सोमवार, दिसंबर 14, 2009
अब तो शर्म करो चिकने घड़ों
सवाल यह है कि जनप्रतिनिधि अपनी जिस्मेदारियों से मुंह क्यों चुरा रहे हैं? वे न तो सदन में नजर आते हैं, न ही सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ करने वाले कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाते हैं। यह देश की राजनीति के बदलते चेहरे और चरित्र की विसंगतियां हैं। सत्तर के दशक तक यह माना जाता था कि राजनीति सेवा का एक माध्यम है और राजनेता जनसेवक । चुनाव जीतने का एक ही नुस्खा था - जनता के बीच रहो और काम करो, लेकिन अब राजनीति, चुनाव और नेता तीनों के मायने बदल गए हैं। आम राजनेता का न तो उद्देश्य जनसेवा रह गया है और न ही उसके चरित्र में इतना बल बचा है कि वह काम और जनसंपर्क के दम पर चुनाव जीत लें। राजनीति में टिके रहने के लिए वे अपने कार्यों की बजाय हथकंडों पर निर्भर रहते हैं। ये हथकंडे तरह-तरह से मतदाताओं को लुभाने से लेकर शक्ति प्रदर्शन, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे और अंतत: बूथों पर कब्जे तक जाते हैं। हैरत इस बात पर होती है कि राजनेताओं का लोकतंत्र के विरुद्ध अमर्यादित आचरण रोकने के लिए मीडिया, आयोग या न्यायपालिका जितने उपाय निकालते हैं, राजनेता अमर्यादित आचरण करने के उससे ज्यादा तरीके निकाल लेते हैं। इस सांप-सीढ़ी के खेल से देश कब तक बच पाएगा? जब नेताओं के आचरण पर हो-हल्ला मचता है, तो वे ऐसा बहाना बनाते हैं कि उनकी बुद्धिमता पर हंसी आती है। जाहिर है, यह सच से मुंह मोडऩे का एक उपाय भर है। इससे उबरना तभी संभव है जब राजनेता खुद अपनी नैतिक जिस्मेदारी महसूस करें। आचरण और चरित्र की पवित्रता में वे रुचि लें और इसके लिए संकल्पबद्ध हों। अनुशासित होना इसकी पहली शर्त है। क्या देश के नेताओं से आम जनता को ऐसी उम्मीद करनी चाहिए?
शनिवार, दिसंबर 05, 2009
फिर न हो पुरानी चूक

प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन उल्फा से बातचीत में केंद्र की ओर से बरती जा रही सावधानी पूरी तरह से जायज है। असम में आतंक के पर्याय रहे इस संगठन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं है। सरकार 1992 के अपने कड़वे अनुभवों को दोहराना नहीं चाहती। उस समय बातचीत को जरिया बनाकर उल्फा ने अपने पांच नेताओं को रिहा करवा लिया था। अनूप चेतिया के नेतृत्व में वार्ता के लिए जेल से रिहा किए गए ये पांचों नेता तब बांग्लादेश भाग गए थे और आतंकी गतिविधियों को फिर से शुरू कर दिया था। अच्छी बात है कि सरकार ने अपनी पिछली गलती से सबक लिया है, लेकिन असम में शांति स्थापित करने के लिए इतना ही काफी नहीं है। यह वह समय है जब सरकार की चतुराई उल्फा को जमींदोज कर सकती है। संगठन के कमांडर इन चीफ परेश बरुआ को छोड़कर वर्तमान में इस संगठन के लगभग सभी शीर्ष नेता सुरक्षा एजेंसियों के कब्जे में हैं। उल्फा को खड़ा करने वाले अरविंद राजखोवा भी भारत के सामने हथियार डाल चुके हैं। उनका आत्मसमर्पण यह साबित करने के लिए काफी है कि लगातार कमजोर हो रहा यह संगठन अब समझौते की राह पर है। यह ऐसी स्थिति है जब सरकार अपनी शर्र्तों के आधार पर समझौता करवा सकती है। असम के मुख्यमंत्री के सुझाव पर भी गौर करना जरूरी है। वे चाहते हैं कि उल्फा नेताओं को सुरक्षित रास्ता दे दिया जाए, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि वे आजाद होने के बाद फिर से उल्फा को मजबूत कर कत्लेआम नहीं मचाएंगे? क्या उल्फा के सरगनाओं को माफी देना उन लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं है, जो बरसों से जारी हिंसा का शिकार हुए हैं?
केंद्र सरकार ने इस मसले पर जो रुख अपना रखा है, उसे देखकर तो यह लगता है कि वह इस बार दबाव में कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। वार्ता शुरू करने से पहले यह तय कर लेना समझदारी है कि बातचीत किनसे की जानी है और किन मुद्दों पर होनी है। जब तक अरविंद राजखोवा संप्रभुता की मांग को नहीं छोड़ते हैं, बातचीत का कोई अर्थ नहीं है। परेश बरुआ की भूमिका को भी सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती है। वे वर्तमान में सबसे अधिक ताकतवर हैं और अब तक भारत की पकड़ से बाहर हैं। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजखोवा की ओर से किए गए समझौते को वे मानने से इनकार कर दें। ध्यान रहे ऐसा पहले भी हो चुका है। 2005 में उल्फा ने वार्ता के लिए 11 सदस्यीय दल पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) बनाया था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस समूह के साथ तीन दौर की बातचीत की थी, लेकिन इसमें उल्फा के किसी बड़े नेता के शामिल नहीं होने से कोई नतीजा नहीं निकला। सरकार को पता होना चाहिए कि उल्फा अब इतना मजबूत नहीं रहा है कि उसकी शर्र्तों के सामने झुका जाए। सरकार को वार्ता के लिए तब ही तैयार होना चाहिए, जब उल्फा हिंसा और संप्रभुता की मांग छोड़ दे। असम में शांति स्थापित करने के लिए उन अपराधियों को माफी नहीं दी जा सकती, जिनके हाथ हजारों बेगुनाहों के खून से रंगे हैं। केंद्र सरकार को इसी रुख पर कायम रहना चाहिए कि आत्मसमर्पण करने वाले उल्फा नेताओं को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और बातचीत संविधान के दायरे में रहकर ही की जाएगी।
शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009
पुरानी चाल का नया चोला

अफगानिस्तान-पाकिस्तान मुद्दा अमेरिका के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। उसने कभी नहीं सोचा होगा कि इन दोनों मुल्कों में संघर्ष इतना लंबा खिंचेगा। वह यहां पर कार्रवाई रोक भी नहीं सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसकी प्रतिष्ठा मिट्टïी में मिल जाएगी। अपनी नाक बचाए रखने के लिए जीतना उसकी मजबूरी है। अमेरिका जीत सुनिश्चित करने के लिए पुराने ढर्रे पर लौट आया है। बराक ओबामा ने ना-नुकुर करते हुए आखिरकार अफगानिस्तान में सैनिक बढ़ाने की इजाजत दे दी है। नई अफ-पाक नीति बनाने में अमेरिकी रणनीतिकारों ने खूब माथापच्ची की है, लेकिन इसकी सफलता पर कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।
अफगानिस्तान में तालिबान को मात देने के लिए अमेरिका ने 30 हजार नए सैनिक उतारने का फैसला किया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इस बार लड़ाई निर्णायक होगी और जीतने पर डेढ़ साल में उनके सैनिक वापस घर लौट आएंगे। यह पहला मौका है, जब अमेरिका ने सैनिकों की तैनाती के साथ, उनकी वापसी के लिए कोई समय सीमा निर्धारित की है। अफगानिस्तान में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से अमेरिकी सैनिकों की संख्या करीब एक लाख हो जाएगी। एक साल में इस पर 30 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 13 अरब रुपये) का खर्च आएगा। सैनिकों की तैनानी और बढ़ते खर्चे से ज्यादा चिंता अमेरिका को आठ साल से जारी जंग को जीतने की है। अफगानिस्तान में फतह हासिल करना अमेरिका के लिए नाक का सवाल बन गया है। ओबामा भी स्वीकार करते हैं कि अफगानिस्तान दूसरा वियतनाम नहीं है। जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वह इतिहास की गलत व्याख्या कर रहे हैं। अफगानिस्तान छोड़ देना अल-कायदा और तालिबान के हौसले को बुलंद करेगा। इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर तथा हमलों का जोखिम पैदा हो जाएगा।
ओबामा अफगानिस्तान में सैनिक बढ़ाने के हिमायती नहीं रहे हैं, पर उन्हें मजबूरी में यह फैसला लेना पड़ा। अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सेना के शीर्ष कमांडर जनरल स्टैनली मैकक्रिस्टल ने चेतावनी दी थी कि तालिबान के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अभियान में यदि अतिरिक्त सैनिक नहीं भेजे गए तो अफगानिस्तान में अमेरिका का यह अभियान संभवत: असफल हो जाएगा। मैकक्रिस्टल ने ओबामा को भेजी गुप्त आकलन रिपोर्ट में कहा था कि अफगानिस्तान में तालिबान के साथ जारी संघर्ष में अमेरिका की असफलता बढ़ रही है और आने वाले समय में आतंकवादी गतिविधियां फिर से तेज हो सकती हैं। ओबामा प्रशासन ने मैकक्रिस्टल के तर्र्कों पर सहमत होते हुए सैनिकों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन डेढ़ साल के भीतर फतह हासिल करना उसके लिए आसान नहीं है। अफगानिस्तान में स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। पाकिस्तान में छिपे आतंकियों ने दुबारा मोर्चा संभाल लिया है। फिलहाल उनके निशाने पर नाटो सेना के अड्डे और विदेशी दूतावास हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले एक साल में ही 500 से ज्यादा नाटो सैनिक आत्मघाती हमलों में हताहत हो चुके हैं। अमेरिका द्वारा सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ये हमले और बढ़ सकते हैं। ओबामा प्रशासन को अफगान नागरिकों के गुस्से की चिंता भी खाए जा रही है। पिछले दस साल से हिंसा का दंश झेल रही जनता अमेरिका की भूमिका से कतई खुश नहीं है। मैकक्रिस्टल ने अपनी रिपोर्ट में भी इसका खुलासा किया था। इसी का नतीजा है कि अमेरिका ने सैनिक बढ़ाने के फैसले के साथ इस तर्क को जोड़ा है कि वे अफगानी नागरिकों को बेहतर जीवन सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे। अमेरिका ने राष्ट्रपति हामिद करजई को भी चेतावनी भरे लहजे में कह दिया है कि वे नतीजे दें या हटने को तैयार रहें।
अमेरिका पाकिस्तान की स्थिति पर भी खासा परेशान है। ओबामा ने अपने भाषण में जिस तरह से कहा कि पाकिस्तान आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बन गया है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि वह अब नरमी बरतने वाला नहीं है। अमेरिका को यह अहसास होने लगा है कि पाकिस्तान हुक्मरान भलमनसाहत के लायक नहीं हैं। अमेरिका ने आतंकियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ड्रोन हमले बढ़ाने के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन इसका विपरीत असर भी पड़ सकता है। आतंकी पलटवार करते हुए आत्मघाती हमलों की संख्या में और इजाफा कर सकते हैं। पहले ही यहां की जनता हिंसा से त्रस्त है और अमेरिका से नाराज है। आने वाले वक्त में यह गुस्सा और भड़क सकता है। ओबामा प्रशासन भी इस खतरे से वाकिफ है। वो आतंकियों का सफाया करने के साथ-साथ आम जनता से हमदर्दी जताना नहीं भूल रहे हैं। पाकिस्तान को दी जानी वाली सहायता मेें की गई भारी वृद्धि को इस रूप में देखा जा सकता है। पाकिस्तानी जनता और सेना इस बात को अच्छी तरह जानती है कि अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक सहायता का क्या मतलब है? यदि मदद नहीं मिलती है, तो पाकिस्तान की स्थिति क्या हो सकती है? अमेरिका के लिए परेशानी की बात यह है कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों को जिन्हें पहले आईएसआई बढ़ावा दे रही थी, अब कई राज्यों में विद्रोह कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई इस बात को लेकर काफी आत्मविश्वास में थे कि वे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों को काबू में कर लेंगे, लेकिन आतंकवादी संगठनों का इतिहास बताता है कि इस तरह के संगठनों को लंबे समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। अमेरिका इस बात की काफी नजदीक से जांच-पड़ताल करेगा कि आईएसआई इस तरह के संगठनों को किसी तरह की आर्थिक सहायता न पहुंचा पाए। साथ ही इस बात को भी देखेगा कि इस तरह के संगठन जनता से पैसों की उगाही के लिए कोई खतरनाक तरीका न अपना सकें। यदि पाकिस्तानी सेना और सरकार अमेरिका और दूसरे अन्य देशों से आर्थिक सहायता हासिल करना चाहती है, तो उसे जिहादी संगठनों के खिलाफ प्रतिबंध लगाना होगा।
नई अफ-पाक नीति में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत का संदर्भ भले ही न दिया हो, लेकिन दोनों मुल्कों को आतंक का सुरक्षित ठिकाना बताकर उन्होंने दिल्ली को राहत पहुंचाई है। यही नहीं पाकिस्तान में मौजूद परमाणु अस्त्र आतंकियों के हाथ लगने की आशंका जताकर भी ओबामा ने वही किया है, जिसकी उम्मीद भारतीय खेमे को थी। अफगानिस्तान क्षेत्र में सैन्य दबाव बढ़ाने के अमेरिकी फैसले पर भारत को संतोष होना चाहिए। भारत फिलहाल यही चाहता है कि अमेरिका कहीं से भी पाक और अफगानिस्तान में अपना दबाव कम न करे, जहां आतंकी भारत विरोधी करतूतों की साजिश रच रहे हैं। यह तय है कि अफ-पाक नीति में भारत की दिलचस्पी दो स्तर पर ज्यादा होती है। पहला, पाक में मौजूद आतंकी संगठनों पर अमेरिकी शिकंजा कसने की झलक इस नीति में भारत हमेशा तलाशता है। दूसरा, अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर अमेरिका की प्रतिक्रिया। इस लिहाज से ओबामा की नई अफ-पाक नीति भारत की इच्छा के मुताबिक है।
पृथ्वी को बचाने की पहल

भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसदी कमी करने की घोषणा कर साबित कर दिया है कि वह धरती को बढ़ते ताप से बचाने की दिशा में पूरी ईमानदारी से जुटा हुआ है। यह कमी 2005 की तुलना में होगी और इसके लिए 2020 तक का समय तय किया गया है। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले अहम सम्मेलन से पहले भारत का कार्बन उत्सर्जन में कटौती का फैसला मायने रखता है। हालांकि इसकी इस आधार पर आलोचना की जा सकती है कि भारत अमेरिका और चीन के दबाव के सामने झुक गया है, फिर भी व्यापक दृष्टिकोण से भारत की सराहना होनी चाहिए। कार्बन उत्सर्जन की दृष्टि से भारत दुनिया में चौथे पायदान पर है, लेकिन वह ग्लोबल वार्र्मिंग पर लगाम कसने के लिए शीर्ष तीनों देशों- चीन, अमेरिका और रूस से न केवल ज्यादा फ्रिकमंद है, बल्कि संजीदा भी है। भारत इस दिशा में पहले से ही नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (एनएपीसीसी) पर काम कर रहा है, जिसमें आठ अभियान - सौर, उन्नत ऊर्जा दक्षता, हिमालय के पर्यावरण को बनाए रखने, हरा-भरा भारत, कृषि और तापमान परिवर्तन के लिए रणनीतिक ज्ञान शामिल है। इसके विपरीत चीन और अमेरिका कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मसले पर गाहेबगाहे आनाकानी करते रहे हैं। हालांकि उन्होंने कटौती के लक्ष्य निर्धारित कर दिए हैं, लेकिन इन्हें हासिल कैसे किया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। क्या जलवायु परिवर्तन इतनी छोटी समस्या है कि इससे निपटने के लिए महज दिखावा किया जाए? आखिर चीन और अमेरिका अपनी जिम्मेदारी कब समझेंगे? क्या ये देश नाममात्र का कार्बन उत्सर्जन करने वाले मुल्कों पर दबाव बनाकर दुनिया को विनाश की ओर नहीं धकेल रहे हैं?
अमेरिका ने 2020 तक उत्सर्जन में 17 फीसदी तक की कटौती का लक्ष्य रखा है, जो 2005 के स्तर से कम है। चीन ने कहा है कि वह 2020 तक सकल घरेलू उत्पाद की प्रति यूनिट ऊर्जा तीव्रता में 40-45 फीसदी तक की कमी करेगा। अगर 1990 के स्तर की बात करें, तो अमेरिका द्वारा उत्सर्जन में की गई यह कटौती महज तीन फीसदी बैठती है। इसके अलावा अमेरिका घरेलू लक्ष्यों तक ही सीमित बना हुआ है और बहुराष्ट्रीय कानूनी बाध्यता को लेकर किए गए समझौते से दूरी बनाए हुए है। चीन का भी यही हाल है। उसने संकेत दिया है कि कार्बन उत्सर्जन में इजाफा तो बरकरार रहेगा, लेकिन इसकी रफ्तार में कमी आएगी। इसमें चीनी अर्थव्यवस्था के विकास की गति की शर्त अलग से जुड़ी हुई है। यदि चीन की अर्थव्यवस्था सात फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ती है, तो उसका उत्सर्जन 50 फीसदी तक बढ़ेगा जो 2005 के स्तर से अधिक है। अगर अर्थव्यवस्था 10 फीसदी की दर से विकास करती है, तो यह उत्सर्जन 150 फीसदी तक बढ़ेगा जो 2005 के स्तर से काफी अधिक है। क्या ये आंकड़े साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि चीन और अमेरिका पृथ्वी को बचाने के लिए कोरी गप्पबाजी कर रहे हैं? यदि इन दोनों मुल्कों का यही रवैया रहा, तो कोपेनहेगन में भी कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है। ऐसी स्थिति में जब जब पृथ्वी के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है, तो विकसित देशों को संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठते हुए बढ़ते ताप पर लगाम कसने के लिए ईमानदार प्रयास करने चाहिए। इसमें जितनी देर होगी खतरा उतना ही बड़ा होता जाएगा।
गुरुवार, दिसंबर 03, 2009
चिंतन से आगे

गहलोत सरकार की ओर से दो दिन के चिंतन के बाद की गई घोषणाएं सुशासन के स्वप्न को साकार करने में मददगार साबित हो सकती हैं, बशर्ते इन पर ईमानदारी से अमल हो। यह अच्छी बात है कि सरकार अपने एक साल के कामकाज की समीक्षा कर रही है, लेकिन इसकी सार्थकता खामियों को दुरुस्त करने की दिशा में पहल करने पर ही है। सरकार ने गांव, गरीब और किसान को केंद्र में रखते हुए हर क्षेत्र में विकास का इरादा जाहिर किया है। भले ही इसका मकसद पंचायत चुनावों में मतदाताओं का लुभाना हो, लेकिन इनके दम पर राज्य में विकास को गति तो दी ही जा सकती है। अच्छा काम कर राजनीतिक लाभ हासिल करने में बुराई ही क्या है? सरकार की ओर से की गई घोषणाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण 'नई कृषि नीतिÓ बनाने का फैसला है। राज्य में किसान जिस तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें देखते हुए लंबे समय से पृथक कृषि नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। देर से ही सही सरकार ने किसानों की सुध तो ली। इस घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सरकार इसमें ऐसे उपायों को शामिल करे, जिससे किसानों को अपना जीवन त्रासद नहीं लगे। हर गांव के लिए अलग मास्टर प्लान बनाने का निर्णय भी अपने आप में ऐतिहासिक है। जनसंख्या की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए गांवों का नियोजित विकास समय की मांग है। मास्टर प्लान बनने से गांवों की बसावट तो व्यवस्थित होगी ही, पानी के निकास की भी समुचित व्यवस्था होगी। निजी अस्पतालों में गरीबों के ऑपरेशन की घोषणा कर सरकार ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि राज्य में इलाज की कमी की वजह से किसी की मौत नहीं हो।
सरकार ने नगरीय विकास की प्रतिबद्धता को भी दोहराया है। हर शहर के लिए 'सिटी डवलपमेंट प्लानÓ बनाने की घोषणा बेतरतीब ढंग से बढ़ रहे शहरों को नियोजित करने में कारगर साबित हो सकती है। अवैध रूप से विकसित हो रही कॉलोनियों पर लगाम कसने के लिए 'नई टाउनशिप पॉलिसीÓ की घोषणा भी एक स्वागतयोग्य कदम है। इससे न केवल भूमाफियाओं पर लगाम कसेगी, बल्कि शहरों को योजनाबद्ध ढंग से विकसित करने में भी मदद मिलेगी। सरकार 26 जनवरी से 'प्रशासन शहरों के संगÓ अभियान भी शुरू करने जा रही है। यह एक सफल प्रयोग है, जिसमें आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों में चक्कर नहीं काटने पड़ते। क्या सरकार हमेशा के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकती कि लोगों को प्रशासन एक ही स्थान पर सहज रूप से उपलब्ध हो जाए? शहरों में ही नहीं, गांवों में भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि प्रशासन गांवों से ही सबसे अधिक दूर होता है। पटवारियों और ग्रावसेवकों को मोबाइल देने से संवाद जरूर कायम होगा, लेकिन महज इससे दूरी पटने वाली नहीं है। दो दिन के गहन चिंतन-मनन के बाद लोकलुभावन घोषणाएं करने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना होगा कि इन्हें पूरा नहीं करना आत्मघाती साबित होता है। जनता वोट की चोट से एक बार में ही हिसाब बराबर कर लेती है। सरकार का मुखिया होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह मंत्रियों और अधिकारियों को इन घोषणाओं को मूर्त रूप देने के लिए पाबंद करें। सिर्फ उनके जवाबदेह बनने से काम नहीं चलेगा, सरकार से जुड़े हर शख्स की जिम्मेदारी तय करना भी उन्हीं का काम है। जब तक यह नहीं होगा न तो चिंतन का कोई अर्थ है और न ही घोषणाओं का।
बुधवार, दिसंबर 02, 2009
अपूरणीय क्षति

राज्यपाल एस.के. सिंह का निधन न केवल राजस्थान, बल्कि समूचे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। राजस्थान के राज्यपाल के तौर पर वे यह साबित करने में कामयाब रहे कि राज्यपाल का पद महज संवैधानिक प्रधान का नहीं होता। वे मुख्यमंत्री व मंत्रियों को शपथ दिलाने और राजकीय मेहमानों के स्वागत-सत्कार तक ही नहीं सिमटे, बल्कि राज्य के जनजीवन से जुडऩे में सफल रहे। इस उपक्रम में उन्होंने सरकार का विरोध झेलने से भी परहेज नहीं किया। जनहित से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी और साफगोई से बोलने का साहस उनके पास ही था। चाहे प्रदेश में शिक्षा के स्तर की बात हो या आरक्षण का मुद्दा, वे पूरी शिद्दत से सक्रिय रहे। विश्वविद्यालयों में शोध के स्तर पर वे खासे चिंतित थे। उन्होंने इसके सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी प्रस्तुत किए थे। शोध ही नहीं, शिक्षण पद्धति, परीक्षा प्रणाली आदि पर वे समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहे। निजी विश्वविद्यालयों की बेतरतीब स्थापना पर उन्होंने कड़ा एतराज जताते हुए कहा था कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी। आरक्षण व्यवस्था में आई विकृतियों पर उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किए, उनसे असहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे इस मायने में भी खास थे कि वे शिकायत करने से ज्यादा ध्यान समस्या के समाधान करने पर देते थे। उनका मकसद जनमानस को उद्वेलित करने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे उसे बदलाव के लिए भी तैयार करते थे। असल में उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल रहते हुए भारतीय लोकतंत्र के इस पद की गरिमा व मान बढ़ाने के साथ-साथ इसकी प्रासंगिकता को भी सिद्ध किया।
एस. के. सिंह जहां भी रहे, उन्होंने अपने काम की छाप छोड़ी। उनकी गिनती देश के शीर्ष राजनयिकों में होती थी। विदेश सेवा में रहते हुए उन्होंने शानदार काम किया। जिस समय कश्मीर मसले पर पाकिस्तान ने राजनीति शुरू की थी, तो सिंह अमेरिका जाकर इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र को तटस्थ बनाने में न केवल कामयाब हुए, बल्कि यह आश्वासन लेने में भी सफल रहे कि संयुक्त राष्ट्र संघ शिमला समझौते का समर्थक है, जिसमें सभी मुद्दों पर द्विपक्षीय चर्चा का प्रावधान है। सिंह पाकिस्तान में सर्वाधिक समय तक राजदूत रहे, वह भी उस दौर में जब दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव चरम पर था। उन्होंने न केवल कश्मीर में पाकिस्तान की दखलंदाजी से संबंधित कई महत्वपूर्ण सूचनाएं भारत को दीं, बल्कि दोनों के संबंधों को पटरी पर लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीन को कूटनीतिक मोर्चे पर घेरने में भी उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने इस क्रम को बरकरार रखा। अरुणाचल समेत समूचे पूर्वोत्तर में आधारभूत ढांचे के विकास में उनका सक्रिय योगदान रहा। महात्मा गांधी के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात कर उन्होंने पूरी दुनिया में मानवाधिकार के क्षेत्र में काम किया। एक मायने में उन्होंने गांधी के दूत के रूप में कार्य करते हुए गांधी दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। अपने काम के दम पर उन्होंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, जॉर्डन, लेबनान व साइप्रस में भारतीय राजदूत रहते हुए इन देशों अपने अनगिनत शुभचिंतक पैदा किए। व्यापक कार्यक्षेत्र और बहुमुखी प्रतिभा के धनी एस. के. सिंह का असामयिक निधन से जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भर पाना नामुमकिन है।
मंगलवार, दिसंबर 01, 2009
जनप्रतिनिधियों का आचरण

भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में सोमवार को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान पहली बार कार्यवाही इसलिए स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि प्रश्न पूछने वाले अधिकांश सांसद अपने सवाल का जवाब जानने के लिए सदन में उपस्थित नहीं थे। सांसदों का बंक मारना अब कोई नई बात नहीं रही है, लेकिन कम से कम उनसे यह उम्मीद तो की जाती है कि अपने प्रश्न का जवाब सुनने के लिए वे सदन में हाजिर रहें। माननीय सदस्यों के सवाल का जवाब तैयार करने के लिए सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ती है और इसके लिए संबंधित विभागों के मंत्रियों को तैयारी भी करनी पड़ती है। इस समूचे प्रकरण का शर्मनाक पहलू यह रहा कि माननीय सदस्यों ने लोकसभा अध्यक्ष को अपने नहीं आने की सूचना देना भी उचित नहीं समझा। इस संदर्भ में देखा जाए तो देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद से लेकर राज्य विधानसभा और ग्राम पंचायत तक में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का यह गैर जिम्मेदाराना आचरण एक 'फैशनÓ का रूप अख्तियार कर चुका है, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए एक खतरनाक बीमारी से किसी तरह कम नहीं है। नेताओं की इस प्रवृत्ति से सभी दल दुखी हैं और कांग्रेस व भाजपा सहित सभी दलों के प्रमुख अपनी पार्टी से चुनकर आने वाले सभी सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने की कई बार सख्त हिदायतें दे चुके हैं। लोकसभा अध्यक्ष और राज्य विधानसभा के अध्यक्ष भी निर्वाचित सदस्यों को बार-बार चेता रहे हैं कि उनकी अनुपस्थिति से कई महत्वपूर्ण निर्णय अटक जाते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद नेताओं के आचरण में सुधार नहीं आना चिंता का विषय है।
नेताओं के इसी आचरण से दुखी होकर सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए कहा था, 'संसद में अब न तो कोई प्रश्न करता है और न ही कोई किसी मुद्दे पर बहस करता है। बस शोर-शराबा करता है और धरना देता है, क्योंकि सांसदों को ऐसा लगता है कि शोर-शराबा करने और धरना देने से मीडिया का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित होगा और इसका उन्हें राजनीतिक फायदा मिलेगा।Ó संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर औसतन 26,035 रुपए खर्च आता है। ऐसे में समय और जनता के धन की कीमत हमारे जनप्रतिनिधियों को भलीभांति समझनी चाहिए। बेलगाम होते जनप्रतिनिधियों के इस आचरण का उपचार न तो दंडात्मक कार्रवाई में है और न ही पार्टी प्रमुखों की हिदायतों में। आम मतदाता ही नेताओं की बैठकों से नदारद रहने की गैर जिम्मेदाराना प्रवृत्ति को सुधार सकता है। अब लोगों के पास सूचना के अधिकार का एक ऐसा हथियार है, जिसके जरिए अपने प्रतिनिधि की पाई-पाई का हिसाब रखा जा सकता है। जब लोगों में जागरुकता आएगी और वे ऐसे लोगों को चुनाव में नकारना शुरू करेंगे, तो नेताओं की अक्ल अपने आप ठिकाने आ जाएगी। जनता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, लेकिन वापस बुलाने का अधिकार नहीं है। ऐसे में वापस बुलाने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए, ताकि जनहित की अनदेखी करने वाले प्रतिनिधियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। मतदाताओं की जागरुकता और जनप्रतिनिधियों की कर्तव्यनिष्ठा के बिना भारत के महाशक्ति बनने के देशवासियों के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता है।
गुरुवार, सितंबर 10, 2009
मैं अधूरा तुम बिन
सफलता के कंगूरों को देखते वक्त क्या आपके मन में यह नहीं आता कि इसके नींव के पत्थर से मुलाकात की जाए कहा जाता है कि हर इंसान की जिंदगी में उसकी पत्नी कहीं प्रेरणा बनकर, कहीं साथ चलकर तो कहीं सहयोग देकर नींव के पत्थर का काम करती है। पति के मंजिल तक पहुंचने के बाद भी न तो ये थकी हैं, और न ही रूकी है। पूरी शिद्दत से जुटी हैं, अपने पतियों को और आगे बढाने में। आइए रूबरू होते हैं अलग-अलग क्षेत्रों की ऎसी ही कुछ दिग्गज हस्तियों से-
गायक बनाया आपने
गीतों को अपनी मखमली आवाज से हिट बनाने वाले गायक रूपकुमार राठौड को इस मुकाम तक पहुंचाने में उनकी पत्नी और मशहूर गायिका सोनाली राठौड का खास योगदान रहा है। अपने गायन के शुरूआती दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं, 'संगीत की दुनिया में मैंने जितना भी नाम कमाया है, सब मेरी पत्नी सोनाली की वजह से है। यदि सोनाली मेरी जिंदगी में नहीं आती, तो मैं कभी भी गायक नहीं बन पाता। मेरी रूचि तो तबला वादन में थी। गजलों के स्वर्णिम काल यानी अस्सी के दशक में मैं मशहूर गजल गायकों का चहेता तबला वादक था। सोनाली ने मुझे गाने के लिए प्रेरित किया। मैंने शुरूआत की और आज सबकुछ आपके सामने है। यह सोनाली की मेहनत का ही नतीजा है कि हमारी जोडी संगीत की दुनिया में हिट है। हमने 1991 में साथ काम करना शुरू किया था और अब तक पच्चीस से ज्यादा एलबम निकाल चुके हैं।'
हर जीत के पीछे अरुणा है
शतरंज की दुनिया के शहंशाह विश्वनाथन आनंद की चतुर चालों से विपक्षी खिलाडी हैरत में पड जाते हैं। शतरंज के क्षेत्र की हर ऊंचाई को साथ देने में साथ छुपा है उनकी पत्नी अरूणा का। अपनी सफलता में अरूणा के योगदान के बारे में आनंद कहते हैं, 'अरूणा को शतरंज की बारीकियों का ज्यादा ज्ञान नहीं है, लेकिन मेरा कॉन्फिडेंस बढाना उन्हें अच्छे-से आता है। मुझे अच्छी तरह याद है पिछले साल वल्र्ड रेपिड चैंपियनशिप के फाइनल में मेरा मुकाबला क्रैमेनिक से था। मैं बेहद घबराया हुआ था। अरूणा ने मुझे समझाना शुरू किया तो क्रैमेनिक का हौवा मेरे दिमाग से निकल गया और मुझे केवल मेरी ताकत ही याद रही। इसी का नतीजा था कि मैंने कै्रमेनिक को खिताबी दौर की तीन बाजियों में मात दी, जबकि वे पूरे साल में भी तीन बाजियां नहीं हारते हैं। अरूणा ने ऎसा पहली बार नहीं किया था। मेरी हर जीत में उनका योगदान होता है।' अरूणा ने पब्लिक रिलेशंस में मास्टर डिग्री हासिल की है और वे आनंद का हौसला बढाने के अलावा इस काम को भी बखूबी अंजाम दे रही हैं।
वो संवारती है मेरा अभिनय
आशुतोष राणा ने अपने दमदार डायलॉग और शानदार अभिनय से बॉलीवुड में अलग जगह बनाई है। राणा थिएटर से निकले हुए कलाकार हैं, पर बडी साफगोई से स्वीकार करते हैं कि उन्हें अभिनय सिखाने वाली सबसे बडी टीचर उनकी पत्नी रेणुका शहाणे हैं। वे कहते हैं, 'मैंने थिएटर से अभिनय सीखा, लेकिन उसे तराशा रेणुका ने। उन्होंने बडी सहजता से मेरे कमजोर और मजबूत पक्षों के बारे में बताया। रियल चैनल के चर्चित शो 'सरकार की दुनिया' में मेरे किरदार के पीछे रेणुका की कडी मेहनत है। इसी के चलते मैं सरकार के कैरेक्टर के साथ न्याय कर पाया। मैं उनसे हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। वे मेरी सबसे बडी मार्गदर्शक हैं।' मोहक मुस्कान से अपने जलवे बिखरने वाली रेणुका शहाणे खुद एक मंझी हुई कलाकार हैं। टेलीविजन इतिहास के सबसे चर्चित धारावाहिकों में से एक 'सुरभि' में उनकी एंकरिंग आज तक लोगों को याद है। 'हम आपके हैं कौन' फिल्म में उनका निभाया भाभी का किरदार लंबे समय तक लोगों को याद रहेगा। रेणुका इन दिनों निर्देशन का काम भी कर रही हैं और अपने पति को ध्यान में रखकर एक फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिख रही हैं।
शनिवार, अगस्त 15, 2009
अधूरा अफसाना
शनिवार, अगस्त 08, 2009
सिमटता संघ
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ऐसी उम्मीद कभी न थी। आठ दशक से भी ज्यादा पुराने इस दरख्त की हर शाख दरकने लगी है। हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन राह भटक गया है, शाखाएं सूनी हो गई हैं, अनुशासन खो गया है, बुद्धिजीवियों ने मुंह मोड़ लिया है और भाजपा का एक धड़ा अकेले चलने पर आमादा है। संघ चक्रव्यूह में फंसता ही चला जा रहा है। वह इससे निकलने के लिए एक रास्ता ढूंढ़ता है तो कई नए घेरों में फंस जाता है। क्या संघ सिमटने लगा है? क्या संघ को जंग लग गई है। संघ के अंदरूनी हालातों का जायजा लेती आवरण कथा।
मोहन राव भागवत। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छठे सर संघचालक। इसी साल 21 मार्च को जब उन्हें के. सुदर्शन का उत्तराधिकारी बनाया गया था तो उम्मीद थी कि वे संघ के कील-कांटों को दुरुस्त करने में कामयाब होंगे। भागवत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों, विशेषकर भाजपा से बिगड़ते रिश्तों को पटरी पर लाना और संगठनों में फैली अराजकता, वैचारिक भटकाव, व्यक्तिवादी राजनीति के चलते सत्ता संघर्ष और एक-दूसरे के खिलाफ गलाकाट प्रतिद्वंदिता पर लगाम लगाना था। भागवत में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की छवि देखने वाले प्रचारकों को उम्मीद थी कि जल्दी ही भाजपा और संघ के ऐसे नेताओं को हाशिए पर डाला जाएगा जिन्होंने हिंदुत्व पर व्यक्तित्व को हावी कर रखा है। संघ के भीतर तो उन्होंने इसकी कवायद भी शुरू की, पर लोकसभा चुनावों के चलते भाजपा में नेताओं का कद छांटने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। चुनाव हुए तो परिणामों से मामला और उलझ गया। हार के हाहाकार के बीच भाजपा के कई नेताओं ने संघ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। संघ से तौबा कर करने की वकालत करने वाले भाजपाईयों की फेहरिस्त बढऩे लगी। इस पूरे घटनाक्रम से भागवत की उस मुहिम को विराम लग गया जिसे वे संघ को संवारने के मकसद से शुरू कर चुके थे।
भाजपा के साथ रिश्तों को अपने हाल पर छोड़ दें तो भी संघ के लिए समस्याएं कम नहीं हैं। संघ की स्थापना 1925 में हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन के साथ हुई थी, लेकिन आठ दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी यह अपने अंजाम तक पहुंच पाया। दरअसल, यह आंदोलन कभी एक दिशा में नहीं चल पाया। शुरूआत में इसके अंतर्गत हिंदू धर्म का एक ऐसा नया स्वरूप उभारने की कोशिश की गई जो राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के एकदम अनुरूप था। इसमें धर्म के एक ऐसे पहलू को विकसित करने की कोशिश की गई जिससे जुडऩा पूरे भारत के लिए सहज हो। शुरूआत में तो यह सफल रहा, लेकिन जब यह आंदोलन हिंदू राष्ट्रवाद की ओर मुडऩे लगा तो दिक्कतें बढऩा शुरू हो गईं। जल्दी ही यह सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की ओर मुड गया। यह ऐसा समय था जब देश में जाति व्यवस्था तेजी से मजबूत हो रही थी। हिंदू समाज जाति के अलावा क्षेत्र और भाषा के आधार पर तेजी से बंट रहा था। संघ ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया और वह हिंदुओं को अन्य धर्मों का भय दिखाकर संगठित करने का असफल प्रयास करता रहा।
1951 में जनसंघ की स्थापना के बाद हिंदुत्व की जो व्याख्या प्रस्तुत की जाने लगी वह हिंदू समाज के बड़े वर्ग को स्वीकार्य नहीं है। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद उपजे हालातों से ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी। अब तो हालात यह हैं कि संघ तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर उसके लिए हिंदुत्व के क्या मायने हैं। इसकी संगठन स्तर पर व्याख्या होने की बजाय संघ से जुड़ा हर व्यक्ति इसकी अलग ढंग से व्याख्या करता है। कोई गुजराज और कंधमाल में जो हुआ, उसे हिंदुत्व कहता है तो कोई इसकी व्यापक और सकारात्मक अर्थों में व्याख्या करता है। संघ के प्रवक्ता राम माधव तो यहां तक कहते हैं कि हिंदुत्व को बनाने वाल संघ नहीं है। वे बताते हैं, 'हिंदुत्व को बनाने वाले हम नहीं हैं। ऐसे में हम इसमें कोई बदलाव कैसे कर सकते हैं। संघ ने हिंदुत्व को स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो और दयानंद सरस्वती से लिया है। यह भारत की खास पहचान है जिसे हम हिंदुत्व कहते हैं। यह हजारों साल से चली आ रही है, हम तो इसे मजबूत बनाने का काम कर रहे हैं। हिंदुत्व के जिस अर्थ की बात राम माधव कर रहे हैं, संघ शायद ही कभी उस पर चला हो।
यह तय है कि संघ किसी भी कीमत पर हिंदुत्व को नहीं छोड़ेगा, लेकिन सवाल यह है कि वह कितने समय तक इस मुद्दे को जीवित रख पाएगा। क्या वह उस हिंदुत्व के आगे बढ़ाने के लिए काम करेगा जिसकी व्याख्या राम माधव कर रहे हैं या फिर उस पर जिसकी बात बजरंग दल और विश्व हिंदु परिषद करते हैं। दबे स्वर में ही सही संघ अब यह स्वीकारने लगा है कि गुजराज और कंधमाल वाला हिंदुत्व वर्तमान परिस्थितियों में ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसकी बानगी वरुण गांधी के भाषण के बाद आए बयानों में देखी जा सकती है। संघ ने वरुण गांधी के भाषण पर असहमति प्रकट करते हुए इससे पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया था। विवादों से रहे अभिनव भारत, श्रीराम सेना, हिंदू जागृति मंच और सनातन प्रभात सरीखे कट्टर हिंदुवादी संगठनों के बारे में संघ पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इनसे संघ का कोई वास्ता नहीं है। संघ के रवैये में आए इस परिवर्तन से एक बात तो स्पष्ट है कि वह अब हिंदुत्व के नाम पर अन्य धर्मों के खिलाफ गैर कानूनी तरीके से लामबंद होने के खिलाफ है।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठन शाखातंत्र पर चलता है। इसी के दम पर संघ ने अपनी पहचान कायम की। देश में आई आपदाओं और संकटों में फंसे नागरिकों की स्वयंसेवकों ने खूब सेवा की। यह दौर अभी भी जारी है, पर इसकी धार कुंद हो चुकी है। वहज है, शाखातंत्र का विफल होना। देश में शाखाओं की संख्या और उनमें आने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या तेजी से गिर रही है। संघ ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में माना है कि शाखाओं की संख्या में कमी आ रही है। दरअसल, संघ नए खून को शाखाओं से जोडऩे में बुरी तरह से विफल रहा है। युवाओं को शाखाओं में जाने से कोई फायदा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। वहां जो चीजें बताई और सिखाई जाती हैं, वे उसके मानसिक स्तर से ऊपर निकल जाती हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि आठ दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी संघ ने अपनी शाखा प्रणाली में कोई खास तब्दीली नहीं की है। शाखाओं की घटती संख्या के बारे में संघ से जुड़े देवेंद्र स्वरूप बताते हैं, 'जिस शाखातंत्र को संघ ने मनुष्य निर्माण और संगठन का मुख्य साधन बनाया था, वह स्वयं अपनी गतिशीलता और तेज खोकर जड़ता का बंदी बनता जा रहा है। शाखा प्रक्रिया में बीते आठ दशकों में निर्मित स्वयंसेवकों का एक बड़ा वर्ग काल कलवित हो चुका है और जो विद्यमान हैं, उनमें से ज्यादातर दैनिक शाखातंत्र में सहभागी नहीं हैं। यद्यपि वे गुरूदक्षिणा के कार्यक्रम में आग्रहपूर्वक उपस्थित होकर अपनी संघनिष्ठा का प्रमाण देते हैं। टूटते बिखरते और चारित्रिक भ्रष्टता की दलदल में धंसते समाज में संघ का शाखातंत्र एक बहुत छोटा द्वीप बनकर रह गया है।
शाखातंत्र का विफल होना संघ के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि संघ को भी इस बात का अहसास है, पर इससे निपटने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब संघ प्रौढ़ और वृद्ध लोगों की जमात बन जाएगा। शाखातंत्र की विफलता के अलावा संघ को बौद्धिक स्वरूप को बचाए रखने के लिए भी जूझना पड़ रहा है। वैचारिक दृष्टि से संघ की बेहद समृद्ध परंपरा रही है। संघ के सर संघचालक सदैव से बौद्धिक जगत के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। वर्तमान सर संघचालक मोहन भागवत उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। उन्होंने प्रचारक बनने से पहले कुछ समय तक डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं भी दी हैं। के. सुदर्शन तो देश के उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों में से हैं जो भाषा की सीमा को लांघ चुके हैं। सुदर्शन 13 भाषाओं के ज्ञाता हैं। उनसे पहले सर संघचालक रहे डॉ. हेडगेवार, माधव गोलवकर और बाला साहब देवरस भी बड़े विचारक रहे हैं। बुद्धिजीवियों के बड़े वर्ग का सीधे तौर पर भी संघ से जुड़ाव रहा है, लेकिन लंबे समय से इसमें आशातीत वृद्धि नहीं हुई है। इस तबके के जो लोग संघ से जुड़ रहे हैं उनका मकसद दूसरा है। वे भाजपा में अपना ग्राउंड तैयार करने के लिए संघ को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।
शाखातंत्र के कमजोर होने और बुद्धिजीवियों की घटती संख्या के कारण समाज पर संघ प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। किसी भी संगठन की सफलता में अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कड़ा अनुशासन संघ की विशेषता रही है, लेकिन अब ये ढीला पड़ता जा रहा है। संघ के आला व्यक्ति भी स्वयंसेवकों के लिए नजीर पेश नहीं कर पा रहे हैं। कई ऐसे प्रचारकों के मामले सामने आए हैं जिन्होंने संघ के नियमों को तोड़ अनुशासन को तार-तार किया। प्रचारकों की इस व्यवहार का स्वयंसेवकों पर बेहद बुरा असर पड़ा है। स्वयंसेवक को निष्क्रिय होना संघ के लिए घातक हो सकता है, क्योंकि आम लोगों के बीच तो वहीं जाकर काम करता है। बातचीत में संघ प्रवक्ता राम माधव ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि हिंदू समाज में संघ का प्रभाव कम हो रहा है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि संघ की विचारधारा किसी भी नजरिए से कमजोर नहीं हुई है। वे बताते हैं, 'शाखाएं संघ का कार्यक्रम है न कि विचारधारा। कहीं-कहीं शहरी क्षेत्रों में शाखाओं में कार्यकर्ताओं की संख्या कम होने का अर्थ यह नहीं कि लोगों ने संघ की विचारधारा को ठुकरा दिया है। साध्वी उमा भारती भी उनकी बात में सुर में सुर मिलाते हुए कहती हैं कि 'संघ में लोगों का गहरा विश्वास है। इतने बड़े संगठन में इस तरह की छोटी-मोटी बातें चलती रहती हैं। इन सबसे संगठन कमजोर होने की बजाय परिष्कृत होकर मजबूत होता है।
संघ की कमजोरियों की चर्चा हो रही हो और भाजपा को जिक्र नहीं हो तो बात अधूरी रहती है। 1951 में जनसंघ की स्थापना उन्हीं लोगों ने की जो संघ द्वारा चलाए जा रहे हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन में शरीक थे। कुछ सक्रिय स्वयंसेवकों के दबाव में एक सामाजिक संगठन राजनीति में कूद पड़ा। चाहे भारतीय जनसंघ हो या भारतीय जनता पार्टी, दोनों की कमान संघ ने हमेशा अपने पास रखी। सत्ता का स्वाद चखने का बाद भी यह नियंत्रण जारी रहा। अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे संघ के वफादार शख्स की सरकार के समय भी यह धारणा स्थिर और सिद्ध थी कि संघ की अनुमति के बिना कोई बड़ा काम नहीं हो सकता। याद कीजिए संघ के दबाव में किस तरह से वाजपेयी को जसवंत सिंह का मंत्रालय बदलना पड़ा। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए इस बात की पूरी कोशिश की कि वे ऐसा कोई काम नहीं करें जिससे संघ की नाराजगी झेलनी पड़े। इतना कुछ करने के बाद भी संघ उनके कार्यकाल से संतुष्ट नहीं हुआ। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कामकाज की खूब बखिया उधेड़ी।
लालकृष्ण आडवाणी द्वारा जिन्ना को सेकुलर बताना संघ को इतनी बुरी तरह अखर गया कि आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाकर ही मानें। ऐसे कई उदाहरण है जब संघ भाजपा नेताओं के सामने नहीं झुके और अपनी बात मनवाकर ही दम लिया। संघ की राजनीति में इस अति सक्रियता ने उस सामाजिक संगठन का गला घोंटने का काम किया जो लाखों स्वयंसेवकों की वर्षों की मेहनत से खड़ा हुआ था। संघ में सक्रिय रहने वाले कई स्वयंसेवकों को भी सत्ता का स्वाद मुंह लगा तो सेवा दूसरे पायदान पर चली गई। धीरे-धीरे कार्यकर्ता भी इसी ओर अग्रसर होने लगा। संघ के नेता अब मानने लगे हैं कि राजनीति में ज्यादा दखलंदाजी से संगठन को नुकसान ही हुआ। भविष्य में भाजपा के साथ रिश्तों को लेकर संघ में बहस तेज हो गई है। संघ का एक बड़ा समूह राजनीति से तौबा करने की वकालत कर रहा है। के.एन. गोविंदाचार्य की मानें तो संघ अब आंख मूंद कर भाजपा को समर्थन नहीं देगा। वे कहते हैं, 'अब संघ, भाजपा से साफ शब्दों में बात करके पूछेगा कि पार्टी भविष्य में उसके साथ किस तरह का संबंध रखना चाहती है। वर्तमान में दोनों के बीच जो रिश्ता है, उस पर नए सिरे से चर्चा करना जरूरी है। यदि भाजपा अकेले आगे चलना चाहती है तो संघ को इससे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन यदि हमारे साथ चलना है तो हमारे हिसाब से ही चलना होगा। दोनों में से किसी को बोझ ढोने की जरूरत नहीं है। संघ को भाजपा की बेखासी न तो आज चाहिए न कल।
भाजपा और संघ के रिश्तों में जारी द्वंद्व का नुकसान संघ को ही ज्यादा हो रहा है। मोहन भागवत अपना पूरा ध्यान संघ की गतिविधियों पर नहीं लगा पा रहे हैं। उन्होंने चुनाव के बाद अपनी टीम बनाने का निश्चय किया था, पर सबकुछ अटका पड़ा है। भाजपा के कई नेता लोकसभा चुनावों में हार का ठीकरा संघ के सिर फोड़ संगठन की छवि को अलग से नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन नेताओं का मानना है कि यदि भाजपा संघ के बिना चुनावों में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। संघ के लिए चिंता की बात यह है कि पिछले 15 सालों में भाजपा के भीतर ऐसे लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। पंद्रहवीं लोकसभा में भाजपा के टिकट पर जीतकर आए सांसदों की सूची पर नजर डाले तो कुल 116 में से 40 से 50 सांसद ही ऐसे हैं जिनका संघ से कोई जुड़ाव रहा है। बाकी 65 से 75 सांसद तो संघ की विचारधारा से भी वाकिफ नहीं है। ये सांसद भविष्य में संघ की मानने और सुनने वाले नहीं हैं। कुल मिलाकर जिस भाजपा को संघ ने खड़ा किया, अब वही उसके गले की फांस बनता जा रहा है। संघ को स्वयंसेवकों के सत्ता के प्रति रुझान को नियंत्रित करने में पसीना आ रहा है। स्वयंसेवकों को अनुभव होता है कि संघ की मेहनत के कारण ही बीजेपी और हिंदूवादी राजनीतिक दल सत्ता का सुख भोग रहे हैं और उसका भाग उन्हें भी मिलना चाहिए। संघ से जुड़े लोग जिस तरह से सत्ता के पीछे भाग रहे हैं उससे संगठन के दूसरे सर संघचालक गोलवलकर की सत्ता को समाज का टॉयलट मानने की बात सही साबित हो गई है। उनका मानना था कि व्यक्ति घर में कहीं भी फिसल सकता है, लेकिन टॉइलट में फिसलने की आशंका ज्यादा होती है। इसी वजह से वह राजनीतिक पार्टी बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। ऐसे में यह कई संकटों से जूझ रहे संघ को तय करना है कि वह भाजपा के साथ भविष्य में किस तरह का रिश्ता रखता है और बाकी समस्याओं को हल करने के लिए किस तरह के कदम उठाता है।
भागवत की लचीली कार्यशैली उनके लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। उनसे पहले जितने भी सर संघचालक रहे हैं वे विचारधारा और प्रक्रिया पर अडिग रहे हैं जबकि मोहन भागवत विचारधारा के साथ ही निर्णय लेने में लचीलापन रखते हैं और किसी भी प्रकरण को उसकी परिणति तक पहुंचाने में विश्वास रखते हैं। यह मोहन भागवत ही थे कि जिनके सुझाव पर संघ के नेता विवाद सुलझाने के लिए आडवाणी के निवास पर गए। उससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि संघ अपने पारिवारिक घटकों के नेताओं के घर गया हो। संघ नेतृत्व की परंपरा रही है कि 'अपनी बात कह दो और आपकी बात कोई माने या न माने, यह उस पर छोड़ दो। मोहन भागवत इसके विपरीत धारा पर चलते हैं। उनका मानना है कि 'स्वयंसेवक, चाहे वह कद या आयु में कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसे इस बात की समझ होनी चाहिए कि उसे जो कहा गया है, वह आज्ञा ही है। संघ में आ रहे परिवर्तन पर राम माधव कहते हैं कि 'हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है, इस सिद्धांत को छोड़कर संघ में कोई भी परिवर्तन हो सकता है। इसमें मुख्य रूप से आईटी प्रोफशनलों की रात्रिकालीन शाखाएं ध्यान आकर्षित करती हैं। ये पारंपरिक शाखाओं से हट कर हैं। ऐसी शाखाओं में रात को ग्यारह से बारह बजे तक विचार विमर्श होता है और आईटी को अधिक से अधिक संपर्क का साधन बनाने पर विचार होता है। इस प्रकार की शाखाओं के मोहन भागवत पूरी तरह से पक्षधर रहे हैं जो मोहन भागवत की आधुनिकता को स्वीकार करने की छवि की ओर संकेत करती है। लेकिन इन सबके उलट मोहन भागवत की कार्यशैली संघ परिवार के घटकों के बीच होने वाले तनाव को कम करने में कितना सहायक होगी, यह देखना दिलचस्प होगा।
साक्षात्कार । के. सुदर्शन । पूर्व सर संघचालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
के.एस. सुदर्शन संघ के लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। नौ साल तक सर संघचालक रहे सुदर्शन स्वाभाव में लचीलापन और विमर्श में तत्परता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संघ के शारीरिक प्रमुख और बौद्धिक प्रमुख, दोनों रूपों में कार्य किया है। संघ के हालातों पर अवधेश आकोदिया ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश -
लोकसभा चुनावों में हार के लिए भाजपा के कई नेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जिम्मेदार बता रहा हैं। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
- जो ऐसा कह रहे हैं वे संघ की विचारधारा को जानते और समझते ही नहीं हैं। संघ भाजपा को क्यों हराएगा? वैसे भी इन चुनावों में मतदाता की तो कोई अहमियत रही ही नहीं। यह चुनाव पूरी तरह से इलोक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का गड़बड़ी का खेल था जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह से अपनी इच्छानुसार खेला। कांग्रेस को जितनी सीटें मिली, उनका अनुमान किसी विश्लेषक ने यहां तक स्वयं कांग्रेस ने भी नहीं लगाया था। कांग्रेस इवीएम मशीनों के दुरूपयोग से जीती है। मैं आपको कई उदाहरण दे सकता हूं कि जहां यह साबित हो जाता है। पी. चिदंबरम के मामले में भी ऐसा ही हुआ।
यदि ऐसा है तो आपकी ओर से शिकायत क्यों नहीं की गई?
- इसके कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद जल्दी ही ऐसा किया जाएगा। हम तो चाहते हैं कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां इवीएम की बजाय मतपत्रों से ही मतदान हो।
क्या भाजपा संघ और हिंदुत्व से तौबा करना चाहती है?
- इसमें से ज्यादातर वे लोग है जो सत्ता के आकर्षण से भाजपा में हैं न कि विचारधारा से प्रभावित होकर। यह उनकी मर्जी है। हमने किसी को बांध थोड़े ही रख रखा है। यदि उन्हें लगता है कि संघ और हिंदुत्व के बिना वे सत्ता में आ सकते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। जो भी हो, सभी बातें स्पष्ट रूप से हो जाएं तो अच्छा है। किसी के मन में शंका नहीं रहनी चाहिए। शंका समस्या पैदा करती है। उसे जितना जल्दी हल कर लें उतना अच्छा है। जहां तक हिंदुत्व की बात है तो यह तो एक जीवन पद्धति है, भाजपा इसे क्यों छोडऩा चाहेगी।
आप हिंदुत्व को कैसे परिभाषित करते हैं?
- हिंदुत्व पांच मूल तत्वों से बना है। पहला, उपासना की प्रत्येक पद्धति का सम्मान करना। दूसरा, जड़ है या चेतन सब बराबर हैं। तीसरा, मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है न कि स्वामी। चौथा, महिलाओं का सम्मान और पांचवा जीवन का मकसद भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने तक ही सीमित नहीं है। इन पांचों तत्वों का समग्र रूप हिंदुत्व है।
भाजपा इस पर कहां तक खरी उतरी है?
जाहिर तौर पर पूरी तरह से तो खरी नहीं उतरी है। यदि वह ऐसा कर पाती तो देश में उसके समर्थन में कमी नहीं आती। कहीं न कहीं तो चूक हुई है। मेरे ख्याल से भाजपा यह तय नहीं कर पाई कि उसे किसी दिशा में चलना है। मूल विचार के विपरीत काम करने का प्रयास हुआ। यह सब उन लोगों की वजह से हुआ जो सत्ता की खातिर भाजपा में आए हैं।
भाजपा के अलावा संघ की और क्या समस्याएं हैं?
- पहली बात तो भाजपा हमारे लिए कोई समस्या नहीं है। जहां तक संघ की अन्य समस्याओं का प्रश्न है तो इतने विशाल संगठन में सब कुछ एक साथ ठीक रखना मुश्किल काम है। फिलहाल कोई बड़ी समस्या तो नहीं है। कुछ कार्यक्रमों में उतार-चढ़ाव चलता रहता है।
संघ की वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि शाखाओं व उनमें आने वाले लोगों की संख्या...
- शहरी क्षेत्रों की कुछ शाखाओं में ऐसा हुआ है, लेकिन आप इसका सामान्यीकरण नहीं कर सकते हैं। आप ये भी तो देखिए कि हमारी ज्यादातर शाखाएं बहुत अच्छी तरह से संचालित हो रही हंै। हर आयु और वर्ग के लोग इनमें आ रहे हैं। शहरों की कुछ शाखाओं का ठीक ढंग से नहीं चलना चिंता का विषय है। जल्दी ही इसका समाधान निकाल लिया जाएगा।
युवा और बुद्धिजीवी वर्ग आपसे दूर क्यों होता जा रहा है?
- हमसे न युवा दूर हो रहे हैं और न ही बुद्धिजीवी। दोनों वर्ग हमसे निरंतर जुड़ रहे हैं। हां, यह जरूरी कहा जा सकता है कि जीवन में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते युवा अब उतनी सक्रियता से हमारे कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं ले रही है। हमारा प्रयास है कि वे प्रतिस्पर्धा और अपने सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए कार्य करें।
संघ के भीतर अनुशासनहीनता बढऩे की क्या वजह है?
- अनुशासन तो संघ का आधार है। कई जगह पर अनुशासनहीनता की जानकारी मुझे भी मिली है। अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लोगों का पूर्णत: आप पर विश्वास हो। अनुसरणकर्ता का नीतियों और तौर-तरीकों से सहमत होना जरूरी है। हम देख रहे हैं कि दिक्कत कहां पर है।
संघ को राजनीति में सक्रिय होने का कितना नुकसान हुआ?
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक संगठन है। हम राजनीति में कभी सक्रिय नहीं हुए। सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जरूर जनसंघ और जनता पार्टी बनी। इनमें ज्यादातर संघ से जुड़े हुए ही लोग थे। हमारी विचाराधारा भी समान थी, इसलिए संघ ने इनका समर्थन किया। इसका मकसद राजनीति करने का बिल्कुल नहीं था।
