रविवार, जून 21, 2009

जाति का जिन्न

चुनावों का मौसम जाने के बाद भी राजस्थान में जाति का जोर कम नहीं हुआ है। अपना राजनीति वजूद कायम रखने की जुगत में नेता सूबे के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जाति के इस जिन्न से निपटना गहलोत सरकार के लिए एक चुनौती है। एक रिपोर्ट!

अपनी सामाजिक समरसता के लिए विख्यात राजस्थान रह-रह कर उपज रहे जातिगत तनावों को झेलने के लिए अभिशप्‍त है। नेताओं ने अपने सियासी सपनों को सच करने के लिए ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि जातियों के बीच भाईचारा पनपने की बजाय कटुता और कलह बढ़ती ही जा रही है। तनाव यूं ही बढ़ता रहा तो कभी भी कोई अनिष्ट हो सकता है और राज्य में हिंसा फैल सकती है। अशोक गहलोत सरकार को भी इसका अहसास है। सरकार ने मीणा और गुर्जरों के बीच चौड़ी होती खाई को पाटने के मकसद से दोनों जातियों के आला नेताओं के साथ मिलकर एक रोड मेप तैयार किया है। कमाल की बात तो यह है कि माहौल को ठीक करने के लिए अपनी-अपनी जाति के पेरोकार नेता सरकार के साथ तो सुर में सुर मिलाते हैं, पर जमीनी स्तर पर द्वेष बढ़ाने वाले काम ही ज्यादा करते हैं।
राजस्थान में जाति की जाजम पर बैठकर अपनी सियासत चलाने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। इनमें से कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला इन दिनों खासी चर्चाओं में है। गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए दो बड़े आंदोलनों के सूत्रधार रहे बैंसला भाजपा का दामन थाम संसद में पहुंचना चाहते थे, लेकिन मामूली अंतर से चुनाव हार गए। इस हार के बाद अपनी राजनीति सिमटती देख बैंसला फिर से अपनी पुरानी भूमिका में आ गए हैं और गुर्जरों को एसटी आरक्षण का दिए जाने का राग अलापने लगे हैं। वे गुर्जरों की सहानूभति और समर्थन बटोरने का कोई भी मौका नहीं चूकते। पिछले दिनों सवाई माधोपुर जिले के बामनवास में गुर्जर और मीणाओं के बीच हुई हिंसक झड़पों के तुरंत बाद वे घटनास्थल पर पहुंच धरने पर बैठ गए थे। वे जहां भी जाते हैं लोकसभा चुनावों में महज 300 वोटों से मिली हार का जिक्र करना नहीं भूलते। वे इसकी वजह मतदान और मतगणना में भारी धांधली बताते हैं और इसके लिए विजयी रहे नमोनारायण मीणा के अलावा समूची मीणा बिरादरी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।
ये सब बैंसला की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे गुर्जरों का खोया हुआ वि’वास पाने की मुहिम में जुटे हैं। दरअसल, भाजपा का दामन थाम लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद से गुर्जर बैंसला से खुश नहीं हैं। विशेष रूप से गुर्जरों की युवा पांत बैंसला पर स्वयं की राजनीति के लिए समाज का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है। इन लोगों में बैंसला के प्रति गुस्सा इस बात को लेकर है कि कर्नल उस पार्टी में शामिल हो गए जिसकी सरकार ने 70 गुर्जरों को मौत के घाट उतारा। समाज के लोग अब कर्नल और वसुंधरा सरकार के समझौतों पर भी अंगुलियां उठा रहे हैं। गौरतलब है कि इन समझौतों की ज्यादातर बातों पर अमल नहीं पाया है। मसलन, मृतकों के आश्रितों को सरकारी नौकरी, मुकदमों की समाप्ति और आंदोलनकारियों की रिहाई। वैसे गुर्जरों को दो बड़े आंदोलन करने के बाद भी सिवाय तबाही के कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्हें वसुंधरा सरकार द्वारा घोषित विशेष श्रेणी के तहत पांच फीसदी आरक्षण का लाभ भी अभी तक नहीं मिल पाया है। इस आशय के विधेयक को विधानसभा में तो पारित कर दिया था, पर यह अभी तक राजभवन में ही अटका हुआ है।
सूत्रों की मानें तो कर्नल बैंसला गुर्जरों को अपनी अगुवाई में संगठित कर फिर से एक बड़ा आंदोलन करना चाहते हैं। उनकी योजना तो 10 जून को भरतपुर जिले के महरावर गांव में महापंचायत के साथ ही आंदोलन शुरू करने की थी, पर क्षेत्र के गुर्जरों की ओर से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्होंने इसमें बदलाव कर दिया है। नई रणनीति के तहत बैंसला ने कई जातियों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर आंदोलन को व्यापक बनाने की कोशिश की है। बैंसला के कहे को सही मानें तो अगला आंदोलन पश्‍िचमी राजस्थान से शुरू होगा और इसे शांतिपूर्ण तरीके से देश भर में चलाया जाएगा। जब कर्नल बैंसला से आंदोलन के मकसद के बारे में पूछा तो वे इधर-उधर की बातें छोड़ तुरंत ही पुराने ढर्रे पर आ गए और कहा कि ‘हमने गुर्जरों को एसटी में शामिल करने की मांग के साथ आंदोलन शुरू किया था और आज भी हम उसी पर कायम है। यह सरकार को तय करना है कि वह गुर्जरों को एसटी दर्जा कैसे देती है। आने वाले कुछ दिनों में कोर कमेटी मुख्यमंत्री से मिलकर अपना पक्ष रखेगी। यदि सरकार हमारी बात मानती है तो ठीक, नहीं तो हम आंदोलन करेंगे। यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन होगा और ठोस निर्णय होने पर ही पूरा होगा।’
विश्‍लेषकों के मुताबिक कर्नल बैंसला के क्रियाकलापों से साफ झलकता है कि वर्तमान हालातों में उनका इरादा गुर्जरों का सिरमौर बने रहने के सिवा कुछ नहीं है। यदि वे कोई आंदोलन करेंगे तो गुर्जरों के बीच रहते हुए और गुर्जरों के दम पर करेंगे। आरक्षण आंदोलन को देशव्यापी बनाने और अन्य जातियों को इसमें शामिल करने की बातें बैंसला तभी तक कर रहे हैं जब तक गुर्जर पुराने समर्पण के साथ उनके पीछे खड़े नहीं हुए हैं। जिस दिन गुर्जर पहले की तरह कर्नल के एक इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार हो गए, आंदोलन शुरू हो जाएगा और सिर्फ गुर्जरों के हक की बात होगी। यदि बैंसला गुर्जरों को आंदोलन के लिए तैयार कर लेते हैं तो भाजपा उनका साथ देने के लिए तैयार खड़ी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा और विशेष रूप से वसुंधरा राजे गुर्जरों का एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए बैंसला की किसी भी हद तक मदद करने को तैयार हैं। प्रह्लाद गुंजल के रूप में एक आक्रामक गुर्जर नेता की घर वापसी भी महारानी के लिए मुफीद साबित होगी। कुल मिलाकर आने वाले समय में राजस्थान को एक और आंदोलन झेलना पड़ सकता है।
जाति के दम पर राजनीति करने वालों की चर्चा हो और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है। मीणा समाज में इनके बराबर कद का कोई नेता नहीं है। डॉ. किरोड़ी को नजदीक से जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वे जाति के मामले में वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। जब गुर्जरों ने एसटी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया था तो किरोड़ी ने खूब हंगामा किया था। इन दिनों उनके बंगले पर मीणा समाज के लोगों का मजमा लगा रहता था। सब डॉ. किरोड़ी के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार थे। इन लोगों के दम पर वे आरक्षण के मुद्दे पर अपनी पार्टी की सरकार के उपर ही पिल पड़े। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने महारानी को साफ तौर पर चेतावनी दी थी कि गुर्जरों को आरक्षण देकर एसटी कोटे से छेड़छाड़ की गई तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस दौरान हुई तनातनी इतनी आगे बढ़ गई कि किरोड़ी को भाजपा से विदा होना पड़ा। भाजपा के बिना भी उन्होंने अपना सियासी वजूद कायम रखा और पहले विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीतने में सफल रहे। दोनों दफा उन्होंने जमकर ‘कास्ट कार्ड’ खेला। किरोड़ी ने इन चुनावों को पूरी मीणा बिरादरी की प्रतिष्ठा का प्र’न बनाते हुए वोट मांगे। लोगों ने उन्हें जमकर वोट दिए और वे अच्छे अंतर से जीतने में सफल हुए।
सियासत की आक्रामक शैली को पसंद करने वाले किरोड़ी इन दिनों खूब गरज रहे हैं। इस बार उनका निशाना वसुंधरा राजे नहीं होकर अशोक गहलोत और केंद्र की मनमोहन सरकार है। कर्नल बैंसला द्वारा गुर्जर आरक्षण का ’शिगूफा छोड़े जाने के बाद डॉ. किरोड़ी ने एक बार फिर से चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि एसटी कोटे से छेड़छाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी। उनके ये तल्ख बयान मीणा समाज में तो उनकी खास बढ़ा रहे हैं, पर गुर्जर समाज के लिए तो वे खलनायक ही साबित हो रहे हैं। गुर्जर ही नहीं अन्य कई जातियों को भी किरोड़ी का मीणाओं के पक्ष में कट्टर स्वाभाव नहीं भा रहा है। पिछले दिनों दौसा में एक युवती के अपहरण की घटना के बाद क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों ने डॉ. किरोड़ी पर अपहरणकर्ताओं को बचाने का आरोप लगाया था।
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा को भी बड़ा मीणा नेता माना जाता है। हालांकि कट्टरता के मामले में वे किरोड़ी के पासंग भी नहीं हैं। उनकी छवि एक ‘सोफ्ट कास्ट लीडर’ की है। वैसे जाति के दम पर खम ठोकने वाले गुर्जर और मीणा नेता ही नहीं हैं, इसमें जाट, राजपूत और ब्राह्मण नेता भी शामिल हैं। हालांकि ये लोगों को उस स्तर का तनाव देने में सक्षम नहीं हैं। सरकार या राजनीतिक दलों के लिए इन नेताओं को काबू में करना भले ही मुश्‍िकल हो, पर लोग इनकी तरफ से निश्‍िचंत रहते हैं। कांग्रेस की ही बात करें तो राज्य व केंद्र में मंत्री पद की मलाई बंट जाने के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर खींचतान हो रही है। जहां शीशराम ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने के बाद कई जाट नेता अपनी दावेदारी जता रहे हैं वहीं, ब्राह्मण और दलित अपनी बारी बता रहे हैं। कुछ दिनों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों का भी यही हाल है। जाति के आधार पर प्रतिनिधत्व मांगा जा रहा है। अशोक गहलोत प्रदेशाध्यक्ष और राजनीतिक नियुक्तियों के मसले को मो सुलझा लेंगे पर राजनीति के चलते फैले जातिगत वैमनस्य को कब तक दुरूस्त कर पाएंगे, यह देखना होगा।

6 टिप्‍पणियां:

  1. चिट्ठा जगत में स्वागत! जाति आधारित राजनीति तो बंद नहीं होने वाली।

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  2. सरजी जातियों की गणित पर आपने जो लेख लिखा है, वो वाकई कमाल है। जय हो।

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  3. its really a thought provoking report.we should seriously about our system,about this bloody cast politics.we have to rectify it.best of luck, good job done........

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  4. its really a thought provoking report. we should seriously think about our system, about this bloody cast politics. we have to rectify it. best of luck. good job done bhaijaan......

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  5. This is an amazing article which brings out the irony in our politics.it should be brought up at national levels for the youth to know what tis the plight of the country as far as politics is considered in any part of the country. Well done

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