रविवार, जून 21, 2009

जाति का जिन्न

चुनावों का मौसम जाने के बाद भी राजस्थान में जाति का जोर कम नहीं हुआ है। अपना राजनीति वजूद कायम रखने की जुगत में नेता सूबे के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जाति के इस जिन्न से निपटना गहलोत सरकार के लिए एक चुनौती है। एक रिपोर्ट!

अपनी सामाजिक समरसता के लिए विख्यात राजस्थान रह-रह कर उपज रहे जातिगत तनावों को झेलने के लिए अभिशप्‍त है। नेताओं ने अपने सियासी सपनों को सच करने के लिए ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि जातियों के बीच भाईचारा पनपने की बजाय कटुता और कलह बढ़ती ही जा रही है। तनाव यूं ही बढ़ता रहा तो कभी भी कोई अनिष्ट हो सकता है और राज्य में हिंसा फैल सकती है। अशोक गहलोत सरकार को भी इसका अहसास है। सरकार ने मीणा और गुर्जरों के बीच चौड़ी होती खाई को पाटने के मकसद से दोनों जातियों के आला नेताओं के साथ मिलकर एक रोड मेप तैयार किया है। कमाल की बात तो यह है कि माहौल को ठीक करने के लिए अपनी-अपनी जाति के पेरोकार नेता सरकार के साथ तो सुर में सुर मिलाते हैं, पर जमीनी स्तर पर द्वेष बढ़ाने वाले काम ही ज्यादा करते हैं।
राजस्थान में जाति की जाजम पर बैठकर अपनी सियासत चलाने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। इनमें से कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला इन दिनों खासी चर्चाओं में है। गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए दो बड़े आंदोलनों के सूत्रधार रहे बैंसला भाजपा का दामन थाम संसद में पहुंचना चाहते थे, लेकिन मामूली अंतर से चुनाव हार गए। इस हार के बाद अपनी राजनीति सिमटती देख बैंसला फिर से अपनी पुरानी भूमिका में आ गए हैं और गुर्जरों को एसटी आरक्षण का दिए जाने का राग अलापने लगे हैं। वे गुर्जरों की सहानूभति और समर्थन बटोरने का कोई भी मौका नहीं चूकते। पिछले दिनों सवाई माधोपुर जिले के बामनवास में गुर्जर और मीणाओं के बीच हुई हिंसक झड़पों के तुरंत बाद वे घटनास्थल पर पहुंच धरने पर बैठ गए थे। वे जहां भी जाते हैं लोकसभा चुनावों में महज 300 वोटों से मिली हार का जिक्र करना नहीं भूलते। वे इसकी वजह मतदान और मतगणना में भारी धांधली बताते हैं और इसके लिए विजयी रहे नमोनारायण मीणा के अलावा समूची मीणा बिरादरी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।
ये सब बैंसला की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे गुर्जरों का खोया हुआ वि’वास पाने की मुहिम में जुटे हैं। दरअसल, भाजपा का दामन थाम लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद से गुर्जर बैंसला से खुश नहीं हैं। विशेष रूप से गुर्जरों की युवा पांत बैंसला पर स्वयं की राजनीति के लिए समाज का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है। इन लोगों में बैंसला के प्रति गुस्सा इस बात को लेकर है कि कर्नल उस पार्टी में शामिल हो गए जिसकी सरकार ने 70 गुर्जरों को मौत के घाट उतारा। समाज के लोग अब कर्नल और वसुंधरा सरकार के समझौतों पर भी अंगुलियां उठा रहे हैं। गौरतलब है कि इन समझौतों की ज्यादातर बातों पर अमल नहीं पाया है। मसलन, मृतकों के आश्रितों को सरकारी नौकरी, मुकदमों की समाप्ति और आंदोलनकारियों की रिहाई। वैसे गुर्जरों को दो बड़े आंदोलन करने के बाद भी सिवाय तबाही के कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्हें वसुंधरा सरकार द्वारा घोषित विशेष श्रेणी के तहत पांच फीसदी आरक्षण का लाभ भी अभी तक नहीं मिल पाया है। इस आशय के विधेयक को विधानसभा में तो पारित कर दिया था, पर यह अभी तक राजभवन में ही अटका हुआ है।
सूत्रों की मानें तो कर्नल बैंसला गुर्जरों को अपनी अगुवाई में संगठित कर फिर से एक बड़ा आंदोलन करना चाहते हैं। उनकी योजना तो 10 जून को भरतपुर जिले के महरावर गांव में महापंचायत के साथ ही आंदोलन शुरू करने की थी, पर क्षेत्र के गुर्जरों की ओर से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्होंने इसमें बदलाव कर दिया है। नई रणनीति के तहत बैंसला ने कई जातियों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर आंदोलन को व्यापक बनाने की कोशिश की है। बैंसला के कहे को सही मानें तो अगला आंदोलन पश्‍िचमी राजस्थान से शुरू होगा और इसे शांतिपूर्ण तरीके से देश भर में चलाया जाएगा। जब कर्नल बैंसला से आंदोलन के मकसद के बारे में पूछा तो वे इधर-उधर की बातें छोड़ तुरंत ही पुराने ढर्रे पर आ गए और कहा कि ‘हमने गुर्जरों को एसटी में शामिल करने की मांग के साथ आंदोलन शुरू किया था और आज भी हम उसी पर कायम है। यह सरकार को तय करना है कि वह गुर्जरों को एसटी दर्जा कैसे देती है। आने वाले कुछ दिनों में कोर कमेटी मुख्यमंत्री से मिलकर अपना पक्ष रखेगी। यदि सरकार हमारी बात मानती है तो ठीक, नहीं तो हम आंदोलन करेंगे। यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन होगा और ठोस निर्णय होने पर ही पूरा होगा।’
विश्‍लेषकों के मुताबिक कर्नल बैंसला के क्रियाकलापों से साफ झलकता है कि वर्तमान हालातों में उनका इरादा गुर्जरों का सिरमौर बने रहने के सिवा कुछ नहीं है। यदि वे कोई आंदोलन करेंगे तो गुर्जरों के बीच रहते हुए और गुर्जरों के दम पर करेंगे। आरक्षण आंदोलन को देशव्यापी बनाने और अन्य जातियों को इसमें शामिल करने की बातें बैंसला तभी तक कर रहे हैं जब तक गुर्जर पुराने समर्पण के साथ उनके पीछे खड़े नहीं हुए हैं। जिस दिन गुर्जर पहले की तरह कर्नल के एक इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार हो गए, आंदोलन शुरू हो जाएगा और सिर्फ गुर्जरों के हक की बात होगी। यदि बैंसला गुर्जरों को आंदोलन के लिए तैयार कर लेते हैं तो भाजपा उनका साथ देने के लिए तैयार खड़ी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा और विशेष रूप से वसुंधरा राजे गुर्जरों का एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए बैंसला की किसी भी हद तक मदद करने को तैयार हैं। प्रह्लाद गुंजल के रूप में एक आक्रामक गुर्जर नेता की घर वापसी भी महारानी के लिए मुफीद साबित होगी। कुल मिलाकर आने वाले समय में राजस्थान को एक और आंदोलन झेलना पड़ सकता है।
जाति के दम पर राजनीति करने वालों की चर्चा हो और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है। मीणा समाज में इनके बराबर कद का कोई नेता नहीं है। डॉ. किरोड़ी को नजदीक से जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वे जाति के मामले में वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। जब गुर्जरों ने एसटी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया था तो किरोड़ी ने खूब हंगामा किया था। इन दिनों उनके बंगले पर मीणा समाज के लोगों का मजमा लगा रहता था। सब डॉ. किरोड़ी के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार थे। इन लोगों के दम पर वे आरक्षण के मुद्दे पर अपनी पार्टी की सरकार के उपर ही पिल पड़े। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने महारानी को साफ तौर पर चेतावनी दी थी कि गुर्जरों को आरक्षण देकर एसटी कोटे से छेड़छाड़ की गई तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस दौरान हुई तनातनी इतनी आगे बढ़ गई कि किरोड़ी को भाजपा से विदा होना पड़ा। भाजपा के बिना भी उन्होंने अपना सियासी वजूद कायम रखा और पहले विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीतने में सफल रहे। दोनों दफा उन्होंने जमकर ‘कास्ट कार्ड’ खेला। किरोड़ी ने इन चुनावों को पूरी मीणा बिरादरी की प्रतिष्ठा का प्र’न बनाते हुए वोट मांगे। लोगों ने उन्हें जमकर वोट दिए और वे अच्छे अंतर से जीतने में सफल हुए।
सियासत की आक्रामक शैली को पसंद करने वाले किरोड़ी इन दिनों खूब गरज रहे हैं। इस बार उनका निशाना वसुंधरा राजे नहीं होकर अशोक गहलोत और केंद्र की मनमोहन सरकार है। कर्नल बैंसला द्वारा गुर्जर आरक्षण का ’शिगूफा छोड़े जाने के बाद डॉ. किरोड़ी ने एक बार फिर से चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि एसटी कोटे से छेड़छाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी। उनके ये तल्ख बयान मीणा समाज में तो उनकी खास बढ़ा रहे हैं, पर गुर्जर समाज के लिए तो वे खलनायक ही साबित हो रहे हैं। गुर्जर ही नहीं अन्य कई जातियों को भी किरोड़ी का मीणाओं के पक्ष में कट्टर स्वाभाव नहीं भा रहा है। पिछले दिनों दौसा में एक युवती के अपहरण की घटना के बाद क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों ने डॉ. किरोड़ी पर अपहरणकर्ताओं को बचाने का आरोप लगाया था।
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा को भी बड़ा मीणा नेता माना जाता है। हालांकि कट्टरता के मामले में वे किरोड़ी के पासंग भी नहीं हैं। उनकी छवि एक ‘सोफ्ट कास्ट लीडर’ की है। वैसे जाति के दम पर खम ठोकने वाले गुर्जर और मीणा नेता ही नहीं हैं, इसमें जाट, राजपूत और ब्राह्मण नेता भी शामिल हैं। हालांकि ये लोगों को उस स्तर का तनाव देने में सक्षम नहीं हैं। सरकार या राजनीतिक दलों के लिए इन नेताओं को काबू में करना भले ही मुश्‍िकल हो, पर लोग इनकी तरफ से निश्‍िचंत रहते हैं। कांग्रेस की ही बात करें तो राज्य व केंद्र में मंत्री पद की मलाई बंट जाने के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर खींचतान हो रही है। जहां शीशराम ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने के बाद कई जाट नेता अपनी दावेदारी जता रहे हैं वहीं, ब्राह्मण और दलित अपनी बारी बता रहे हैं। कुछ दिनों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों का भी यही हाल है। जाति के आधार पर प्रतिनिधत्व मांगा जा रहा है। अशोक गहलोत प्रदेशाध्यक्ष और राजनीतिक नियुक्तियों के मसले को मो सुलझा लेंगे पर राजनीति के चलते फैले जातिगत वैमनस्य को कब तक दुरूस्त कर पाएंगे, यह देखना होगा।

गुरुवार, जून 18, 2009

धांधली या पश्‍िचम की धौंस

ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनेजाद का दुबारा चुने जाने की घोषणा के बाद उपजा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। पराजित प्रत्याशी मीर हुसैन मुसावी ने चुनावों में भारी धांधली का आरोप लगाते हुए परिणामों को खारिज कर दिया है। वे इस चुनाव को रद्द कर फिर से मतदान की मांग कर रहे हैं। उनके समर्थक देशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं। कई जगह प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया है और लोगों के मारे जाने की भी खबरें आ रही हैं। मामला बिगड़ता देख गार्डियन काउंसिल ने चुनाव परिणामों को अस्थाई घोषित कर दिया है। इस रोक को अहमदीनेजाद की कमजोर होती पकड़ के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। वैसे देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अभी भी अहमदीनेजाद के पक्ष में हैं। गार्डियन काउंसिल के ज्यादातर मौलवी भी उनके पक्ष में हैं। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम है कि परिणामों को निरस्त किया जाएगा और देश में फिर से चुनाव होंगे।
चुनावों में अहमदीनेजाद की भारी जीत को विपक्षी खेमा पचा नहीं पा रहा है। मुसावी लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि वोटों की गिनती के दौरान भारी हेराफेरी की गई है। हालांकि राष्ट्रपति अहमदीनेजाद और गार्डियन काउंसिल ने ऐसे इलाकों में वोटों की दुबारा गिनती करवाने के हामी भर दी है जहां गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है, लेकिन मुसावी इसके लिए तैयार नहीं हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि मतदान के दौरान ही लाखों मतपत्रों का गायब कर दिया गया था और बड़ी संख्या में लोग अपना वोट नहीं डाल पाए तो दुबारा वोट गिने जाने का क्या अर्थ है? उल्लेखनीय है कि ईरान की जनता ने इन चुनावों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। 85 प्रतिशत से भी ज्यादा तमदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो कि एक रिकॉर्ड है। हालांकि मतदान के दौरान कई जगह मतपत्र समाप्त हो जाने और कई लोगों के वोट नहीं डाल पाने की खबरें मीडिया में आई थीं। मुसावी ने भी इस तरह की अनियमितताएं होने का बयान दिया था, पर उन्होंने उस समय चुनाव आयोग से ऐसे मतदान केंद्रों पर फिर से मतदान कराने की गुजारिश नहीं की।
दरअसल, मुसावी को अपनी जीत का पूरा भरोसा था, पर परिणामों ने उन्हें हैरत में डाल दिया है। उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में भी वे अहमदीनेजाद से बड़े अंतर से पिछड़े हैं। इन चुनावों में मुसावी ने देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को और अहमदीनेजाद ने ईरान की संप्रभुता तथा प्रतिष्ठा को मुद्दा बनाया था। चूंकि अहमदीनेजाद एक भावनात्मक मसले पर चुनाव लड़ रहे थे इसलिए उन्हें जनता का ज्यादा समर्थन मिला। पिछले कुछ सालों में अमरीका और इजराइल की खुली खिलाफत करने के कारण ईरान में अहमदीनेजाद की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। इसी साल अप्रैल में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के नस्लभेद सम्मेलन में जब उन्होंने इजराइल को नस्लभेदी बताया था तो ईरान वापसी पर उनका हीरो सरीखा स्वागत हुआ था। परमाणु कार्यक्रम के मसले पर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के भारी दबाव के बाद भी अहमदीनेजाद टस से मस नहीं हुए। चुनावों में भी उनके यही भावनात्मक मुद्दे कारगर साबित हुआ और जनता ने उन्हें भारी समर्थन दिया।
अहमदीनेजाद को मिले भारी मतों के बावजूद मुसावी की काबिलियत पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। वे एक अच्छे आर्थिक सुधारक हैं। 1981 से 89 तक ईरान के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अच्छा काम किया। इस दौरान उनकी आर्थिक नीतियों की सभी ने सराहना की। यह इराक के साथ टकराव का दौर था, लेकिन मुसावी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पटरी से नहीं उतरी। मुसावी ने अहमदीनेजाद की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए देश की जनता से वोट मांगे थे। उन्हें उम्मीद थी कि जिस प्रकार 1997 में सुधारवादी नेता मोहम्मद खातमी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा वोट पाकर राष्ट्रपति बने थे, ठीक वैसा ही समर्थन उन्हें हासिल होगा। चुनाव के दौरान खातमी ने मुसावी के पक्ष में जमकर प्रचार भी किया था। लाख कोशिशों के बाद भी मुसावी देश की अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने के सपने को लोगों की भावनाओं के साथ जोडऩे में असफल रहे और उन्हें राष्ट्रपति बनने लायक समर्थन नहीं मिला। चुनाव में मिली हार के बाद मुसावी जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं वह समझ से परे हैं। वे अपनी हार के लिए उसी सिस्टम को दोष दे रहे हैं जिसका वे वर्षों तक हिस्सा रहे हैं। 8 साल तक देश का प्रधानमंत्री रहने के बाद वे 6 साल तक राष्ट्रपति के सलाहकार रहे। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने चुनाव के दौरान होने वाली गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने की मुहिम नहीं छेड़ी और न ही लोकतंात्रिका प्रक्रिया को पारदर्शी और जबावदेह बनाने का काम किया।
ईरान में जिस तरह का लोकतंत्र है, उसमें इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव की दौरान अनियमितताएं नहीं हुई होंगी, पर इस बात की कोई गारंटी नही है कि फिर से चुनाव कराने पर ये स्वतंत्र और निष्पक्ष ही होंगे। देश में जब तक सत्ता सर्वोच्च नेता और गार्डियन काउंसिल के पास केंद्रित रहेगी, ज्यादातर निर्णय और प्रक्रियाएं संदेहास्पद ही रहेंगी। बस, इस पर अगुंली उठाने वाले हाथ बदल जाएंगे। ईरान के लोकतंत्र में कई खामियां हैं। यहां शासन की वास्तविक शक्ति जनता से चुने प्रतिनिधियों के पास नहीं बल्कि मौलवियों और रूढ़ीवादियों के पास रहती है। संविधान के मुताबिक तो राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रमुख होता है, पर सर्वोच्च नेता और गार्डियन काउंसिल की सहमति के बिना वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकता है। रक्षा और विदेश मामलों के बारे में सभी फैसले का अधिकार सर्वोच्च नेता के पास होता है। इसके अलावा कार्यपालिका का वास्तविक संचालन गार्डियन काउंसिल करती है। मजलिस यानी संसद में पेश होने वाले विधेयकों को इस काउंसिल से अनुमोदित कराना होता है। यहां तक कि चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों के नामों को भी काउंलिस हरी झंडी देती है। हालिया चुनावों में उसने ऐसे 2005 में चुनाव लडऩे वाले सैकड़ों उम्मीदवारों पर प्रतिबंध लगा दिया था।
ईरान में उपजे हालातों पर पश्चिम देशों के रुख का जिक्र करना भी जरूरी है। ईरान के चुनावों परिणामों से मुसावी के बाद सबसे ज्यादा दुख ये देश ही मना रहे हैं। परिणाम आते ही यहां के मीडिया ने अहमदीनेजाद की जीत को कट्टरपंथ की जीत बताते हुए चिंता जाहिर करना शुरू कर दिया। अहमदीनेजाद हमेशा से इन देशों की आंख का कांटा रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम के अलावा कई मौकों पर उन्होंने इन देशों की बादशाहत की हंसी उड़ाई है। दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी वे कह चुके हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में ये देश ऐसा कोई मौका नहीं चूकना चाहते जिसमें अहमदीनेजाद को सत्ता से बाहर होने की संभावना बनती हो। इसी के तहत ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शन को पश्चिम जगत का मीडिया कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर दिखा रहा है। मंगलवार को तेहरान में हुई रैली को ईरान के इतिहास की सबसे बड़ी रैली के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जबकि तस्वीरों और वीडियो फुटेज से तो ऐसा कुछ प्रतीत नहीं होता है। प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ और सुरक्षाकर्मियों के कड़े रुख की खबरों के बीच जो आंकड़े दिए जा रहे हैं वे और भी ज्यादा हास्यास्पद लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि रैली में सुरक्षाकर्मियों की ओर से की गई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई और सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लाखों की भीड़ पर गोली चलाई जाए और एक ही व्यक्ति की मौत हो, ऐसा कैसे हो सकता है?
पश्चिमी मीडिया अपने हितों की खातिर पहले भी ऐसा भ्रामक कवरेज करता आया है। वह तथ्यों को इस तरह से पेश करता है कि शेष विश्व को लगता है कि यहां तो हालत बहुत ज्यादा खराब है। इस मामले में इराक का उदाहरण लिया जा सकता है। पश्चिमी मीडिया ने यहां किस तरह से अपने मुताबिक सच को तोड़ा-मरोड़ा। ईरान की स्थिति की भ्रामक तस्वीर पेश करने में अमरीकी मीडिया जितना तत्परता दिखा रहा है उसका पासंग भी इराक में अमरीकी सेना के अत्याचारों को दिखाने में लगाया होता तो दुनिया का दादा बनने वाला देश कब का नंगा हो चुका होता। बहरहाल, ईरान ने बहुत जल्दी पश्चिमी देशों के इरादों का भांप लिया है और सरकार ने विदेशी मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। सरकार की अनुमति के बिना अब कोई भी विदेशी मीडियाकर्मी यहां से रिपोर्टिंग नहीं कर पाएगा और न ही प्रदर्शन स्थल पर मौजूद रहेगा। कड़ी पाबंदियों के चलते विदेशी मीडियाकर्मी प्रदर्शन स्थल पर तो नहीं जा रहे हैं, पर माहौल को भयावह बताने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए अब सबसे ज्यादा इस्तेमाल साइबर मीडिया हो रहा है। ईरानी सरकार अब इस पर नजर लगाए हुए है और प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है।

शनिवार, मई 30, 2009

ओला के बहाने


शीशराम ओला को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलना सूबे की जाट राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। राजस्थान में कांग्रेस की नई जाट लॉबी जन्म ले चुकी है। पार्टी पुराने चेहरों से तौबा कर युवाओं पर दांव खेल रही है। किसका दिमाग है इसके पीछे? अंदर की कहानी!

शेखावाटी। राजस्थान का जाट बाहुल्य इलाका। देश की सेना में ही नहीं, राजनीति में भी यहां की तूती बोलती है। सरकार चाहे किसकी भी हो शेखावाटी की भागीदारी हमेशा दमदार रहती है। परंपरागत रूप से इस क्षेत्र को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में भाजपा इसमें सेंध लगाने में कामयाब रही। हालांकि हाल ही में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने अपने पुराने गढ़ पर फिर से कब्जा जमा लिया है। कांग्रेस के प्रदर्शन में आए उतार-चढ़ाव के बीच एक ऐसे नेता भी रहे जिन्होंने अपने क्षेत्र में हमेशा पार्टी का झंडा बुलंद रखा। जी हां, हम बात कर रहे हैं दिग्गज जाट नेता शीशराम ओला की। ओला झुंझुनूं से लगातार पांचवीं बार सांसद चुने गए हैं। इससे पहले पहले वे दो दफा विधायक भी रह चुके हैं। दो-दो बार केंद्र व राज्य में मंत्री भी रहे हैं।
पंद्रहवीं लोकसभा के नतीजे आ रहे थे तो ओला के घर जश्न का माहौल था। जश्न महज सांसद बनने का नहीं था, बल्कि कैबीनेट मंत्री बनने की संभावनाओं का था। जो भी बधाई देने आ रहा था वो यह ही कह रहा था, 'इस बार तो कैबीनेट मिनिस्ट्री पक्की है।' स्वयं ओला को भी इस बात का पूरा यकीन था कि चुनावों में कांग्रेस के बेहद अच्छे प्रदर्शन का इनाम उन्हें भी मिलेगा और प्रमोशन के तौर पर उन्हें कैबीनेट मंत्रालय मिलेगा, लेकिन हुआ इसका उलट। कैबीनेट की उम्मीद लगाए बैठे ओला को सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भी जगह नहीं मिली। उन्होंने अपने स्तर पर खूब हाथ-पांव मारे, लेकिन कोई भी उनका साथ देने को कोई तैयार नहीं हुआ। वे जहां भी गए उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
ओला के दरकिनार होने के एक नहीं कई कारण हैं। अशोक गहलोत के साथ छत्तीस का आंकड़ा उन्हें इस बार भारी पड़ गया। गौरतलब है कि ओला और गहलोत में कभी नहीं बनी। कई मौकों पर तो दोनों के बीच की खींचतान सार्वजनिक तौर पर दिखी गई। ताजा उदाहरण विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई दावेदारी का है। इस दौरान ओला ने न सिर्फ मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश की, बल्कि उनके समर्थकों ने पार्टी पर्यवेक्षकों के सामने गहलोत के विरोध में जमकर नारेबाजी भी की। दरअसल, ओला की राजनीति महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं है। उनके मन में राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का सपना आज से नहीं, बरसों से है। अशोक गहलोत के आने से उनके इस सपने को ग्रहण लग गया। इसलिए वे हमेशा गहलोत विरोधी खेमे की ओर ही रहे। उन्होंने गहलोत को सूबे की सियासत से रुखसत करने की जी तोड़ कोशिश की। गहलोत पर जाट विरोधी होने का ठप्पा लगाना भी इसी मुहीम का एक हिस्सा था, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।
मुख्यमंत्री बनने तक गहलोत, ओला के खिलाफ सुरक्षात्मक मुद्रा में रहे, लेकिन इसके बाद वे आक्रामक हो गए। लोकसभा चुनावों में टिकट वितरण के समय ही गहलोत ने ओला को किनारे करने की पूरी व्यूह रचना रच ली थी। सूबे में जितने भी जाट नेताओं को टिकट दिया गया, ओला को छोड़कर सभी गहलोत की पसंद के थे। ये सब जीतने में भी सफल रहे। केंद्र में सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो मंत्री बनने-बनाने की लॉबिंग में ओला के साथ इनमें से कोई जाट नेता खड़ा नजर नहीं आया। गहलोत ने इस बात का भी ख्याल रखा कि ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने से कहीं जाट नाराज न हो जाएं, इसलिए उन्होंने सीकर सांसद महादेव सिंह खंडेला को मंत्री बनवा दिया। खंडेला, गहलोत के खास सिपेहसालार हैं।
ओला को साइडलाइन कर खंडेला को मंत्री बनवाकर गहलोत ने विधानसभा चुनाव के दौरान शुरू की गई रणनीति को ही आगे बढ़ाया है। इसके तहत गहलोत राजस्थान में नई जाट लॉबी को सक्रिय करने पर काम कर रहे हैं। उन्हें इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। शीशराम ओला के अलावा नारायण सिंह, कमला बेनीवाल, हरेंद्र मिर्धा, कर्नल सोनाराम, रिछपाल मिर्धा, डॉ. हरि सिंह, रामेश्वर डूडी, राजेंद्र चौधरी सरीखे गहलोत विरोधी नेताओं को कांग्रेस में किनारे किया जा रहा है। कुछ विधानसभा चुनाव में अलग-थलग हो गए, तो कुछ को लोकसभा चुनाव ने पीछे धकेल दिया है। इन नेताओं ने कभी भी गहलोत का समर्थन नहीं किया, उल्टे विधानसभा चुनाव से पहले आलाकमान तक भी ऐसी खबरें पहुंचाई थीं कि गहलोत के रहते जाट कांग्रेस के साथ नहीं आएंगे। नतीजों के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भी इन नेताओं ने गहलोत का विरोध किया था, लेकिन आखिर में आलाकमान ने उन्हीं के नाम पर मुहर लगाई। मुख्यमंत्री बनने के बाद जाट राजनीति पर भी गहलोत का जादू असरकारी साबित हो रहा है। गहलोत के साथ अब जाट नेताओं की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी है। महादेव सिंह खंडेला, हरीश चौधरी, ज्योति मिर्धा, बद्रीराम जाखड, लालचंद कटारिया, विश्वेंद्र सिंह, डॉ. चंद्रभान, रामलाल जाट, महेंद्र चौधरी, वीरेंद्र बेनीवाल, रीटा चौधरी, रूपाराम डूडी सरीखे जाट नेता गहलोत के बेहद करीबी हैं। राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील को वे पहले ही उनके पाले में आ चुके हैं। गहलोत के साथ खड़े जाट नेता संख्या और ताकत दोनों में ही विरोधी खेमें से मजबूत हैं। ये नेता युवा हैं और लोगों में इनकी अच्छी पकड़ है। गहलोत के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इनमें से कई राहुल गांधी की भी पसंद हैं।
प्रदेश की जाट राजनीति को अपने हाल पर छोड़ शीशराम ओला पर वापिस आएं तो इस बार मंत्री पदों को लेकर कांग्रेस ने डीएमके के साथ जिस तरह से कड़ा रुख अपनाया उससे साफ हो गया था कि मनमोहन सिंह और राहुल गांधी मंत्रियों की योग्यता पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। ओला के पास कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता नहीं है। वे महज मेट्रिक पास हैं। 82 साल की उम्र भी उनके लिए नुकसानदायक साबित हुई। राहुल गांधी इनते बुजुर्ग नेता को मंत्री बनाने के लिए राजी नहीं हैं। मनमोहन सिंह तो पहले से ही मंत्री रहते हुए ओला के प्रदर्शन से नाखुश थे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक पिछली सरकार में ओला का प्रदर्शन औसत से भी नीचे रहा, इसलिए किसी ने भी उनको वापिस मंत्री बनाए जाने की पैरवी नहीं की। पिछली बार भी उन्हें मजबूरी में ही मंत्री बनाया गया था, क्योंकि राजस्थान से कांग्रेस के वे ही इकलौते जाट सांसद थे। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी भी उनसे खुश नहीं बताई जाती हैं। ओला का राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी पेश करना उन्हें काफी अखरा था। ओला समर्थकों द्वारा पर्यवेक्षकों के सामने की गई नारेबाजी की रिपोर्ट भी सोनिया गांधी को मिली थी।
ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने के लिए कोई कितने भी तर्क दे, लेकिन वे उन्हें मानने को तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार यह सब उनकी सियासत को समेटने की साजिश है। जब हमने उनसे यह पूछा कि यह साजिश कौन रच रहा है तो उन्होंने अशोक गहलोत का नाम तो नहीं लिया, पर उनकी ओर इशारा जरूर कर दिया। वे स्वयं तो गहलोत के खिलाफ कुछ नहीं बोले, लेकिन उनके बेहद करीबी माने जाने वाले एक शख्स ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर हमें बताया कि 'अशोक गहलोत के कहने पर ही ओला साहब को मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है, वर्ना उनका कैबीनेट मंत्री बनना पक्का था। गहलोत ने विधानसभा चुनाव में ओला साहब की ओर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी किए जाने का बदला लिया है। मुख्यमंत्री उनकी राजनीति खत्म कर स्वयं के लोगों को आगे लाना चाहते हैं।' मंत्री नहीं बनाए जाने से ओला बेहद गुस्से में हैं, पर फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक पार्टी उन्हें राज्यपाल बनाकर सम्मानजनक विदाई देना चाहती है। आलाकमान की ओर से ओला को इसकी सूचना भी भिजवाई गई है, पर ओला इस पर राजी नहीं है। वे सक्रिय राजनीति में ही रहना चाहते हैं। वे अभी भी गहलोत के साथ दो-दो हाथ करने के मूड में हैं। इसके लिए उन्होंने यह रणनीति भी बनाई थी कि गहलोत की वजह से एक जाट मंत्री नहीं बन पाया, लेकिन महादेव सिंह खंडेला को मंत्री बनवाकर गहलोत ने उनसे यह मौका भी छीन लिया है। खंडेला न केवल जाट हैं, बल्कि उनके शेखावाटी से ही हैं। खंडेला के मंत्री बनने के बाद ओला समर्थकों का एक वर्ग उनके ऊपर राज्यपाल बनने के लिए हामी भरने के लिए दबाव बना रहा है। उनका मानना है कि उम्र के इस पड़ाव पर पार्टी की खिलाफत करके उन्हें फजीहत के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा। देर से ही सही, धीरे-धीरे ओला को भी ये समझ में आ रहा है।
ओला एपीसोड के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि राजस्थान में गहलोत को चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं है। ओला के बहाने उन्होंने अपने कई विरोधियों की बोलती बंद कर दी है। गहलोत राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह चीजों को अपने पक्ष में कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में गठन में जिस तरह से उनकी तूती बोली, उससे साफ हो गया है कि राजस्थान में से किसी कांग्रेसी को आगे बढऩा है तो गहलोत के साथ बिना ऐसा होना संभव नहीं है। इसलिए गहलोत विरोधी खेमे के हौंसले पस्त होते जा रहे हैं और उनके समर्थकों को कारवां बढ़ता जा रहा है। कुल मिलाकर गहलोत ने राजस्थान में एकछत्र राज कायम कर लिया है जिसे हिलाने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं है।


गुरुवार, मई 28, 2009

गुफ्तगु - देश के सबसे युवा सांसद हमदुल्‍ला सईद से...


देश के सबसे छोटे लोकसभा क्षेत्र लक्षद्वीप से जीतकर आए 26 वर्षीय हमदुल्ला सईद पंद्रहवीं लोकसभा में सबसे युवा चेहरे हैं। हमुदल्‍ला के दिवंगत पिता पी.एम. सईद ने इस लोकसभा सीट का लगातार 37 साल तक प्रतिनिधित्‍व किया। चौदहवीं लोकसभा के चुनावों में वे महज 71 वोटों से हार गए थे, पर उनके बेटे ने पूरा हिसाब चुकता कर लिया है। कानून की पढ़ाई पढ़ चुके हमदुल्‍ला अपने पिता के कामों को तो आगे बढ़ाने से इतर बहुत कुछ करना चाहते हैं। पिछले दिनों हुई बातचीत में उन्‍होंने इन्‍हीं का जिक्र किया। प्रस्‍तुत है उनसे हुई गुफ्तगु के मुख्‍य अंश-


लोकसभा में सबसे कम उम्र सांसद होने के नाते आप सेलिब्रिटी बन गए हैं, कैसा अनुभव कर रहे हैं?

- मुझे बहुत अच्छा फील हो रहा है। सबका अटेंशन मुझे मिल रहा है। मीडिया, बाकी सांसद सब मुझसे बात कर रहे हैं और मेरी योजनाओं के बारे में पूछ रहे हैं। शुरूआत में थोड़ा दबाव महसूस कर रहा था, पर अब एकदम सहज हूं।


पढ़ाई करते-करते राजनीति में आने का मन कैसे बना?
- इंडियन सोसायटी कॉलेज पुणे से लॉ में ग्रेजुएशन करने के बाद मैं मास्टर्स डिग्री के लिए यूनाइटेड किंगडम जाने वाला था, लेकिन इतने में ही पिताजी की मृत्यु हो गई। उनके चले जाने के बाद क्षेत्र की जनता ने मुझ पर काफी प्रेशर बनाया कि मैं अपने पिता के कामों को आगे बढ़ाऊं। आखिरकार लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए मैंने चुनाव लडऩे का फैसला किया। राहुल गांधी तो काफी दिनों से चुनाव लडऩे के लिए पहले से ही कह रहे थे। वैस राजनीति मेरे लिए नई नहीं है। मेरे पिता लक्षदीप से लगातार 37 साल तक सांसद रहे। मैं स्वयं स्टूडेंट रहते हुए राजनीति में सक्रिय रहा।


राजनीति में आने का मकसद क्या है?
- जनप्रतिनिधि का एक ही काम होता है, लोगों की सेवा करना। क्षेत्र की जनता बड़ी उम्मीदों के साथ अपना नेता चुनती है। मैं किसी चमत्कार का दावा तो नहीं करता, पर जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहूंगा और उनकी समस्याओं के शीघ्र निराकरण का अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रयास करुंगा।


इस बार लोकसभा में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है, इसे आप किस रूप में देखते हैं?
- यूथ हमारे देश का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जब वह वाकी क्षेत्रों में देश का नाम रोशन कर रहा है तो राजनीति इससे क्यों अछूती रहे। यदि नौजवान लोग राजनीति में ज्यादा आएंगे तो देश का कायाकल्प हो जाएगा, क्योंकि उनमें जोश होता है और काम करने का जज्बा भी। मैं यह नहीं कह रहा कि बुजुर्ग नेताओं को राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए, वे भी हमारे साथ रहें। मेरे हिसाब से तो युवा और अनुभवी नेता मिलकर देश में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।


तो क्या आप युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करेंगे?
- युवाओं को अपनी जिम्मेदारी खुद समझनी चाहिए। राजनीतिक दल सिर्फ मौका दे सकते हैं। काम तो युवाओं को ही करना है। वैसे हमारी पार्टी युवाओं पर पूरा फोकस कर रही है। लोकसभा चुनाव में भी नौजवानों को खूब टिकट दिए गए, इनमें से ज्यादातर जीत कर भी आए। राहुल गांधी चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा युवा राजनीति में आए। मैं भी उनकी मुहिम से जुड़ा हुआ हूं। हम देश भर में ऐसे युवाओं को तलाश रहे हैं जो राजनीति में अच्छा कर सकते हैं।


देश के विकास को लेकर आपका क्या सपना है?
- दुनिया में हमारे देश की स्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाला समय हमारा है, लेकिन इसके लिए हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि व परिवहन की दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। करोड़ो लोग अभी भी शिक्षा से वंचित हैं, कुपोषण के शिकार हैं और बेरोजगार हैं। एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बदतर और क्या हो सकता है कि अभावों में उसे आत्महत्या करनी पड़ती है। यह सच्चाई है जिसे हमें स्वीकारना होगा और सुधार करना होगा।


महिलाओं के उत्थान के लिए आप क्या करना चाहेंगे?
- देश में महिलाओं की स्थिति निश्चित रूप से दयनीय है। मेरे हिसाब से महिला उत्थान के लिए सबसे अच्छा जरिया शिक्षा है। शिक्षा का स्तर बढऩे पर बाकी चीजे अपने आप ठीक होने लगती हैं। मेरे स्वयं के सात बहिनें हैं। सबने अच्छी पढ़ाई की तो अच्छी पोजीशन पर हैं, चार तो डॉक्टर हैं।


आप काफी धार्मिक प्रवृत्ति के लगते हैं, आपके मोबाइल नंबर की अंतिम तीन अंक भी 786...
- मेरे नजरिए से धार्मिक होना अच्छी बात है। मैं नियमित रूप से नमाज पढ़ता हूं। इससे मुझे शांति तो मिलती ही है और मैं अनुशासित भी रहता हूं। जहां तक मोबाइल नंबर में 786 का सवाल है, मुझे यह नंबर लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

राजनीति के अलावा और क्या अच्छा लगता है?
- मुझे पढऩा काफी पसंद है। वक्त मिलने पर मैं घंटों तक पढ़ता हूं। नामचीन लेखकों के अलावा नए लेखकों को भी मैं खूब पढ़ता हूं। अरविंद अडिगा ने मुझे काफी प्रभावित किया। इसके अलावा म्युजिक सुनना भी पसंद है। लाइट म्युजिक सुनना अच्छा लगता है।


चुनाव जीतने के बाद आपकी लाइफ स्टाइल में कितना बदलाव आया?
- मैं काफी बदलाव महसूस कर रहा हूं। जाहिर तौर पर पहले से ज्यादा व्यस्त हो गया हूं। लोग मिलने भी खूब आते हैं और मोबाइल पर काल्स भी। व्यस्त होना मुझे पहले से ही पसंद है, इसलिए सब अच्छा लग रहा है। एक बदलाव मेरे पहनावे में भी आया है। पहले जींस-टीशर्ट पहनता था, अब कुर्ता-पायजामा पहनता हूं।


शादी के बारे में क्या सोचा है?
- अरे यार! अभी शादी की उम्र ही कहां हुई है। इस बारे में अब तक कुछ भी नहीं सोचा है। अभी काफी जिम्मेदारियां हैं, पहले उन्हें निभाना है फिर शादी के बारे में देखेंगे।

शनिवार, मई 23, 2009

छप्पर फाड़ के


विधानसभा चुनावों में महज एक वोट से मात खाने वाले डॉ। सी.पी. जोशी की केबीनेट मंत्री के रूप में ताजपोशी यही साबित करती है कि देने वाल जब भी देता है छप्पर फाड़ के देता है। स्थितियां बदलीं तो गहलोत भी जोशी के साथ हो लिए। आखिर कैसे हुआ ऐसा? एक अंतर्कथा।

डॉ. सी.पी. जोशी। राजस्थान में कांग्रेस के निजाम। तीन बार विधायक रहे। एक बार मंत्री भी बने, पर देश भर में उन्हें इन सबसे ज्यादा पिछले विधानसभा चुनाव में महज एक वोट से मिली हार के लिए जाना जाता है। यह हार जोशी की उम्मीदों को तीन-तेरह करने वाली थी। कहां वे मुख्यमंत्री बनने का सपना देख रहे थे और विधायक भी नहीं बन पाए, लेकिन लोकसभा चुनाव में उन्होंने पूरा हिसाब चुकता कर लिया वह भी सूद समेत। मनमोहन की दूसरी पारी की टीम ट्वंटी में जोशी राजस्थान से इकलौते हैं। जोशी ने गिरिजा व्यास, शीशराम ओला, नमोनारायण मीणा, चंद्रेश कुमारी और सचिन पायलट सरीखे दिग्गजों को पछाड़ते हुए कैबीनेट मंत्री बनकर सबको चौंका दिया है।
केंद्र की मनमोहन सरकार में डॉ. जोशी की कैबीनेट मंत्री के रूप में ताजपोशी कई तरह से मायने रखती है। इससे जोशी का कद तो बड़ा ही है, मुख्यमंत्री गहलोत भी मजबूत हो गए हैं। अब राज्य में उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा है। गौरतलब है कि जोशी, गहलोत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने हुए थे। विश्लेषकों की मानें तो यदि जोशी विधानसभा चुनाव जीत जाते तो गहलोत का गद्दीनशीं होना इतना आसान नहीं होता। वे उन्हें कड़ी टक्कर देते। हालांकि दस जनपथ पर अच्छे रसूखों के चलते पलड़ा गहलोत का ही भारी रहता, लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बनने पर भी जोशी उनके लिए पूरे पांच साल तक गले की फांस ही बने रहते। एक वोट से विधानसभा चुनाव हार जाने पर मुख्यमंत्री बनने का सपना टूटने के बाद भी जोशी ने गहलोत के लिए कम समस्याएं पैदा नहीं की। अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे निकलने के लिए जोशी ने गहलोत को खबर दिए बिना जयपुर में राहुल गांधी का कार्यक्रम रखवा दिया और फिर लोकसभा चुनाव की तैयारी के लिए 'टारगेट-25' भी बना डाला।
गहलोत को टकराव की राजनीति कम ही भाती है। उन्होंने जोशी से कई बार सुलह करने का कोशिश की, पर बात नहीं बनी। कभी जोशी की उम्मीदें आड़े आती तो कभी तल्ख मिजाजी, लेकिन जब जोशी ने लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा जाहिर की तो गहलोत को एक और मौका मिल गया। हालांकि जब जोशी को चित्तौडग़ढ़ की बजाय भीलवाड़ा से टिकट दिया गया तो लगा कि गहलोत उन्हें एक और पटकनी देना चाहते हैं। चुनाव प्रचार के शुरूआती दिनों में भी यही प्रतीत हो रहा था, पर मतदान का दिन नजदीक आते-आते गहलोत ने जोशी को जिताने के लिए पूरी ताकत झौंक दी। वे खुद तो वहां गए ही पार्टी के कई नेताओं को जोशी को जिताने की जिम्मेदारी के साथ भेजा गया। भितरघात कर रहे क्षेत्रीय नेताओं को भी गहलोत ने व्यक्तिगत तौर पर जोशी के पक्ष में पाबंद किया। आखिरकार विधानसभा चुनाव में एक वोट से हारने वाले जोशी लोकसभा चुनाव में एक लाख से ज्यादा वोटों से विजयी रहे।
जोशी तो जीते ही पूरे राजस्थान में भी कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया। जब इसका श्रेय लेना का समय आया तो इस बार माहौल कुछ बदला-बदला सा था। गहलोत ने पहली बार जोशी को सामने किया और प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते उन्हें भी जीत का श्रेय दिया। गौरतलब है कि गहलोत और जोशी के रिश्तों में कड़वाहट 'श्रेय' लेने की होड़ में ही आई थी। प्रदेशाध्यक्ष बनते ही उन्होंने सूबे में मृतप्राय पड़ी कांग्रेस को फिर से खड़ी करने के लिए खूब मेहनत की, लेकिन आलाकमान के सामने इसका पूरा श्रेय अशोक गहलोत ले जाते। विधानसभा चुनावों में मिली जीत के समय भी ऐसा ही हुआ। पूरा श्रेय गहलोत हड़प गए। जोशी को तो हर मोर्चे पर हार ही हाथ लगी। विश्लेषकों के मुताबिक जोशी की स्पष्टवादिता ही उन पर भारी पड़ी। साम्यवादी चे-गुवेरा से प्रभावित जोशी जो भी करते गहलोत के सामने गा देते। और जब आलाकमान से शाबासी लेने की बारी आती तो गहलोत बड़ी चतुराई से जोशी को किनारे कर अपनी पीठ आगे कर देते। हालांकि मुख्यमंत्री बनने के बाद गहलोत ने इस आदत को छोड़ दिया और वे जोशी के साथ सुलह के मूड में नजर आए। ज्यादातर मौकों पर उन्हें साथ रखने की कोशिश की। शुरूआत में जोशी के कदम कुछ ठिठके हुए थे, पर लोकसभा चुनाव में गहलोत की ओर से की गई मदद से वे गदगद हो गए। उदयपुर की सुखाडिय़ा यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर रहे जोशी, गहलोत की मनोदशा भांपने में कामयाब रहे और साथ हो लिए।
गहलोत को नजदीक से जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वे जिस पर मेहरबान होते हैं पूरी तरह से होते हैं। जोशी को मनमोहन सिंह सरकार के कैबीनेट में शामिल करवाकर उन्होंने इसे एक बार फिर से साबित कर दिया है। सहयोगी दलों के दबाव के बीच जब यह तय हुआ कि महमोहन सिंह के साथ छोटा मंत्रिमंडल शपथ लेगा तो यह तय माना जा रहा था कि राजस्थान से शायद ही किसी की बारी आए। कयास लगाए जा रहे थे कि एकाध का नंबर आया तो शीशराम ओला या गिरिजा व्यास हो सकते हैं। राहुल गांधी की ज्यादा चली तो सचिन पायलट का नाम लिस्ट में हो सकता है, लेकिन सी.पी. जोशी के बारे में किसी ने नहीं सोचा था। विश्लेषक यह मान कर चल रहे थे कि मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में राजस्थान से चार मंत्री होंगे। इनमें एक ब्राह्मण, एक जाट, एक गुर्जर और एक एससी या एसटी से संबंध रखने वाले सांसद होंगे।
ब्राह्मणों में गिरिजा व्यास की दावेदारी को सबसे पुख्ता माना जा रहा था। गिरिजा पहले भी मंत्री रही हैं और दस जनपथ पर भी उनकी अच्छी पहुंच है। इस हिसाब से सी.पी. जोशी उनसे कद में काफी छोटे हैं। वे एक विधायक और राज्य सरकार में मंत्री की हैसियत से तो राजनीति अनुभव रखते हैं, पर सांसद पहली बार ही बने हैं। वैसे भी लोकसभा चुनावों में टिकट वितरण में भी वे जोशी पर भारी पड़ी थीं। चित्तौडग़ढ़ से गिरिजा को जोशी के मुकाबले तरजीह दी गई थी। पर कैबीनेट मंत्री बन जोशी ने पूरा हिसाब चुकता कर लिया। गहलोत के करीबी सूत्रों के मुताबिक उन्होंने जोशी की ताजपोशी का मन केंद्र में यूपीए की जीत के साथ ही बना लिया था। गहलोत ने काफी पहले ही पार्टी आलाकमान को जोशी का नाम दे दिया था। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया था कि जोशी का नाम पहली लिस्ट में ही होना चहिए।
गहलोत के अलावा राहुल गांधी ने भी जोशी की पूरी मदद की। सूत्रों के मुताबिक राहुल, जोशी के व्यक्तित्व से काफी प्रभावित हैं और उन्होंने काफी पहले से ही उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देने का मन बना रखा था। केंद्र में यूपीए की सरकार नहीं भी आती तो राहुल उन्हें संगठन में अच्छा पद देने के मूड में थे। सूत्रों के मुताबिक राहुल ने जोशी के लिए मंत्रालय भी तय कर रखा है। वे संभवतया ग्रामीण विकास मंत्रालय संभालेंगे। वैसे तो राहुल गांधी और सी.पी. जोशी की नजदीकियों की चर्चाएं काफी पहले से होती रही हैं, पर जयपुर में हुए कार्यक्रम में यह पहली बार सार्वजनिक हुईं थी। राज्य में कांग्रेस की सरकार बनने के कुछ दिन बाद हुए इस कार्यक्रम के बारे में मुख्यमंत्री गहलोत को कानों-कान खबर नहीं थी। पूरे कार्यक्रम में राहुल गांधी साए की तरह सी.पी. जोशी के साथ रहे। लोकसभा चुनाव में राहुल ने जोशी का पूरा ध्यान रखा। वे राज्य में सात लोकसभा क्षेत्रों में प्रचार के लिए गए, इनमें एक सी.पी. जोशी की सीट भीलवाड़ा भी थी।
सी.पी. जोशी को दिल्ली भेजकर गहलोत ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। जोशी से प्रतिद्वंद्विता समाप्त होने के बाद उन्हें यहां चुनौती देने वाला कोई नहीं बचा है साथ ही प्रदेशाध्यक्ष भी अब उनकी मर्जी का होगा। यानी राजस्थान में अब गहलोत का एकछत्र राज चलेगा। वैसे जोशी को मनाने के फेर में गहलोत को नई दिक्कतों से रूबरू होना पड़ सकता है। शपथ ग्रहण के पहले दौर में जोशी को शामिल करने से मंत्री बनने का ख्बाव सजाए बैठे कई नेताओं की उम्मीदें चकनाचूर हुई हैं। ये नेता गहलोत के लिए परेशानी का सबब बन सकते हैं। जोशी के कैबीनेट में शामिल होने से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वालेे नेताओं में गिरिजा व्यास और शीशराम ओला हैं। दोनों नेता गहलोत के विरोधी माने जाते हैं। विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री के दावेदारों में भी ये दोनों नेता शमिल थे। गहलोत के लिए राहत की बात यह है कि केंद्र में अभी मंत्रिमंडल का विस्तार होना है। इसमें इन नेताओं को समायोजित किया जा सकता है। फिर भी सभी को संतुष्ट करना संभव नहीं होगा, क्योंकि राजस्थान के हिस्से में शायद ही चार से ज्यादा मंत्रालय आएं और कैबीनेट मंत्रालय की संभावना तो नहीं के बराबर है।
सूबे के दिग्गज नेताओं की नाराजगी के अलावा गहलोत पर एक बार फिर से जाट विरोधी होने का ठप्पा भी लग सकता है। शीशराम ओला को पहली सूची में जगह नहीं मिलने को उनका विरोधी खेमा जाटों के अपमान के तौर पर प्रचारित कर सकता है। सूत्रों के मुताबिक गहलोत को भी इसका अंदेशा है और इसे एनकाउंटर करने के लिए उन्होंने तरकीब भी सोच रखी है। वे किसी जाट नेता को प्रदेशाध्यक्ष बनाने के बारे में सोच रहे हैं। ऐसा करके वे जाटों में तो अच्छा संदेश देने में कामयाब होंगे, लेकिन शीशराम ओला की नाराजगी को दूर नहीं कर पाएंगे। तमाम तरह के कयासों के बीच यह देखना रोचक होगा कि गहलोत क्या कदम उठाते हैं। उनका हर कदम उम्मीद से आगे होता है और हालात के अनुसार नपा-तुला। जादूगर जो ठहरे, वो भी खानदानी।

शनिवार, मई 16, 2009

फिर चला जादू


सूबे में गहलोत का तिलिस्म फिर चला और भाजपा को चारों खाने चित्त कर दिया। चुनाव परिणामों ने जहां गहलोत को फ्रीहैंड दे दिया है वहीं, वसुंधरा के हाथ बांध दिए हैं। एक और मात खाने के बाद महारानी के सामने संकटों का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।

अशोक गहलोत द्वारा विधानसभा चुनाव में दिया गया जुमला 'मुझे जादू करना आता है' लोकसभा चुनाव में और भी असरदार साबित हुआ। हालांकि इसमें गहलोत की जादूगरी के अलावा राहुल गांधी का हुनर भी काम आया। प्रचार के दौरान राहुल राज्य की 7 लोकसभा सीटों पर गए थे। इनमें से 6 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है। बारां-झालावाड़ ही एकमात्र ऐसी सीट रही जहां राहुल गांधी प्रचार के लिए आए और कांग्रेस प्रत्याशी जीतने में कामयाब नहीं रहा। कुल मिलाकर राजस्थान के रण में भाजपा के बड़े-बड़े दावे कांग्रेस की आंधी में उड़ गए और पिछली बार 25 में 21 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 4 सीटों पर ही सिमट गई। पार्टी के ज्यादातर गढ़ ढह गए और बड़े-बड़े दिग्गज को मुंह की खानी पड़ी। दूसरी और 20 सीटें हासिल कर कांग्रेस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि विधानसभा चुनावों में मिली जीत तुक्का नहीं थी। लोकसभा चुनावों के परिणाम सूबे की सियासत में खलबली मचा सकते हैं। जहां कांग्रेस अशोक गहलोत के नेतृत्व में और स्थायित्व हासिल करेगी वहीं, भाजपा में प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे को बदलने की मांग फिर से जोर पकड़ेगी।
सूबे में सरकार बनाते ही मुख्यमंत्री गहलोत ने लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल से सबक लिए और एक के बाद एक लोक कल्याणकारी निर्णय किए। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले मिले 72 दिनों में कांग्रेस सरकार ने 71 छोटे-बड़े कार्य कर जनता में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। शराब की दुकानें खुलने के समय में कटौती करने के निर्णय तुरूप का इक्का साबित हुआ। इससे आमतौर पर भाजपा के साथ रहने वाला शहरी वोटर ने भी कांग्रेस की ओर रुख किया। इन चुनावों में गहलोत ने कर्मचारी और किसान विरोधी होने के कलंक को भी धो दिया। जहां डीए बढ़ाने की घोषणा कर कर्मचारियों को खुश किया गया वहीं, पांच साल तक बिजली की रेट नहीं बढ़ाने का ऐलान कर किसानों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई। नतीजतन, इस बार कर्मचारी गहलोत के खिलाफ मुखर नहीं हुए और किसानों का तो एकतरफा साथ मिला।
राज्य में कांग्रेस की जीत में गहलोत सरकार के कामकाज के अलावा मुख्यमंत्री का चुनाव मैनेजमेंट भी बड़ा योगदान है। गहलोत ने सत्ता और संगठन में बेहतरीन तालमेल बिठाया। कांग्रेस ने एकजुट होकर पूरी ताकत से चुनाव लड़ा। पार्टी में विभिन्न स्तरों पर धड़ेबंदी होने के कयासों का हकीकत से कोई वास्ता नहीं रहा। कांग्रेस की पूरी टीम गहलोत के पीछे खड़ी रही। गहलोत ने पूरे राज्य में धुंआधार प्रचार किया और बड़ी चतुराई से वसुंधरा सरकार के समय हुए भ्रष्टाचार को मुद्दा बना दिया। दूसरी ओर मतदान से एक दिन पहले गहलोत द्वारा नाराज नेताओं को व्यक्तिगत रूप से समझाने की रणनीति पूरी तरह से कामयाब रही। गहलोत उन नेताओं की नाराजगी दूर करने में सफल रहे जो पार्टी प्रत्याशी के वोटों में सेंध लगाने की की स्थिति में थे। इन नेताओं का देर से ही सही पार्टी के पक्ष में जुट जाना निर्णायक साबित हुआ। बसपा के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में शामिल होना भी कांग्रेस के लिए मुफीद साबित हुआ। बसपा के उम्मीदवार कांग्रेस को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा पाए।
कुल मिलाकर सूबे के सरदार बनने के बाद से गहलोत का हर तीर निशाने पर लग रहा है। लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने से आलाकमान की नजरों में तो उनका कद बढ़ा ही है, राज्य की राजनीति में भी उनके वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं बचा है। राहत की बात यह है कि कई मौकों पर गहलोत के प्रतिद्वंद्वी साबित हो रहे डॉ. सी.पी. जोशी भीलवाड़ा से चुनाव जीत गए हैं। मुख्यमंत्री के दावेदारों में शामिल रहे शीशराम ओला एक बार फिर से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में गहलोत डंके की चोट पर अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। इस बार उनके पास अच्छा प्रदर्शन करने का बेहतर अवसर भी है, क्योंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने से धन की कोई कमी नहीं आने वाली है।
विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा प्रदेश नेतृत्व यह खुले तौर पर स्वीकारता था कि लोकसभा चुनाव में 2004 की स्थिति को बरकरार रखना संभव नहीं है, लेकिन ऐसे परिणाम की उम्मीद तो किसी को न थी। यदि विधानसभा चुनाव के पैटर्न पर ही वोटिंग होती तो भी भाजपा को 10 से 12 सीटें मिलनी चाहिए थीं, पर पार्टी महज 4 सीटों पर सिमट गई। भाजपा की बदतर स्थिति के लिए ज्यादातर वे ही कारण जिम्मेदार हैं जो विधानसभा चुनावों में थे। वसुंधरा राजे के पूरी ताकत से सक्रिय न होना एक अलग वजह जरूर रही। महारानी चुनाव प्रचार के दौरान अपने बेटे दुष्यंत की बारां-झालावाड़ में ही अटकी रहीं। वे बाकी सीटों पर गहलोत की बराबर सघनता से प्रचार नहीं कर पाईं। वसुंधरा जैसे-तैसे कर दुष्यंत की सीट निकालने में तो कामयाब रहीं, पर बाकी जगह स्थिति और बदतर हो गई। वैसे इस बार महारानी के प्रचार में पहले जैसी धार भी नहीं दिखी। आक्रामक तेवरों की आदी महारानी पूरे चुनाव के दौरान सुरक्षात्मक नजर आईं। वे गहलोत के भ्रष्टाचार के आरोपों का एक भी जबाव नहीं दे पाईं। उनके पास गहलोत सरकार को घेरने के लिए कोई मुद्दा भी नहीं था।
बद से बदतर होता संगठनात्मक ढांचा भी भाजपा की हार की बड़ी वजह है। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपाई दिग्गजों की बीच की दरारें खाई में तब्दील हो गईं। प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और वसुंधरा राजे के बीच मनमुटाव सार्वजिनक होने लगा। महारानी ने अपनी मर्जी से टिकट दिए। इसमें ओम माथुर की भी ज्यादा नहीं चली। टिकट वितरण से नाराज आला नेताओं ने खुले तौर पर अपनी नाराजगी तो जाहिर नहीं की, पर चुनावों से अपने-आपको दूर ही रखा। नेताओं के बीच बढ़ती दूरियों का लब्बोलुआब यह रहा कि कार्यकर्ताओं ने पार्टी से कटते चले गए। उम्मीदवारों को समर्पित कार्यकर्ताओं की खासी कमी खली। भाजपा सरीखी कैडर बेस पार्टी के लिए इससे बड़ा नुकसान और क्या हो सकता था। झुलसा देने वाली गर्मी और शादियों के सीजन में भाजपा के वोटर को घर से निकालने के लिए कार्यकर्ताओं की फौज किसी भी प्रत्याशी के पास नहीं थी। लिहाजा, कम वोटिंग हुई और भाजपा को भारी नुकसान हुआ।
लोकसभा चुनाव में भाजपा का सफाया कई बवंडर खड़े कर सकता है। वसुंधरा राजे और ओम माथुर के विरोधियों को उन्हें यहां से रुखसत करने का एक और मौका मिल गया है। वे इसे किसी भी कीमत पर हाथ से जाने देने के मूड में नहीं हैं। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने वसुंधरा और माथुर की खुली खिलाफत शुरू कर दी है। पूर्व उपमुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा ने बताया कि 'प्रदेश में पार्टी की हार का कारण कुछ नेताओं का खुद को पार्टी से ऊंचा मानना है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम सीटें मिलीं तो जनता ने तय कर लिया था कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से जिताना है, लेकिन भाजपा इसे भांप नहीं पाई।' राज्यसभा सांसद और प्रदेशाध्यक्ष रहे ललित किशोर चतुर्वेदी भाजपा की हार का जिक्र करते ही पार्टी नेतृत्व पर पिल पड़ते हैं। वे कहते हैं, 'बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होए। भाजपा की हार के लिए संगठन स्तर पर वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा और कुछ लोगों की दादागीरी जिम्मेदार है। दो-तीन लोगों के कारण पार्टी का यह हाल हुआ है। इन नेताओं ने विधानसभा चुनावों में मिली हार से कोई सबक नहीं लिया।' पूर्व मुख्य सचेतक महावीर प्रसाद जैन ने भी पार्टी नेतृत्व पर जमकर भड़ास निकाली। जैन ने बताया कि 'लोकसभा चुनाव में पार्टी एकजुट नहीं रह पाई। पूरा काम दो-तीन लोगों ने अपने हाथ में ले लिया। इन्होंने पार्टी को अपनी जागीर समझ लिया। इससे कार्यकर्ता और जमीन से जुड़े नेता पार्टी से कटते चले गए और पार्टी की करारी हार हुई।'
मुखर होते विरोध के स्वरों के बीच भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ दिक्कत यह है कि वे फेरबदल करे तो क्या करे? ओम माथुर के बदलने में तो ज्यादा दिक्कत नहीं है, पर वसुंधरा राजे का कोई सर्वमान्य विकल्प पार्टी के पास नहीं है। कोई भी ऐसा कद्दावर नेता दिखाई नहीं दे रहा है जिसका कोई विरोध नहीं करे और जो पार्टी में फिर से प्राण फूंक सके। गुलाब चंद कटारिया और घनश्याम तिवाड़ी का नाम काफी समय से चल रहा है। कटारिया की संभावना ज्यादा बनती है, क्योंकि लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद पार्टी तिवाड़ी को शायद मौका नहीं दे। वैसे पार्टी का एक धड़ा अभी भी यह मानता है कि राजस्थान में भाजपा की कमान वसुंधरा राजे के हाथ में ही रहेगी, क्योंकि राजस्थान इकलौता राज्य नहीं है जहां भाजपा हारी है। वसुंधरा राजे के लिए भाजपा का हारना उतना नुकसानदायक नहीं है जितना लालकृष्ण आडवाणी का कमजोर होना। महारानी, आडवाणी की खास सिपेहसालार रही हैं। कई मौकों पर आडवाणी ने उनका खुला समर्थन किया है। यदि आडवाणी ने सक्रिय राजनीति से तौबा की तो इसका असर वसुंधरा के कद पर भी पड़ेगा।

शुक्रवार, मई 08, 2009

सियासत में सिमटा सौहार्द


बरसों तक भाई-भाई की तरह रहे गुर्जर और मीणा अब एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। सियासतदां तनाव को मिटाने की बजाय इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। दहशत भरे इस माहौल के लिए कौन जिम्मेदार है?

गुर्जर आरक्षण आंदोलन से पहले दौसा को राजेश पायलट और मेहंदीपुर बालाजी के लिए जाना जाता था। 2007 में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की अगुवाई में शुरू हुआ गुर्जर आरक्षण आंदोलन अपने दो पड़ावों के बाद अब थम चुका है, लेकिन इसकी लपटें अब तक उठ रही हैं। हालांकि अब मुद्दा गुर्जर आरक्षण का नहीं, बल्कि दो जातियों बीच अस्तित्व की लड़ाई का है। मीणा और गुर्जर जातियों के बीच बढ़ती झड़पों ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। लोगों में दहशत है। सियासतदां इसे को दूर करने की बजाय, अपना-अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं। निर्दलीय चुनाव लड़े डॉ. किरोड़ी लाल मीणा, मीणा जाति और कश्मीर से आए कमर रब्बानी चेची गुर्जर जाति के झंडाबरदार बने हुए हैं। जातिगत पंचायतों में दोनों नेता एक-दूसरे के खिलाफ जमकर जहर उलग रहे हैं।
परिसीमन में दौसा सीट के अनुसूचित जनजाति के आरक्षित होते ही कई मीणा नेताओं की इस सीट पर नजर थी। कांग्रेस के नमोनारायण मीणा ने तो यहां बाकायदा तैयारियां भी शुरू कर दी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद बदली परिस्थितियों किरोड़ी लाल मीणा ने भी यहां से दावेदारी जता दी। किरोड़ी ने कांग्रेस के ऊपर समर्थन देने का दबाव भी बनाया, पर कांग्रेस अपने सिंबल पर किरोड़ी को चुनाव लड़ाना चाहती थी। लंबी जद्दोजहद के बाद किरोड़ी निर्दलीय ही मैदान में उतर गए। किरोड़ी के आने पर नमोनारायण ने यहां से दावेदारी छोड़ दी और वे सामान्य हो चुकी टोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े। कांग्रेस ने यहां से पुलिस अधिकारी रहे लक्ष्मण मीणा को प्रत्याशी बनाया तो भाजपा ने रामकिशोर मीणा को प्रत्याशी बनाया। इन उम्मीदवारों के बीच ही मुकाबला रहता तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन काफी पहले मैदान में कूद चुके कमर रब्बानी चेची के टक्कर में आने से माहौल तनावपूर्ण हो गया।
राजस्थान में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर मीणाओं का ही वर्चस्व रहा है। पहली बार किसी अन्य जाति के नेता ने मीणाओं को उन्हीं के गढ़ में आकर चुनौती दी। चेची कश्मीरी मुसलमान हैं, पर इनके वंशज गुर्जर रहे हैं। दौसा में चेची ने स्वयं को एक गुर्जर के तौर पर ही प्रचारित किया। चेची को गुर्जरों का एकतरफा समर्थन मिलने लगा ही मुसलमान भी उनके साथ हो लिए। सवर्ण जाति के वोटों में भी वे सेंध लगाते नजर आए। उधर, मीणा वोटों के तीन जगहों पर बंटते हुए दिखाई दे रहे थे। किरोड़ी को यह रास नहीं आया। उन्होंने चेची को कश्मीर से आया प्रशिक्षित आतंकवादी बताना शुरू कर दिया। हालांकि दौसा में आतंक फैलाने का काम किराड़ी समर्थकों ने किया। जगह-जगह लोगों को धमकाया गया, पर बात बनती हुई दिखाई नहीं दी। कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मण मीणा की मानें तो किरोड़ी हिंसा फैलाकर चुनाव जीतना चाहते हैं। मीणा कहते हैं, 'किरोड़ी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते हैं। उनके पक्ष में माहौल हो तो ठीक है नहीं तो वे गुंडागिर्दी पर उतर आते हैं। विधानसभा चुनाव में भी वे ऐसे ही जीते।'
मतदान के दिन मीणा और गुर्जरों के बीच कई जगह झड़पें हुईं। किरोड़ी के काफिले पर हमला हुआ, लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह सब सुनियोजित था ताकि किरोड़ी को मीणाओं की सहानुभूति मिल जाए। मीणा वोटों में हो रहे बटवारे को रोकने के लिए उन्होंने इलाके के पुलिस स्टेशन में दिनभर हुडदंग मचाया। किरोड़ी अपने समर्थकों के साथ चेची की गिरफ्तारी की मांग को लेकर दिन भर पुलिस स्टेशन पर ही बैठे रहे। वे बार-बार अपने पैर में आई खरोंच को दिखाना भी नहीं भूल रहे थे। आखिर में चेची के खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने और अधिकारियों की ओर से चेची पर कार्रवाई के आश्वासन के बाद ही वे वहां से रवाना हुए। मतदान का अगला दिन भी क्षेत्र के लोगों के लिए दहशत भरा रहा। नांगल प्यारीवास गांव में मीणा समाज की महापंचायत के बाद लोगों ने जमकर उपद्रव मचाया। ऐसे हालातों में गुर्जर भी कहां चुप रहने वाले थे। अगले ही दिन उन्होंने भी आरक्षण आंदोलन के दौरान चर्चा में आए सिकंदरा चौराहे पर महापंचायत कर किरोड़ी लाल की गिरफ्तारी की मांग की और आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है।
आम गुर्जर और मीणा यहां शांति से रहने चाहते हैं, लेकिन कुछ लोगों की सियासत में क्षेत्र का सौहार्द्र सिमटता ही जा रहा है। चुनाव परिणाम आने पर यहां स्थिति और बिगड़ सकती है। चेची की हार पर शायद कम बबाल हो, पर किरोड़ी अपनी हार नहीं पचा पाएंगे। प्रचार के दौरान भी किरोड़ी ने चेची के खिलाफ जमकर जहर उगला था। जब हमने उनसे इस बारे में बात की तो वे भड़क उठे और बोले, 'चेची कश्मीर में टे्रनिंग लिया हुआ आतंकवादी है। वो यहां गूजर बनकर लोगों को बरगला रहा है। उसने मेरे ऊपर हमला करवाया। प्रशासन भी उसका साथ दे रहा है। अब क्षेत्र की जनता ही उन्हें सबक सिखाएगी। ऐसे लोग जनप्रतिनिधि तो क्या नागरिक बनने लायक भी नहीं हैं।' चेची उन पर पलटवार करते हुए कहते हैं कि 'आतंकवादी वह है जो आतंक फैलाए। आप दौसा की जनता से पूछ लीजिए कि आतंक कौन फैला रहा है। किरोड़ी के लोगों ने बूथ केप्चरिंग की, लोगों को वोट नहीं डालने दिया और फिर हमले का ड्रामा किया। जनता सब जानती है, परिणाम सबके सिखा देंगे।'
ऐसा नहीं है कि गुर्जर और मीणा जातियों के बीच द्वेषता शुरू से रही है। आरक्षण आंदोलन के पहले तक दोनों जातियों के बीच बेहद अच्छे संबंध रहे। कई मौकों पर दोनों जातियों ने आपसी भाईचारे का परिचय दिया। धाधरेन गांव के 80 वर्षीय लक्खी मीणा उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, 'गुर्जर और मीणाओं में कभी कोई लड़ाई नहीं रही। एक-दूसरे के सुख-दुख में खूब काम आते थे। इतिहास में भी उल्लेख है कि हम आपस में रिश्तेदार रहे हैं, लेकिन आरक्षण की लड़ाई ने सब तबाह कर दिया। गलतियां दोनों तरफ से हुई हैं। कुछ लोगों के बहकावे में आकर दोनों जातियां भ्रमित हो रही हैं।' एक-दूसरे से सटे दोनों जातियों के गांवों में लोगों को थोड़ा सा कुरेदने पर ही पता लग जाता है कि मीणा और गुर्जरों के बीच संबंध कितने प्रगाढ़ रहे हैं। 72 साल के गोविंद गुर्जर कहते हैं कि 'गुर्जर-मीणा एकता के किस्सों की कमी नहीं हैं। महावीर जी में शोभायात्रा का रथ दोनों जातियों के लोग मिलकर खींचते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और शादी-समारोह में आते-जाते हैं।'
देश की सबसे बड़ी पंचायत में कई बार दौसा की नुमाइंदगी करने वाले स्वर्गीय राजेश पायलट ने गुर्जर-मीणा रिश्तों में मिठास घोलने के लिए खूब काम किया। कभी-कभार दोनों जातियों के बीच तनाव होता तो पायलट बड़ी सहजता से हल कर देते। आरक्षण आंदोलन में अपना एक हाथ गंवा देने वाले जगन कहते हैं, 'पायलट साहब होते तो आंदोलन में इतना खून-खराबा नहीं होता। दोनों जातियों में उनकी पकड़ थी। गुर्जरों के वोट तो उन्हें मिलते ही थे, मीणाओं के भी वोट भी एकतरफा उन्हें ही मिलते थे। एक बार किरोड़ी लाल उनके खिलाफ चुनाव लड़े थे, तब भी मीणाओं ने पायलट को वोट दिए थे। सब उनकी बात मानते थे। कोई कितने भी गुस्से में हो वे उसे शांत कर देते थे।'
मीणा-गुर्जरों में पनपी इस कटुता के कारणों पर जाएं तो इसके लिए विशुद्ध रूप से कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जिम्मेदार हैं। आरक्षण आंदोलन की अगुवाई करने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के भाजपा का दामन थाम लोकसभा चुनाव लडऩे से यह बात साबित हो गई हैं। आंदोलन के दौरान कर्नल बार-बार यह कहते थे कि यह एक गैर राजनीतिक आंदोलन है। वे इसमें शामिल होने वाले नेताओं के सामने शर्त रखते थे कि भविष्य में चुनाव नहीं लडऩा हो तो आंदोलन में शिरकत कर सकते हैं। आज वही कर्नल स्वयं राजनीति में कूद चुके हैं। वो भी उस पार्टी से जिसकी सरकार को वे तानाशाह और हत्यारी कहते हुए नहीं थकते थे। कर्नल के एक इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार रहने वाले ज्यादातर गुर्जर उनकी राजनीति महत्वाकांक्षा से अभी तक अनभिज्ञ हैं। गुर्जरों का बहुमत आज भी बैंसला के पीछे है जो यह मानता है कि कर्नल गुर्जरों की भलाई के लिए ही राजनीति में आए हैं, लेकिन एक वर्ग जो पढ़ा-लिखा है उनसे खासा खफा है। पत्रकारिता का कोर्स कर रहे राजेश खटाना कहते हैं कि 'कर्नल साहब ने राजनेताओं के साथ रहते-रहते जल्दी ही राजनीति सीख ली। 71 लोगों की लाशों पर चढ़कर वे संसद में पहुंचना चाहते हैं। ये किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा की अति है। कर्नल साहब के इस कदम से साफ हो गया है कि अपने फायदे के लिए उन्होंने समाज का इस्तेमाल किया।'
बरसों से साथ रहते आ रहे मीणा-गुर्जरों के बीच चौड़ी होती खाई के बीच डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का जिक्र करना जरूरी है। किराड़ी हमेशा शीर्ष पर रहने के आदी हैं। मात खाना उन्हें पसंद नहीं है। वे अपना मकसद पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। आरक्षण आंदोलन के दौरान मीणाओं को उकसाने वालों में वे सबसे ऊपर थे। गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता रहे डॉ. रूप सिंह की मानें तो किरोड़ी ने ही मीणा और गुर्जरों के बीच नफरत के बीज बोए। वे कहते हैं, 'किरोड़ी ने गांवों में जा-जाकर मीणा भाइयों से कहा कि गुर्जरों को आरक्षण मिल गया तो उनके बच्चों को नौकरियां नहीं मिलेंगी। गुर्जर आरक्षण मांग कर हमारा हक मार रहे हैं।' वे आगे कहते हैं कि 'आम मीणाओं को गुर्जरों को आरक्षण मिलने पर कोई आपत्ति नहीं थी, दिक्कत तो किरोड़ी सरीखे नेताओं को थी जिनकी सियासत संकट में आ सकती थी, ऐसे नेताओं ने ही लोगों को बरगलाया।'

शनिवार, मई 02, 2009

पानी न कंठ को न खेत को


पश्चिमी राजस्थान में बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा गांव की 48 वर्षीय भूरी देवी पेड़ के नीचे छितराई हुइ छांव में पानी के टैंकर का इंतजार कर रही है। यह जगह उसके घर से पांच किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है। वह पिछले दो घंटे से टैंकर आने की उम्मीद लगाए बैठी है। वह यहां एक घंटे और रुकेगी, यदि टैंकर आ जाता है तो ठीक नहीं तो उसे तीन किलोमीटर आगे बने टांके पर जाकर पानी लाना होगा। यानी अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए भूरी देवी सिर पर 25 लीटर वजन लिए हुए आठ किलोमीटर से भी ज्यादा पैदल चलकर घर पहुंचेंगी। इस इलाके में पीने का पानी जुटाने के लिए इतनी मशक्कत करने वाली भूरी देवी अकेली महिला नहीं हैं। पश्चिमी राजस्थान के ज्यादातर इलाकों में पेयजल की यही स्थिति है। हालांकि इंदिरा गांधी नहर के आने से कई जिलों में हालात पहले से बेहतर जरूर हुए हैं।
वैसे पश्चिमी राजस्थान ही नहीं समूचे राज्य में ही पीने के पानी की समस्या है। गांव ही नहीं शहरी क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। सैकड़ों शहर ऐसे हैं जहां सात दिन में एक बार जलापूर्ति होती है। फिर भी शहरों में तो लोग जैसे-तैसे करके पीने का पानी जुटा लेते हैं, पर गांवों में स्थिति बेहद खराब है। गांव हो या शहर, यहां पेयजल की आपूर्ति भूमिगत जल स्रोतों से होती है। गर्मियां आते-आते इनमें से अधिकांश जलस्रोत पूरी तरह से सूख जाते हैं। दरअसल, बीते सालों में भूमिगत का अंधाधुंध दोहन होने से जलस्तर तेजी से नीचे गिरा है। वर्षा की मात्रा कम होने के कारण किसानों को सिंचाई के लिए भूमिगत जलस्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। राज्य में कुओं और नलकूपों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और भूमिगत जल के दोहन की गति बढ़ती ही जा रही है, जबकि धरती में जल समाने की गति उससे आधी भी नहीं है। ऐसी स्थिति में आने वाले समय में हालात बेहद खराब होने वाले हैं, क्योंकि एक सीमा के बाद भूमिगत जल भी समाप्त हो जाएगा।
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के आंकड़ों पर गौर करें तो समस्या की बिकरालता का अंदाजा लग जाता है। बोर्ड के मुताबिक राज्य के 236 ब्लॉकों में से 140 में भूमिगत जल का दोहन अपनी सीमा को कब का पार कर चुका है। 50 ब्लॉकों में यह खतरनाक स्तर है और 14 में अद्र्धखतरनाक स्थिति में। यदि समय रहते नहीं चेते तो इन ब्लॉकों में ऐसा समय आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा जब यहां सिंचाई के पानी तो दूर पीने का पानी भी नसीब नहीं होगा। राजस्थान में समस्या महज भूमिगत जल तक ही सीमित नहीं है। जो पानी यहां उपलब्ध है, उसका अधिकांश भाग सिंचाई करने व पानी पीने के लिए उपयुक्त नहीं है। राज्य के 32 में से 30 जिले किसी न किसी रूप से पानी में फ्लोराइड की समस्या से ग्रस्त हैं। कई जिलों में तो हालात बेहद खराब है और लोग इससे गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। खारे पानी की समस्या भी यहां व्यापक स्तर पर है। राजस्थान में जल संकट को दूर करने के लिए परंपरागत जल स्रोतों को फिर से ध्यान देकर जल संग्रहण क्षेत्रों को बढ़ाना होगा। जल पुरूष राजेंद्र सिंह ने यह सब करके दिखाया है। जब वे अलवर जिले में इसका सफल प्रयोग कर सकते हैं तो राज्य के बाकी हिस्सों या यूं कहें देश भर में इस तरह का अभियान क्यों नहीं चलाया जाता। इसके अलावा इस समस्या के समाधान का और कोइ रास्ता भी नहीं है।

सोमवार, अप्रैल 20, 2009

अलझती उम्मीदें


सूबे में कांग्रेस 'टारगेट-25' के इर्द-गिर्द और भाजपा पिछले प्रदर्शन के आसपास ठहरने की उम्मीद कर रही है, लेकिन दोनों दलों की ये उम्मीदें कई मोर्चों पर उलझी होने से पूरी होती हुई दिखाई नहीं दे रही हैं। असल में कौन कितने पानी में है? एक आकलन!

राजनीति में जीत मिले या हार संकट पीछा नहीं छोड़ते। सूबे की दोनों पार्टियां इन दिनों सियासत के इसी सच से रूबरू हो रही हैं। जहां कांग्रेस विधानसभा चुनाव में मिली जीत को लोकसभा चुनाव में दोहराने के लिए जूझ रही हैं वहीं, भारतीय जनता पार्टी एक और हार को टालने के लिए संघर्ष कर रही है। सूबे में कांग्रेस ने आम चुनाव की तिथियां घोषित होने से पहले ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। 'टारगेट-25' बना पार्टी क्लीन स्वीप के इरादे से मैदान में उतरी। समूचे राजस्थान में कांग्रेस के पक्ष में माहौल को देखकर एकबारगी तो लग रहा था कि पार्टी अपने तय लक्ष्य के करीब पहुंचने में कामयाब हो जाएगी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने तेजी से अपनी स्थिति में सुधार किया। बिखरी-बिखरी सी दिखने वाली भाजपा अब एकजुट होती दिखाई दे रही है। ताजा हालातों में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर है।
वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि राज्य में कांग्रेस की सीटों में इजाफा होगा। गौरतलब है कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस को 25 में से महज 4 सीटों पर कामयाबी मिली थी और शेष सभी 21 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। यदि विधानसभा चुनाव में हुए वोटिंग पैटर्न को आधार माना जाए तो कांग्रेस आसानी से 12 से 14 सीटें जीतने में सफल हो जाएगी। हालांकि कांग्रेसी इससे कहीं ज्यादा की उम्मीद लगाए बैठे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक 10 सीटों पर तो कांग्रेस एकतरफा जीत की स्थिति में है और बाकी 15 में से आधी सीटों पर जीत की पूरी उम्मीद है। इस तरह से कांगे्रसी 17 से 18 सीटों पर जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए कांग्रेस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। सूबे में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व टिकट वितरण से भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है। गुटबाजी से बचने के लिए कांग्रेस ने कई सीटों पर बेहद कमजोर प्रत्याशी मैदान में उतार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। टिकट वितरण में हुई देरी कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकती है। कई सीटों पर तो भाजपा उम्मीदवारों की घोषणा के 20 दिन बाद कांगेस ने अपने प्रत्याशी तय किए हैं। इन उम्मीदवारों को पूरे क्षेत्र को कवर करने लायक समय ही नहीं बचा है। पार्टी को कई जगह बगावत का भी सामना करना पड़ रहा है। बूटा सिंह सरीखे दिग्गज नेता के अदावत पर उतर आने का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ेगा।
विधानसभा चुनावों में भाजपा की खुली खिलाफत करने वाले डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और प्रह्लाद गुंजल की नाराजगी भी कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है। निर्दलीय मैदान में उतरे किरोड़ी दौसा में तो कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मण मीणा के लिए मुसीबतें खड़ी कर ही रहे हैं, बाकी सीटों पर भी समीकरण उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इस पूरे मामले में अशोक गहलोत की रणनीति कारगर तरीके से काम कर रही है। पहले बसपा विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर और फिर परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी को अपने साथ लेकर वे किरोड़ी के पर कतरने में कामयाब हो गए हैं। अब न तो मीणा समाज में उनकी उतनी पकड़ बची है और न ही स्वयं की उम्मीदवारी में उतना दम। किरोड़ी एपीसोड को लंबा खींचना कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। किरोड़ी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए दौसा सीट पर ही उलझकर रह गए हैं। अन्य सीटों पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए उनके पास समय ही नहीं बचा है। प्रह्लाद गुंजल जरूर कांग्रेस के लिए दिक्कतें खड़ी कर सकते हैं। गुंजल को कोटा से टिकट दिलवाने का वादा सूबे के कांग्रेसी निजाम सी.पी. जोशी को भारी पड़ सकता है।
लोकसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदों की बात करें तो विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद वसुंधरा राजे पार्टी को काफी हद तक एकजुट करने में कामयाब रही है। पार्टी पूरी तैयारी के साथ चुनाव मैदान में है। एकाध सीट को छोड़ दें तो पार्टी ने टिकट वितरण भी पूरी मुस्तैदी से किया है। बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद भाजपा ने अपने कई विधायकों को भी मैदान में उतारा है। ये सभी कांग्रेस उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। भाजपा ने मौजूदा सांसदों के खिलाफ एंटीइंकंबेंसी को ध्यान में रखते हुए कई सीटों पर नए और युवा चेहरों का उम्मीदवार बना दांव खेला है। हालांकि विधानसभा चुनाव में पार्टी का यह दांव उल्टा पड़ गया था और कई दिग्गजों ने खुली खिलाफत कर दी थी। भाजपा को बगावत का सामना इस बार भी करना पड़ रहा है। कई सीटों पर बागी उम्मीदवार खड़े हो गए हैं। भाजपा में स्टार प्रचारकों की कमी भी खल रही है। प्रदेश में वसुंधरा राजे ही एक ऐसा चेहरा हैं जो भीड़ खींचने में सक्षम हैं। वे भी मुकाबले मं फंसे अपने बेटे दुष्यंत के कारण झालावाड़ से बाहर निकल ही नहीं पा रही हैं।
भाजपा ने कास्ट केमिस्ट्री को भी दुरूस्त करने का प्रयास किया है। पार्टी ने कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को टिकट देकर नाराज चल रहे गुर्जरों को मनाने का प्रयास किया है। हालांकि यह पक्का नहीं है कि बैंसला के कहने से गुर्जर वोट भाजपा को मिल जाएंगे। गोया किरोड़ी लाल मीणा और प्रह्लाद गुंजल की कांग्रेस से नाराजगी का सीधा फायदा भाजपा को होगा। मीणा और गुंजल कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा के उम्मीदवारों को लाभ पहुंचा सकते हैं। बदले हुए हालातों में भाजपा 10 सीटों पर तो अपनी जीत पक्की मान रही है और बाकी पर फिफ्टी-फिफ्टी की संभावना जता रही है। यदि भाजपा इसके आसपास पहुंचने में कामयाब हो जाती है तो यह पार्टी के जिए बड़ी जीत होगी।

शनिवार, अप्रैल 11, 2009

कमल के कर्नल!


जाति की जाजम पर बैठकर कर सियासत में सफलता के ख्वाब देखने वालों में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का नाम भी जुडऩे जा रहा है। वे भाजपा का दामन थाम संसद की सीढ़ीयां चढऩे को बेताब हैं। तो क्या आंदोलन के समय हुए समझौते में यह भी शामिल था? अंदर की कहानी!

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला। सूबे में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुवा। जिनके नेतृत्व में गुर्जरों ने दो ऐसे आंदोलन किए कि समूचे राजस्थान में जनजीवन ठहर गया और सरकार की चूलें हिल गईं। हालांकि इस आंदोलन में गुर्जरों के साथ हर कदम पर छल हुआ। इतनी जान कुर्बान करने के बाद भी उन्हें आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। गुर्जर समाज का एक तबका इसके लिए कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को जिम्मेदार मानता है। इनके मुताबिक कर्नल ने भाजपा सरकार के सामने घुटने टेक दिए। गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल ने तो उन्हें सरकार का एजेंट तक कहा। कोई कुछ भी कहे, लेकिन आज भी गुर्जर समाज में कर्नल की पकड़ सबसे ज्यादा है। भारतीय जनता पार्टी गुर्जरों में उनके इसी रुतबे का फायदा उठाने की फिराक में है। भाजपा काफी दिनों से बैंसला को पार्टी में लाने और चुनाव लडऩे के लिए मना रही है। सूत्रों के मुताबिक कर्नल इसके लिए राजी हो गए हैं और सवाई माधोपुर संसदीय सीट से मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। यहां से कांग्रेस की और से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा चुनाव लड़ रहे हैं।
बैंसला का भाजपा मोह नया नहीं है। सेना से रिटायर होने के बाद वे भाजपा के सैनिक प्रकोष्ठ में पदाधिकारी रहे। 2003 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के लिए वोट भी मांगे। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री के बाद वे उनसे गुर्जरों को एसटी आरक्षण की वादे को याद दिलाने के लिए कई बार मिले। बात बनती नहीं दिखी तो प्रदर्शन भी किया। जब उन्हें लगा कि सरकार कुछ करने की बजाय मामले को टाल रही तो बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई। बैंसला ने गांव-गांव जाकर लोगों को तैयार किया। एकदम सेना की मानिंद। आरपार की लड़ाई के लिए। कर्नल की मेहनत का नतीजा भी निकला। उनके नेतृत्व में एक अविश्वसनिय आंदोलन शुरू हुआ। दर्जनों लोग मारे गए, पर गुर्जर हिले तक नहीं। कर्नल के एक इशारे पर हजारों गुर्जर मरने-मारने को तैयार थे। सरकार को मामले का कोई हल नहीं दिखा। वह इस इंतजार में थी कि गुर्जर थक-हार कर खुद ही रास्ता खोल दें। इस बीच ये आंदोलन कर्नल के हाथों में से निकल कर उत्तर भारत के कई हिस्सों में फैल गया। बैंसला पर समझौते का दबाव बढऩे लगा। वार्ताओं के कई दौर चले और आखिरकार समझौता हुआ। इसमें गुर्जरों को एसटी आरक्षण की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए चोपड़ा कमेटी का गठन, मृतकों के आश्रितों को मुआवजा व नौकरी और आंदोलनकारियों से मुकदमें वापस लेने की घोषणा हुई। कई गुर्जर नेता इस समझौते से खुश नहीं थे। इनके मुताबिक कर्नल आंदोलन के चरम पर ढीले पड़ गए और समझौते के दौरान बहुत कम में मान गए।
समझौते के बाद बैंसला पूरी तरह से महारानी के मुरीद हो गए। कर्नल ने उनकी खूब तारीफ भी की, लेकिन जब सरकार ने अपने वादों से मुकरना शुरू किया तो वे भौचक रह गए। सरकार ने न तो आंदोलनकारियों पर लदे मुकदमों को वापस लिया और न ही मृतकों के आश्रितों को नौकरियां दीं। इतने में ही चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट भी आ गई जिसमें गुर्जरों को एसटी में शामिल करने के दावे को खारिज कर दिया गया। गुर्जरों का गुस्सा उबाल लेने लगा और कर्नल पर आंदोलन के लिए दबाव बढ़ता गया। आखिर उन्हें आंदोलन की घोषणा करनी पड़ी। हालांकि इस घोषणा में गुर्जरों के अलावा महारानी के दबाव ने भी काम किया। दरअसल, उन दिनों बसपा के बेनर तले कई गुर्जर नेता सक्रिय थे और पहले आंदोलन की बरसी पर मायावती की बड़ी सभा की तैयारी कर रहे थे। प्रह्लाद गुंजल भी इनमें शामिल थे। महारानी को डर था कि मायावती की सभा के बहाने गुर्जर आंदोलन का नेतृत्व बैंसला के हाथों से छिटक ओर किसी के हाथों में जा सकता है। इस बारे में गुंजल बताते हैं, 'जगह-जगह गुर्जरों की पंचायतें हो रही थीं। सरकार के साथ समझौते के नाम पर समाज के सम्मान को गिरवी रखने वाले कर्नल साहब के प्रति लोगों में गुस्सा बढ़ रहा था। गुर्जर अपने हक के लिए एक बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे। महारानी नहीं चाहती थीं कि गुर्जरों का नेतृत्व कर्नल साहब के अलावा कोई करे, इसलिए उन्होंने एक सुनियोजित आंदोलन शुरू करवाया। इसकी पूरी पटकथा महारानी ने लिखी, कर्नल साहब ने उसी के अनुसार काम किया।'
आंदोलन के दूसरे दौर में गुर्जरों ने सड़क की बजाय रेल की पटरियों पर कब्जा कर दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रेक को बाधित कर दिया। इस दौरान खूब खून बहा और दर्जनों गुर्जर मारे गए। कई दिनों के बाद सरकार ने आंदोलनकारियों से वार्ता प्रांरभ की। इस बातचीत में राज्य के बाहर के गुर्जर नेता भी शामिल हुए। सरकार पर गुर्जरों की मांगे मानने के लिए दबाव बढ़ ही रहा था कि बैंसला ने फिर से पाला बदल लिया। वे साफ तौर पर महारानी क पक्ष में आ गए। बाहर से आए गुर्जर नेता बैंसला के इस व्यवहार परिवर्तन से रुष्ट होकर वापस हो लिए। कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और गुर्जर नेता मसूद चौधरी ने तो साफ तौर पर कहा कि कर्नल समाज का भला नहीं कर रहे हैं, वे साफ तौर पर सरकार के साथ सौदबाजी कर रहे हैं। गुर्जर नेताओं के लाख विरोध के बाद भी बैंसला ने सरकार के साथ समझौता कर लिया। जिसके तहत गुर्जरों को विशेष श्रेणी में आरक्षण का प्रावधान किया गया। वसुंधरा सरकार ने इस विधेयक को विधानसभा में पास कर राज्यपाल के पास भेज दिया था, जहां यह आज तक लंबित है। इस आरक्षण का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं है। यदि राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं तो इसमें सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने संबंधी निर्देश का पेंच फंस जाएगा।
वसुंधरा सरकार के साथ हुए समझौते के बाद से ही बैंसला यह प्रचारित कर रहे थे कि 'वसुंधरा सरकार गुर्जरों की भलाई के लिए अपनी सीमाओं के हिसाब से बहुत कुछ कर चुकी है। महारानी तो आरक्षण भी दे चुकीं हैं, लेकिन कांग्रेस के इशारे पर राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं। गेंद अब केंद्र की यूपीए सरकार के पाले में है। यदि आरक्षण विधेयक को लागू करने में दिक्कत आ रही है तो सरकार को संविधान में संशोधन कर आरक्षण की सीमा बढ़ानी चाहिए।' कुल मिलाकर बैंसला इस पूरे मामले को कांग्रेस के ऊपर थोप देना चाहते हैं। महारानी का भी शुरू से यही मकसद था कि कैसे भी करके उनके यह बला टल, कांग्रेस के पाले में चली जाए। कुछ हद तक कर्नल ने यह काम कर दिखाया। इस बीच गुर्जरों पर बैंसला की पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही थी। विधानसभा चुनावों में यह साबित हो गया कि गुर्जर अब कर्नल की सारी बातें मानने वाले नहीं हैं। गौरतलब है कि विधानसभा चुनावों में बैंसला ने गुर्जरों से भाजपा को वोट देने की अपील की थी, पर उसका कोई खास असर नहीं हुआ। गुर्जरों ने भाजपा को वोट नहीं दिए।
विधानसभा चुनावों में कर्नल का जादू नहीं चलने के बाद भाजपा का एक धड़ा उन्हें किनारे करने के पक्ष में है। इसका मानना है कि बैंसला का ज्यादा तवज्जों देने से मीणा वोट पूरी तरह से पार्टी से कट जाएंगे। किरोड़ी लाल मीणा के पार्टी छोड़ देने के बाद पहले ही अधिकांश मीणा वोटर भाजपा से रूठ चुके हैं, लेकिन महारानी कर्नल का पूरा पक्ष ले रही हंै। इसके पीछे एक बड़ी वजह है। वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां सीट पर मुकाबले में फंस गए हैं। इस सीट पर गुर्जर वोटर अच्छी संख्या में हैं। यदि दुष्यंत गुर्जर वोट हासिल कर लेते हैं तो उनकी जीत की संभावनाएं बन जाएंगी। बेटे को जिताने के लिए महारानी बैंसला का सक्रिय समर्थन चाहती हैं। इतने समय से नेताओं के संपर्क में रहने के बाद कर्नल ने भी अब सियासत सीख ली है। उन्होंने दुष्यंत की मदद करने की एवज में टोंक-सवाई माधोपुर सीट से भाजपा का टिकट मांग लिया है।
बैंसला को करीब से जानने खुले तौर पर स्वीकारते हैं कि सियासत का कहकरा उन्हें नहीं आता है। वे बहुत जल्दी राजनीतिक चालों में फंस जाते हैं। कर्नल के चुनाव लडऩे के निर्णय से आरक्षण आंदोलन के दौरान उनके दाएं-बाएं खड़े रहने वाले गुर्जर नेता खासे खिन्न हैं। वे कहते हैं कि कर्नल साहब ने ही यह तय किया था कि आरक्षण आंदोलन संघर्ष समिति से जुड़ा कोई भी शख्स चुनाव नहीं लड़ेगा और अब उसके मुखिया ही मैदान में कूद पड़े हैं। आंदोलन के दौरान बैंसला के प्रवक्ता रहे डॉ. रूप सिंह भी उनके राजनीति में आने के निर्णय से खासे खफा हैं। सिंह बताते हैं कि 'जिनकी अगुवाई में हमने सामाजिक आंदोलन शुरू किया था आज वे ही राह भटक गए हैं। कर्नल साहब के चुनाव लडऩे के फैसले ने समाज को पीछे धकेल दिया है। समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। वे उस दल के साथ जा रहे हैं जिनकी सरकार ने 71 निर्दोष गुर्जरों को मार डाला। समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।'
बैंसला के पास राजनीति में आने का अपना ही तर्क है। वे मानते हैं कि राजनीतिक रूप से सक्षम हुए बिना किसी भी समाज का भला नहीं हो सकता। चुनाव लडऩे के मकसद के बार में उन्होंने बताया कि 'मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन समाज के भले के लिए चुनाव लड़ रहा हूं। आंदोलन के दौरान हमारे पास कोई मजबूत नेता होता तो हमें आरक्षण मिल चुका होता। 2010 में आरक्षण की अवधि समाप्त हो रही है। आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा होने चाहिए। मैं संसद में जाकर यही मांग करुंगा। आरक्षण सामाजिक समानता लाने के उद्देश्य से भटक गया है।' शुरू से ही बैंसला के खिलाफ रहे गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल उनके इस तर्क से सहमत नहीं है। वे कहते हैं, 'कर्नल साहब समाज के मान-सम्मान पर पैर रखकर उस कुनबे में शामिल हो रहे हैं जिसने गुर्जरों के 71 बेटों की हत्या करवाई हो। समाज में अब उनकी कोई इज्जत नहीं बची है।'