मंगलवार, दिसंबर 14, 2010

नाकाम निजाम

राज्य की अशोक गहलोत सरकार में शांति धारीवाल नंबर दो पोजीशन पर हैं। उनके पास न केवल सर्वाधिक महत्वपूर्ण विभाग हैं, बल्कि मुख्यमंत्री ने भी उन्हें पूरी ताकत दे रखी है, लेकिन यह निजाम हर मोर्चे पर नाकाम साबित हो रहा है। गहलोत को भी उनकी नाकामी लगातार खटक रही है।

शांति धारीवाल। गहलोत सरकार में काबीना मंत्री। गृह, विधि, स्वायत्त शासन व नगरीय विकास सरीखे अहम मंत्रालयों का जिम्मा तो उनके पास है ही, लेकिन सबसे अहम बात यह है कि सरकार में हैसियत के नजरिए से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद उनका ही नंबर आता है। अशोक गहलोत ने भी उन्हें पूरी तवज्जों दी और कई मौकों पर साबित भी किया कि धारीवाल उनके सबसे पसंदीदा हैं, लेकिन यह धारीवाल की बदकिस्मती ही है कि वे गहलोत की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। जाने-अनजाने इस तरह की परिस्थितियां बन जाती हैं जो धारीवाल की सियासी सेहत के लिए माकूल नहीं होतीं। मुख्यमंत्री की नजरों में उनकी इमेज अब पहले जैसी नहीं रही है। पार्टी से जुड़े सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि गहलोत ने उनके पर कतरना शुरू कर दिया है और वे उनके विकल्प की तलाश में हैं।
वैसे ऐसो नहीं है कि धारीवाल और गहलोत भी कोई पुरानी दोस्ती रही हो। इसे महज एक संयोग कहें या धारीवाल की बुलंद किस्मत कि इस बार के विधानसभा चुनाव में गहलोत के साख माने जाने वाले ज्यादातर दिग्गज नेता चुनाव हार गए। जब मंत्रिमंडल गठन की बात आई तो अनुभवी, वरिष्ठ, तेजतर्रार की कसौटी पर धारीवाल सबसे ज्यादा खरे उतरे लिहाजा उन्हें मुख्यमंत्री ने सबसे अहम जिम्मेदारियां सौंप दीं। यहां तक कि विधानसभा में मुख्यमंत्री से पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर भी धारीवाल देते। एक बार विधानसभा सत्र के दौरान जब धारीवाल सीने में दर्द के चलते अस्पताल में भर्ती हो गए तो गहलोत बहुत असहज हो गए थे। शुरूआती दौर में धारीवाल का प्रदर्शन भी शानदार रहा और उन्होंने गहलोत का दिल जीत लिया। चाहे कानून व्यवस्था की बात हो या नगरीय विकास की नई योजनाओं की या फिर कोई सियासी मुसीबत, धारीवाल ने अपने कामकाज की छाप हमेशा छोड़ी। प्रदेश में कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ, अपराधों का ग्राफ नहीं बढ़े, पुलिस की साख भी सलामत रही, जयपुर में मेट्रो की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी मिली, भूमाफिया पर शिकंजा कसा गया, वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार की बड़ी वजह बने भूमि नियमन के 90बी नियम में संशोधन किया गया...। लेकिन, ये सब धारीवाल के शुरुआती दिनों की उपलब्धियां हैं, धीरे-धीरे उनके कामकाज में सुस्ती आने लगी और गहलोत की नजरों में उनका तिलिस्त भी बरकरार नहीं रहा।
उन्हें सबसे ज्यादा असफलता गृह मंत्री होने के नाते मिल रही है। पिछले कुछ समय में ही दो-तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं जो गृह मंत्रालय की असफलता को इंगित करने के लिए काफी हैं। भला कौन यकीन करेगा कि एक पुलिस स्टेशन में कुछ पुलिसवाले, उसी थाने में तैनात अपनी एक साथी महिला कांस्टेबल का रेप और मर्डर कर दें। दिल दहला देने वाला ये वाकया और कहीं का नहीं बल्कि धारीवाल के गृह जिले कोटा जिले के चेचट पुलिस स्टेशन का है। कांस्टेबल माया यादव चेचट थाने में ही दो पुलिसवालों देशराज और तुलसीराम ने न सिर्फ उसके साथ बलात्कार किया बल्कि उसका मर्डर भी कर डाला। बात यहीं खत्म नहीं हुई, महिला कांस्टेबल के रेप और मर्डर के बाद पूरे मामले को दूसरा रंग देने की भी कोशिश की गई। चेचट में हुई इस शर्मनाक घटना से कुछ दिन पहले ही झालावाड़ जिले के मनोरहथाना में भी पुलिस ने आतंक मचाया था। हुआ यूं था कि एक युवती के साथ सामूहिक ज्यादती करने वालों के खिलाफ भील समाज के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान ही स्थिति बिगड़ गई और पुलिस ने फायरिंग कर दी तो भीलों ने पथराव। पत्थरबाजी में घायलों की तादाद 36 से ज्यादा पहुंची जबकि फायरिंग की घटना में भील समाज के एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई और एक अन्य युवक ने झालावाड़ अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। जब हाड़ौती में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बदतर है तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में क्या हाल होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। कुछ महीने पहले उदयपुर के सराड़ा में भी पुलिस ने खूब किरकिरी कराई थी। असल में यहां दो शराब व्यावसायियों के बीच विवाद था, जिसमें शहजाद और मोहन मीणा दोनों ही शराब का कारोबार करते थे। दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद बढ़ा तो शहजाद ने मोहन का अपहरण कर हत्या कर दी। मोहन मीणा के अपहरण और हत्या के कुकृत्य से आम अल्पसंख्यक समुदाय को कोई लेना देना नहीं था, लेकिन घटना के लगभग एक पखवाड़े बाद जानबूझकर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। वहीं नावां में तो पुलिस ने ऐसी बर्बरता की कि एक युवक ने पेरशान होकर आत्महत्या ही कर ली। युवक की मौत की खबर सुनते ही क्षेत्र के लेागों का पुलिस के प्रति गुस्सा फूट पड़ा।
प्रदेश की कानून-व्यवस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो बार तो मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लग चुकी है। दौसा संसदीय क्षेत्र से सांसद और कभी भाजपा के लिए मुसीबत बने किरोड़ी लाल मीणा एक मामले को लेकर रात के अंधेर में पुलिस पहरे के बावजूद मुख्यमंत्री निवास में घुस गए और राजधानी के एक कार्यक्रम में छात्राओं ने इतना हंगामा किया कि मुख्यमंत्री को भाषण अधूरा छोड़ कार्यक्रम से जाना पड़ा। हद तो तब हो गई जब इन छात्राओं ने चंद घंटों बाद ही सुनियोजित तरीके से कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय पर कब्जा जमा लिया और पुलिस को भनक तक नहीं लगी। छात्राओं ने यहां काफी समय तक हंगामा किया और वे वहां से तब ही गईं जब पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान सिंह ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि पंद्रह दिन के भीतर उनकी सारी मांगे मान ली जाएंगी। सूत्रों के मुताबिक इन तीनों घटनाओं से गहलोत काफी खिन्न है और इस तरह की चर्चाएं हैं कि उन्होंने धारीवाल को बुलाकर उनकी क्लास भी ली है। धारीवाल ने उन्हें यह भरोसा भी दिलाया है कि जल्द ही व्यवस्था के कील-कांटों को दुरुस्त कर लिया जाएगा, लेकिन गहलोत उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। इन मामलों के अलावा गहलोत पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति से भी खुश नहीं हैं। प्रदेश में हत्या, लूट, चोरी आदि वारदातों में खास इजाफा हुआ है। गहलोत इस बात से खासे चिंतित है कि उनकी मंशा के बावजूद अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है।
मंत्रालय की नाकामियों के अलावा धारीवाल के राजनीति निर्णयों से भी गहलोत खुश नहीं है। पहले स्थानीय निकाय चुनाव और फिर पंचायत चुनावों में उन्होंने आलाकमान और संबंधित क्षेत्र के विधायक-सांसदों की इच्छा को दरकिनार कर अपने चहेते को खूब टिकट बांटे। कोटा नगर निगम से उन्होंने डॉ. रत्ना जैन को टिकट दिलाया था और जीत सुनिश्चित करने के लिए उनके दिन-रात एक भी कर दी थी। ऐसा पहली बार देखा गया कि धारीवाल खुद के अलावा किसी और के चुनाव में इतनी सघनता से प्रचार किया। वे शहर की हर गली, हर मौहल्ले में घूमे और रत्ना जैन के लिए वोट मांगे। उन्हें सबसे ज्यादा मशक्कत क्षेत्र के अल्पसंख्यक मतदाताओं को मनाने में करनी पड़ी। ये हमेशा से धारीवाल के साथ रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उपेक्षा की शिकायत के साथ ने केवल इन्होंने दूरी बना ली थी, बल्कि मंत्रीजी के खिलाफ अभियान भी छेड़ दिया था। यहां तक कि उनके जन्मदिन के आयोजन में भी उनके खिलाफ नारोबाजी हो गई।
खैर, इसे धारीवाल की मेहनत का नतीजा कहें या कांग्रेस के पक्ष में चल रही लहर कि डॉ. रत्ना जैन समेत ज्यादातर ने स्थानीय निकाय चुनावों में जीत भी हासिल की, लेकिन साथ ही पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की संख्या में भी इजाफा हो गया। ये नेता अब अंदरूनी तौर पर धारीवाल को हलकान करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इन नेताओं को यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा है कि धारीवाल महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर धौंस जमाए बैठे रहे और और उनकी नंबर दो की हैसियत बरकरार रहे। पंचायत चुनाव में तो उनका हर दाव उल्टा पड़ा। अपने चहेतों को टिकट बांटने के चक्कर में उन्होंने अपने विरोधियों को तो खूब पैदा कर ही लिया, उन्हें भी गद्दीनशीं नहीं करवा पाए जिनके लिए इतनी मशक्कत की। पूरे घटनाक्रम के बाद धारीवाल समर्थकों ने जिस तरह से सांसद इज्यराज सिंह के घर पर पत्थरबाजी की, उससे मुख्यमंत्री खासे नाराज बताऐ जाते हैं।
एक चतुर राजनेता की यह सबसे बड़ी खूबी होती है कि वह अपनी गलतियों का ठीकरा बड़ी चालाकी से दूसरे के माथे पर फोड़ देता है। धारीवाल धडल्ले से इसी सलीके से सियासत कर रहे हैं। राज्य में अब तक हुए कलेक्टर-एसपी सम्मेलन में यह परंपरा रही है कि गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन दोनों के साथ खड़े हुए नजर आते हैं, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह से बदली हुई थी। खुद गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन की खिंचाई करने में लगे हुए थे। जरा गौर फरमाइए सम्मेलन में गृह मंत्री शांति धारीवाल ने क्या कहा- ‘पिछले दिनों जब सीएम जेएलएन मार्ग पर एक कार्यक्रम में गए तो आंदोलनकारी छात्राएं उनके सामने आ गईं। इंटेलीजेंस को पता ही नहीं था। इस तरह की इंटेलीजेंस से कैसे अपराध नियंत्रित होंगे? इट्स कंपलीट फेल्योर। शहरों के थाने ऐसे लगते हैं, जैसे प्रॉपर्टी डीलिंग की दुकान हो। भूमाफिया ने थानों को शरणस्थली बना रखा है।’ धारीवाल ने ऐसा क्यों कहा यह अलग विषय है, लेकिन इससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था की पोल तो खुल ही गई।
सूत्रों के मुताबिक धारीवाल को लगातार मिल रही नाकामियों और इनके बावजूद उनके तीखे होते तेवरों ने गहलोत बेहद खिन्न हैं। यह भी चर्चा है कि गहलोत ने धारीवाल के पर कतरना भी शुरू कर दिया है। प्रतिकूल परिस्थितियों की बढ़ती फेहरिस्त से धारीवाल कितने परेशान हैं, ये उनके बुझे हुए चेहरे से आसानी से देखा जा सकता है। बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उनके ऊपर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अक्सर संयम बरतने वाले धारीवाल का धीरज भी जबाव देने लगा है और वे बात-बात पर खीज प्रकट करने लगे हैं। हालांकि उन्हें इस बात की तसल्ली भी है कि गहलोत भले ही उनसे कितने ही नाराज क्यों न हों, उन्हें बदलना आसान नहीं होगा, क्योंकि उन जैसे अनुभवी और काम के जानकार विधायक इस बार कांग्रेस के टिकट से कम ही जीत कर आए हैं।

मंगलवार, दिसंबर 07, 2010

ब्राह्मण के बदले ब्राह्मण!


वैसे तो महाराष्ट्र की राजनीति से राजस्थान का कोई सीधा कनेक्शन नहीं है, लेकिन आदर्श सोसायटी घोटाले की भेंट चढ़े अशोक चव्हाण की जगह की पृथ्वीराज चव्हाण की ताजपोशी ने सूबे में कांग्रेस का कप्तान बनने का ख्वाव सजा रहे ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदों के पंख लगा दिए हैं। आलाकमान ने महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन करते समय जिस तरह से कास्ट केमिस्ट्री का ध्यान रखा है, उसके बाद कयास लगाया जा रहा है कि राजस्थान में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का मसला भी इसी फॉर्मूले से सुलझाया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो डॉ. सीपी जोशी की जगह कोई ब्राह्मण नेता ही लेगा। ब्राह्मण की जगह ब्राह्मण फॉर्मूले से मोहन प्रकाश, सांसद डॉ. महेश जोशी, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. गिरिजा व्यास, महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष बीडी कल्ला, विधायक रघु शर्मा और मंत्री बृजकिशोर शर्मा के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं।
महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन से पहले भी प्रदेशाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नेताओं की दावेदारी मजबूत थी, क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग की लिहाज से ओबीसी, अल्पसंख्यक और एससी-एसटी को पहले ही बहुत कुछ मिल चुका है। ओबीसी वर्ग में सबसे मजबूत जाटों की बात करें तो छह जाट लोकसभा में हैं और नरेंद्र बुडानिया दूसरी मर्तबा राज्यसभा में पहुंच चुका है। केंद्र में महादेव सिंह खंडेला मंत्री हैं तो कमला गुजरात में राज्यपाल हैं। युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष भी इसी वर्ग से हैं। ओबीसी वर्ग के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं तो डॉ. प्रभा ठाकुर महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सचिन पायलट केंद्र में असरदार मंत्री हैं। विजयलक्ष्मी बिश्नोई महिला कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। मूल ओबीसी के 14 और 17 जाटों सहित कुल 31 विधायक हैं। इनमें से छह जाट, एक जट सिख और तीन मूल ओबीसी के मंत्री हैं। साफ है पार्टी अब किसी जाट या ओबीसी को ही प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की राजनीतिक मजबूरी से उबर चुकी है। जहां तक अल्पसंख्यक का सवाल है विधानसभा चुनाव हारे अश्क अली टाक को राज्यसभा पहुंच गए हैं। मुख्य सचिव भी मुस्लिम हैं। विधायकों में से दस अल्पसंख्यक हैं तो मंत्रिमंडल में दो हैं। एससी-एसटी को देखें तो दोनों के तीन-तीन सांसद राज्यसभा और लोकसभा में हैं। नमोनारायण मीणा केंद्र में मंत्री हैं। उन्हें सामान्य कोटे की सीट मिली है। जगन्नाथ पहाडिय़ा हरियाणा के राज्यपाल हैं। विधायकों में से 18 एससी और 20 एसटी के हैं। गहलोत कैबिनेट में चार एससी और आठ एसटी के हैं।
इस लिहाज से देखें तो ब्राह्मणों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। तीन ब्राह्मण लोकसभा और एक राज्यसभा में हैं। आनंद शर्मा और सीपी जोशी केंद्र में मंत्री हैं। बीएल जोशी राज्यपाल हैं। गिरिजा व्यास महिला आयोग की अध्यक्ष हैं। इसके बावजूद भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का सोच रही कांग्रेस में इस वर्ग को प्रतिनिधित्व की उम्मीद जताई जा रही है। ब्राह्मण नेताओं में डॉ. महेश जोशी, ममता शर्मा, रघु शर्मा, ममता शर्मा, बीडी कल्ला और बृजकिशोर शर्मा के नाम तो पहले से चल रहे थे अब इसमें मोहन प्रकाश और डॉ. गिरिजा व्यास का नाम नया जुड़ा है। मोहन प्रकाश पूर्व राज्यपाल नवलकिशोर शर्मा की पसंद माने जाते हैं। उनकी छवि वैचारिक दृढ़ता वाले नेता की है। बीएचयू के छात्र संघ अध्यक्ष रहे मोहन प्रकाश आठवीं विधानसभा में धौलपुर के राजाखेड़ा से लोकदल के विधायक थे। उनके पिता डॉ. मंगल सिंह बाड़ी से कांग्रेस की टिकट पर पहली विधानसभा के सदस्य बने थे। माना जाता है कि जनार्दन द्विवेदी और नवलकिशोर शर्मा जैसे नेताओं ने उनका नाम आगे बढ़ाया है। गिरिजा व्यास उन्हें टक्कर दे रही हैं। उनको लेकर आलाकमान के ध्यान में यह बात भी है कि वरिष्ठ होने के बाद भी उन्हें मनमोहन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली थी। सीपी जोशी को केबिनेट में एडजस्ट करना गिरिजा को ही भारी पड़ा था। ऐसे में आलाकमान जोशी की जगह उनकी ताजपोशी कर सकता है।
मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने से पहले डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को तगड़ा दावेदार माना जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा का गढ़ कही जाने वाली जयपुर सीट से फतह हासिल कर संसद में पहुंचे महेश जोशी का नाम प्रदेशाध्यक्ष के लिए तब से चल रहा है, जबसे डॉ. सीपी जोशी केंद्र में मंत्री बने हैं। वे इसके लिए लॉबिंग भी अच्छे से कर रहे हैं। उन्हें पता है कि आलाकमान उसे ही यह जिम्मेदारी देगा, जो गहलोत और सीपी दोनों की पसंद हो। इसलिए वे एक अरसे से इस तरह की राजनीति कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी खुश रहें और सीपी जोशी भी नाराज न हो। हालांकि जयपुर नगर निगम चुनाव के दौरान उम्मीदवार चयन पर सीपी के साथ उनकी तनातनी हो गई थी, लेकिन राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में उन्होंने सभी गिले-शिकवे दूर कर दिए। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में कई आला नेता उनकी आवाज दस जनपथ तक भी पहुंचा रहे हैं। हालांकि मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने के बाद उनकी पैरवी करने वाले नेताओं की संख्या कम हुई है।
इधर महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा भी अपने दावे पर डटी हुई हैं। उन्हें महिला होने का फायदा मिल रहा है, लेकिन सीपी जोशी से उनका छत्तीस का आंकड़ा भारी पड़ रहा है। सीपी से उनकी प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है। ममता शर्मा ने लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोटा-बंूदी सीट से टिकट मांगा था, लेकिन सीपी जोशी ने उनके खिलाफ लॉबिंग की और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाने वाले इज्येराज सिंह को टिकट दिलवा दिया। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव में बूंदी जिला प्रमुख के लिए ममता शर्मा के खास माने जाने वाले राकेश बोयत को टिकट नहीं दिया। और जब वे बागी ही मैदान में कूद जीतने में सफल रहे तो ममता शर्मा से महिला कांग्रेस की जिम्मेदारी छीन आलाकमान से उनकी शिकायत कर दी। हालांकि दस जनपथ अपने जोरदार रसूखों के दम पर ममता ने इसका करारा जबाव दिया और आलाकमान ने उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए भी ममता शर्मा का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट यही है राजस्थान में गहलोत कैंप और दिल्ली में जर्नादन द्विवेदी कैंप उनकी पैरवी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसी के दम पर उनका राज्यसभा जाना तय हो गया था, लेकिन ऐनवक्त पर आनंद शर्मा के राजस्थान आने से गणित बिगड़ गया। ममता का प्रदेशाध्यक्ष बनना इस पर निर्भर करेगा कि अशोक गहलोत उन्हें कितना सपोर्ट करते हैं।
जहां तक अन्य ब्राह्मण दावेदारों का सवाल है तो वे डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को टक्कर नहीं दे पा रहे हैं। जहां बीडी कल्ला पूर्व में भी अध्यक्ष रह चुके हैं और उम्र भी उनके आड़े आ रही है, वहीं विधायक रघु शर्मा पर खुद का बड़बोलापन भारी पड़ रहा है। गौरतलब है कि रघु एक अरसे से पार्टी और सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयानबाजी कर रहे हैं। यहां तक कि विधानसभा में भी कई मंत्रियों की घेराबंदी कर चुके हैं। पिछले सत्र में तो उन्होंने पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री भरत सिंह को अवसाद का शिकार बता सनसनी फैला दी। हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्राम सेवकों का मामला उठाते हुए उन्होंने कहा कि ‘मंत्री मानसिक अवसाद के शिकार हैं। इनको डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। ग्रामसेवक और सरपंच हड़ताल कर रहे हैं। ग्रामीण विकास की नोडल एजेंसी का काम ठप है। मंत्री ने हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्रामसेवकों सें ज्ञापन तक नहीं लिया। मंत्री को यह तक पता नहीं है कि इनका मांग पत्र क्या है। ये खुद ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बन रहे हैं, लेकिन कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। ईमानदार हैं तो जनता के निर्वाचित राजस्थान के सभी सरपंचों को चोर ठहराने का इनका कोई अधिकार नहीं बनता। आज नरेगा में 500 सरपंचों के खिलाफ एफआईआर करवा दी गई हैं, ऐसे में काम कैसे होगा। सरपंच को 14 फंदों में फांसकर उससे कैसे उम्मीद करते हैं कि नरेगा का काम ठीक तरह से होगा।’ इस तरह की चर्चा है कि सीपी जोशी के इशारे पर रघु शर्मा ऐसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस मुहिम से गहलोत खासे खिन्न हैं। सूत्रों की मानें तो उन्होंने यह तय कर लिया है कि रघु को किसी भी स्थिति में अध्यक्ष नहीं बनने देना हैं। जहां तक गहलोत सरकार में मंत्री बृजकिशोर शर्मा का सवाल है, तो इसके लिए वे खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं।
महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल गैर ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदें धूमिल जरूर हुई हैं, लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं। कई नेताओं अभी भी लॉबिंग में लगे हुए हैं। जाट नेताओं में पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान, सांसद लालचंद कटारिया और नेरंद्र बुड़ानिया का नाम चर्चा में है। इन तीनों नेताओं को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का विश्वासपात्र माना जाता है। पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन कद्दावर नेता हैं। सॉफ्ट जाट के रूप में उनकी स्वीकार्यता सभी गुटों में है। सांसद कटारिया भी प्रदेशाध्यक्ष बनने की कोशिश में हैं। उनका एकमात्र सहारा गहलोत हैं। पिछले दिनों जब पार्टी उपाध्यक्ष डॉ. हरी सिंह ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमला किया तो बचाव में आने वाले प्रमुख जाट नेता थे। गहलोत से नजदीकियों के चलते राज्यसभा सांसद नरेंद्र बुडानिया का नाम भी सुर्खियों में है। यदि जाट अध्यक्ष चुना जाता है तो उनकी दावेदारी प्रबल है। हालांकि किसी जाट को मौका मिलने की संभावना कम ही लग रही है। ठीक इसी तरह से अल्पसंख्यक समुदाय की दावेदारी भी कमजोर पड़ रही है। अश्क अली टांक के राज्यसभा जाने और एस. अहमद के मुख्य सचिव बनने के बाद किसी अल्पसंख्यके प्रदेशाध्यक्ष बनने की संभावना कम ही है। वैसे चिकित्सा मंत्री दुर्रू मियां और अश्क अली टांक इस वर्ग के दावेदारों में शामिल हैं। अनुसूचित जाति व जनजाति कोटे से सांसद रघुवीर मीणा और कार्यकारी अध्यक्ष परस राम मोरदिया का नाम चर्चाओं में है।
राजपूत दावेदारों में भंवर जितेंद्र सिंह का नाम चर्चा में है। वे राहुल के काफी नजदीकी हैं, लेकिन राहुल के संगठन संबंधी जरूरी कामों को संभालने वाले जितेंद्र प्रदेश की राजनीति में शायद ही रुचि लें। वैश्य दावेदारों में पूर्व वित्त मंत्री प्रद्युम्न सिंह और संयम लोढ़ा का नाम लिया जा रहा है। दोनों पहले गहलोत कैंप में थे, लेकिन संयम अब सीपी के साथ हैं। बहरहाल, निर्णय अब सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अहमद पटेल, राजस्थान के प्रभारी मुकुल वासनिक और चुनाव प्रभारी जनार्दन द्विवेदी के हाथों में है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की राय महत्वपूर्ण रहेगी। सीपी जोशी, भंवर जितेंद्र सिंह और सचिन पायलट से भी सलाह मशविरा किया जाएगा। हालांकि कोई चौकाने वाला फैसला तब ही आ सकता है जब राहुल गांधी इस मामले में विशेष रुचि लें। उनके हस्तक्षेप के बाद ही किसी ऐसे नए चेहरे को प्रदेश की कमान दी सकती है, जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं हो।

शनिवार, जून 19, 2010

दो कोड़ी के लेखक और करोड़ों की किताब


कहते हैं किताबों से बेहतर कोई दोस्त नहीं होता, लेकिन जिंदगी को राह दिखाने वाली किताबें जब आधे-अधूरे तथ्यों और कही-सुनी बातों को प्रमाणित करती हुई दिखाई दें, तो यह दोस्ती से दगा नहीं तो और क्या है? ऐसी पुस्तकों को लिखने वाले या तो जानी-मानी हस्तियों की जिंदगी के अंतरंग और निहायत निजी क्षणों को मिर्च-मसाला लगाकर पाठकों को परोसते हैं या धार्मिक मान्यताओं पर कटाक्ष करते हैं।
यदि कोई लेखक पाठकों को सचाई से रूबरू कराने के लिए ऐसा करे, तो वह शाबासी का हकदार है, लेकिन पिछले पांच-छह साल में मुझे तो ऐसी कोई पुस्तक याद नहीं आती, जिसमें लेखक ने इतिहास के अनछुए पक्ष को उजागर किया हो। साफ है, जल्द प्रसिद्ध होने की लालसा रखने वाले लेखक जानबूझकर ऐसे विषयों पर अपनी कलम चलाते हैं, जो विवादित हैं और जो पुस्तक और लेखक को फटाफट हिट करने की की कुव्वत रखते हैं। क्या यह लेखकीय धर्म से धोखा नहीं है? इसी पृष्ठभूमि में इन दिनों जो पुस्तक चर्चाओं में है वह है- जेवियर मोरो की 'एल सारी रोजो'। 2008 में ही स्पेनिश में छप चुकी है। यह पुस्तक सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित है और इसका फे्रंच व डच में भी अनुवाद हो चुका है, लेकिन भारतीयों के एक बड़े वर्ग का इन भाषाओं से खास वास्ता नहीं होने से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। परंतु जैसे ही इसे अंग्रेजी में प्रकाशित करने की तैयारी शुरू हुई कांग्रेसी नेताओं ने बखेड़ा खड़ा कर दिया।
अभिषेक मनु सिंघवी ने तो सार्वजनिक रूप से यहां तक कह दिया कि वे इस पुस्तक को भारत में नहीं छपने देंगे। हो सकता है सिंघवी सोनिया गांधी की नजरों में अपनी साख मजबूत करने के लिए ऐसा कर रहे हों, लेकिन जेवियर मोरो ने भी छोटा अपराध नहीं किया है। माना कि 'एल सारी रोजो' इतिहास की पुस्तक न होकर एक उपन्यास है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे इतिहास की ही मनचाही व्याख्या कर दें। जब उन्हें अपनी कल्पना शक्ति का ही प्रदर्शन करना था, तो सोनिया गांधी को पात्र बनाने की जरूरत क्या थी? वे किसी काल्पनिक पात्र के इर्द-गिर्द ही कथानक बुनते।
हो सकता है सोनिया गांधी के बारे में मोरो ने सच लिखा हो, लेकिन इसके प्रमाण के रूप में वे उनके कुछ गिने-चुने करीबियों के नाम ही बता पाए हैं। जब किसी 'रियल' व्यक्ति को पात्र बनाया जाए, तो लेखक से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वह तथ्यों को भी 'रियल' तरीके से पेश करे। उपन्यास में भी लेखक को तथ्यों से छेड़छाड़ की आजादी नहीं दी जा सकती, लेकिन ऐसा हो रहा है। साहित्यिक विधाओं में ही नहीं विशुद्ध रूप से इतिहास के लेखक भी सुर्खियां बटोरने के लिए तथ्यों को अपने हिसाब से पेश कर रहे हैं। जसवंत सिंह का उदाहरण हमारे सामने है। 'ए कॉल टू ऑनर' में उन्होंने दावा किया था कि कांग्रेस के शासनकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय में विदेशी जासूस रहा करता था, लेकिन पूछे जाने पर वे उसका नाम भी नहीं बता पाए। 'जिन्ना- इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस' में जिन्ना के महिमा मंडन और सरदार पटेल की आलोचना उन्होंने किस आधार पर की, यह उनकी पार्टी भी नहीं समझ पाई। हां, उनकी पुस्तक जरूर धड़ाधड़ बिकी। जहां तक जेवियर मोरो का सवाल है, तो वे परिवार की परंपरा को ही निभा रहे हैं। उनके चाचा डोमिनिक लापियर भारत की आजादी और बंटवारे पर आधारित विवादित पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट' लिखकर ही लोकप्रिय हुए थे। 'एल सारी रोजो' के अंग्रेजी अनुवाद 'द रेड साड़ी' ने छपने से पहले ही धूम मचा दी है। यहां तक कि हिंदी के खांटी पाठक भी अब 'लाल साड़ी' का इंतजार कर रहे हैं।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि नए दौर के लेखक सफल होने के जुनून में इतने उतावले हो गए हैं कि नए तथ्य और पात्र खोजने का उनके पास समय ही नहीं है। यही वजह है विवादित पुस्तकों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है और कालजयी रचनाएं ढूंढने से भी नहीं मिल रही हंै। जरा गौर कीजिए वर्तमान में ऐसे कितने लेखक हैं, जिन्हें उनके कृतित्व के लिए आने वाली पीढिय़ां भी याद करेंगी? जब लेखक का लेखन कार्य से ज्यादा ध्यान खुद की ब्रांडिंग और किताब की मार्केटिंग पर रहेगा, तो वह क्या मौलिक रच पाएगा?

मंगलवार, जून 08, 2010

अब तो संभल जाओ कॉमरेडों


भले ही आज के दौर में किस्से-कहानियां सुनने-सुनाने की परंपरा जीवित नहीं बची हो, लेकिन भेडिय़ा वाली कहानी ज्यादातर लोगों की स्मृति में है। इसमें एक भेड़पालक भेडिय़ा आया...भेडिय़ा आया... कहकर गांव वालों के साथ मसखरी करता, लेकिन एक दिन सचमुच भेडिय़ा आ जाता है और वह मुश्किल में पड़ जाता है। पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। राजनीतिक विश्लेषक प्रत्येक विधानसभा चुनाव से पहले यह कयास लगाते कि इस बार उनका गढ़ ढहने वाला है, लेकिन परिणाम आते और वाम मोर्चा फिर सत्ता में आ जाता। बाकी राजनीतिक दलों के लिए पहेली बन चुकी इस उपलब्धि पर वाम नेता इतराये भी खूब, किंतु आजकल उनकी बोलती बंद है और वजह है ममता बनर्जी। ममता बनर्जी ने पहले पंचायत चुनाव, फिर लोकसभा चुनाव और अब स्थानीय निकाय चुनाव में उन्हें जिस तरह से शिकस्त दी है, उसके बाद यह कहा जाने लगा है कि इस बार सचमुच हार का भेडिय़ा आने वाला है। स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों से जाहिर है कि राज्य की जनता बदलाव के लिए बेचैन है। जब पंचायत चुनावों में वाम मोर्चा की हार हुई थी, तब इसके कुछ नेताओं ने कहा था कि जनता ने गलती की है, लेकिन यह क्षणिक है। अब उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि जनता बार-बार गलती नहीं कर रही है, बल्कि वह यह संकेत दे रही है कि वह वाम शासन से उकता चुकी है। तृणमूल कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि ममता बनर्जी का आत्मविश्वास हवाई नहीं है। अब वे केवल शहरी मध्यवर्ग की लीडर नहीं रह गई हैं, बल्कि किसानों-मजदूरों और राज्य के बुद्धिजीवियों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम के बाद गांव का वंचित तबका भी उनके साथ खड़ा हो गया है।
वाम दलों को पश्चिम बंगाल में स्थापित करने का श्रेय ज्योति बसु को है। उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत में भूमि सुधारों के एजेंडे को लागू कर पश्चिम बंगाल में क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखी। भूमिहीन मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। एक फसली जमीन को बहुफसली बनाया। नतीजतन, एक ऐसा राज्य जो अकाल की मार झेलने के लिए अभिशप्त था, अपने पैरों पर उठ खड़ा हुआ। 1980 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ ही यह दूसरे राज्यों को निर्यात करने लगा, लेकिन यहीं आकर विकास की कहानी ठहर गई। कृषि पैदावार में कुलांचे भर रहा राज्य औद्योगिक विकास में पिछडऩे लगा। इसके लिए भी वामपंथी राजनीति जिम्मेदार थी। आंदोलन की आग से तपकर निकली राजनीति बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई जहां आगे कोई रास्ता ही नहीं है। फिर भी ज्योति बसु ने यह भ्रम बरकरार रखा कि बंगाल तरक्की कर रहा है, लेकिन राजनीति के रंगमंच से उनके हटते ही पर्दे के पीछे की असलियत सामने आने लगी। सर्वहारा की राजनीति करने वाले वामपंथी नेता जब जमीनी हकीकत से कटने लगे, तो इससे पैदा होने वाले शून्य को भरने के लिए किसी राजनीतिक ताकत की जरूरत बढ़ती ही जा रही थी। लंबे समय से वामपंथियों के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी बंगाल की अग्निकन्या ममता बनर्जी उन ताकतों में शीर्ष बनकर उभरीं। उनका साथ दिया माओवादियों और दूसरे गैर-राजनीतिक दलों और संगठनों ने। इन नई ताकतों को वामपंथ से निराश पूर्व वामपंथी लेखकों, कलाकारों और विचारकों का भी खुला समर्थन मिला। मजबूत विकल्प की संभावना देखकर राज्य की जनता ने भी उन पर पूरा भरोसा जताया। ऐसे में राज्य में अगले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों की सत्ता छिन जाए, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।
वाम मोर्चे की पतली हालत का ठीकरा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टïाचार्य के सिर फोड़ा जा रहा है। हो सकता है कि राज्य के औद्योगिक विकास और निवेश के लिए उनकी पहल में कोई खोट न हो, लेकिन उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर के जनाक्रोश का ठोस समाधान खोजने की बजाय विवाद का कुप्रबंधन किया। इससे पार्टी न केवल किसानों में अलोकप्रिय हुई, अपितु शहरी मध्यवर्ग में भी उसकी तीखी आलोचना हुई। वैसे वाम राजनीति आज दोराहे पर खड़ी है, तो उसके लिए ज्योति बसु की राजनीति भी कम कसूरवार नहीं है। साठ के दशक में राज्य में कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले बसु ने रास्ता तो लोकतंत्र का चुना, लेकिन उनके तरीके नक्सलवादियों के थे। उस खूनी दौर के गवाह रहे लोग जानते हैं कि कैसे वामपंथ और नक्सलवाद की जुगलबंदी ने राज्य में कहर बरपाया था। उस उद्वेलनकारी समय के गर्भ से भले ही वामपंथी सत्ता के शिशु ने जन्म लिया, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने बड़े होकर अर्थ से ज्यादा अनर्थ किए। उन्हीं अनर्र्थों का नतीजा हुआ कि बसु के रिटायर होते ही वामपंथी किले की दीवारें ढहने लगीं। इसकी वजह यह थी कि आंदोलन की कोख से निकले वामपंथी आरामतलब हो गए। आम जनता से कटने लगे। जिन दीन-हीन लोगों की आवाज बनकर वे सत्ता के सिंहासन पर पहुंचे थे, उनकी चीख-पुकार को भी अनसुना करने लगे। नतीजतन, जनता से कटा हुआ नेतृत्व अपने पार्टीजनों के बीच भी विवाद का विषय बनने लगा। चूंकि ज्योति बसु राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे, इसलिए इस लड़ाई को उन्होंने सार्वजनिक नहीं होने दिया, लेकिन बुद्धदेव भट्टïाचार्य ऐसा नहीं कर पाए। वे हाथ-पांव तो खूब मार रहे हैं, लेकिन पार्टी की अंदरूनी खींचतान ने उन्हें निढाल कर रखा है।
इसे वाम मोर्चे की भयंकर राजनीतिक भूल ही माना जाएगा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का डटकर मुकाबला करने की बजाय उसके नेता केंद्र में यूपीए सरकार को मुसीबत में डालने में मशगूल रहे। भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील के सवाल पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी और कांग्रेस को सबक सिखाने के इरादे के साथ की गई तीसरे मोर्चे की स्थापना की भूमिका सबसे अहम रही। सबसे बुरी बात यह हुई कि आम लोगों ने सीपीएम के नेतृत्व में रची गई इस रणनीति को जनपक्षी मूल्यों में दृढ़ निष्ठा की मिसाल की तरह लेने के बजाय अवसरवाद और सिद्धांतप्रियता के अजब घालमेल की तरह लिया। 2004 के आम चुनाव में सीपीएम ने इराक पर अमेरिकी हमले को केरल और बंगाल में बाकायदा चुनावी मुद्दा बनाया था और इसके आधार पर भारत के साम्राज्यवाद विरोधी जनमत के अलावा मुस्लिम वोटों की भी भरपूर फसल काटी थी। अपनी इस मुहिम को खींचकर उसके नेता 2005 में न्यूक्लियर डील के लिए की गई जॉर्ज डब्ल्यु. बुश की भारत यात्रा तक ले गए और समर्थन वापसी के बाद इसका विस्तार पिछले साल हुए आम चुनाव तक करने की उन्हें पूरी उम्मीद थी, लेकिन चुनाव नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में एक वोट बैंक के रूप में वाम मोर्चे को सबसे बड़ा झटका मुसलमानों की तरफ से ही लगा है। इस उलटबांसी को समझना वाम नेताओं के लिए बहुत आसान नहीं है, लेकिन इसे समझे बगैर उनका गुजारा भी नहीं हो सकता। यूपीए सरकार में रहते हुए वाम दलों ने गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तबकों की पैरवी करने का खूब दिखावा किया, लेकिन चुनाव में इसका रत्ती भर भी लाभ उन्हें नहीं मिला, तो इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं। वे जिन मुद्दों पर केंद्र की यूपीए सरकार का विरोध कर रहे थे बुद्धदेव उन्हीं नीतियों का अनुसरण कर रहे थे।
वाम मोर्चा यह भी उम्मीद नहीं कर सकता कि भविष्य में सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनके पास अब न तो मुद्दे बचे हैं और न ही ममता बनर्जी के मुकाबले का कोई जनप्रिय नेता। ममता बनर्जी आज उन्हीं मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही हैं, जिन पर किसी जमाने में वामपंथियों का एकाधिकार हुआ करता था। उन्होंने बड़ी चतुराई से बुद्धदेव भट्टïाचार्य के औद्योगिक विकास के एजेंडे को किसान और मजदूर विरोधी करार दे दिया। भट्टïाचार्य ने किसानों को समझाने की बजाय उद्योगों के लिए उनकी जमीन अधिग्रहण के धड़ाधड़ फरमान जारी कर दिए। विरोध में सिंगूर और नंदीग्राम उबल पड़े और जमकर खून-खराबा हुआ। इस दौरान ममता बनर्जी ने यह सफलतापूर्वक प्रचारित किया कि इस अत्याचार से उन्हें वे ही बचा सकती हैं। लिहाजा जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। इससे हुआ यह कि बरसों से वाम दलों को वोट देते आए लोग उनके नेतृत्व पर भरोसा जाहिर करने लगे। इसी वोट बैंक के दम पर ही तो वाम दल बरसों से सत्ता में बने हुए थे। पंचायत, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम यह साबित करते हैं कि वाम दलों के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। वाम नेताओं को परेशानी यह है कि उन्हें इस वोट बैंक को फिर से समेटने का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है। ज्योति बसु के देहावसान के बाद ऐसा कोई नेता भी नजर आता, जो अपने दम पर जनाधार बढ़ा सके। वाम नेताओं की जिस पीढ़ी ने गरीबों की झोपडिय़ों में रह कर राजनीति का ककहरा सीखा था, वह अब या तो विदा हो चुकी है या नेपथ्य में है। शायद इसी का दुष्परिणाम है कि जिस अनुशासन के लिए वाम दलों को जाना जाता था, अब वह तार-तार होने लगा है। कुल मिलाकर देश की वाम राजनीति जाने-अनजाने कई व्याधियों से घिर चुकी है और फिलहाल यह संभावना भी कम ही है कि वह इनसे जल्द उबर पाएगी।

बुधवार, मार्च 17, 2010

जुबान संभालिए मौलाना साब...


मौलाना कल्बे जव्वाद का यह कहना कि खुदा ने महिलाओं को अच्छे नस्ल के बच्चे पैदा करने के लिए बनाया है, यदि वे घर छोड़कर राजनीति में आ जाएंगी तो घर कौन संभालेगा, महिला विरोधी तो है ही, इस्लाम की गलत व्याख्या करने का दुस्साहस भी है। ऐसा आए दिन होता है, जब इस्लामिक धर्मग्रंथों का हवाला देकर महिलाओं के लिए कई कार्य वर्जित बताए जाते हैं। उन्हें पुरुषों के मुकाबले समाज में कम अधिकार दिए जाने को सही ठहराया जाता है। इसकी सबसे अहम वजह मौलवियों द्वारा इस्लाम में औरतों के अधिकारों और प्रतिष्ठा को गलत तरीके से वर्णित करना है। ये उलेमा ऐसा अपने रूढि़वादी नजरिए के कारण करते हैं, वे इस्लाम के संदर्भ में हेरफेर करके शिक्षा, पर्दा, शादी, तलाक और औरतों के कामकाज के बारे में गलत विचार पेश करते हैं। इस्लाम में ऐसा उल्लेख कहीं नहीं है कि औरतों को फलां काम करना चाहिए और फलां नहीं। मिसाल के तौर पर कुरान के संदर्भ को ही लें। कुरान का पहला शब्द है 'इकराÓ जिसका अर्थ है 'पढ़ोÓ। इसमें यह कहीं नहीं कहा गया है कि पुरुष ही पढं़े, औरतें नहीं। इस्लाम में यह बात हर जगह जोर देकर कही गई है कि महिलाओं की पढ़ाई भी पुरुषों की तरह ही जरूरी है। ऐसे कई और भी उदाहरण हैं, जो साबित करते हैं कि मौलाना-मौलवी धर्म को किनारे रख कोरी लफ्फाजी करते हैं। हैरत की बात यह है कि मौलवी-उलेमा इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों से अच्छी तरह वाकिफ हो सकते हैं, लेकिन वे उन्हें नजरअंदाज करते हैं। वे महिलाओं के कर्तव्यों की चर्चा तो हमेशा करते हैं, लेकिन उनके अधिकारों या सुविधाओं का जिक्र नहीं करते। इतिहास में कई जगह उल्लेख है कि मुस्लिम महिलाओं ने उन सब कार्र्यों को अंजाम दिया है, जो पुरुष किया करते थे। यहां तक कि वे युद्ध के दौरान फौजों के साथ रहती थीं और घायलों की सेवा करती थीं। कई औरतें व्यापार के लिए दूसरे शहरों की यात्रा तक करती थीं। इस्लाम का उद्देश्य साफ है कि औरतें अपने काम के लिए घर से बाहर जा सकती हैं, किंतु उस सीमा तक कि ऐसा करने से उनकी मर्यादा, जिंदगी और परिवार पर कोई विपरीत असर न पड़ता हो। औरतों के लिए इस्लाम की भूमिका एक अभिभावक की तरह है। इस्लाम धर्म को मानने का यह आशय कदापि नहीं है कि औरतों को दयनीय अवस्था में रखा जाए। जरा सोचें कि वे मौलवी कभी भी उन विवाहित मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं के बारे में चर्चा क्यों नहीं करते, जिनके पति खाड़ी और अरब देशों में कई साल तक अपनी पत्नी को घर पर अकेला छोड़कर नौकरी कर रहे हैं, जबकि इस्लाम यह छूट नहीं देता कि कोई भी पति चार महीने से अधिक अपनी पत्नी से अलग रहे। आखिर क्यों इस्लाम के तथाकथित ठेकेदार सिर्फ औरतों के कर्तव्यों की ही बातें करते हैं? वे महिलाओं के अधिकारों और इस्लाम के उन तोहफों पर रोशनी नहीं डालते, जो औरतों की बेहतरी के लिए उन्हें दिए गए हैं। वक्त आ गया है कि इस्लाम की नुमाइंदगी करने वाले इस पर गंभीरता से विचार करें। मौलाना-मौलवी बेतुके बयान और फतवे जारी करने की बजाय इस पर ज्यादा जोर दें कि महिलाओं के कल्याण के लिए क्या किया जा सकता है। यदि उन्होंने वक्त रहते ऐसा नहीं किया तो समाज में उनका ही आदर कम होगा। रही बात महिलाओं की, तो उनका हर क्षेत्र में आगे बढऩा तय है, राजनीति भी इसमें शामिल है।

गडकरी गुड करी


भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष नितिन गडकरी ने अपनी नई टीम में अपेक्षा के अनुरूप युवाओं, महिलाओं और नए चेहरों को अधिक तवज्जो दी है। हालांकि कुछ नामों को देखकर लगता है कि उन्हें मजबूरी में शामिल किया गया है, फिर भी गडकरी बिना काम किए दाएं-बाएं बने रहकर पार्टी की छवि बिगाडऩे वालों से परहेज करते हुए दिखाई दिए हैं। यह तो समय ही बताएगा कि इस नई टीम के साथ गडकरी जैसा प्रदर्शन करना चाह रहे हैं, वैसा कर पाते हैं या नहीं, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के पार्टी की व्याधियों को दुरुस्त करने की ठानी है। यह किसी से नहीं छिपा है कि भाजपा में राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व में मतभेद मनभेद में बदल गए हैं और ऐसी ही स्थिति अनेक राज्यों में भी है। यद्यपि फिलहाल शांति नजर आ रही है, लेकिन यह कहना कठिन है कि पार्टी के नेता गिले-शिकवे दूर कर गडकरी के नेतृत्व में एकजुट हो गए हैं। भाजपा की समस्याएं इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि एक तो वह औरों से अलग दल की अपनी छवि खो चुकी है और दूसरे उसके पास ऐसे मुद्दों का अभाव है, जो कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार कर सकें। भाजपा अपने जिन मुद्दों के लिए जानी जाती थी, वे अब उसकी नैया पार नहीं लगा सकते, क्योंकि एक तो उसने ही उन्हें मझधार में छोड़ा और दूसरे अब आम जनमानस की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। इसके बावजूद भाजपा अपनी खोई हुई शक्ति इसलिए फिर से प्राप्त कर सकती है, क्योंकि राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस के विकल्प की आवश्यकता महसूस की जा रही है। नितिन गडकरी ने अपनी नई टीम तो बना ली है, लेकिन यह परिणाम तब ही देगी जब यह सुधार और बदलाव की योजना पर एकजुट होकर, ईमानदारी से अमल करे। यह किसी से छिपा नहीं है कि गुटबाजी भाजपा पर किस कदर हावी हो चुकी है। अन्यथा आज भी लोकसभा में १५० से अधिक सांसदों वाली मुख्य विपक्षी पार्टी के प्रति निराशा का वैसा भाव नहीं होता, जैसा पिछले कुछ अरसे से देखने को मिल रहा है। गडकरी सही कहते हैं कि कार्यकर्ताओं की पहचान बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने से नहीं, गांव-गांव घूमने से होगी। यह तब ही संभव है, जब परिक्रमा के पराक्रम से प्रतिष्ठापित होने की परंपरा को समाप्त किया जाए। गुटबाजी समाप्त करने के अलावा फिलहाल राजनीतिक स्तर पर भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बिहार से है, जहां इस वर्ष चुनाव होने हैं। दूसरी चुनौती उत्तर प्रदेश है, जहां से लोकसभा के लिए 80 सदस्य चुने जाते हैं। इस राज्य में पार्टी पहले ही खिसककर चौथे स्थान पर पहुंच गई है। व्यक्तियों के लिए पदों का सृजन करने के बजाय पदों पर व्यक्तियों के चयन का जैसा स्वरूप उभरेगा, गडकरी भाजपा को उसका खोया हुआ स्थान दिलाने में उतने ही सफल रहेंगे। पिछले दिनों लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि राजनीतिक लोगों के बारे में आम धारणा है कि वे बेईमान हैं। नई परिस्थितियों में भाजपा के सामने इस माहौल को बदलने की भी चुनौती है। इस चुनौती से आचरण की शुचिता और जनहित की प्राथमिकता के बल पर ही निपटा जा सकता है। अपने अनुकरणीय कार्य-व्यवहार से ही भाजपा जन समर्थन हासिल कर सकती है। बेहतर होगा कि नितिन गडकरी के नेतृत्व में भाजपा की नई टीम यह प्रदर्शित करे कि वह अपनी राजनीति के जरिये समाज को दिशा देने और उसका उत्थान करने के लिए समर्पित है।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

अभी दूर है दिल्ली


संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में मंगलवार को इतिहास बना भी और घटा भी। आधी आबादी को संवैधानिक हक देने के लिए सिर्फ संख्याबल के साथ-साथ बाहुबल की भी जरूरत पड़ेगी, इसकी उम्मीद जरा कम थी। जो भी हो सदन से सात सांसदों के निलंबन, मार्शलों के जरिए माननीयों का निष्कासन और अभूतपूर्व हंगामे के बाद अंतत: राज्यसभा में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला 108वां संविधान संशोधन विधेयक पारित हो ही गया। इससे महिलाओं के राजनीतिक हक की शुरुआत भले ही हो गई हो, लेकिन असल में उनके लिए दिल्ली अभी बहुत दूर है। राज्यसभा में तमाम लानत-मलानत के बाद मंजूर हुए महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। साथ ही कम से कम 14 विधानसभाओं की पथरीली गलियों को भी पार करना होगा। एक-दूसरे से आगे निकलने और श्रेय लेने की होड़ में महिला आरक्षण विधेयक पर बेमन से ही सही, कांग्रेस, भाजपा और वामपंथियों ने जिस तरह से हाथ मिलाया है, उससे संख्याबल के लिहाज से लोकसभा में भी विधेयक का पारित होना आसान दिख रहा है, लेकिन वास्तव में राह बेहद मुश्किल है। मुलायम, लालू और शरद यादव के बाद ममता बनर्जी की पार्टी के सदस्यों का भी राज्यसभा से अनुपस्थित रहना इसका खुला संकेत है। सरकार को लोकसभा में नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। राज्यसभा में पटकनी खाने के बाद मुलायम सिंह यादव और लालू यादव जिस तरह से क्षेत्रीय दलों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं, उससे कयास लगाया जा रहा है कि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी है। जाहिर तौर पर यह सरकार के लिए यह बड़ी असहज और चुनौतीपूर्ण स्थिति हो सकती है। ध्यान रहे कि महिला बिल पर कांग्रेस के रुख से उसके कुछ सहयोगी भी खुश नहीं हैं। ममता ने तो अपनी असहमति छिपाई भी नहीं। ऐसे ही तमाम छोटे दल हैं, जिनमें आसमान छूती महंगाई पर सरकार के अनमने रुख से गुस्सा बढ़ रहा है। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव सरकार के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। लालू, मुलायम और शरद जैसे विरोधियों को लगता है कि सरकार इसके बाद उन्हें अनसुना करने में असमर्थ होगी। सरकार से समर्थन वापसी की धमकी देकर मुलायम और लालू ने सोमवार को तो सरकार को रोक लिया था, लेकिन मंगलवार तक उसका असर खत्म हो गया। राज्यसभा में सख्ती के सहारे सरकार ने विधेयक पारित करवा लिया। यादव तिकड़ी नहीं चाहते कि लोकसभा में भी इसी तरह की चरम स्थिति पैदा हो। अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सरकार को यही संकेत देने की कोशिश होगी। मान लीजिए किसी तरह से लोकसभा में भी विधेयक पारित हो जाता है, तो फिर इसे विधानसभाओं की ड्योढ़ी लांघनी होगी। ध्यान रहे कि कुल 50 फीसदी विधानसभाओं को इस विधेयक पर मुहर लगानी होगी। क्षेत्रीय क्षत्रपों के अब तक के तेवरों को देखते हुए यह आसान कतई नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहेगा कि महिला आरक्षण विधेयक की कीमत सियासी नुकसान के रूप में चुकानी पड़े। बंगाल में ममता तो बिहार में नीतीश और उत्तर प्रदेश में मायावती महिला आरक्षण पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त लेने में कोई हिचक दिखाने वाले नहीं हैं। ममता ने राज्यसभा में अध्यादेश के समर्थन से कन्नी काटने, तो नीतीश ने अपनी पार्टी की टूट के जोखिम पर भी इसके पक्ष में खड़े होने के और क्या निहितार्थ हैं? वहीं मायावती ने विरोध का तरीका ऐसा निकाला, जिससे वह सपा के साथ खड़ी कतई न दिखाई पड़े। उनकी पार्टी ने विरोध तो किया, लेकिन सपा के रुख के विपरीत विधेयक पर चर्चा में भाग लेकर अपने तर्क रखते हुए। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के कब्जे से मुस्लिम वोट बैंक खींचने का ममता को यह अच्छा मौका नजर आया। तब ही तो तृणमूल के दो सांसदों ने अंतिम क्षणों में मुस्लिम समुदाय का अलग कोटा मांगकर राज्यसभा में विधेयक पर वोटिंग से गैरहाजिर हो गए। निश्चित रूप से बिल को बिना बहस पारित कराने पर माकपा की मुहर के बाद ही ममता ने यह राजनीतिक दांव खेला। जहां ममता ने चुनाव से पहले बंगाल विधानसभा में महिला विधेयक पर वाममोर्चा सरकार को असहज करने के लिए आधार तैयार कर लिया, वहीं बिहार में सवर्ण वोट बैंक को खिसकने से बचाने के लिए नीतीश कुमार को भी चुनावी साल में यह विधेयक प्रभावी राजनीतिक अस्त्र समझ में आया। पंचायत में आरक्षण के जरिए पिछड़े वर्ग को पहले ही मोहपाश में बांध चुके बिहार के मुखिया सवर्णों की नाखुशी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। राजद की राजनीति को पिछड़ों और अगड़ों दोनों के बीच निष्प्रभावी बनाने के लिए विधेयक के समर्थन का रास्ता ही नीतीश को भाया। इस विधेयक को कानून बनने में सियासी उलझनों के अलावा प्रक्रियागत उलझने भी कम पेचीदा नहीं हैं। लोकसभा की मंजूरी के बाद इसे राष्ट्रपति के पास अधिसूचना के लिए भेजा जायेगा। फिर इस सरकारी गजट को विधानसभाओं की मंजूरी जरूरी होगी। ध्यान रहे देश में कुल 28 विधानसभाएं हैं, जिनमें से कम से कम 14 में इस विधेयक को दो तिहाई बहुमत से मंजूरी मिलनी जरूरी है। यहां से मंजूरी मिलने के बाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली इसके लिए एक अलग कानून बनाने की वकालत कर रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक में तीन बड़े प्रावधान किये गये हैं। विधेयक में संसद समेत राज्य विधानसभाओं की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का प्रावधान 15 सालों के लिए होगा। चुनाव क्षेत्रों को रोटेशन प्रणाली के आधार पर आरक्षित किया जायेगा। चुनाव में पहले से ही अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को मिल रहे आरक्षण कोटे में उसी जाति की महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान किया जाएगा। यहां सवाल यह है कि देश की राजनीति इस अहम बदलाव से किस रूप में प्रभावित होगी। यदि संसद के स्तर पर ही बात करें तो, महिला आरक्षण के अमल के आने के बाद देश की सबसे बड़ी पंचायत की लगभग आधी सीटें आरक्षित हो जाएंगी। अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए पहले से 131 सीटें आरक्षित हैं। दो सीटें एंग्लो इंडियन समुदाय के सदस्यों के नामांकन के जरिए भरी जाती हैं। इस तरह 545 के सदन में नामांकन से भरी जाने वाली दो सीटें हटाने के बाद 181 सीटें महिलाओं (अनुसूचित जाति-जनजाति समेत) के लिए आरक्षित होंगी। तब अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए 87 सीटें आरक्षित रह जाएंगी। इस तरह कुल 268 सीटें आरक्षित होंगी और 275 अनारक्षित होंगी। इससे भी ज्यादा एक और महत्वपूर्ण पहलू है- रोटेशन प्रणाली। यह निश्चित रूप से सांसदों को उनके दायित्व व निष्ठा के प्रति उदासीन भी करेगी। इस रोटेशन प्रणाली के तहत 362 सांसदों को हमेशा मालूम होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें अपने पुराने लोकसभा क्षेत्र से लडऩे का मौका नहीं मिलेगा। दरअसल रोटेशन प्रणाली लागू होने के बाद 181 महिला सांसदों का चुनाव क्षेत्र बदलेगा, तो दूसरे 181 सदस्य अपने आप प्रभावित होंगे। जाहिर तौर पर कुछ ही कद्दावर नेता ऐसे होंगे, जिन्हें दूसरे लोकसभा क्षेत्र से भी चुनाव लडऩे में बहुत दिक्कत नहीं आएगी। एक तरह से देखें तो एक पारी के बाद सांसदों का राजनीतिक भविष्य अधर में होगा। सबसे बड़ा खतरा यह है कि सांसदों को पता होगा कि पांच साल उन्हें कोई छूने वाला नहीं और अगले चुनाव में उन्हें टिकट मिलने वाला नहीं। ऐसे में वे अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति कितनी प्रतिबद्धता दिखाएंगे और उसके विकास में कितनी रुचि लेंगे, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। हालांकि इन तर्कों को आधार बनाकर राजनीति में महिला आरक्षण को नकारा नहीं जा सकता। आरक्षण निश्चित रूप से मिले, लेकिन यह ध्यान रहे कि इससे महिलाओं की स्थिति और लोकतंत्र दोनों मजबूत हो, कमजोर नहीं।

गुरुवार, फ़रवरी 25, 2010

सचिन तुझे सलाम...


रिकॉर्ड्स सचिन तेंदुलकर का परछाई की तरह पीछा करते हैं। ढेरों शतक, रनों का अंबार, बेहतरीन स्ट्राइक रेट और अब वन डे क्रिकेट के इतिहास में पहला दोहरा शतक! इन्हें देखकर आंख का अंधा भी कह सकता है कि सचिन जब तक खेलेंगे, कोई न कोई नया रिकॉर्ड उनके नाम के साथ जुड़ता रहेगा। दुनिया का कोई भी आलोचक 147 गेंदों पर तीने छक्कों और 25 चौकों से सजी 200 रन की उनकी ऐतिहासिक पारी में ऐसा नुक्स नहीं निकाल सकता जिससे कहा जा सके कि काश, सचिन ने कीर्तिमान बनाने की जगह टीम को जीत दिलाने की चिंता की होती।
निश्चय ही क्रिकेट के हर पैमाने पर सचिन का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ सचिन से ही है। पिछले कुछ सालों में टीम इंडिया को, खासकर छोटे संस्करणों वाली क्रिकेट के कुछ चमकदार खिलाड़ी मिले हैं, लेकिन सचिन के कद के सामने ये सब बौने ही दिखाई देते हैं। भारतीय टीम ही नहीं, पूरी दुनिया की टीमों में सचिन सा खिलाड़ी नहीं है। मैच विनर होने के लिए किसी भी खिलाड़ी में जो धैर्य, संतुलन और चुनौती झेलने का जज्बा होना चाहिए, वह सचिन में कूट-कूट कर भरा है। यह बिल्कुल संभव है कि किसी शहर-कस्बे की अनजान गली में खिड़कियों के शीशे चटकाते कई होनहारों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सचिन जैसा बनने के लिए प्रतिभा ही नहीं लगन और मेहनत भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बिताए उनके 20 सालों का अरसा देखें, तो सचिन तेंदुलकर एक क्रिकेटर की उम्र के लिहाज से आखिरी दौर में कहे जा सकते हैं, लेकिन उनके सतत प्रदर्शन से लगता है कि वे असल में सड़क की वैसी ढलान पर हैं, जहां स्पीड और तेज हो जाती है। अब कोई दूसरा बल्लेबाज उनके रिकॉर्ड्स के आसपास भी नहीं लगता, ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग टेस्ट में शतकों के साथ उनसे होड़ में हैं, लेकिन अब उनसे शतकों की ज्यादा उम्मीद नहीं बची है। अलबत्ता सचिन के प्रदर्शन से लगने लगा है कि वे अगले कई और साल क्रिकेट खेल सकते हैं, लिहाजा अब कुछ लोग उनमें वन डे और टेस्ट में शतकों का शतक लगाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।
शानदार प्रदर्शन के बावजूद अलग-अलग मौकों और मुद्दों को लेकर सचिन की तरफ काफी अंगुलियां भी उठ चुकी हैं। ग्रेग चैपल ने काफी पहले कहा था कि सचिन अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुके हैं और उनमें वापसी की ज्यादा संभावना नहीं बची है, लेकिन सचिन ने हमेशा की तरह हर आलोचना का जवाब अपने बल्ले से दिया है। यह सचिन का खुद पर भरोसा ही है कि उन्होंने कभी भी क्रिकेट से विदाई का संकेत नहीं दिया। यह जरूर कहा कि आलोचक उनके बारे में कई फैसले खुद कर रहे हैं और शायद वे उनका खेल देखने का धीरज नहीं रख पा रहे हैं। 1999 के बाद एक लंबा दौर ऐसा अवश्य रहा, जब सचिन को लगातार टेनिस एल्बो और पीठ की मांसपेशियों के खिंचाव जैसी परेशानियों के कारण मैदान से दूर रहना पड़ा। इसी बीच टीम को युवा बनाने की जरूरत पर जोर देने और बढ़ी उम्र के खिलाडिय़ों से छुटकारा पाने की बात भी उठी। लेकिन आज भी जैसा प्रदर्शन सचिन कर रहे हैं, उसमें उनकी जगह पर नए खिलाड़ी के बारे में सोच पाना थोड़ा कठिन हो जाता है। तेंदुलकर सिर्फ इसलिए महान नहीं माने जाते कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हजारों रन बनाए और दजर्नों विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अनेक मील के पत्थर स्थापित किए हैं। वह महान हैं, क्योंकि उनके अंदर बचपन से ही सर्वश्रेष्ठ बनने की चाह रही है और इसके लिए वह किसी भी चुनौती से भागे नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। क्रिकेट के प्रति खुद को पूरी तरह से समर्पित रखा। पिता रमेश तेंदुलकर महान संगीतकार और गायक सचिन देव बर्मन के मुरीद थे, इसलिए उन्होंने अपने छोटे बेटे का नाम सचिन रखा था। शायद उन्होंने सोचा होगा कि उनका सचिन भी बड़ा होकर संगीत की दुनिया में नाम कमाएगा, लेकिन जब सचिन की क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखी तो बेटे को खूब प्रोत्साहित किया। सचिन ने उन्हें हमेशा उम्मीद से ज्यादा ही दिया।
सचिन इसीलिए भी महान हैं कि वे खुद को नहीं बल्कि क्रिकेट के खेल को महान मानते हैं। अपने स्कूली क्रिकेट खेलने के दिनों से आज तक क्रिकेट के प्रति समर्पण, अनुशासन और जुनून को उन्होंने कम नहीं होने दिया है। वे जीतना चाहते हैं और इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं। हारना तो वह अपने बेटे के साथ खेलते हुए भी पसंद नहीं करते। वे टीम भावना में विश्वास रखते हैं और आलोचना पर घबराते नहीं, बल्कि उनके इरादे और दृढ़ हो जाते हैं।

रविवार, फ़रवरी 07, 2010

मैं मुंबई हूं...


मैं मुंबई हूं। मैं पहले एक टापू थी। मुंबादेवी के नाम से मेरा नाम मुंबई पड़ा। पहले मेरी पहचान मछुआरों के गांव से अधिक कुछ नहीं थी। 'कोली' समाज के लोग तब यहां रहा करते थे। तांदले, नाखवा, भोईर, भांजी, सांधे, कलसे वगैरह सब कोली समाज के ही लोग हैं। मछली पकडऩा, समुद्र की पूजा करना और भाईचारे से रहना इन सबका धर्म है। वक्त बदला तो इन लोगों ने नमक के खेत छोड़ सारी जमीन बेच दी। ईरानी, पारसी, गुजराती, मारवाड़ी और उत्तर प्रदेश व बिहार से आए लोगों ने ये जमीनें खरीदीं और यहां मिलें बनवार्ईं, कल-कारखाने शुरू किए, अखबार निकाले, प्याऊ, मंदिर, स्कूल, अस्पताल, धर्मशालाएं और गैराज आदि बनवाए। गोवानीज, पुर्तगाली और ईसाइयों के चर्च यहां पहले से ही थे। अंग्रेजों ने रेल चलाई तो इसका संचालन करने वाले ज्यादातर लोग उत्तर व दक्षिण भारतीय लोग थे। पोर्ट ट्रस्ट में भी वे सेवा में थे। मुसलमान भी थे। तब मकान के मकान खाली पड़े रहते। मकान मालिक लोगों को पकड़-पकड़कर अपना मकान लेने के लिए बुलाते। बाकी जो जमीनें बची थीं वे लीज यानी पट्टे पर थीं। ट्रामें चलती थीं। तब उत्तर भारतीय दूध का कारोबार करते थे। कच्छी-गुजराती भी दूध व होटल के कारोबार में थे। पारसी और ईरानी केक और पेस्ट्री के साथ पाव का कारोबार करते थे। मस्का मार के ईरानी चाय बहुत चलती थी। एक पाव में लोगों का पेट भर जाता था। मिलों में तीन-तीन पालियां (पारी) चलती थीं। जो बेरोजगार थे, वे किसी के नागा करने पर, बदली कामगार का काम करते थे। दोपहर में फुटपाथ पर सिले हुए कपड़े, हरी सब्जियां-फल आदि का धंधा करते। अलग-अलग क्षेत्र, भाषा और संस्कृति के लोग मजे से रहते थे। पहले खानावल चलते थे। बना बनाया भोजन घर-घर मिलता। डिब्बेवाले उसी परंपरा से निकले हैं। वे दफ्तर में डिब्बा पहुंचाते और वापस ले आते। सुबह ग्यारह बजे के बाद लोकल गाड़ी के मालडिब्बे उनके डिब्बों से भर जाते। जब शाम को रेलवे के कारखाने छूटते और दोपहर में मिलें, तो आम जनता का अथाह समुद्र सड़कों पर गहरा जाता। एक-दो घंटे में ही सारी सब्जी बिक जाती। यहां के गरीब लोग चौका-बर्तन का काम करते। उनके जैसा मेहनती कोई दूसरा नहीं है। घर चमके या न चमके, बर्तन दप-दप चमकते। चाहें तो अपना मुंह देख लें। शॉर्टहैंड और टाइपिंग के साथ-साथ नर्स के कामों की वजह से दक्षिण के लोग यहां आते गए। कुछ तो केंद्र सरकार की नौकरियों में प्रमोशन और तबादले की वजह से आए। पूरी दुनिया कहने लगी कि मुंबई जैसा कोई दूसरा कॉस्मोपोलिटन शहर नहीं है। देश के नामी-गिरामी धनपतियों, फिल्मी सितारों, खिलाडिय़ों और राजनेताओं ने मेरी शान बढ़ाई। मेरे यहां की बसें, लोकल ट्रेनें, मस्का-पाव- सभी चीजें तो बेमिसाल हैं, बदल गए या यूं कहूं बहक गए हैं, तो वे लोग जो मेरे स्वयंभूं ठेकेदार बन बैठे हैं। कहते हैं- मैं केवल मराठियों की हूं। कहने वालों की याददाश्त शायद कमजोर हो गई है, क्योंकि वे तो एक समय मध्य प्रदेश से मेरी शरण में आए थे। वे एक आदिम नारे- जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ कर रहे हैं, लेकिन ऐ दुनिया वालो! भैंस और एक जीते-जागते शहर में बड़ा फर्क होता है। कोई है, जो मेरे इस दर्द को समझेगा?

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

'अमर कथा' का अंत


समाजवादी पार्टी से अमर सिंह और उनके समर्थकों की बर्खास्तगी आश्चर्यचकित करने वाली नहीं है, क्योंकि पार्टी में उनकी खिलाफत करने वालों की बढ़ती फेहरिस्त और मुलायम सिंह की 'चुप्पी' से इसके संकेत पहले ही मिल गए थे। पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने जिस तरह से मायावती और सोनिया गांधी की तारीफ की, उसी से साफ हो गया था कि न तो अमर सिंह समाजवादी पार्टी का हिस्सा बने रहना चाहते हैं और न ही मुलायम सिंह की उनमें कोई दिलचस्पी बची है। राजनीति को संभावनाओं का खेल बताने वाले अमर सिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 14 साल तक एक पार्टी की 'सेवा' करने के बाद उन्हें अनुशासनहीनता का आरोप लगा रुखसत किया जाएगा और उम्र के इस पड़ाव में सियासी ठिकाना तलाशना पड़ेगा। 'अमर कथा' के अंत से दो सवाल बेहद मौजूं हो गए हैं- एक तो अमर सिंह किसके पहलू में अपनी राजनीति को आगे बढ़ाएंगे और दूसरा अपने पारिवारिक सदस्यों की महत्वाकांक्षाओं में उलझे मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी को किस दिशा में ले जाएंगे? अमर सिंह भले ही जनाधार वाले नेता कभी भी न रहे हों, लेकिन वर्तमान में देश की राजनीति जिस संक्रमण के दौर से गुजर रही है, उसमें उन जैसे नेताओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, यह किसी से छिपा नहीं है। चाहे महंगे होते चुनावों के लिए धन जुटाना हो या बहुमत लायक सीटों का इंतजाम करना, अमर सिंह इनमें उस्ताद रहे हैं। मुलायम सिंह को दूसरा अमर सिंह ढूंढने के लिए तो खासी मशक्कत करनी पड़ेगी ही, यह भी डर सताता रहेगा कि उनके 'हमराज' किसी दूसरी पार्टी में जाने पर मोर्चा न खोल दें। यह सही है कि मुलायम सिंह यादव एक जुझारू राजनेता हैं और उन्होंने यह साबित किया है कि कोई व्यक्ति कैसे अपने बलबूते सशक्त राजनीतिक दल खड़ा कर सकता है, लेकिन अब उन्हें इस पर विचार करना ही होगा कि समय के साथ उनके विश्वासपात्र सहयोगी एक-एक कर अलग क्यों होते जा रहे हैं? मौजूदा स्थितियों में सपा के समक्ष संकट इसलिए और अधिक गहरा नजर आता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस न केवल उसके जनाधार में सेंध लगाने के लिए तत्पर है, बल्कि इसके लिए कोई मौका भी नहीं छोड़ रही है। बहुत समय नहीं हुआ जब क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में सपा सबसे सशक्त नजर आती थी और संख्या बल के हिसाब से तो वह अभी भी कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उसके लिए यह चिंता का विषय बनना चाहिए कि वह अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में अपनी धार खोती जा रही है। अमर सिंह के निष्कासन के बाद सपा का वह खेमा तो शांत हो जाएगा, जो उन पर परंपरागत वोट बैंक को छिटकाने और पार्टी को अपनी बुनियादी जमीन से भटकाने सरीखे आरोप लगा रहा था, लेकिन इतने भर से पार्टी संकट से नहीं उबर जाएगी। वंशवाद के समक्ष घुटने टेकना मुलायम के लिए भविष्य में भारी पड़ सकता है। मुलायम को यह ध्यान रखना होगा कि एक समय परिवारवाद की राजनीति का मुखर विरोध करने वाली सपा अब वंशवाद की राजनीति का एक उदाहरण बन गई है और ऐसी पार्टियों के लिए जनाधार को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अमर सिंह के साथ चलने के आदी हो चुके मुलायम इससे कैसे निपटते हैं, उनका और समाजवादी पार्टी का भविष्य इसी से तय होना है।