Tuesday, December 14, 2010

नाकाम निजाम

राज्य की अशोक गहलोत सरकार में शांति धारीवाल नंबर दो पोजीशन पर हैं। उनके पास न केवल सर्वाधिक महत्वपूर्ण विभाग हैं, बल्कि मुख्यमंत्री ने भी उन्हें पूरी ताकत दे रखी है, लेकिन यह निजाम हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहा है। गहलोत को भी उनकी नाकामी लगातार खटक रही है।

शांति धारीवाल। गहलोत सरकार में काबीना मंत्री। गृह, विधि, स्वायत्त शासन व नगरीय विकास सरीखे अहम मंत्रालयों का जिम्मा तो उनके पास है ही, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि सरकार में हैसियत के नजरिए से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद उनका ही नंबर आता है। अशोक गहलोत ने भी उन्हें पूरी तवज्जों दी और कई मौकों पर साबित भी किया कि धारीवाल उनके सबसे पसंदीदा हैं, लेकिन यह धारीवाल की बदकिस्मती ही है कि वे गहलोत की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। जाने-अनजाने इस तरह की परिस्थितियां बन जाती हैं जो धारीवाल की सियासी सेहत के लिए माकूल नहीं होतीं। मुख्यमंत्री की नजरों में उनकी इमेज अब पहले जैसी नहीं रही है। पार्टी से जुड़े सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि गहलोत ने उनके पर कतरना शुरू कर दिया है और वे उनके विकल्प की तलाश में हैं।
वैसे ऐसो नहीं है कि धारीवाल और गहलोत भी कोई पुरानी दोस्ती रही हो। इसे महज एक संयोग कहें या धारीवाल की बुलंद किस्मत कि इस बार के विधानसभा चुनाव में गहलोत के साख माने जाने वाले ज्यादातर दिग्गज नेता चुनाव हार गए। जब मंत्रिमंडल गठन की बात आई तो अनुभवी, वरिष्ठ, तेजतर्रार की कसौटी पर धारीवाल सबसे ज्यादा खरे उतरे लिहाजा उन्हें मुख्यमंत्री ने सबसे अहम जिम्मेदारियां सौंप दीं। यहां तक कि विधानसभा में मुख्यमंत्री से पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर भी धारीवाल देते। एक बार विधानसभा सत्र के दौरान जब धारीवाल सीने में दर्द के चलते अस्पताल में भर्ती हो गए तो गहलोत बहुत असहज हो गए थे। शुरूआती दौर में धारीवाल का प्रदर्शन भी शानदार रहा और उन्होंने गहलोत का दिल जीत लिया। चाहे कानून व्यवस्था की बात हो या नगरीय विकास की नई योजनाओं की या फिर कोई सियासी मुसीबत, धारीवाल ने अपने कामकाज की छाप हमेशा छोड़ी। प्रदेश में कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ, अपराधों का ग्राफ नहीं बढ़े, पुलिस की साख भी सलामत रही, जयपुर में मेट्रो की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी मिली, भूमाफिया पर शिकंजा कसा गया, वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार की बड़ी वजह बने भूमि नियमन के 90बी नियम में संशोधन किया गया...। लेकिन, ये सब धारीवाल के शुरुआती दिनों की उपलब्धियां हैं, धीरे-धीरे उनके कामकाज में सुस्ती आने लगी और गहलोत की नजरों में उनका तिलिस्त भी बरकरार नहीं रहा।
उन्हें सबसे ज्यादा असफलता गृह मंत्री होने के नाते मिल रही है। पिछले कुछ समय में ही दो-तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं जो गृह मंत्रालय की असफलता को इंगित करने के लिए काफी हैं। भला कौन यकीन करेगा कि एक पुलिस स्टेशन में कुछ पुलिसवाले, उसी थाने में तैनात अपनी एक साथी महिला कांस्टेबल का रेप और मर्डर कर दें। दिल दहला देने वाला ये वाकया और कहीं का नहीं बल्कि धारीवाल के गृह जिले कोटा जिले के चेचट पुलिस स्टेशन का है। कांस्टेबल माया यादव चेचट थाने में ही दो पुलिसवालों देशराज और तुलसीराम ने न सिर्फ उसके साथ बलात्कार किया बल्कि उसका मर्डर भी कर डाला। बात यहीं खत्म नहीं हुई, महिला कांस्टेबल के रेप और मर्डर के बाद पूरे मामले को दूसरा रंग देने की भी कोशिश की गई। चेचट में हुई इस शर्मनाक घटना से कुछ दिन पहले ही झालावाड़ जिले के मनोरहथाना में भी पुलिस ने आतंक मचाया था। हुआ यूं था कि एक युवती के साथ सामूहिक ज्यादती करने वालों के खिलाफ भील समाज के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान ही स्थिति बिगड़ गई और पुलिस ने फायरिंग कर दी तो भीलों ने पथराव। पत्थरबाजी में घायलों की तादाद 36 से ज्यादा पहुंची जबकि फायरिंग की घटना में भील समाज के एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई और एक अन्य युवक ने झालावाड़ अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। जब हाड़ौती में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बदतर है तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में क्या हाल होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। कुछ महीने पहले उदयपुर के सराड़ा में भी पुलिस ने खूब किरकिरी कराई थी। असल में यहां दो शराब व्यावसायियों के बीच विवाद था, जिसमें शहजाद और मोहन मीणा दोनों ही शराब का कारोबार करते थे। दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद बढ़ा तो शहजाद ने मोहन का अपहरण कर हत्या कर दी। मोहन मीणा के अपहरण और हत्या के कुकृत्य से आम अल्पसंख्यक समुदाय को कोई लेना देना नहीं था, लेकिन घटना के लगभग एक पखवाड़े बाद जानबूझकर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। वहीं नावां में तो पुलिस ने ऐसी बर्बरता की कि एक युवक ने पेरशान होकर आत्महत्या ही कर ली। युवक की मौत की खबर सुनते ही क्षेत्र के लेागों का पुलिस के प्रति गुस्सा फूट पड़ा।
प्रदेश की कानून-व्यवस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो बार तो मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लग चुकी है। दौसा संसदीय क्षेत्र से सांसद और कभी भाजपा के लिए मुसीबत बने किरोड़ी लाल मीणा एक मामले को लेकर रात के अंधेर में पुलिस पहरे के बावजूद मुख्यमंत्री निवास में घुस गए और राजधानी के एक कार्यक्रम में छात्राओं ने इतना हंगामा किया कि मुख्यमंत्री को भाषण अधूरा छोड़ कार्यक्रम से जाना पड़ा। हद तो तब हो गई जब इन छात्राओं ने चंद घंटों बाद ही सुनियोजित तरीके से कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय पर कब्जा जमा लिया और पुलिस को भनक तक नहीं लगी। छात्राओं ने यहां काफी समय तक हंगामा किया और वे वहां से तब ही गईं जब पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान सिंह ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि पंद्रह दिन के भीतर उनकी सारी मांगे मान ली जाएंगी। सूत्रों के मुताबिक इन तीनों घटनाओं से गहलोत काफी खिन्न है और इस तरह की चर्चाएं हैं कि उन्होंने धारीवाल को बुलाकर उनकी क्लास भी ली है। धारीवाल ने उन्हें यह भरोसा भी दिलाया है कि जल्द ही व्यवस्था के कील-कांटों को दुरुस्त कर लिया जाएगा, लेकिन गहलोत उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। इन मामलों के अलावा गहलोत पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति से भी खुश नहीं हैं। प्रदेश में हत्या, लूट, चोरी आदि वारदातों में खास इजाफा हुआ है। गहलोत इस बात से खासे चिंतित है कि उनकी मंशा के बावजूद अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
मंत्रालय की नाकामियों के अलावा धारीवाल के राजनीति निर्णयों से भी गहलोत खुश नहीं है। पहले स्थानीय निकाय चुनाव और फिर पंचायत चुनावों में उन्होंने आलाकमान और संबंधित क्षेत्र के विधायक-सांसदों की इच्छा को दरकिनार कर अपने चहेते को खूब टिकट बांटे। कोटा नगर निगम से उन्होंने डॉ. रत्ना जैन को टिकट दिलाया था और जीत सुनिश्चित करने के लिए उनके दिन-रात एक भी कर दी थी। ऐसा पहली बार देखा गया कि धारीवाल खुद के अलावा किसी और के चुनाव में इतनी सघनता से प्रचार किया। वे शहर की हर गली, हर मौहल्ले में घूमे और रत्ना जैन के लिए वोट मांगे। उन्हें सबसे ज्यादा मशक्कत क्षेत्र के अल्पसंख्यक मतदाताओं को मनाने में करनी पड़ी। ये हमेशा से धारीवाल के साथ रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उपेक्षा की शिकायत के साथ ने केवल इन्होंने दूरी बना ली थी, बल्कि मंत्रीजी के खिलाफ अभियान भी छेड़ दिया था। यहां तक कि उनके जन्मदिन के आयोजन में भी उनके खिलाफ नारोबाजी हो गई।
खैर, इसे धारीवाल की मेहनत का नतीजा कहें या कांग्रेस के पक्ष में चल रही लहर कि डॉ. रत्ना जैन समेत ज्यादातर ने स्थानीय निकाय चुनावों में जीत भी हासिल की, लेकिन साथ ही पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की संख्या में भी इजाफा हो गया। ये नेता अब अंदरूनी तौर पर धारीवाल को हलकान करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इन नेताओं को यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा है कि धारीवाल महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर धौंस जमाए बैठे रहे और और उनकी नंबर दो की हैसियत बरकरार रहे। पंचायत चुनाव में तो उनका हर दाव उल्टा पड़ा। अपने चहेतों को टिकट बांटने के चक्कर में उन्होंने अपने विरोधियों को तो खूब पैदा कर ही लिया, उन्हें भी गद्दीनशीं नहीं करवा पाए जिनके लिए इतनी मशक्कत की। पूरे घटनाक्रम के बाद धारीवाल समर्थकों ने जिस तरह से सांसद इज्यराज सिंह के घर पर पत्थरबाजी की, उससे मुख्यमंत्री खासे नाराज बताऐ जाते हैं।
एक चतुर राजनेता की यह सबसे बड़ी खूबी होती है कि वह अपनी गलतियों का ठीकरा बड़ी चालाकी से दूसरे के माथे पर फोड़ देता है। धारीवाल धडल्ले से इसी सलीके से सियासत कर रहे हैं। राज्य में अब तक हुए कलेक्टर-एसपी सम्मेलन में यह परंपरा रही है कि गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन दोनों के साथ खड़े हुए नजर आते हैं, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह से बदली हुई थी। खुद गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन की खिंचाई करने में लगे हुए थे। जरा गौर फरमाइए सम्मेलन में गृह मंत्री शांति धारीवाल ने क्या कहा- ‘पिछले दिनों जब सीएम जेएलएन मार्ग पर एक कार्यक्रम में गए तो आंदोलनकारी छात्राएं उनके सामने आ गईं। इंटेलीजेंस को पता ही नहीं था। इस तरह की इंटेलीजेंस से कैसे अपराध नियंत्रित होंगे? इट्स कंपलीट फेल्योर। शहरों के थाने ऐसे लगते हैं, जैसे प्रॉपर्टी डीलिंग की दुकान हो। भूमाफिया ने थानों को शरणस्थली बना रखा है।’ धारीवाल ने ऐसा क्यों कहा यह अलग विषय है, लेकिन इससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था की पोल तो खुल ही गई।
सूत्रों के मुताबिक धारीवाल को लगातार मिल रही नाकामियों और इनके बावजूद उनके तीखे होते तेवरों ने गहलोत बेहद खिन्न हैं। यह भी चर्चा है कि गहलोत ने धारीवाल के पर कतरना भी शुरू कर दिया है। प्रतिकूल परिस्थितियों की बढ़ती फेहरिस्त से धारीवाल कितने परेशान हैं, ये उनके बुझे हुए चेहरे से आसानी से देखा जा सकता है। बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उनके ऊपर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अक्सर संयम बरतने वाले धारीवाल का धीरज भी जबाव देने लगा है और वे बात-बात पर खीज प्रकट करने लगे हैं। हालांकि उन्हें इस बात की तसल्ली भी है कि गहलोत भले ही उनसे कितने ही नाराज क्यों न हों, उन्हें बदलना आसान नहीं होगा, क्योंकि उन जैसे अनुभवी और काम के जानकार विधायक इस बार कांग्रेस के टिकट से कम ही जीत कर आए हैं।

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