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि विश्वकप और राष्ट्रमंडल खेलों सरीखी महत्वपूर्ण स्पर्धाओं में देश का शीर्ष निशानेबाज हिस्सा नहीं ले पाएगा? अगर बिंद्रा इनमें हिस्सा लेते तो निश्चित ही भारतीय टीम के पदकों की संख्या में इजाफा होता और कई नौजवान उन जैसा बनने की प्रेरणा लेते, लेकिन जिस देश में खेल संघ राजनीति का अखाड़ा हो और सरकार के पास कोई स्पष्ट खेल नीति नहीं, वहां ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। खेल मंत्रालय की अस्पष्ट नीति के कारण ही खिलाडिय़ों और खेल संघों के बीच मतभेद पैदा होते हैं, जिसका नुकसान खेल प्रतिभाओं को झेलना पड़ता है। नतीजतन एक अरब की आबादी का देश अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एक अदद पदक और जीत के लिए तरसता रहता है। बिंद्रा मामले के बहाने देश की खेल नीति की बेशुमार कमजोर कडिय़ां एक बार फिर सामने आ गई हैं। खेल मंत्रालय कहता है कि बिना ट्रायल खिलाडिय़ों को टीम में न रखा जाए और बाद में उसके अधिकारी कहते हैं कि अगर संघ चाहे तो ऐसे खिलाडिय़ों को बिना ट्रायल के चुन सकते हैं, जबकि सबसे बड़ा पेच यही है। दुर्भाग्य से देश में खेल के साथ खिलवाड़ करने और खिलाडिय़ों के भविष्य को बर्बाद करने वाली ऐसी घटनाओं की फेहरिस्त दिनोंदिन लंबी होती जा रही है। यदि सरकार ने अपनी खेल नीति और खेल संघों ने अपने कामकाज के तरीके को नहीं सुधारा तो स्थिति और भयावह होगी। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में प्रतिस्पर्धा कड़ी होती जा रही है, तब यदि हमें कहीं ध्यान देने की जरूरत है तो वह है सुविधाओं का विकास और खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन, ताकि वे मैदान पर भी भारत की बुलंदी के झंडे गाड़ सकें।

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