सोमवार, जुलाई 13, 2009

नए निजाम, पुरानी मुसीबतें

सूबे में भाजपा के नए निजाम अरुण चतुर्वेदी आते ही पुरानी मुसीबतों के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। उनके आते ही पार्टी के भीतर चल रहा घमासान और तेज हो गया है। पार्टी का कोई भी बड़ा नेता उन्हें स्वीकार करने के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में क्या चतुर्वेदी भाजपा के कील-कांटों को दुरुस्त कर पाएंगे? एक रिपोर्ट!

अरुण चतुर्वेदी। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम। हाईकमान ने उन्हें नियुक्त तो किया सूबे में पार्टी को पटरी पर लाने के लिए, लेकिन उनके आते ही असंतोष थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज नेताओं की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। विधायक व पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी ने तो चतुर्वेदी की नियुक्ति का विरोध करते हुए भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से ही इस्तीफा दे दिया है। भाटी के बाद विधायक रोहिताश्व ने भी बागी तेवर दिखाते हुए कहा है कि नए अध्यक्ष एक कमजोर व्यक्ति हैं उनकी राजस्थान में कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। चतुर्वेदी को पूरे प्रदेश के भूगोल तक का ज्ञान नहीं है। पार्टी उनके नेतृत्व में मजबूत नहीं हो सकती। हालांकि चतुर्वेदी सबको साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं। वे पार्टी के आला नेताओं से मिलकर सहयोग करने की गुजारिश कर रहे हैं, पर संघ के अलावा कोई भी उनके साथ चलने को तैयार नहीं है।

हम पहले ही बता चुके है कि राजस्थान में भाजपा वसुंधरा राजे, वसुंधरा विरोधी और संघ के रूप में तीन खेमों में बंटी है। अरुण चतुर्वेदी संघ खेमे से हैं। प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए संघ ने ही उनका नाम भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के पास भेजा था। हालांकि उनके साथ मदन दिलावर और सतीश पूनिया का नाम भी शामिल था, लेकिन मुहर चतुर्वेदी के नाम पर लगी। संघ और पार्टी के प्रति वफादारी के अलावा युवा होने का फायदा उन्हें मिला। विवादों से दूर रहना भी उनके काम आया। गौरतलब है कि प्रदेशाध्यक्ष बनने से पहले वे पार्टी उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रवक्ता भी थे। उनके इन पदों पर रहते हुए पार्टी के भीतर खूब घमासान मचा। खेमेबंदी भी जमकर हुई, पर चतुर्वेदी ने इनसे दूरी ही बनाए रखी। वे 'सबके साथ और किसी के साथ नहीं वाली नीति पर चले। संघ के प्रति जरूर उनका 'साफ्ट कॉर्नर' रहा। राज्य में संघ के भीतर भी कई धड़े बने हुए हैं, पर चतुर्वेदी के सभी से अच्छे संबंध हैं।

अरुण चतुर्वेदी को जिनती आसानी से पार्टी अध्यक्ष पद मिला है, काम करना उतना ही मुश्किल है। वे स्वयं भी मानते हैं कि इस जिम्मेदारी को संभालना आसान नहीं है। विशेष बातचीत में उन्होंने माना कि लगातार दो हार झेलने के बाद पार्टी में शक्ति का संचार करना आसान काम नहीं है। वे कहते हैं, 'हार का ज्यादा असर कार्यकर्ताओं पर पड़ता है। वे बहुत जल्दी मायूस हो जाते हैं। सबसे ज्यादा जरूरी काम कार्यकर्ताओं को ही सक्रिय करना है, क्योंकि पार्टी के उन्हीं के दम पर कायम है। कार्यकर्ताओं में जोश भरने का पूरी योजना मेरे दिमाग में है। स्थानीय निकायों के चुनावों को देखते हुए हम जल्दी ही इस पर काम शुरू करेंगे।' चतुर्वेदी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में भले ही कामयाब हो जाएं, लेकिन बड़े नेताओं के बीच लगातार चौड़ी खाई को भरने में उन्हें पसीना आ जाएगा। उन्हें पद संभालने से पहले ही इसका ट्रेलर मिल गया। आमतौर पर नए अध्यक्ष की नियुक्ति की घोषणा होते ही बधाई देने और स्वागत करने के लिए नेताओं मजमा लगना शुरू हो जाता है, लेकिन चतुर्वेदी के साथ ऐसा नहीं हुआ। पार्टी का कोई भी आला नेता उन्हें बधाई देने नहीं पहुंचा। बाद में वे स्वयं एक-एक करके सभी नेताओं के यहां गए और सहयोग मांगा।

सूबे में भाजपा के नए निजाम के लिए कदम-कदम पर मुश्किलें हैं। उनके सामने सबसे पहली चुनौती नियुक्ति के बाद पनपे असंतोष को थामना है। चतुर्वेदी के लिए देवी सिंह भाटी का पार्टी छोड़ देना और रोहिताश्व की खुली खिलाफत से ज्यादा घातक उन्हें पटकनी देने के लिए अंदरखाने बन रही रणनीतियां हैं। उनके विरोधियों, खासतौर पर वसुंधरा खेमे में नए अध्यक्ष को लेकर खलबली मची हुई है। सूत्रों से जो जानकारियां मिल रही हैं वे चतुर्वेदी के लिए खतरनाक हैं। महारानी इस मसले पर केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं और उन्होंने अपने समर्थकों को फिलहाल चुप रहने को कहा है। साथ ही चतुर्वेदी की अध्यक्षता में होने वाली बैठकों से दूर रहने को कहा है। जरूरत पडऩे पर वे अपने लमावजे के साथ दिल्ली भी जा सकती हैं। यहां हालत कुछ-कुछ वैसे ही हो रहे जो ओम माथुर के अध्यक्ष बनने के समय हुए थे। उस समय वसुंधरा नहीं चाहती थीं कि उनके विश्वस्त डॉ। महेश शर्मा को हटाकर ओम माथुर को प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी जाए, लेकिन राजनाथ सिंह ने माथुर को राजस्थान भेज दिया। महारानी ने उनकी वापसी के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, पर वे सफल नहीं हुईं। इस मामले में आडवाणी भी उनकी कुछ मदद नहीं कर पाए। माथुर राजस्थान आ तो गए, लेकिन महारानी ने उन्हें ज्यादा तवज्जों नही दी। पार्टी के नितिगत निर्णयों में माथुर की ज्यादा नहीं चली।

महारानी अच्छी तरह जानती हैं कि एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल अपना फैसला नहीं बदलेगा। नए अध्यक्ष का विरोध वे उन्हें हटाने के लिए नहीं, बल्कि उन पर दबाव बनाने के लिए कर रही हैं। वे हाईकमान के सामने ये साबित करना चाहती हैं कि चतुर्वेदी को अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले से राज्य में पार्टी के ज्यादातर लोग सहमत नहीं हैं। इससे केंद्रीय नेताओं के सामने चतुर्वेदी का कद छोटा हो जाएगा, महारानी चाहती भी यही हैं। सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा खेमा चतुर्वेदी के लिए ओम माथुर से भी बदतर हालात पैदा करने की योजना बना रहा है। इसके तहत उन पर एक साथ हमला बोलने की बजाय धीरे-धीरे वार किया जाएगा। वे जितने समय भी अध्यक्ष पद पर रहे, असंतोष बरकरार रहे। जरूरत के हिसाब से यह कम-ज्यादा होता रहे।

महारानी खेमे को अपनी जगह छोड़ दें तो भी चतुर्वेदी की राह आसान नही हैं। वसुंधरा विरोधी खेमा उनके लिए दिक्कतें खड़ी कर सकता है। हालांकि इनमें से कई नेताओं से चतुर्वेदी के अच्छे संबंध हैं। पक्का संघी होने के कारण भैरों सिंह शेखावत, हरिशंकर भाभड़ा और ललित किशोर चतुर्वेदी सरीखे वरिष्ठ नेता भी उनका विरोध नहीं करेंगे। इन दिग्गजों के कहने से और भी कई नेता नए अध्यक्ष का सहयोग कर सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा विरोधी ज्यादातर नेता चतुर्वेदी का सहयोग करने तो तैयार हैं, लेकिन इस शर्त पर कि वे वसुंधरा को राजस्थान से रुखसत करने की उनकी मुहीम का हिस्सा बनें। गौरतलब है कि ये नेता लंबे समय से महारानी के खिलाफ सक्रिय है। इनकी लाख कोशिशों के बाद भी वसुंधरा ने मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और फिर चुनावों में पार्टी की हार के बाद वे नेता प्रतिपक्ष बनने में सफल रही। वसुंधरा के विरोधी उन्हें पटकनी देने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते। यदि प्रदेशाध्यक्ष उनके पक्ष का रहा तो वे महारानी हटाओ मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने में सफल हो सकते हैं। वसुंधरा विरोधी खेमें में एक ही व्यक्ति हैं जो चतुर्वेदी के लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं। वे हैं घनश्याम तिवाड़ी। तिवाड़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। जिस समय महारानी मुख्यमंत्री थीं और प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही थी तो तिवाड़ी कुर्सी की दौड़ में सबसे आगे थे। प्रदेशाध्यक्ष को लेकर उनके नाम की चर्चा इस बार तो थी ही ओम माथुर के समय भी रही। यदि वे लोकसभा चुनाव नहीं हारते तो अध्यक्ष पद के लिए वे ही सबसे तगड़े दावेदार थे।

वैसे भले ही अरुण चतुर्वेदी आते ही मुश्किलों में घिर गए हों, पर मुसीबतें महारानी के लिए भी कम नहीं है। जिस तरह से अन्य राज्यों में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व परिवर्तन कर रहा है, उसी क्रम में राजस्थान से वसुंधरा का नंबर भी आ सकता है। ओम माथुर के इस्तीफे के बाद नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़े जाने को दबाव उन पर पहले से ही है। पार्टी में यह स्वर मुखर होने लगा है कि हार के लिए ओम माथुर से ज्यादा जिम्मेदार वसुंधरा हैं। इसलिए माथुर की तर्ज पर उन्हें भी इस्तीफा देना चाहिए। वसुंधरा को भी इसका अहसास है। वे इस बात के लिए लॉबिंग कर रही है कि राजस्थान में एक साथ दो परिवर्तन पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होंगे। अरुण चतुर्वेदी के खिलाफ असंतोष को हवा देकर वे पार्टी के आला नेताओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि यदि उन्हें बदलकर किसी और को जिम्मेदारी दी गई तो इसी तरह से विरोध के स्वर उभरेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के करीबियों की मानें तो राजस्थान की जिम्मेदारी अरुण चतुर्वेदी को सौंपकर पार्टी ने वसुंधरा को भविष्य के कदम का संकेत दे दिया है। राजनाथ सिंह तो महारानी को हटाने के लिए पूरा मन बना चुके हैं, पर लालकृष्ण आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। आडवाणी के आशीर्वाद से महारानी भले ही नेता प्रतिपक्ष पद पर बनी रहें, लेकिन राज्य भाजपा में मचा घमासान कम होने वाला नहीं है।

शनिवार, जुलाई 11, 2009

आदर्श नहीं बन पाए माइकल जैक्सन

संगीत और डांस के अनूठे संगम से समां बांध देने वाले माइकल जैक्सन की मृत्यु के बाद कला जगत को हुई क्षति की भरपाई शायद ही कभी हो पाए। इसमें कोई दोराय नहीं है कि माइकल जैक्सन एक बेहतरीन कलाकार थे। उनकी द थ्रिलर एलबम हो या डेंजरस टूर या फिर उनका मून वॉक डांस, सबने रिकॉर्ड बनाए और खूब लोकप्रियता हासिल की। उनकी सभी एलबमों को मिला दिया जाए तो साढ़े सात करोड़ से ज्यादा प्रतियां तो उनके रहते हुए बिक चुकी थीं। संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार 'ग्रेमी अवॉर्ड' उन्होंने 13 बार जीता। दुनिया का ऐसा कोई कोना नहीं है जहां उन्हें दीवानगी की हद तक चाहने वाले नहीं हों। वे जहां भी जाते छा जाते। इतना कुछ होते हुए माइकल जैक्सन का जीवन लोगों के लिए आदर्श नहीं बन पाया। उनके जीवन से संगीत को निकाल दिया जाए तो याद करने लायक शायद ही कुछ बचे।

माइकल जैक्सन और विवादों का चोली दामन का साथ रहा। कॅरियर के शुरूआती दौर में जब उन्होंने अपना रंग-रूप बदलने के लिए सर्जरी करवाई तो उनकी काफी आलोचना हुई। यह सर्जरी उनके लिए सिरदर्द ही साबित हुई। शरीर में कई तरह के विकार पैदा हो गए। इन्हें ठीक करवाने के लिए उन्होंने खासी मशक्कत की, पर सफलता नहीं मिली। पिछले कुछ सालों से तो वे दवाईयों के सहारे ही जिंदा थे। 1993 में एक 13 साल के लड़के ने माइकल जैक्सन पर यौन शोषण का आरोप लगाया। हालांकि बाद में यह मामला आपसी समझौते में सुलझ गया। बताया जाता है कि इसके लिए माइकल को बड़ी रकम चुकानी पड़ी। 2003 में टेलीविजन पर प्रसारित एक डोक्यूमेंट्री में माइकल जैक्सन द्वारा किए गए यौन उत्पीडनों को सिलसिलेवार ढंग से दिखाया गया। इसके प्रसारण के बाद उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे ऐसा करते रहे हैं। 2005 में उनके लिखाफ एक 11 साल के लड़के का अपहरण कर यौन दुराचार करने का मामला दर्ज हुआ। माइकल जैक्सन नशे के भी आदी थे। इसी के चलते उन्हें अपने मशहूर एलबम 'डेंजरस' का वर्ल्‍ड टूर भी रद्द करना पड़ा। माइकल जैक्सन का वैवाहिक जीवन भी सफल नहीं रहा वे अपनी पत्नियों के साथ बहुत कम समय तक रहे। अपने अनाप-शनाप खर्चों के चलते वे एक बार तो दिवालिया होने की स्थिति में आ गए थे। कुल मिलाकर विवादों का बंवडर हमेशा उनके साथ चला। उन्होंने विवादों से स्वयं को बचाने की खूब कोशिश की, पर विवाद थमने की बजाय बढ़ते ही गए।

दुनिया की चर्चित शख्शियतों में माइकल जैक्सन अकेले नही हैं जो अपने विवादास्पद क्रियाकलापों के चलते किसी के 'आइडियल' नहीं बन पाए। इस फेहरिस्त में कई बड़े नाम शामिल हैं। इन लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र में तो खूब नाम कमाया, पर जिंदगी के बाकी मोर्चों पर ये फिसड्डी साबित हुए। सवाल यह उठता है कि ऐसी कौनसी वजह हैं कि ये लोग विवादों में फंसते चले जाते हैं? जितना अनुशासन ये अपने काम में दिखाते हैं, उतना बाकी जगह क्यों नहीं दिखा पाते? इसका बड़ा वजह यह है कि ऊंचा मुकाम हासिल करने के बाद इन लोगों को किसी की फ्रिक नहीं होती है। इतनी शोहरत पाने के बाद वे दुनिया के हिसाब से नहीं बल्कि दुनिया को अपने हिसाब से चलाने के बारे में सोचते हैं। समाज के नियम-कायदों की इनकी नजर में कोई अहमियत नहीं होती है। कई लोग जानबूझकर विवाद पैदा करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे कम से कम वे 'लाइम लाइट' में तो रहते हैं। हालांकि माइकल जैक्सन के मामले में ऐसा नहीं है। उन्होंने शायद ही कभी सुर्खिया बटोरने के लिए किसी विवाद को जन्म दिया हो। उन पर तो सफल होने का जूनून सवार था, लेकिन जब सफल हुए तो जीवन जीना ही भूल गए। इसी का नतीजा है कि आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं तो उन्हें श्रद्धांजलि देने वाली करोड़ों नम आंखों के साथ विवादों के किस्सों, संपत्ति, कर्ज और बेटे-बेटियों के भरण-पोषण को लेकर ढेरों सवाल भी हैं। इन सवालों के बीच उन जैसा कलाकार तो हर कोई बनना चाहेगा, पर उन जैसा विवादों से भरा व कष्‍टप्रद जीवन कोई नहीं जीना चाहेगा।
(11 जुलाई को डेली न्‍यूज़ में प्रकाशित)

गुरुवार, जुलाई 09, 2009

सक्रिय हुए सूरमा


ओम माथुर का प्रदेशाध्यक्ष पद से मोहभंग क्या हुआ उनकी जगह लेने वालों की कतार लग गई। कई धड़ों में बंटी भाजपा के आला नेता एकाएक सक्रिय हो गए हैं। सब किसी अपने को जिम्मेदारी दिलाना चाहते हैं। सूबे की भाजपा में अध्यक्ष पद के लिए चल रही रस्साकशी के छोर खोजती रिपोर्ट!


भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश कार्यालय। पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद यहां सन्नाट पसरा रहता था, पर पिछले कुछ दिनों से अचानक पुरानी रौनक लौट आई है। नेताओं की आवाजाही तो बढ़ी ही है, कार्यकर्ताओं का आना-जाना भी शुरू हो गया है। पार्टी दफ्तर में हुई इस हलचल की वजह प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर की विदाई तय होना है। कोई उनकी जगह लेने के लिए तो कोई नए निजाम की टीम में शामिल होने के लिए लाबिंग में जुटा है। आलाकमान ने भी राजस्थान में पार्टी का नया कप्तान तलाशने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी किसी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो महारानी की मर्जी का हो, जिसके नाम पर संघ मुहर लगाए, जिसे भैरों सिंह शेखावत का भी आशीर्वाद प्राप्त हो और जो वसुंधरा विरोधियों की नजरों में भी नहीं खटकता हो।


वैसे भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अभी राजस्थान में बदलाव करने के मूड में नहीं था, लेकिन ओम माथुर काम करने को राजी नहीं हुए। उन्होंने मौजूदा हालातों में पद पर बने रहने से साफ तौर पर इंकार कर दिया। माथुर को मनाने में नाकाम रहने के बाद पार्टी नए प्रदेशाध्यक्ष को लेकर पशोपेश में है। आलाकमान ऐसे नेता को राजस्थान की जिम्मेदारी देना चाहता है जिससे किसी को ऐतराज नहीं हो और जो पार्टी में चल रही खींचतान को खत्म करने की दिशा में काम कर सके, पर फिलहाल ऐसे किसी नाम पर सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही है। प्रदेशाध्यक्ष के चयन को लेकर भाजपा तीन खेमों वसुंधरा राजे, संघ और संघ समर्थित वरिष्ठ नेताओं में बंटी हुई है। इनमें से महारानी का खेमा अभी भी सबसे मजबूत है। विरोधी मान रहे थे कि दो चुनावों में मिली हार और माथुर के इस्तीफे के बाद महारानी पर नेता प्रतिपक्ष पद छोडऩे का दबाव बनेगा, लेकिन पार्टी राज्य में दोहरा बदलाव करना नहीं चाहती है।


वर्तमान परिस्थितियों इस बात की संभावना ज्यादा है कि प्रदेशाध्यक्ष पद महारानी की मर्जी से ही किसी को दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक वे किसी जाट पर दांव खेलना चाहती हैं। गौरतलब है कि चुनावों में भाजपा की पराजय के पीछे जाटों की नाराजगी को बड़ी वजह माना जा रहा है। प्रदेशाध्यक्ष पद पर जाट नेताओं के तौर पर डॉ। दिगंबर सिंह, रामपाल जाट और सुभाष महरिया के नामों की चर्चा है। दोनों वसुंधरा के करीबी हैं, पर महरिया के नाम पर संघ ऐतराज कर सकता है। ऐसे में दिगंबर सिंह का दावा मजबूत है। वसुंधरा के करीबियों की मानें तो महारानी ने दिगंबर को अध्यक्ष बनने के लिए तैयार रहने को कहा है। इसी के चलते पार्टी कार्यालय में उनका आना-जाना अचानक बढ़ गया है। आजकल वे अपना ज्यादातर वक्त यहीं बिता रहे हैं। दिगंबर के साथ दिक्कत एक ही है कि जाटों पर उनका प्रभाव भरतपुर तक ही सीमित है। शेखावाटी क्षेत्र में उनकी इतनी पकड़ नहीं है। यही परेशानी रामपाल जाट के साथ भी है।


यदि किसी गैर जाट को मौका दिया जाता है तो महारानी के विश्वस्तों में से रामदास अग्रवाल की लॉटरी खुल सकती है। सूत्रों के मुताबिक वे इसके लिए लॉबिंग भी कर रहे हैं। उन्हें महारानी का समर्थन तो हासिल है ही, संघ से भी उनके अच्छे संबंध हैं। भैरों सिंह शेखावत से उनकी ट्युनिंग उस जमाने से है जब बाबोसा मुख्यमंत्री और वे स्वयं प्रदेशाध्यक्ष थे। डॉ। किरोड़ी लाल मीणा के भाजपा छोड़ देने के बाद वसुंधरा विरोधियों में उनकी खिलाफत करने वाले ज्यादा नहीं हैं। केंद्रीय नेताओं से मधुर रिश्ते अग्रवाल के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। अग्रवाल के लिए उम्र एक बाधा हो सकती है। पार्टी नेतृत्व अग्रवाल सरीखे पुरानी पीढ़ी के नेता को जिम्मेदारी देने की बजाय किसी नए नेता को राज्य का जिम्मा सौंपना ज्यादा पसंद करेगा। संघ ने भी पार्टी को यही राय दी है कि राजस्थान में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले बेहतर खड़ा करने के लिए किसी नए चेहरे को दायित्व सौंपा जाए।


संघ समर्थक दावेदारों की बात करें तो पूर्व मंत्री मदन दिलावर, प्रदेश उपाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी और सतीश पूनिया का नामों की चर्चा है। संघ के सूत्रों की मानें तो ये तीन नाम पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भेज दिए गए हैं। संघ ने सूबे की 'कास्ट केमिस्ट्री' और पार्टी के भीतर अब तक के कामकाज की समीक्षा के आधार पर ये नाम भेजे हैं। इन नामों से में मदन दिलावर को दलित होने का फायदा मिल सकता है। लेकिन पार्टी के आला नेताओं का एक धड़ा उनके नाम पर हामी भरने को तैयार नहीं है। इनका मानना है कि दिलावर की धार्मिक कट्टरता पार्टी के लिए कभी भी संकट खड़ा कर सकती है। वसुंधरा के शासनकाल में मंत्री रहते हुए वे कई मर्तबा सरकार को परेशानी में डाल चुके हैं। स्वाभाव से तल्ख दिलावर के लिए वसुंधरा के साथ कड़वे संबंध नुकसानदायक साबित हो सकती है। अरुण चतुर्वेदी के साथ भी यही है। महारानी से उनका शुरू से छत्तीस का आंकड़ा है। विधानसभा चुनावों के समय चतुर्वेदी ने सिविल लाइन क्षेत्र से टिकट हासिल करने में अपना पूरा दम लगा दिया, पर कामयाब नहीं हुउ। वसुंधरा ने उनकी जगह युवा मोर्चा के अध्यक्ष अशोक लाहोटी को उम्मीदवार बना दिया, जो भैरों सिह शेखावत के भतीजे और कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप सिंह खाचरियावास से हार गए। चतुर्वेदी पार्टी उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रवक्ता भी है, पर शायद ही ऐसा कोई मौका हो जब उन्होंने वसुंधरा की तारीफ की हो। ऐसे में यदि आलाकमान चतुर्वेदी को जिम्मेदारी देता है तो खींचतान कम होने की बजाय और बढ़ जाएगी।


जहां तक सतीश पूनिया की दावेदारी का सवाल है तो इनके साथ भी वही दिक्कत है जो मदन दिलावर और अरुण चतुर्वेदी के साथ है। पांच साल मुख्यमंत्री रहते हुए महारानी ने पूनिया को किनारे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दरअसल, पूनिया चूरु क्षेत्र की राजनीति से निकल कर आए हैं। यहां राजेंद्र सिंह राठौड़ और उनके बीच शुरू से ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है। वसुंधरा ने इसका फायदा उठाने की रणनीति पर काम किया। पूनिया का पटकनी देने के लिए उन्होंने राजेंद्र राठौड़ को अपने खेमें में शामिल कर लिया। महारानी का वरदहस्त प्राप्त होते ही राठौड़ ने पूनिया की जड़े खोदना शुरू किया। राठौड़ की मुहीम कामयाब रही और आज हालत यह है कि पूनिया खुद की ही पार्टी में पूरी तरह से हाशिए पर हैं। वसुधंरा कभी नहीं चाहेंगी कि पूनिया प्रदेशाध्यक्ष बन पहले से भी ज्यादा ताकतवर बन जाएं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनकी हालत जख्मी शेर सरीखी है। मौका मिला तो शिकार को बख्शने का सवाल ही पैदा नहीं होता।


इन तीन नामों के अलावा संघ की ओर से घनश्याम तिवाड़ी और गुलाबचंद कटारिया का नाम लंबे समय से चल रहे हैं। ये दोनों नेता वसुंधरा विरोधी खेमे का अहम हिस्सा हैं। जसवंत सिंह को इनका सरदार माना जाता है और भैरों सिंह शेखावत को सलाहकार। इस खेमें लंबे से समय से महारानी के खिलाफ मुहीम छेड़ रखी है। प्रदेशाध्यक्ष पद से माथुर के इस्तीफे के बाद यह खेमा फिर से सक्रिय हो गया है। ये लोग पार्टी के आला नेताओं से मिलकर वसुंधरा पर नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे के लिए दबाव बना रहे हैं। इनका कहना है कि जिस तरह से माथुर ने पार्टी की हार की जिम्मेदारी ली है, उसी तरह से महारानी को भी जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे देना चाहिए। आलाकमान से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, उन्हें देखकर लगता नहीं कि महारानी से इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा। ऐसे में वसुंधरा के विरोधियों ने अपना पूरा ध्यान प्रदेशाध्यक्ष के पद को झटकने में लगा दिया है।


लोकसभा चुनाव से पहले तक गुलाबचंद कटारिया और घनश्याम तिवाड़ी में से तिवाड़ी की दावेदारी ज्यादा मजबूत नजर आ रही थी, पर जयपुर से गिरधारी लाल भार्गव की विरासत बचाने में नाकाम रहने के बाद वे कमजोर पड़ गए हैं। हालांकि अभी भी उन्हें संघ का समर्थन प्राप्त है, लेकिन उनके काम करने के तरीके से खिन्न होकर कल तक उनके साथ रहने वाले कई लोग खिलाफत करने लगे हैं। लोकसभा चुनावों में अतिआत्मविश्वास तिवाड़ी को अब तक दुख दे रहा है। दरअसल, अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होने के कारण तिवाड़ी ने दूसरी पंक्ति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को ज्यादा तवज्जों नहीं दी। चुनाव परिणाम तो उनके लिए निराशाजनक रहे ही, समर्थक भी नाराज हो गए। वसुंधरा विरोधी होने का ठप्पा तो उन पर पहले से ही लगा हुआ है। इन हालातों में आलाकमान तिवाड़ी को मौका देकर खींचतान का नया मैदान तैयार करने की भूल शायद ही करे।


ओम माथुर के विकल्प के तौर पर गुलाबचंद कटारिया की दावेदारी की चर्चा भले ही आखिर में की जा रही हो, पर वर्तमान में वे सबसे मजबूत स्थिति में हैं। कल तक जिस 'भोली छवि' और 'ढुलमुल व्यक्तित्व' को उनकी कमजोरी बताया जाता था, अब वही उन्हे सूबे में भाजपा का मुखिया बनवा सकती है। संघ तो उनका साथ देने के लिए पहले से ही तैयार है। कई गुटों में बंटी पार्टी समझौते के रूप में कटारिया के नाम पर सहमत हो सकती है। कटारिया भले ही वसुंधरा विरोधी मुहीम में शामिल रहे हो, लेकिन उन्होंने कभी उनसे व्यक्तिगत बैर नहीं बांधा। वसुंधरा उनके नाम पर इसलिए राजी हो सकती है कि कटारिया उनके लिए भविष्य में ज्यादा परेशानी पैदा करने वाले नहीं हैं। कटारिया को करीब से जानने वाले लोग अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें कठोर निर्णय लेने और विवादों में पडऩे से परहेज है। यदि कटारिया अध्यक्ष बनते हैं तो वे शायद ही महारानी के कामकाज में कोई दखल दें।


दावेदारों की भीड़ के बीच भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व यह तय नहीं कर पा रहा है कि वह आखिर किस पर भरोसा करे। आलाकमान की दुविधा यह है कि वह किस धड़े की बात मानें और किसे अनदेखा करे। पार्टी का प्रयास है कि राज्य के बड़े नेता किसी एक नाम पर सहमत हो जाएं और टकराव टल जाए। सूत्रों के मुताबिक आलाकमान पार्टी नेताओं को यही समझाने का प्रयास कर रहा है कि अध्यक्ष कोई भी बने सब मिलकर फिर से खड़ा करने का काम करें। नेताओं के लिए भी यही करना ठीक है, क्योंकि पार्टी से ही उनकी अहमियत है।

मंगलवार, जुलाई 07, 2009

बिके सब, कोई कम कोई एकदम!

हरमोहन धवन जी ने अपनी आप बीती में मीडिया के कड़वे सच से एक बार फिर परदा उठाया है। मैं इसे थोड़ा और उपर खिसकाने की जुर्रत कर रहा हूं। मैं यहां अपने पत्रकार मित्रों के मुंह से सुनी बातें भी नहीं करुंगा। मैं आपको वहीं बता रहा हूं जो अपनी आंखों से देखा है। मेरा इरादा पत्रकारों की जमात, जिसमें मैं खुद भी शामिल हूं को कठघरे में खड़ा करने का नहीं है, पर इतना जरूर कहना चाहता हूं कि जो व्‍यापारी करोड़ों का निवेश करेगा वह तो केवल लाभ के बारे में ही सोचेगा, लेकिन पत्रकार द्वारा उसकी हां में हां मिलाना कहां तक जायज है? सवाल आपके सामने है जबाव भी आपको ही खोजना है...

बात लोकसभा चुनावों की है। जगह है राजस्थान के एक दैनिक अखबार का न्यूज़ रूम। यहां रोज की तरह समाचारों को अंतिम रूप दिया जा रहा है, पर माहौल कुछ बदला-बदला है। न्यूज़ एडीटर की टीम में आज एक नया शख्स दिखाई दे रहा है। यह व्यक्ति संस्थान में काम नहीं करता है, लेकिन समाचार बनाने में खूब दखल दे रहा है। समाचार बन जाते हैं, पर यह व्यक्ति वहीं डटा रहता है। पेज बनने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद जब अखबार छपने चला जाता है तभी वह रवाना होता है। जी हां, लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीदवारों के मीडिया मैनेजरों की पहुंच इसी तरह से राज्य के बड़े कहे जाने वाले समाचार पत्रों तक रही। हालांकि संस्करणों के हिसाब से इसमें ऊंच-नीच देखने को मिली। पंद्रहवीं लोकसभा चुनाव के लिए ज्यों ही पार्टी ने उम्मीदवारों की घोषणा की मीडिया समूह 'मोटी कमाई' के लिए सक्रिय हो गए। बाकायदा पैकेज बनाए गए। पैकेज का मोटा या छोटा होना चुनाव लड़ने वाले की व्यक्तिगत हैसियत और उसकी पार्टी पर निर्भर था। औसत रूप से इसकी राशि 5 से 15 लाख रूपए के बीच में रही।

मीडिया समूहों की एक पूरी टीम उम्मीदवारों को पैकेज का मजमून समझाने आती। इन्हें उम्मीदवारों के चुनाव कार्यालयों तक में आने से गुरेज नहीं रहता। हैरत की बात तो यह रही कि इसमें मार्केटिंग के लोगों के अलावा पत्रकार भी शामिल होते थे। जब बात पैसों पर आ जाए तो डीलिंग में सारी बातें खुलकर होती। कितना कवरेज मिलेगा, कैसे मिलेगा, दूसरी पार्टी के प्रत्याशी से क्या डील हुई है या होगी, उसने भी इतने ही पैसे दे दिए तो क्या होगा सरीखे सवाल उम्मीदवार या उनके नुमाइंदों की ओर से दागे जाते। टीम हर सवाल का जबाव देने की कोशिश करती। आखिर में मोलभाव होता। इतना तो कीजिए...थोड़ा और....जैसी मिन्नतों के बीच टीम की ओर से पैकेज को अधिकतम रखने का प्रयास होता, लेकिन कम मिलने पर भी डील होती। कुल मिलाकर इस टीम का एक ही उद्देश्य था, किसी को बख्शा नहीं जाए सबसे कुछ न कुछ लिया जाए। किसी से खबरें प्लांट करने के नाम पर तो किसी से विज्ञापन के नाम पर। कहते हैं बेईमानी का काम पूरी ईमानदारी से किया जाता है, लेकिन कई उम्मीदवारों को शिकायत रही कि पैकेज देते वक्त उनसे जो वादे किए उन्हें पूरा नहीं किया गया। जब इसकी शिकायत की जाती तो एक ही जबाव मिलता, 'इतने पैकेज में यही मिलेगा, ज्यादा चाहिए तो ओर पैसे दो।'
जब बड़े अखबारों की यह हालत रही तो छोटों की स्थिति तो बदतर होनी ही थी। पीत पत्रकारिता के दम पर जिंदा रहने वाले इन अखबारों से तो वैसे भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। बड़े अखबारों की तर्ज पर इस बार इन्होंने भी पैकेज सिस्टम शुरू किया था, लेकिन यह कारगर नहीं रहा। इन्हें जिस उम्मीदवार से जितना पैसा मिल गया उसी से संतोष करना पड़ा। हालांकि इन्होंने अपने काम में पूरी ईमानदारी बरती। जिससे दाम मिला उसका पूरा काम किया और जिससे नहीं मिला उसका काम तमाम किया। इन अखबारों में ऐसे उम्मीदवारों को जीतता हुआ बताया गया जिन्हें पांच हजार वोट भी नहीं मिले और उन उम्मीदवारों को मुकाबले से बाहर बताया गया जो लाखों वोटों के अंतर से चुनाव जीते। समाचारों को अतिशियोक्तिपूर्ण तरीके से लिखे जाने की सारी हदें इन अखबारों ने पार कीं।
वैसे तो यह सब पत्रकारिता के मूल्यों को मिट्टी में मिलाने वाले कार्यकलाप थे, पर राहत की बात यह रही कि राज्य का कोई भी बड़ा समाचार पत्र किसी पार्टी विशेष का पोस्टर या मुख पत्र नहीं बना। उन खबरों को छोड़ दिया जाए जो उम्मीदवारों ने पैसे देकर प्लांट कराई थीं, तो बाकी समाचारों के कंटेंट में ज्यादा बेईमानी नहीं की गई। जो खबरें प्लांट कराई गईं, उनमें भी सब कुछ उम्मीदवार की मर्जी से या अतिशियोक्तिपूर्ण नहीं था। इस बात का पूरा ध्यान रखा गया कि पाठक को वह समाचार ही लगे, विज्ञापन नहीं। हां, उम्मीदवारों के चुनावी दौरों या किसी बड़े नेता की सभा के कवरेज में जरूर भेदभाव देखने को मिला। मसलन, किसी बड़े नेता की सभा में खूब भीड़ आई, लेकिन पार्टी के कुछ स्थानीय नेता उसमें नहीं आए। अगले दिन अखबारों में यह खबर उम्मीदवार के साथ उनकी ट्यूनिंग के हिसाब से ही आई। जिनसे अच्छे पैकेज की डील हुई उन्होंने खबर छापी 'सभा में उमड़ा जनसैलाब' और जिनसे नहीं हुई उन्होंने खबर छापी 'पार्टी की फूट उजागर'।
कितने शर्म की बात है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ होने का दावा करने वाला मीडिया लोकतंत्र के बाकी तीन स्तंभों को मजबूत करने की झूठी मुहिम में स्वयं ही ध्वस्त होता जा रहा है। इससे ज्यादा दुखद बात क्या होगी कि एक तरफ मीडिया मतदाताओं को जागरूक करने का अभियान चला स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान की बातें करता है और दूसरी तरफ उन्हीं उम्मीदवारों या पार्टियों के हाथों बिक जाता है। कुल मिलाकर मीडिया एक मंडी में तब्दील हो चुका है, जहां बिकते सब हैं, कोई कम तो कोई एकदम!
(पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम पवक्ता’ में प्रकाशित)

झुग्गियों में जश्न


महाराष्ट्र के पिंपरी चिंचवाड शहर में रहने वाली सुलभ उबाले इन दिनों बेहद खुश हैं। उनकी कंपनी को एक बड़ा ऑर्डर जो मिला है। उबाले न तो कोई उद्योगपति हैं और न ही किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी की प्रबंधक हैं। वे तो स्वावलंबन की नई इबारत लिखने वाले सामूहिक प्रयासों की एक कड़ी हैं। पिंपरी चिंचवाड में उनकी जैसी 160 महिलाएं हैं जिन्होंने अपने दम पर 'स्वामिनी बचत गट अखिल संघ लिमिटेड' यानी एसएमबीजीएएस नामक कंपनी बनाई है। इनमें से ज्यादातर महिलाएं झुग्गियों में रहती हैं और कुछ दिन पहले तक दूसरों के घरों में काम किया करती थीं। इन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा काम शुरू कर पाएंगी जिस पर उनका मालिकाना हक तो होगा ही, दूसरों को को रोजगार मुहैया कराने का अवसर भी मिलेगा।


'स्वामिनी' को 1 करोड़ रुपये के निवेश के साथ शुरू किया गया है। मामूली हैसियत रखने वाली महिलाओं के लिए इतनी बड़ी रकम जुटाने का सफर किसी जंग जीतने जैसा था। दिक्कतों के कई दौर आए, पर इरादा कमजोर नहीं पड़ा। सबसे पहले इन महिलाओं ने अपने पास जमा पूंजी को एकत्रित करना शुरू किया। शुरूआत में इसे इतनी सफलता नहीं मिली, क्योंकि बरसों की मेहनत और परिवार का पेट काटकर की गई बचत के जाया जाने का डर सबके मन में था। धीरे-धीरे इस संदेह को दूर कर जब आत्मनिर्भर होने का सपना दिखाया तो कारवां बढ़ता गया और 20 लाख रुपए इक्कटृठा हो गए। इससे समूह की सदस्यों का हौंसला बढ़ा और बाकी पैसों के लिए प्रयास करना शुरू किया। कई संस्थाओं और महकमों को अपनी योजना के बारे में समझाया। आखिर में मेहनत रंग लाई और इस पूरी परियोजना से प्रभावित होकर पिंपरी चिंचवाड नगर निगम ने 'स्वामिनी' को 30 लाख रुपये की सब्सिडी देने का फैसला किया। बाकी बचे 50 लाख रुपए का बैंक ऑफ बड़ौदा से अग्रिम कर्ज ले लिया। इसे सात साल की अवधि में चुकता करना है।


'स्वामिनी' ने अपनी पहली इकाई तलवाड के औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित की है और यहां प्लास्टिक के बैग बनाए जाते हैं। ईकाई शुरू हुए अभी कुछ ही दिन हुए हैं और कंपनी को बड़ा ऑर्डर भी मिल गया। पुणे की प्लास्टिक बनाने वाली एक कंपनी ने आगामी सात साल के लिए 700 किलोग्राम प्रतिदिन के हिसाब से 250 दिनों तक प्लास्टिक बैग बनाने का करार किया है। कंपनी चलाने वाली महिलाओं की खुशी उस समय दोगुनी हो गई जब उन्हें पता लगा कि उनके यहां का उत्पाद अमरीका और दुबई के बाजारों में बेचा जाएगा। वे इसे एक चुनौती भी मानती हैं। कंपनी की सदस्य स्वाती मजूमदार बताती हैं कि 'विदेशी बाजार में माल का निर्यात किए जाने की वजह से हमारे सामने बेहतर गुणवत्ता वाले बैग तैयार करने की चुनौती होगी। इसलिए फिलहाल हम मुनाफे के बारे में नहीं सोच रहे हैं।' पुणे की कंपनी के ऑर्डर की आपूर्ति करने के लिए कंपनी में जोर-शोर से काम चल रहा है।


महिलाओं के सामूहिक प्रयासों खड़ी हुई 'स्वामिनी' लोगों के लिए किसी कौतूहल से कम नहीं है। क्षेत्र के लोगों तो क्या, इन महिलाओं के परिवारजनों को भी इस बात का यकीन नहीं हो रहा है कि कल तक घरेलू कामकाज में सिमटी रहने वाली औरत इतनी काबिल है। समूह की एक सदस्य सुलभ उबाले कहती हैं, 'पहले ये महिलाएं गरीब थीं और समाज में इनकी स्थिति भी अच्छी नहीं थी, पर अब इस रोजगार के जरिए उनकी हालत सुधरी है। कई लोगों को तो अब भी यह विश्वास नहीं होता है कि इन महिलाओं ने खुद की एक औद्योगिक इकाई खोली है।' साथ मिलकर काम करने की मिसाल कायम करने वाली ये महिलाएं यहीं रुकना नहीं चाहती है, उनकी मंजिल बहुत आगे है। अभी उनकी 'स्वामिनी' ने प्लास्टिक बैग बनाने की एक इकाई लगाई है, भविष्य में इन्हें बढ़ाने की भी योजना है। अब तो इलाके के लोगों को भी यकीन होने लगा है कि 'स्वामिनी' का सफर यहीं थमने वाला नहीं है।


'स्वामिनी' सदस्य महिलाओं के लिए ही नहीं, इलाके की उन महिलाओं के लिए भी वरदान साबित हो रही है जो काम करने की कूवत तो रखती हैं, पर जिन्हें उचित अवसर नहीं मिलता है। प्लास्टिक बैग बनाने वाली इकाई में इस समय तकरीबन 70 महिलाएं काम कर रही हैं। इन्हें यहां न केवल काम करने का बढिय़ा माहौल मिल रहा है, बल्कि अच्छी तनख्वाह भी मिल रही है। इनमें से ज्यादातर वही हैं जो मामूली वेतन पर घरों में काम करती थीं। 'स्वामिनी' ने इनके हुनर को पहचाना और घरेलू कामकाज करने वाली महिलाओं को ट्रेनिंग देकर कुशल कामगार बना दिया। पुणे की प्लास्टिक बनाने वाली कंपनी के ऑर्डर को पूरा करने का जिम्मा इन्हीं के ऊपर है। 'स्वामिनी' से जुड़े हर शख्स को उम्मीद है कि जुलाई के दूसरे हफ्ते में जब उत्पादन की पहली खेप आएगी तो हर कोई उसकी तारीफ करेगा। देश तो क्या सात समंदर पार भी उसे वाहवाही मिलेगी।
(5 जुलाई को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित)

शनिवार, जून 27, 2009

मिशन सुशासन


विधानसभा चुनावों की मामूली जीत को लोकसभा चुनावों में 'क्लीन स्वीप' में तब्दील करने के बाद अशोक गहलोत सब्र और साहस के नए सियासतदां के रूप में उभरे हैं। अब उनका ध्यान सूबे में सुशासन के सपने को साकार करने की ओर है। क्या है उनका मिशन सुशासन? एक रिपोर्ट!

बात 18 जून की है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत हरित राजस्थान योजना का पहला पौधा लगाते हुए कहते हैं, 'मैंने आज असली माली का काम किया है। हम सबको इसी जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए।' यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने आम लोगों को सरकार से कनेक्ट करने की असरदार अपील की हो। राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी के दौरान गहलोत आए दिन कुछ न कुछ ऐसा करते हैं कि विरोधी भी वाह-वाह करने लगते हैं। ऐसा ही नजारा पिछले दिनों जाट समाज द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में देखने को मिला जब भाजपा नेता व राज्यसभा सदस्य डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया ने गहलोत की तारीफों के जमकर पुल बांधे। कार्यक्रम में गहलोत और राज्य के तमाम दिग्गज जाट नेताओं की उपस्थित में पिलानिया ने गहलोत के कामकाज की सराहना करते हुए यहां तक कहा कि गहलोत मारवाड़ के ही नहीं समूचे राजस्थान के गांधी हैं। ये वही पिलानिया हैं जिन्होंने राजस्थान में जाटों को ओबीसी आरक्षण दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी और वाजपेयी सरकार द्वारा इसकी घोषणा के बाद वे भाजपा को दामन थाम राज्यसभा पहुंच गए। एक समय था जब पिलानिया, गहलोत को जाट विरोधी साबित करने का कोई मौका नहीं चूकते थे, पर आज वे ही उन पर कायल हैं।
चुनाव की थकान मिटाने के बाद अब अशोक गहलोत का पूरा ध्यान सुचारू रूप से सरकार चलाने पर है। राज्य की जनता को उनसे उम्मीदें भी खूब हैं, क्योंकि इस बार सरकार के पास काम न करने का कोई बहाना नहीं है। विधासनसभा में उन्हें पूर्व बहुमत तो प्राप्त है ही केंद्र में भी कांग्रेस नीत सरकार होने के कारण धन की कमी भी आड़े नहीं आएगी। गहलोत स्वयं भी जानते हैं कि लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं है। लिहाजा, वे इन दिनों वे सरकार के कील-कांटों को दुरूस्त करने में लगे हैं, ताकि सरकार पूरी ताकत के साथ काम कर सके। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री कुछ मंत्रियों के कामकाज से संतुष्ट नहीं है। आने वाले दिनों में वे ऐसे मंत्रियों के विभागों में फेरबदल किए जाने की संभावना है। इसमें आधा दर्जन कैबीनेट व कई राज्यमंत्री शामिल हैं। इन मंत्रियों में से ज्यादातर के पर कतरे जाने की संभावना है। माना जा रहा है कि फेरबदल के तहत स्वायत्त शासन व गृह मंत्री शांति धारीवाल, वन एवं खनिज मंत्री रामलाल जाट, जनजाति व तकनीकी शिक्षा मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय का एक-एक विभाग बदला जा सकता है। सार्वजनिक निर्माण राज्यमंत्री प्रमोद जैन भाया का विभाग बदले जाने के कयास लगाए जा रहे हैं। वहीं, बसपा छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले छह विधायकों में से कम से कम एक को मंत्री बनाए जाने की चर्चा है। इसके लिए राजकुमार शर्मा और राजेंद्र गुढ़ा का नाम चल रहा है।

मंत्रालयों में बदलाव के अलावा गहलोत का ध्यान राजनीतिक नियुक्तियों की ओर भी है। सूत्रों के मुताबिक आने वाले कुछ दिनों में ही ये नियुक्तियां होनी है। संगठन की ओर से इस प्रक्रिया को जल्दी पूरा करने के काफी दिनों से दबाव आ रहा है। प्रदेशाध्यक्ष डॉ।सी.पी. जोशी तो कई बार सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि जब तक आम कार्यकत्र्ता की सरकार में भागीदारी नहीं होगी सत्ता हासिल करने का जश्न अधूरा है। इन नियुक्तियों के माध्यम से गहलोत संगठन के लिए अच्छा काम करने वालों को ईनाम देने की कोशिश करेंगे। इसके लिए पिछले कई दिनों से कांग्रेसी नेता जयपुर में डेरा डाले हुए हैं और अपने-अपने पक्ष में लॉबिंग कर रहे हैं। बात संगठन की चली तो बताते जाएं कि राज्य में पार्टी अध्यक्ष भी बदला जाना है। वर्तमान अध्यक्ष डॉ.सी.पी.जोशी केंद्र की मनमोहन सरकार में कैबीनेट मंत्री बनने के बाद वे संगठन के लिए पूरा समय नहीं दे पा रहे हैं। प्रदेशाध्यक्ष के लिए कई नेताओं का नाम चल रहा है। कास्ट केमिस्ट्री को ध्यान में रखते हुए गहलोत किसी जाट, दलित अथवा अल्पसंख्यक पर दांव खेल सकते हैं।

अशोक गहलोत स्वाभाव से शांत हैं, पर अधिकारियों से काम लेने के मामले में उन्हें चतुर राजनेता माना जाता है। वे कभी भी ब्यूरोक्रेट्स को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। वे आक्रामक तरीके से काम नहीं करते, पर उन्हें काम निकालना आता है। अनुशासन तो उन्हेंं शुरू से ही पसंद रहा है, अधिकारियों से भी वे इसकी अपेक्षा करते हैं। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को साफ शब्दों में हिदायत दी है कि काम को सही तरीके से व सही समय पर पूरा करने में किसी भी तरह की कौताही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। लगता है ब्यूरोक्रेट्स से निपटने के मामले में गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल की गलतियों से काफी-कुछ सीखा है। उन्होंने पिछली बार अधिकारियों पर जरूरत से ज्यादा यकीन किया, जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। इस बार उनकी एक ही रणनीति है, जो अच्छा काम करे उसे ईनाम दो और जो बुरा करे उसे दंड। उनकी इस रणनीति की बानगी कलक्टरों की तबादला सूची में मिल जाती है। सरकार के लिए दिक्कतें खड़े करने वाले कलक्टरों को कुछ महीनों में ही बदल दिया गया, पर साथ ही सरकार का काम आसान करने वाले कलक्टरों को अच्छी पोस्टिंग का ईनाम भी मिला। पिछले दिनों बुलाई गई कलेक्टर्स कांफ्रेंस में गहलोत ने अधिकारियों को सीधी भाषा में समझा दिया कि आमजन को गुड गवर्नेंस देने के लिए अधिकारियों को बातें कम और काम ज्यादा करनी चाहिए।

सरकारी मशीनरी को दुरूस्त कर गहलोत ऐसे कामों को ज्यादा तवज्जों देना चाहते हैं जो लोकलुभावन हों। पिछली कार्यकाल की तरह वे कठोर निर्णय लेकर लोगों को नाराज करने के मूड में नहीं हैं। उन्होंने किसानों के लिए पांच साल तक बिजली की दरें नहीं बढ़ाने और शराब की दुकानों के समय व संख्या में कटौती की घोषणा कर इसकी शुरूआत भी कर दी है। वे इस बार कर्मचारी विरोधी होने के कलंक को भी धोना चाहते हैं। उन्होंने राज्य में छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू करने के बाद ऐसे कर्मचारियों को स्थाई करने के आदेश दिए हैं जो पिछले दस सालों से संविदा के आधार पर काम कर रहे हैं। इसके अलावा विदेशी में नौकरी के इच्छुक लोगों को सरकार द्वारा बनाई गई प्लेसमेंट एजेंसी के मार्फत दूसरों देशों में भेजा जाएगा। इससे लोगों को रोजगार तो मिलेगा ही कबूतरबाजी और धोखाधड़ी से भी निजात मिलेगी। युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के लिए सरकार रिक्त पदों के मुताबिक नौकरिया देने की बात पहले ही कह चुकी है।

लोकलुभावन निर्णयों के अलावा गहलोत कुछ ऐसे निर्णय भी करना चाहते हैं जो उनके कार्यकाल में मील का पत्थर साबित हों। मसलन, वे राज्य को विशेष दर्जा दिलाना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने प्रयास भी शुरू कर दिए हैं। यदि वे इस मुहिम में सफल होते हैं तो राज्य को केंद्र से अनुदान के रूप में ज्यादा वित्तीय सहायता मिल जाया करेगी, जो यहां की माली हालत के लिए संजीवनी का काम करेगी। उल्लेखनीय है कि विशेष श्रेणी के राज्यों को केंद्रीय योजना सहायता का 90 फीसदी हिस्सा अनुदान के रूप में मिलने से इन राज्यों की वित्तीय स्थिति में तेजी से सुधार आया है। देश में फिलहाल ऐसे राज्यों की संख्या 11 है। वैसे तो बिहार और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य विशेष श्रेणी की मांग कर रहे हैं, पर इस मामले में राजस्थान के दावे में काफी दम है। विस्तृत क्षेत्र, मरुस्थल, कम वर्षा, कमजोर आधारभूत ढांचा, पेयजल की समस्या, अकाल व सूखा, बदहाल अर्थव्यवस्था सरीखे कई कारणों से राजस्थान को विशेष राज्य का दर्जा मिल सकता है।

सरकार राज्य के हितों से जुड़े उन मुद्दों को सुलझाने में काफी रुचि ले रही है जो पड़ौसी राज्यों से विवाद के कारण हल नहीं हो पाए हैं। इस संदर्भ में गहलोत को एक बड़ी सफलता उस समय मिली जब पंजाब ने राजस्थान के हिस्से का शेष बचा 2670 क्यूसेक पानी देना शुरू कर दिया। गौरतलब है कि 1981 में भाखड़ा व्यास प्रबंधन बोर्ड के साथ हुए समझौते के तहत पंजाब के हरिके बैराज से राजस्थान को रोजाना 9770 क्यूसेक पानी देना तय हुआ था, लेकिन कभी भी 7100 क्सूसेक से ज्यादा पानी नहीं दिया गया। पिछली कई सरकारों ने इसे सुलझाने की कोशिश की थी, पर सफलता नहीं मिली। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले दिनों इस बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मदद की अपील की थी। प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद राजस्थान को पूरा पानी मिलना शुरू हो गया है। इससे नहरी क्षेत्र में चार लाख हैक्टेयर सिंचाई क्षेत्र बढ़ जाएगा।

पंजाब के साथ विवाद सुलझाने के बाद गहलोत ने हरियाणा से राजस्थान के हिस्से का पानी लेने की कवायद शुरू कर दी है। इस बारे में हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ गहलोत की मीटिंग भी हो चुकी है, जिसमें मामले को जल्दी सुलझाने के लिए दो सदस्यीय कमेटी बनाई गई है। हरियाणा के साथ जल ववाद पर जाएं तो पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के बीच हुए समझौते में राजस्थान को 0।47 एमएफ पानी दिया जाना तय हुआ था, लेकिन भाखड़ा मेनलाइन के सिद्धमुख प्रोजेक्ट से राज्य को महज 0.30 एमएफ पानी मिल रहा है। मामले को हल करने के लिए कई बार वाताएं हो चुकी है, पर नतीजा सिफर ही रहा है। जहां राजस्थान अपने हिस्से को पानी देने पर अड़ा हुआ है वहीं, हरियाणा सरकार का कहना है कि राजस्थान अपने खर्चे पर सतलुज-यमुना नहर का निर्माण कर लेता है तो वह पानी देने को तैयार है। मुख्यमंत्री गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल में इस बाबत एक प्रस्ताव भी बनाकर भेजा था, लेकिन हरियाणा सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया।

मिशन सुशासन के तहत इन तमाम कामों को अंजाम तक पहुंचाने में गहलोत का ज्यादा दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा, क्योंकि राजस्थान में उनका हाथ बंटाने वालों की कमी नहीं है। गहलोत की खिलाफत करने वालों को जिस सहज ढंग से मात मिली है, उसे देखकर शायद ही कोई विरोध करने की हिम्मत जुटा पाए। राज्य के कांग्रेसी कुनबे को अच्छी तरह समझ में आ गया है कि गहलोत के साथ चलकर ही राजनीति को परवान चढ़ाया जा सकता है। उनसे वैर लेने वालों की राजनीति का रास्ता तो रसातल की ओर ही जाता है। लिहाजा, इन दिनों उनके समर्थकों का कारवां बढ़ता ही जा रहा है। इस बीच गहलोत कांग्रेस के वोट बैंक को बनाए रखने और उसे बढ़ाने के प्रयास भी कर रहे हैं। राज्य की राजनीति में जाति के महत्व को ध्यान में रखते हुए वे आजकल विभिन्न जातियों के दिग्गज नेताओं से मेलजोल बढ़ा रहे हैं। राज्य में जातिगत सम्मेलनों की संख्या भी एकाएक बढ़ गई है। इनमें से कमोबेश सभी में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत उपस्थित होते हैं। अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए अल्पसंख्यक मामलात विभाग बनना पहले ही तय हो गया है। ऐसा होने से अल्पसंख्यकों के सभी मामले एक ही विभाग के अंतर्गत आ जाएंगे। फिलहाल अल्पसंख्यकों के कई विषय वित्त, कला, संस्कृति, गृह, राजस्व, सामाजिक न्याय व अधिकारिता विभाग में आते हैं। सूत्रों की मानें तो चिकित्सा मंत्री दुर्रु मियां को इसकी जिम्मेदारी दी जा रही है।

रविवार, जून 21, 2009

जाति का जिन्न

चुनावों का मौसम जाने के बाद भी राजस्थान में जाति का जोर कम नहीं हुआ है। अपना राजनीति वजूद कायम रखने की जुगत में नेता सूबे के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। जाति के इस जिन्न से निपटना गहलोत सरकार के लिए एक चुनौती है। एक रिपोर्ट!

अपनी सामाजिक समरसता के लिए विख्यात राजस्थान रह-रह कर उपज रहे जातिगत तनावों को झेलने के लिए अभिशप्‍त है। नेताओं ने अपने सियासी सपनों को सच करने के लिए ऐसा चक्रव्यूह रचा है कि जातियों के बीच भाईचारा पनपने की बजाय कटुता और कलह बढ़ती ही जा रही है। तनाव यूं ही बढ़ता रहा तो कभी भी कोई अनिष्ट हो सकता है और राज्य में हिंसा फैल सकती है। अशोक गहलोत सरकार को भी इसका अहसास है। सरकार ने मीणा और गुर्जरों के बीच चौड़ी होती खाई को पाटने के मकसद से दोनों जातियों के आला नेताओं के साथ मिलकर एक रोड मेप तैयार किया है। कमाल की बात तो यह है कि माहौल को ठीक करने के लिए अपनी-अपनी जाति के पेरोकार नेता सरकार के साथ तो सुर में सुर मिलाते हैं, पर जमीनी स्तर पर द्वेष बढ़ाने वाले काम ही ज्यादा करते हैं।
राजस्थान में जाति की जाजम पर बैठकर अपनी सियासत चलाने वाले नेताओं की लंबी फेहरिस्त है। इनमें से कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला इन दिनों खासी चर्चाओं में है। गुर्जरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलाने के लिए दो बड़े आंदोलनों के सूत्रधार रहे बैंसला भाजपा का दामन थाम संसद में पहुंचना चाहते थे, लेकिन मामूली अंतर से चुनाव हार गए। इस हार के बाद अपनी राजनीति सिमटती देख बैंसला फिर से अपनी पुरानी भूमिका में आ गए हैं और गुर्जरों को एसटी आरक्षण का दिए जाने का राग अलापने लगे हैं। वे गुर्जरों की सहानूभति और समर्थन बटोरने का कोई भी मौका नहीं चूकते। पिछले दिनों सवाई माधोपुर जिले के बामनवास में गुर्जर और मीणाओं के बीच हुई हिंसक झड़पों के तुरंत बाद वे घटनास्थल पर पहुंच धरने पर बैठ गए थे। वे जहां भी जाते हैं लोकसभा चुनावों में महज 300 वोटों से मिली हार का जिक्र करना नहीं भूलते। वे इसकी वजह मतदान और मतगणना में भारी धांधली बताते हैं और इसके लिए विजयी रहे नमोनारायण मीणा के अलावा समूची मीणा बिरादरी को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।
ये सब बैंसला की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वे गुर्जरों का खोया हुआ वि’वास पाने की मुहिम में जुटे हैं। दरअसल, भाजपा का दामन थाम लोकसभा चुनाव लड़ने के बाद से गुर्जर बैंसला से खुश नहीं हैं। विशेष रूप से गुर्जरों की युवा पांत बैंसला पर स्वयं की राजनीति के लिए समाज का इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है। इन लोगों में बैंसला के प्रति गुस्सा इस बात को लेकर है कि कर्नल उस पार्टी में शामिल हो गए जिसकी सरकार ने 70 गुर्जरों को मौत के घाट उतारा। समाज के लोग अब कर्नल और वसुंधरा सरकार के समझौतों पर भी अंगुलियां उठा रहे हैं। गौरतलब है कि इन समझौतों की ज्यादातर बातों पर अमल नहीं पाया है। मसलन, मृतकों के आश्रितों को सरकारी नौकरी, मुकदमों की समाप्ति और आंदोलनकारियों की रिहाई। वैसे गुर्जरों को दो बड़े आंदोलन करने के बाद भी सिवाय तबाही के कुछ हासिल नहीं हुआ। उन्हें वसुंधरा सरकार द्वारा घोषित विशेष श्रेणी के तहत पांच फीसदी आरक्षण का लाभ भी अभी तक नहीं मिल पाया है। इस आशय के विधेयक को विधानसभा में तो पारित कर दिया था, पर यह अभी तक राजभवन में ही अटका हुआ है।
सूत्रों की मानें तो कर्नल बैंसला गुर्जरों को अपनी अगुवाई में संगठित कर फिर से एक बड़ा आंदोलन करना चाहते हैं। उनकी योजना तो 10 जून को भरतपुर जिले के महरावर गांव में महापंचायत के साथ ही आंदोलन शुरू करने की थी, पर क्षेत्र के गुर्जरों की ओर से अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के कारण उन्होंने इसमें बदलाव कर दिया है। नई रणनीति के तहत बैंसला ने कई जातियों के प्रतिनिधियों को साथ लेकर आंदोलन को व्यापक बनाने की कोशिश की है। बैंसला के कहे को सही मानें तो अगला आंदोलन पश्‍िचमी राजस्थान से शुरू होगा और इसे शांतिपूर्ण तरीके से देश भर में चलाया जाएगा। जब कर्नल बैंसला से आंदोलन के मकसद के बारे में पूछा तो वे इधर-उधर की बातें छोड़ तुरंत ही पुराने ढर्रे पर आ गए और कहा कि ‘हमने गुर्जरों को एसटी में शामिल करने की मांग के साथ आंदोलन शुरू किया था और आज भी हम उसी पर कायम है। यह सरकार को तय करना है कि वह गुर्जरों को एसटी दर्जा कैसे देती है। आने वाले कुछ दिनों में कोर कमेटी मुख्यमंत्री से मिलकर अपना पक्ष रखेगी। यदि सरकार हमारी बात मानती है तो ठीक, नहीं तो हम आंदोलन करेंगे। यह अब तक का सबसे बड़ा आंदोलन होगा और ठोस निर्णय होने पर ही पूरा होगा।’
विश्‍लेषकों के मुताबिक कर्नल बैंसला के क्रियाकलापों से साफ झलकता है कि वर्तमान हालातों में उनका इरादा गुर्जरों का सिरमौर बने रहने के सिवा कुछ नहीं है। यदि वे कोई आंदोलन करेंगे तो गुर्जरों के बीच रहते हुए और गुर्जरों के दम पर करेंगे। आरक्षण आंदोलन को देशव्यापी बनाने और अन्य जातियों को इसमें शामिल करने की बातें बैंसला तभी तक कर रहे हैं जब तक गुर्जर पुराने समर्पण के साथ उनके पीछे खड़े नहीं हुए हैं। जिस दिन गुर्जर पहले की तरह कर्नल के एक इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार हो गए, आंदोलन शुरू हो जाएगा और सिर्फ गुर्जरों के हक की बात होगी। यदि बैंसला गुर्जरों को आंदोलन के लिए तैयार कर लेते हैं तो भाजपा उनका साथ देने के लिए तैयार खड़ी है। सूत्रों की मानें तो भाजपा और विशेष रूप से वसुंधरा राजे गुर्जरों का एक बड़ा आंदोलन खड़ा करने के लिए बैंसला की किसी भी हद तक मदद करने को तैयार हैं। प्रह्लाद गुंजल के रूप में एक आक्रामक गुर्जर नेता की घर वापसी भी महारानी के लिए मुफीद साबित होगी। कुल मिलाकर आने वाले समय में राजस्थान को एक और आंदोलन झेलना पड़ सकता है।
जाति के दम पर राजनीति करने वालों की चर्चा हो और डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का जिक्र न हो ऐसा कैसे हो सकता है। मीणा समाज में इनके बराबर कद का कोई नेता नहीं है। डॉ. किरोड़ी को नजदीक से जानने वाले अच्छी तरह जानते हैं कि वे जाति के मामले में वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। जब गुर्जरों ने एसटी आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन किया था तो किरोड़ी ने खूब हंगामा किया था। इन दिनों उनके बंगले पर मीणा समाज के लोगों का मजमा लगा रहता था। सब डॉ. किरोड़ी के एक इशारे पर कुछ भी करने को तैयार थे। इन लोगों के दम पर वे आरक्षण के मुद्दे पर अपनी पार्टी की सरकार के उपर ही पिल पड़े। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने महारानी को साफ तौर पर चेतावनी दी थी कि गुर्जरों को आरक्षण देकर एसटी कोटे से छेड़छाड़ की गई तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। इस दौरान हुई तनातनी इतनी आगे बढ़ गई कि किरोड़ी को भाजपा से विदा होना पड़ा। भाजपा के बिना भी उन्होंने अपना सियासी वजूद कायम रखा और पहले विधानसभा चुनावों और फिर लोकसभा चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव जीतने में सफल रहे। दोनों दफा उन्होंने जमकर ‘कास्ट कार्ड’ खेला। किरोड़ी ने इन चुनावों को पूरी मीणा बिरादरी की प्रतिष्ठा का प्र’न बनाते हुए वोट मांगे। लोगों ने उन्हें जमकर वोट दिए और वे अच्छे अंतर से जीतने में सफल हुए।
सियासत की आक्रामक शैली को पसंद करने वाले किरोड़ी इन दिनों खूब गरज रहे हैं। इस बार उनका निशाना वसुंधरा राजे नहीं होकर अशोक गहलोत और केंद्र की मनमोहन सरकार है। कर्नल बैंसला द्वारा गुर्जर आरक्षण का ’शिगूफा छोड़े जाने के बाद डॉ. किरोड़ी ने एक बार फिर से चेतावनी देना शुरू कर दिया है कि एसटी कोटे से छेड़छाड़ किसी भी सूरत में बर्दाश्‍त नहीं की जाएगी। उनके ये तल्ख बयान मीणा समाज में तो उनकी खास बढ़ा रहे हैं, पर गुर्जर समाज के लिए तो वे खलनायक ही साबित हो रहे हैं। गुर्जर ही नहीं अन्य कई जातियों को भी किरोड़ी का मीणाओं के पक्ष में कट्टर स्वाभाव नहीं भा रहा है। पिछले दिनों दौसा में एक युवती के अपहरण की घटना के बाद क्षेत्र के प्रतिष्ठित लोगों ने डॉ. किरोड़ी पर अपहरणकर्ताओं को बचाने का आरोप लगाया था।
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा को भी बड़ा मीणा नेता माना जाता है। हालांकि कट्टरता के मामले में वे किरोड़ी के पासंग भी नहीं हैं। उनकी छवि एक ‘सोफ्ट कास्ट लीडर’ की है। वैसे जाति के दम पर खम ठोकने वाले गुर्जर और मीणा नेता ही नहीं हैं, इसमें जाट, राजपूत और ब्राह्मण नेता भी शामिल हैं। हालांकि ये लोगों को उस स्तर का तनाव देने में सक्षम नहीं हैं। सरकार या राजनीतिक दलों के लिए इन नेताओं को काबू में करना भले ही मुश्‍िकल हो, पर लोग इनकी तरफ से निश्‍िचंत रहते हैं। कांग्रेस की ही बात करें तो राज्य व केंद्र में मंत्री पद की मलाई बंट जाने के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद को लेकर खींचतान हो रही है। जहां शीशराम ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने के बाद कई जाट नेता अपनी दावेदारी जता रहे हैं वहीं, ब्राह्मण और दलित अपनी बारी बता रहे हैं। कुछ दिनों में होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों का भी यही हाल है। जाति के आधार पर प्रतिनिधत्व मांगा जा रहा है। अशोक गहलोत प्रदेशाध्यक्ष और राजनीतिक नियुक्तियों के मसले को मो सुलझा लेंगे पर राजनीति के चलते फैले जातिगत वैमनस्य को कब तक दुरूस्त कर पाएंगे, यह देखना होगा।

गुरुवार, जून 18, 2009

धांधली या पश्‍िचम की धौंस

ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में महमूद अहमदीनेजाद का दुबारा चुने जाने की घोषणा के बाद उपजा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। पराजित प्रत्याशी मीर हुसैन मुसावी ने चुनावों में भारी धांधली का आरोप लगाते हुए परिणामों को खारिज कर दिया है। वे इस चुनाव को रद्द कर फिर से मतदान की मांग कर रहे हैं। उनके समर्थक देशभर में प्रदर्शन कर रहे हैं। कई जगह प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया है और लोगों के मारे जाने की भी खबरें आ रही हैं। मामला बिगड़ता देख गार्डियन काउंसिल ने चुनाव परिणामों को अस्थाई घोषित कर दिया है। इस रोक को अहमदीनेजाद की कमजोर होती पकड़ के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। वैसे देश के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई अभी भी अहमदीनेजाद के पक्ष में हैं। गार्डियन काउंसिल के ज्यादातर मौलवी भी उनके पक्ष में हैं। ऐसे में इस बात की संभावना बहुत कम है कि परिणामों को निरस्त किया जाएगा और देश में फिर से चुनाव होंगे।
चुनावों में अहमदीनेजाद की भारी जीत को विपक्षी खेमा पचा नहीं पा रहा है। मुसावी लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि वोटों की गिनती के दौरान भारी हेराफेरी की गई है। हालांकि राष्ट्रपति अहमदीनेजाद और गार्डियन काउंसिल ने ऐसे इलाकों में वोटों की दुबारा गिनती करवाने के हामी भर दी है जहां गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है, लेकिन मुसावी इसके लिए तैयार नहीं हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि मतदान के दौरान ही लाखों मतपत्रों का गायब कर दिया गया था और बड़ी संख्या में लोग अपना वोट नहीं डाल पाए तो दुबारा वोट गिने जाने का क्या अर्थ है? उल्लेखनीय है कि ईरान की जनता ने इन चुनावों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। 85 प्रतिशत से भी ज्यादा तमदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो कि एक रिकॉर्ड है। हालांकि मतदान के दौरान कई जगह मतपत्र समाप्त हो जाने और कई लोगों के वोट नहीं डाल पाने की खबरें मीडिया में आई थीं। मुसावी ने भी इस तरह की अनियमितताएं होने का बयान दिया था, पर उन्होंने उस समय चुनाव आयोग से ऐसे मतदान केंद्रों पर फिर से मतदान कराने की गुजारिश नहीं की।
दरअसल, मुसावी को अपनी जीत का पूरा भरोसा था, पर परिणामों ने उन्हें हैरत में डाल दिया है। उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में भी वे अहमदीनेजाद से बड़े अंतर से पिछड़े हैं। इन चुनावों में मुसावी ने देश की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को और अहमदीनेजाद ने ईरान की संप्रभुता तथा प्रतिष्ठा को मुद्दा बनाया था। चूंकि अहमदीनेजाद एक भावनात्मक मसले पर चुनाव लड़ रहे थे इसलिए उन्हें जनता का ज्यादा समर्थन मिला। पिछले कुछ सालों में अमरीका और इजराइल की खुली खिलाफत करने के कारण ईरान में अहमदीनेजाद की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। इसी साल अप्रैल में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के नस्लभेद सम्मेलन में जब उन्होंने इजराइल को नस्लभेदी बताया था तो ईरान वापसी पर उनका हीरो सरीखा स्वागत हुआ था। परमाणु कार्यक्रम के मसले पर अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के भारी दबाव के बाद भी अहमदीनेजाद टस से मस नहीं हुए। चुनावों में भी उनके यही भावनात्मक मुद्दे कारगर साबित हुआ और जनता ने उन्हें भारी समर्थन दिया।
अहमदीनेजाद को मिले भारी मतों के बावजूद मुसावी की काबिलियत पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता है। वे एक अच्छे आर्थिक सुधारक हैं। 1981 से 89 तक ईरान के प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने अच्छा काम किया। इस दौरान उनकी आर्थिक नीतियों की सभी ने सराहना की। यह इराक के साथ टकराव का दौर था, लेकिन मुसावी की वजह से देश की अर्थव्यवस्था पटरी से नहीं उतरी। मुसावी ने अहमदीनेजाद की आर्थिक नीतियों की कड़ी आलोचना करते हुए देश की जनता से वोट मांगे थे। उन्हें उम्मीद थी कि जिस प्रकार 1997 में सुधारवादी नेता मोहम्मद खातमी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा वोट पाकर राष्ट्रपति बने थे, ठीक वैसा ही समर्थन उन्हें हासिल होगा। चुनाव के दौरान खातमी ने मुसावी के पक्ष में जमकर प्रचार भी किया था। लाख कोशिशों के बाद भी मुसावी देश की अर्थव्यवस्था का कायाकल्प करने के सपने को लोगों की भावनाओं के साथ जोडऩे में असफल रहे और उन्हें राष्ट्रपति बनने लायक समर्थन नहीं मिला। चुनाव में मिली हार के बाद मुसावी जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं वह समझ से परे हैं। वे अपनी हार के लिए उसी सिस्टम को दोष दे रहे हैं जिसका वे वर्षों तक हिस्सा रहे हैं। 8 साल तक देश का प्रधानमंत्री रहने के बाद वे 6 साल तक राष्ट्रपति के सलाहकार रहे। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने चुनाव के दौरान होने वाली गड़बडिय़ों को दुरुस्त करने की मुहिम नहीं छेड़ी और न ही लोकतंात्रिका प्रक्रिया को पारदर्शी और जबावदेह बनाने का काम किया।
ईरान में जिस तरह का लोकतंत्र है, उसमें इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव की दौरान अनियमितताएं नहीं हुई होंगी, पर इस बात की कोई गारंटी नही है कि फिर से चुनाव कराने पर ये स्वतंत्र और निष्पक्ष ही होंगे। देश में जब तक सत्ता सर्वोच्च नेता और गार्डियन काउंसिल के पास केंद्रित रहेगी, ज्यादातर निर्णय और प्रक्रियाएं संदेहास्पद ही रहेंगी। बस, इस पर अगुंली उठाने वाले हाथ बदल जाएंगे। ईरान के लोकतंत्र में कई खामियां हैं। यहां शासन की वास्तविक शक्ति जनता से चुने प्रतिनिधियों के पास नहीं बल्कि मौलवियों और रूढ़ीवादियों के पास रहती है। संविधान के मुताबिक तो राष्ट्रपति कार्यपालिका का प्रमुख होता है, पर सर्वोच्च नेता और गार्डियन काउंसिल की सहमति के बिना वह ज्यादा कुछ नहीं कर सकता है। रक्षा और विदेश मामलों के बारे में सभी फैसले का अधिकार सर्वोच्च नेता के पास होता है। इसके अलावा कार्यपालिका का वास्तविक संचालन गार्डियन काउंसिल करती है। मजलिस यानी संसद में पेश होने वाले विधेयकों को इस काउंसिल से अनुमोदित कराना होता है। यहां तक कि चुनाव लडऩे वाले उम्मीदवारों के नामों को भी काउंलिस हरी झंडी देती है। हालिया चुनावों में उसने ऐसे 2005 में चुनाव लडऩे वाले सैकड़ों उम्मीदवारों पर प्रतिबंध लगा दिया था।
ईरान में उपजे हालातों पर पश्चिम देशों के रुख का जिक्र करना भी जरूरी है। ईरान के चुनावों परिणामों से मुसावी के बाद सबसे ज्यादा दुख ये देश ही मना रहे हैं। परिणाम आते ही यहां के मीडिया ने अहमदीनेजाद की जीत को कट्टरपंथ की जीत बताते हुए चिंता जाहिर करना शुरू कर दिया। अहमदीनेजाद हमेशा से इन देशों की आंख का कांटा रहे हैं। परमाणु कार्यक्रम के अलावा कई मौकों पर उन्होंने इन देशों की बादशाहत की हंसी उड़ाई है। दुबारा राष्ट्रपति चुने जाने के बाद भी वे कह चुके हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में ये देश ऐसा कोई मौका नहीं चूकना चाहते जिसमें अहमदीनेजाद को सत्ता से बाहर होने की संभावना बनती हो। इसी के तहत ईरान में हो रहे विरोध प्रदर्शन को पश्चिम जगत का मीडिया कुछ ज्यादा ही बढ़ा-चढ़ा कर दिखा रहा है। मंगलवार को तेहरान में हुई रैली को ईरान के इतिहास की सबसे बड़ी रैली के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, जबकि तस्वीरों और वीडियो फुटेज से तो ऐसा कुछ प्रतीत नहीं होता है। प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ और सुरक्षाकर्मियों के कड़े रुख की खबरों के बीच जो आंकड़े दिए जा रहे हैं वे और भी ज्यादा हास्यास्पद लग रहे हैं। बताया जा रहा है कि रैली में सुरक्षाकर्मियों की ओर से की गई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई और सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। लाखों की भीड़ पर गोली चलाई जाए और एक ही व्यक्ति की मौत हो, ऐसा कैसे हो सकता है?
पश्चिमी मीडिया अपने हितों की खातिर पहले भी ऐसा भ्रामक कवरेज करता आया है। वह तथ्यों को इस तरह से पेश करता है कि शेष विश्व को लगता है कि यहां तो हालत बहुत ज्यादा खराब है। इस मामले में इराक का उदाहरण लिया जा सकता है। पश्चिमी मीडिया ने यहां किस तरह से अपने मुताबिक सच को तोड़ा-मरोड़ा। ईरान की स्थिति की भ्रामक तस्वीर पेश करने में अमरीकी मीडिया जितना तत्परता दिखा रहा है उसका पासंग भी इराक में अमरीकी सेना के अत्याचारों को दिखाने में लगाया होता तो दुनिया का दादा बनने वाला देश कब का नंगा हो चुका होता। बहरहाल, ईरान ने बहुत जल्दी पश्चिमी देशों के इरादों का भांप लिया है और सरकार ने विदेशी मीडिया पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। सरकार की अनुमति के बिना अब कोई भी विदेशी मीडियाकर्मी यहां से रिपोर्टिंग नहीं कर पाएगा और न ही प्रदर्शन स्थल पर मौजूद रहेगा। कड़ी पाबंदियों के चलते विदेशी मीडियाकर्मी प्रदर्शन स्थल पर तो नहीं जा रहे हैं, पर माहौल को भयावह बताने से बाज नहीं आ रहे हैं। इसके लिए अब सबसे ज्यादा इस्तेमाल साइबर मीडिया हो रहा है। ईरानी सरकार अब इस पर नजर लगाए हुए है और प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रही है।

शनिवार, मई 30, 2009

ओला के बहाने


शीशराम ओला को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिलना सूबे की जाट राजनीति में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। राजस्थान में कांग्रेस की नई जाट लॉबी जन्म ले चुकी है। पार्टी पुराने चेहरों से तौबा कर युवाओं पर दांव खेल रही है। किसका दिमाग है इसके पीछे? अंदर की कहानी!

शेखावाटी। राजस्थान का जाट बाहुल्य इलाका। देश की सेना में ही नहीं, राजनीति में भी यहां की तूती बोलती है। सरकार चाहे किसकी भी हो शेखावाटी की भागीदारी हमेशा दमदार रहती है। परंपरागत रूप से इस क्षेत्र को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ चुनावों में भाजपा इसमें सेंध लगाने में कामयाब रही। हालांकि हाल ही में हुए आम चुनावों में कांग्रेस ने अपने पुराने गढ़ पर फिर से कब्जा जमा लिया है। कांग्रेस के प्रदर्शन में आए उतार-चढ़ाव के बीच एक ऐसे नेता भी रहे जिन्होंने अपने क्षेत्र में हमेशा पार्टी का झंडा बुलंद रखा। जी हां, हम बात कर रहे हैं दिग्गज जाट नेता शीशराम ओला की। ओला झुंझुनूं से लगातार पांचवीं बार सांसद चुने गए हैं। इससे पहले पहले वे दो दफा विधायक भी रह चुके हैं। दो-दो बार केंद्र व राज्य में मंत्री भी रहे हैं।
पंद्रहवीं लोकसभा के नतीजे आ रहे थे तो ओला के घर जश्न का माहौल था। जश्न महज सांसद बनने का नहीं था, बल्कि कैबीनेट मंत्री बनने की संभावनाओं का था। जो भी बधाई देने आ रहा था वो यह ही कह रहा था, 'इस बार तो कैबीनेट मिनिस्ट्री पक्की है।' स्वयं ओला को भी इस बात का पूरा यकीन था कि चुनावों में कांग्रेस के बेहद अच्छे प्रदर्शन का इनाम उन्हें भी मिलेगा और प्रमोशन के तौर पर उन्हें कैबीनेट मंत्रालय मिलेगा, लेकिन हुआ इसका उलट। कैबीनेट की उम्मीद लगाए बैठे ओला को सरकार में राज्य मंत्री के रूप में भी जगह नहीं मिली। उन्होंने अपने स्तर पर खूब हाथ-पांव मारे, लेकिन कोई भी उनका साथ देने को कोई तैयार नहीं हुआ। वे जहां भी गए उन्हें निराशा ही हाथ लगी।
ओला के दरकिनार होने के एक नहीं कई कारण हैं। अशोक गहलोत के साथ छत्तीस का आंकड़ा उन्हें इस बार भारी पड़ गया। गौरतलब है कि ओला और गहलोत में कभी नहीं बनी। कई मौकों पर तो दोनों के बीच की खींचतान सार्वजनिक तौर पर दिखी गई। ताजा उदाहरण विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर हुई दावेदारी का है। इस दौरान ओला ने न सिर्फ मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी पेश की, बल्कि उनके समर्थकों ने पार्टी पर्यवेक्षकों के सामने गहलोत के विरोध में जमकर नारेबाजी भी की। दरअसल, ओला की राजनीति महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं है। उनके मन में राजस्थान का मुख्यमंत्री बनने का सपना आज से नहीं, बरसों से है। अशोक गहलोत के आने से उनके इस सपने को ग्रहण लग गया। इसलिए वे हमेशा गहलोत विरोधी खेमे की ओर ही रहे। उन्होंने गहलोत को सूबे की सियासत से रुखसत करने की जी तोड़ कोशिश की। गहलोत पर जाट विरोधी होने का ठप्पा लगाना भी इसी मुहीम का एक हिस्सा था, पर उन्हें सफलता नहीं मिली।
मुख्यमंत्री बनने तक गहलोत, ओला के खिलाफ सुरक्षात्मक मुद्रा में रहे, लेकिन इसके बाद वे आक्रामक हो गए। लोकसभा चुनावों में टिकट वितरण के समय ही गहलोत ने ओला को किनारे करने की पूरी व्यूह रचना रच ली थी। सूबे में जितने भी जाट नेताओं को टिकट दिया गया, ओला को छोड़कर सभी गहलोत की पसंद के थे। ये सब जीतने में भी सफल रहे। केंद्र में सरकार बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई तो मंत्री बनने-बनाने की लॉबिंग में ओला के साथ इनमें से कोई जाट नेता खड़ा नजर नहीं आया। गहलोत ने इस बात का भी ख्याल रखा कि ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने से कहीं जाट नाराज न हो जाएं, इसलिए उन्होंने सीकर सांसद महादेव सिंह खंडेला को मंत्री बनवा दिया। खंडेला, गहलोत के खास सिपेहसालार हैं।
ओला को साइडलाइन कर खंडेला को मंत्री बनवाकर गहलोत ने विधानसभा चुनाव के दौरान शुरू की गई रणनीति को ही आगे बढ़ाया है। इसके तहत गहलोत राजस्थान में नई जाट लॉबी को सक्रिय करने पर काम कर रहे हैं। उन्हें इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है। शीशराम ओला के अलावा नारायण सिंह, कमला बेनीवाल, हरेंद्र मिर्धा, कर्नल सोनाराम, रिछपाल मिर्धा, डॉ. हरि सिंह, रामेश्वर डूडी, राजेंद्र चौधरी सरीखे गहलोत विरोधी नेताओं को कांग्रेस में किनारे किया जा रहा है। कुछ विधानसभा चुनाव में अलग-थलग हो गए, तो कुछ को लोकसभा चुनाव ने पीछे धकेल दिया है। इन नेताओं ने कभी भी गहलोत का समर्थन नहीं किया, उल्टे विधानसभा चुनाव से पहले आलाकमान तक भी ऐसी खबरें पहुंचाई थीं कि गहलोत के रहते जाट कांग्रेस के साथ नहीं आएंगे। नतीजों के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर भी इन नेताओं ने गहलोत का विरोध किया था, लेकिन आखिर में आलाकमान ने उन्हीं के नाम पर मुहर लगाई। मुख्यमंत्री बनने के बाद जाट राजनीति पर भी गहलोत का जादू असरकारी साबित हो रहा है। गहलोत के साथ अब जाट नेताओं की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी है। महादेव सिंह खंडेला, हरीश चौधरी, ज्योति मिर्धा, बद्रीराम जाखड, लालचंद कटारिया, विश्वेंद्र सिंह, डॉ. चंद्रभान, रामलाल जाट, महेंद्र चौधरी, वीरेंद्र बेनीवाल, रीटा चौधरी, रूपाराम डूडी सरीखे जाट नेता गहलोत के बेहद करीबी हैं। राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील को वे पहले ही उनके पाले में आ चुके हैं। गहलोत के साथ खड़े जाट नेता संख्या और ताकत दोनों में ही विरोधी खेमें से मजबूत हैं। ये नेता युवा हैं और लोगों में इनकी अच्छी पकड़ है। गहलोत के लिए सबसे बड़ी राहत की बात यह है कि इनमें से कई राहुल गांधी की भी पसंद हैं।
प्रदेश की जाट राजनीति को अपने हाल पर छोड़ शीशराम ओला पर वापिस आएं तो इस बार मंत्री पदों को लेकर कांग्रेस ने डीएमके के साथ जिस तरह से कड़ा रुख अपनाया उससे साफ हो गया था कि मनमोहन सिंह और राहुल गांधी मंत्रियों की योग्यता पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। ओला के पास कोई विशेष शैक्षणिक योग्यता नहीं है। वे महज मेट्रिक पास हैं। 82 साल की उम्र भी उनके लिए नुकसानदायक साबित हुई। राहुल गांधी इनते बुजुर्ग नेता को मंत्री बनाने के लिए राजी नहीं हैं। मनमोहन सिंह तो पहले से ही मंत्री रहते हुए ओला के प्रदर्शन से नाखुश थे। पार्टी सूत्रों के मुताबिक पिछली सरकार में ओला का प्रदर्शन औसत से भी नीचे रहा, इसलिए किसी ने भी उनको वापिस मंत्री बनाए जाने की पैरवी नहीं की। पिछली बार भी उन्हें मजबूरी में ही मंत्री बनाया गया था, क्योंकि राजस्थान से कांग्रेस के वे ही इकलौते जाट सांसद थे। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी भी उनसे खुश नहीं बताई जाती हैं। ओला का राजस्थान के मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी पेश करना उन्हें काफी अखरा था। ओला समर्थकों द्वारा पर्यवेक्षकों के सामने की गई नारेबाजी की रिपोर्ट भी सोनिया गांधी को मिली थी।
ओला को मंत्री नहीं बनाए जाने के लिए कोई कितने भी तर्क दे, लेकिन वे उन्हें मानने को तैयार नहीं हैं। उनके अनुसार यह सब उनकी सियासत को समेटने की साजिश है। जब हमने उनसे यह पूछा कि यह साजिश कौन रच रहा है तो उन्होंने अशोक गहलोत का नाम तो नहीं लिया, पर उनकी ओर इशारा जरूर कर दिया। वे स्वयं तो गहलोत के खिलाफ कुछ नहीं बोले, लेकिन उनके बेहद करीबी माने जाने वाले एक शख्स ने नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर हमें बताया कि 'अशोक गहलोत के कहने पर ही ओला साहब को मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है, वर्ना उनका कैबीनेट मंत्री बनना पक्का था। गहलोत ने विधानसभा चुनाव में ओला साहब की ओर मुख्यमंत्री पद की दावेदारी किए जाने का बदला लिया है। मुख्यमंत्री उनकी राजनीति खत्म कर स्वयं के लोगों को आगे लाना चाहते हैं।' मंत्री नहीं बनाए जाने से ओला बेहद गुस्से में हैं, पर फिलहाल चुप रहना ही बेहतर समझ रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक पार्टी उन्हें राज्यपाल बनाकर सम्मानजनक विदाई देना चाहती है। आलाकमान की ओर से ओला को इसकी सूचना भी भिजवाई गई है, पर ओला इस पर राजी नहीं है। वे सक्रिय राजनीति में ही रहना चाहते हैं। वे अभी भी गहलोत के साथ दो-दो हाथ करने के मूड में हैं। इसके लिए उन्होंने यह रणनीति भी बनाई थी कि गहलोत की वजह से एक जाट मंत्री नहीं बन पाया, लेकिन महादेव सिंह खंडेला को मंत्री बनवाकर गहलोत ने उनसे यह मौका भी छीन लिया है। खंडेला न केवल जाट हैं, बल्कि उनके शेखावाटी से ही हैं। खंडेला के मंत्री बनने के बाद ओला समर्थकों का एक वर्ग उनके ऊपर राज्यपाल बनने के लिए हामी भरने के लिए दबाव बना रहा है। उनका मानना है कि उम्र के इस पड़ाव पर पार्टी की खिलाफत करके उन्हें फजीहत के अलावा और कुछ हासिल नहीं होगा। देर से ही सही, धीरे-धीरे ओला को भी ये समझ में आ रहा है।
ओला एपीसोड के बाद यह पूरी तरह साफ हो गया है कि राजस्थान में गहलोत को चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं है। ओला के बहाने उन्होंने अपने कई विरोधियों की बोलती बंद कर दी है। गहलोत राजनीति के एक मंझे हुए खिलाड़ी की तरह चीजों को अपने पक्ष में कर रहे हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में गठन में जिस तरह से उनकी तूती बोली, उससे साफ हो गया है कि राजस्थान में से किसी कांग्रेसी को आगे बढऩा है तो गहलोत के साथ बिना ऐसा होना संभव नहीं है। इसलिए गहलोत विरोधी खेमे के हौंसले पस्त होते जा रहे हैं और उनके समर्थकों को कारवां बढ़ता जा रहा है। कुल मिलाकर गहलोत ने राजस्थान में एकछत्र राज कायम कर लिया है जिसे हिलाने वाला दूर-दूर तक कोई नहीं है।


गुरुवार, मई 28, 2009

गुफ्तगु - देश के सबसे युवा सांसद हमदुल्‍ला सईद से...


देश के सबसे छोटे लोकसभा क्षेत्र लक्षद्वीप से जीतकर आए 26 वर्षीय हमदुल्ला सईद पंद्रहवीं लोकसभा में सबसे युवा चेहरे हैं। हमुदल्‍ला के दिवंगत पिता पी.एम. सईद ने इस लोकसभा सीट का लगातार 37 साल तक प्रतिनिधित्‍व किया। चौदहवीं लोकसभा के चुनावों में वे महज 71 वोटों से हार गए थे, पर उनके बेटे ने पूरा हिसाब चुकता कर लिया है। कानून की पढ़ाई पढ़ चुके हमदुल्‍ला अपने पिता के कामों को तो आगे बढ़ाने से इतर बहुत कुछ करना चाहते हैं। पिछले दिनों हुई बातचीत में उन्‍होंने इन्‍हीं का जिक्र किया। प्रस्‍तुत है उनसे हुई गुफ्तगु के मुख्‍य अंश-


लोकसभा में सबसे कम उम्र सांसद होने के नाते आप सेलिब्रिटी बन गए हैं, कैसा अनुभव कर रहे हैं?

- मुझे बहुत अच्छा फील हो रहा है। सबका अटेंशन मुझे मिल रहा है। मीडिया, बाकी सांसद सब मुझसे बात कर रहे हैं और मेरी योजनाओं के बारे में पूछ रहे हैं। शुरूआत में थोड़ा दबाव महसूस कर रहा था, पर अब एकदम सहज हूं।


पढ़ाई करते-करते राजनीति में आने का मन कैसे बना?
- इंडियन सोसायटी कॉलेज पुणे से लॉ में ग्रेजुएशन करने के बाद मैं मास्टर्स डिग्री के लिए यूनाइटेड किंगडम जाने वाला था, लेकिन इतने में ही पिताजी की मृत्यु हो गई। उनके चले जाने के बाद क्षेत्र की जनता ने मुझ पर काफी प्रेशर बनाया कि मैं अपने पिता के कामों को आगे बढ़ाऊं। आखिरकार लोगों की भावनाओं की कद्र करते हुए मैंने चुनाव लडऩे का फैसला किया। राहुल गांधी तो काफी दिनों से चुनाव लडऩे के लिए पहले से ही कह रहे थे। वैस राजनीति मेरे लिए नई नहीं है। मेरे पिता लक्षदीप से लगातार 37 साल तक सांसद रहे। मैं स्वयं स्टूडेंट रहते हुए राजनीति में सक्रिय रहा।


राजनीति में आने का मकसद क्या है?
- जनप्रतिनिधि का एक ही काम होता है, लोगों की सेवा करना। क्षेत्र की जनता बड़ी उम्मीदों के साथ अपना नेता चुनती है। मैं किसी चमत्कार का दावा तो नहीं करता, पर जनता के लिए हमेशा उपलब्ध रहूंगा और उनकी समस्याओं के शीघ्र निराकरण का अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रयास करुंगा।


इस बार लोकसभा में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है, इसे आप किस रूप में देखते हैं?
- यूथ हमारे देश का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। जब वह वाकी क्षेत्रों में देश का नाम रोशन कर रहा है तो राजनीति इससे क्यों अछूती रहे। यदि नौजवान लोग राजनीति में ज्यादा आएंगे तो देश का कायाकल्प हो जाएगा, क्योंकि उनमें जोश होता है और काम करने का जज्बा भी। मैं यह नहीं कह रहा कि बुजुर्ग नेताओं को राजनीति से संन्यास ले लेना चाहिए, वे भी हमारे साथ रहें। मेरे हिसाब से तो युवा और अनुभवी नेता मिलकर देश में बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।


तो क्या आप युवाओं को राजनीति में आने के लिए प्रेरित करेंगे?
- युवाओं को अपनी जिम्मेदारी खुद समझनी चाहिए। राजनीतिक दल सिर्फ मौका दे सकते हैं। काम तो युवाओं को ही करना है। वैसे हमारी पार्टी युवाओं पर पूरा फोकस कर रही है। लोकसभा चुनाव में भी नौजवानों को खूब टिकट दिए गए, इनमें से ज्यादातर जीत कर भी आए। राहुल गांधी चाहते हैं की ज्यादा से ज्यादा युवा राजनीति में आए। मैं भी उनकी मुहिम से जुड़ा हुआ हूं। हम देश भर में ऐसे युवाओं को तलाश रहे हैं जो राजनीति में अच्छा कर सकते हैं।


देश के विकास को लेकर आपका क्या सपना है?
- दुनिया में हमारे देश की स्थिति लगातार मजबूत होती जा रही है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाला समय हमारा है, लेकिन इसके लिए हमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि व परिवहन की दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। करोड़ो लोग अभी भी शिक्षा से वंचित हैं, कुपोषण के शिकार हैं और बेरोजगार हैं। एक कृषि प्रधान देश के लिए इससे बदतर और क्या हो सकता है कि अभावों में उसे आत्महत्या करनी पड़ती है। यह सच्चाई है जिसे हमें स्वीकारना होगा और सुधार करना होगा।


महिलाओं के उत्थान के लिए आप क्या करना चाहेंगे?
- देश में महिलाओं की स्थिति निश्चित रूप से दयनीय है। मेरे हिसाब से महिला उत्थान के लिए सबसे अच्छा जरिया शिक्षा है। शिक्षा का स्तर बढऩे पर बाकी चीजे अपने आप ठीक होने लगती हैं। मेरे स्वयं के सात बहिनें हैं। सबने अच्छी पढ़ाई की तो अच्छी पोजीशन पर हैं, चार तो डॉक्टर हैं।


आप काफी धार्मिक प्रवृत्ति के लगते हैं, आपके मोबाइल नंबर की अंतिम तीन अंक भी 786...
- मेरे नजरिए से धार्मिक होना अच्छी बात है। मैं नियमित रूप से नमाज पढ़ता हूं। इससे मुझे शांति तो मिलती ही है और मैं अनुशासित भी रहता हूं। जहां तक मोबाइल नंबर में 786 का सवाल है, मुझे यह नंबर लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी थी।

राजनीति के अलावा और क्या अच्छा लगता है?
- मुझे पढऩा काफी पसंद है। वक्त मिलने पर मैं घंटों तक पढ़ता हूं। नामचीन लेखकों के अलावा नए लेखकों को भी मैं खूब पढ़ता हूं। अरविंद अडिगा ने मुझे काफी प्रभावित किया। इसके अलावा म्युजिक सुनना भी पसंद है। लाइट म्युजिक सुनना अच्छा लगता है।


चुनाव जीतने के बाद आपकी लाइफ स्टाइल में कितना बदलाव आया?
- मैं काफी बदलाव महसूस कर रहा हूं। जाहिर तौर पर पहले से ज्यादा व्यस्त हो गया हूं। लोग मिलने भी खूब आते हैं और मोबाइल पर काल्स भी। व्यस्त होना मुझे पहले से ही पसंद है, इसलिए सब अच्छा लग रहा है। एक बदलाव मेरे पहनावे में भी आया है। पहले जींस-टीशर्ट पहनता था, अब कुर्ता-पायजामा पहनता हूं।


शादी के बारे में क्या सोचा है?
- अरे यार! अभी शादी की उम्र ही कहां हुई है। इस बारे में अब तक कुछ भी नहीं सोचा है। अभी काफी जिम्मेदारियां हैं, पहले उन्हें निभाना है फिर शादी के बारे में देखेंगे।