शनिवार, मई 16, 2009

फिर चला जादू


सूबे में गहलोत का तिलिस्म फिर चला और भाजपा को चारों खाने चित्त कर दिया। चुनाव परिणामों ने जहां गहलोत को फ्रीहैंड दे दिया है वहीं, वसुंधरा के हाथ बांध दिए हैं। एक और मात खाने के बाद महारानी के सामने संकटों का नया सिलसिला शुरू हो सकता है।

अशोक गहलोत द्वारा विधानसभा चुनाव में दिया गया जुमला 'मुझे जादू करना आता है' लोकसभा चुनाव में और भी असरदार साबित हुआ। हालांकि इसमें गहलोत की जादूगरी के अलावा राहुल गांधी का हुनर भी काम आया। प्रचार के दौरान राहुल राज्य की 7 लोकसभा सीटों पर गए थे। इनमें से 6 पर कांग्रेस ने जीत हासिल की है। बारां-झालावाड़ ही एकमात्र ऐसी सीट रही जहां राहुल गांधी प्रचार के लिए आए और कांग्रेस प्रत्याशी जीतने में कामयाब नहीं रहा। कुल मिलाकर राजस्थान के रण में भाजपा के बड़े-बड़े दावे कांग्रेस की आंधी में उड़ गए और पिछली बार 25 में 21 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 4 सीटों पर ही सिमट गई। पार्टी के ज्यादातर गढ़ ढह गए और बड़े-बड़े दिग्गज को मुंह की खानी पड़ी। दूसरी और 20 सीटें हासिल कर कांग्रेस ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि विधानसभा चुनावों में मिली जीत तुक्का नहीं थी। लोकसभा चुनावों के परिणाम सूबे की सियासत में खलबली मचा सकते हैं। जहां कांग्रेस अशोक गहलोत के नेतृत्व में और स्थायित्व हासिल करेगी वहीं, भाजपा में प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और नेता प्रतिपक्ष वसुंधरा राजे को बदलने की मांग फिर से जोर पकड़ेगी।
सूबे में सरकार बनाते ही मुख्यमंत्री गहलोत ने लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी। उन्होंने अपने पिछले कार्यकाल से सबक लिए और एक के बाद एक लोक कल्याणकारी निर्णय किए। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लगने से पहले मिले 72 दिनों में कांग्रेस सरकार ने 71 छोटे-बड़े कार्य कर जनता में अपनी पकड़ मजबूत कर ली। शराब की दुकानें खुलने के समय में कटौती करने के निर्णय तुरूप का इक्का साबित हुआ। इससे आमतौर पर भाजपा के साथ रहने वाला शहरी वोटर ने भी कांग्रेस की ओर रुख किया। इन चुनावों में गहलोत ने कर्मचारी और किसान विरोधी होने के कलंक को भी धो दिया। जहां डीए बढ़ाने की घोषणा कर कर्मचारियों को खुश किया गया वहीं, पांच साल तक बिजली की रेट नहीं बढ़ाने का ऐलान कर किसानों का समर्थन हासिल करने की कोशिश की गई। नतीजतन, इस बार कर्मचारी गहलोत के खिलाफ मुखर नहीं हुए और किसानों का तो एकतरफा साथ मिला।
राज्य में कांग्रेस की जीत में गहलोत सरकार के कामकाज के अलावा मुख्यमंत्री का चुनाव मैनेजमेंट भी बड़ा योगदान है। गहलोत ने सत्ता और संगठन में बेहतरीन तालमेल बिठाया। कांग्रेस ने एकजुट होकर पूरी ताकत से चुनाव लड़ा। पार्टी में विभिन्न स्तरों पर धड़ेबंदी होने के कयासों का हकीकत से कोई वास्ता नहीं रहा। कांग्रेस की पूरी टीम गहलोत के पीछे खड़ी रही। गहलोत ने पूरे राज्य में धुंआधार प्रचार किया और बड़ी चतुराई से वसुंधरा सरकार के समय हुए भ्रष्टाचार को मुद्दा बना दिया। दूसरी ओर मतदान से एक दिन पहले गहलोत द्वारा नाराज नेताओं को व्यक्तिगत रूप से समझाने की रणनीति पूरी तरह से कामयाब रही। गहलोत उन नेताओं की नाराजगी दूर करने में सफल रहे जो पार्टी प्रत्याशी के वोटों में सेंध लगाने की की स्थिति में थे। इन नेताओं का देर से ही सही पार्टी के पक्ष में जुट जाना निर्णायक साबित हुआ। बसपा के सभी छह विधायकों का कांग्रेस में शामिल होना भी कांग्रेस के लिए मुफीद साबित हुआ। बसपा के उम्मीदवार कांग्रेस को कोई खास नुकसान नहीं पहुंचा पाए।
कुल मिलाकर सूबे के सरदार बनने के बाद से गहलोत का हर तीर निशाने पर लग रहा है। लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने से आलाकमान की नजरों में तो उनका कद बढ़ा ही है, राज्य की राजनीति में भी उनके वर्चस्व को चुनौती देने वाला कोई नेता नहीं बचा है। राहत की बात यह है कि कई मौकों पर गहलोत के प्रतिद्वंद्वी साबित हो रहे डॉ. सी.पी. जोशी भीलवाड़ा से चुनाव जीत गए हैं। मुख्यमंत्री के दावेदारों में शामिल रहे शीशराम ओला एक बार फिर से चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में गहलोत डंके की चोट पर अपना कार्यकाल पूरा करेंगे। इस बार उनके पास अच्छा प्रदर्शन करने का बेहतर अवसर भी है, क्योंकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार होने से धन की कोई कमी नहीं आने वाली है।
विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा प्रदेश नेतृत्व यह खुले तौर पर स्वीकारता था कि लोकसभा चुनाव में 2004 की स्थिति को बरकरार रखना संभव नहीं है, लेकिन ऐसे परिणाम की उम्मीद तो किसी को न थी। यदि विधानसभा चुनाव के पैटर्न पर ही वोटिंग होती तो भी भाजपा को 10 से 12 सीटें मिलनी चाहिए थीं, पर पार्टी महज 4 सीटों पर सिमट गई। भाजपा की बदतर स्थिति के लिए ज्यादातर वे ही कारण जिम्मेदार हैं जो विधानसभा चुनावों में थे। वसुंधरा राजे के पूरी ताकत से सक्रिय न होना एक अलग वजह जरूर रही। महारानी चुनाव प्रचार के दौरान अपने बेटे दुष्यंत की बारां-झालावाड़ में ही अटकी रहीं। वे बाकी सीटों पर गहलोत की बराबर सघनता से प्रचार नहीं कर पाईं। वसुंधरा जैसे-तैसे कर दुष्यंत की सीट निकालने में तो कामयाब रहीं, पर बाकी जगह स्थिति और बदतर हो गई। वैसे इस बार महारानी के प्रचार में पहले जैसी धार भी नहीं दिखी। आक्रामक तेवरों की आदी महारानी पूरे चुनाव के दौरान सुरक्षात्मक नजर आईं। वे गहलोत के भ्रष्टाचार के आरोपों का एक भी जबाव नहीं दे पाईं। उनके पास गहलोत सरकार को घेरने के लिए कोई मुद्दा भी नहीं था।
बद से बदतर होता संगठनात्मक ढांचा भी भाजपा की हार की बड़ी वजह है। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपाई दिग्गजों की बीच की दरारें खाई में तब्दील हो गईं। प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और वसुंधरा राजे के बीच मनमुटाव सार्वजिनक होने लगा। महारानी ने अपनी मर्जी से टिकट दिए। इसमें ओम माथुर की भी ज्यादा नहीं चली। टिकट वितरण से नाराज आला नेताओं ने खुले तौर पर अपनी नाराजगी तो जाहिर नहीं की, पर चुनावों से अपने-आपको दूर ही रखा। नेताओं के बीच बढ़ती दूरियों का लब्बोलुआब यह रहा कि कार्यकर्ताओं ने पार्टी से कटते चले गए। उम्मीदवारों को समर्पित कार्यकर्ताओं की खासी कमी खली। भाजपा सरीखी कैडर बेस पार्टी के लिए इससे बड़ा नुकसान और क्या हो सकता था। झुलसा देने वाली गर्मी और शादियों के सीजन में भाजपा के वोटर को घर से निकालने के लिए कार्यकर्ताओं की फौज किसी भी प्रत्याशी के पास नहीं थी। लिहाजा, कम वोटिंग हुई और भाजपा को भारी नुकसान हुआ।
लोकसभा चुनाव में भाजपा का सफाया कई बवंडर खड़े कर सकता है। वसुंधरा राजे और ओम माथुर के विरोधियों को उन्हें यहां से रुखसत करने का एक और मौका मिल गया है। वे इसे किसी भी कीमत पर हाथ से जाने देने के मूड में नहीं हैं। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने वसुंधरा और माथुर की खुली खिलाफत शुरू कर दी है। पूर्व उपमुख्यमंत्री हरिशंकर भाभड़ा ने बताया कि 'प्रदेश में पार्टी की हार का कारण कुछ नेताओं का खुद को पार्टी से ऊंचा मानना है। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कम सीटें मिलीं तो जनता ने तय कर लिया था कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत से जिताना है, लेकिन भाजपा इसे भांप नहीं पाई।' राज्यसभा सांसद और प्रदेशाध्यक्ष रहे ललित किशोर चतुर्वेदी भाजपा की हार का जिक्र करते ही पार्टी नेतृत्व पर पिल पड़ते हैं। वे कहते हैं, 'बोए पेड़ बबूल के तो आम कहां से होए। भाजपा की हार के लिए संगठन स्तर पर वरिष्ठ नेताओं की उपेक्षा और कुछ लोगों की दादागीरी जिम्मेदार है। दो-तीन लोगों के कारण पार्टी का यह हाल हुआ है। इन नेताओं ने विधानसभा चुनावों में मिली हार से कोई सबक नहीं लिया।' पूर्व मुख्य सचेतक महावीर प्रसाद जैन ने भी पार्टी नेतृत्व पर जमकर भड़ास निकाली। जैन ने बताया कि 'लोकसभा चुनाव में पार्टी एकजुट नहीं रह पाई। पूरा काम दो-तीन लोगों ने अपने हाथ में ले लिया। इन्होंने पार्टी को अपनी जागीर समझ लिया। इससे कार्यकर्ता और जमीन से जुड़े नेता पार्टी से कटते चले गए और पार्टी की करारी हार हुई।'
मुखर होते विरोध के स्वरों के बीच भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ दिक्कत यह है कि वे फेरबदल करे तो क्या करे? ओम माथुर के बदलने में तो ज्यादा दिक्कत नहीं है, पर वसुंधरा राजे का कोई सर्वमान्य विकल्प पार्टी के पास नहीं है। कोई भी ऐसा कद्दावर नेता दिखाई नहीं दे रहा है जिसका कोई विरोध नहीं करे और जो पार्टी में फिर से प्राण फूंक सके। गुलाब चंद कटारिया और घनश्याम तिवाड़ी का नाम काफी समय से चल रहा है। कटारिया की संभावना ज्यादा बनती है, क्योंकि लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद पार्टी तिवाड़ी को शायद मौका नहीं दे। वैसे पार्टी का एक धड़ा अभी भी यह मानता है कि राजस्थान में भाजपा की कमान वसुंधरा राजे के हाथ में ही रहेगी, क्योंकि राजस्थान इकलौता राज्य नहीं है जहां भाजपा हारी है। वसुंधरा राजे के लिए भाजपा का हारना उतना नुकसानदायक नहीं है जितना लालकृष्ण आडवाणी का कमजोर होना। महारानी, आडवाणी की खास सिपेहसालार रही हैं। कई मौकों पर आडवाणी ने उनका खुला समर्थन किया है। यदि आडवाणी ने सक्रिय राजनीति से तौबा की तो इसका असर वसुंधरा के कद पर भी पड़ेगा।

शुक्रवार, मई 08, 2009

सियासत में सिमटा सौहार्द


बरसों तक भाई-भाई की तरह रहे गुर्जर और मीणा अब एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद हो गए हैं। सियासतदां तनाव को मिटाने की बजाय इसे अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। दहशत भरे इस माहौल के लिए कौन जिम्मेदार है?

गुर्जर आरक्षण आंदोलन से पहले दौसा को राजेश पायलट और मेहंदीपुर बालाजी के लिए जाना जाता था। 2007 में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की अगुवाई में शुरू हुआ गुर्जर आरक्षण आंदोलन अपने दो पड़ावों के बाद अब थम चुका है, लेकिन इसकी लपटें अब तक उठ रही हैं। हालांकि अब मुद्दा गुर्जर आरक्षण का नहीं, बल्कि दो जातियों बीच अस्तित्व की लड़ाई का है। मीणा और गुर्जर जातियों के बीच बढ़ती झड़पों ने क्षेत्र में तनाव बढ़ा दिया है। लोगों में दहशत है। सियासतदां इसे को दूर करने की बजाय, अपना-अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं। निर्दलीय चुनाव लड़े डॉ. किरोड़ी लाल मीणा, मीणा जाति और कश्मीर से आए कमर रब्बानी चेची गुर्जर जाति के झंडाबरदार बने हुए हैं। जातिगत पंचायतों में दोनों नेता एक-दूसरे के खिलाफ जमकर जहर उलग रहे हैं।
परिसीमन में दौसा सीट के अनुसूचित जनजाति के आरक्षित होते ही कई मीणा नेताओं की इस सीट पर नजर थी। कांग्रेस के नमोनारायण मीणा ने तो यहां बाकायदा तैयारियां भी शुरू कर दी थी, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद बदली परिस्थितियों किरोड़ी लाल मीणा ने भी यहां से दावेदारी जता दी। किरोड़ी ने कांग्रेस के ऊपर समर्थन देने का दबाव भी बनाया, पर कांग्रेस अपने सिंबल पर किरोड़ी को चुनाव लड़ाना चाहती थी। लंबी जद्दोजहद के बाद किरोड़ी निर्दलीय ही मैदान में उतर गए। किरोड़ी के आने पर नमोनारायण ने यहां से दावेदारी छोड़ दी और वे सामान्य हो चुकी टोंक-सवाई माधोपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े। कांग्रेस ने यहां से पुलिस अधिकारी रहे लक्ष्मण मीणा को प्रत्याशी बनाया तो भाजपा ने रामकिशोर मीणा को प्रत्याशी बनाया। इन उम्मीदवारों के बीच ही मुकाबला रहता तो कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन काफी पहले मैदान में कूद चुके कमर रब्बानी चेची के टक्कर में आने से माहौल तनावपूर्ण हो गया।
राजस्थान में अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों पर मीणाओं का ही वर्चस्व रहा है। पहली बार किसी अन्य जाति के नेता ने मीणाओं को उन्हीं के गढ़ में आकर चुनौती दी। चेची कश्मीरी मुसलमान हैं, पर इनके वंशज गुर्जर रहे हैं। दौसा में चेची ने स्वयं को एक गुर्जर के तौर पर ही प्रचारित किया। चेची को गुर्जरों का एकतरफा समर्थन मिलने लगा ही मुसलमान भी उनके साथ हो लिए। सवर्ण जाति के वोटों में भी वे सेंध लगाते नजर आए। उधर, मीणा वोटों के तीन जगहों पर बंटते हुए दिखाई दे रहे थे। किरोड़ी को यह रास नहीं आया। उन्होंने चेची को कश्मीर से आया प्रशिक्षित आतंकवादी बताना शुरू कर दिया। हालांकि दौसा में आतंक फैलाने का काम किराड़ी समर्थकों ने किया। जगह-जगह लोगों को धमकाया गया, पर बात बनती हुई दिखाई नहीं दी। कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मण मीणा की मानें तो किरोड़ी हिंसा फैलाकर चुनाव जीतना चाहते हैं। मीणा कहते हैं, 'किरोड़ी लोकतंत्र में विश्वास नहीं रखते हैं। उनके पक्ष में माहौल हो तो ठीक है नहीं तो वे गुंडागिर्दी पर उतर आते हैं। विधानसभा चुनाव में भी वे ऐसे ही जीते।'
मतदान के दिन मीणा और गुर्जरों के बीच कई जगह झड़पें हुईं। किरोड़ी के काफिले पर हमला हुआ, लेकिन सूत्रों के मुताबिक यह सब सुनियोजित था ताकि किरोड़ी को मीणाओं की सहानुभूति मिल जाए। मीणा वोटों में हो रहे बटवारे को रोकने के लिए उन्होंने इलाके के पुलिस स्टेशन में दिनभर हुडदंग मचाया। किरोड़ी अपने समर्थकों के साथ चेची की गिरफ्तारी की मांग को लेकर दिन भर पुलिस स्टेशन पर ही बैठे रहे। वे बार-बार अपने पैर में आई खरोंच को दिखाना भी नहीं भूल रहे थे। आखिर में चेची के खिलाफ रिपोर्ट लिखे जाने और अधिकारियों की ओर से चेची पर कार्रवाई के आश्वासन के बाद ही वे वहां से रवाना हुए। मतदान का अगला दिन भी क्षेत्र के लोगों के लिए दहशत भरा रहा। नांगल प्यारीवास गांव में मीणा समाज की महापंचायत के बाद लोगों ने जमकर उपद्रव मचाया। ऐसे हालातों में गुर्जर भी कहां चुप रहने वाले थे। अगले ही दिन उन्होंने भी आरक्षण आंदोलन के दौरान चर्चा में आए सिकंदरा चौराहे पर महापंचायत कर किरोड़ी लाल की गिरफ्तारी की मांग की और आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है।
आम गुर्जर और मीणा यहां शांति से रहने चाहते हैं, लेकिन कुछ लोगों की सियासत में क्षेत्र का सौहार्द्र सिमटता ही जा रहा है। चुनाव परिणाम आने पर यहां स्थिति और बिगड़ सकती है। चेची की हार पर शायद कम बबाल हो, पर किरोड़ी अपनी हार नहीं पचा पाएंगे। प्रचार के दौरान भी किरोड़ी ने चेची के खिलाफ जमकर जहर उगला था। जब हमने उनसे इस बारे में बात की तो वे भड़क उठे और बोले, 'चेची कश्मीर में टे्रनिंग लिया हुआ आतंकवादी है। वो यहां गूजर बनकर लोगों को बरगला रहा है। उसने मेरे ऊपर हमला करवाया। प्रशासन भी उसका साथ दे रहा है। अब क्षेत्र की जनता ही उन्हें सबक सिखाएगी। ऐसे लोग जनप्रतिनिधि तो क्या नागरिक बनने लायक भी नहीं हैं।' चेची उन पर पलटवार करते हुए कहते हैं कि 'आतंकवादी वह है जो आतंक फैलाए। आप दौसा की जनता से पूछ लीजिए कि आतंक कौन फैला रहा है। किरोड़ी के लोगों ने बूथ केप्चरिंग की, लोगों को वोट नहीं डालने दिया और फिर हमले का ड्रामा किया। जनता सब जानती है, परिणाम सबके सिखा देंगे।'
ऐसा नहीं है कि गुर्जर और मीणा जातियों के बीच द्वेषता शुरू से रही है। आरक्षण आंदोलन के पहले तक दोनों जातियों के बीच बेहद अच्छे संबंध रहे। कई मौकों पर दोनों जातियों ने आपसी भाईचारे का परिचय दिया। धाधरेन गांव के 80 वर्षीय लक्खी मीणा उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, 'गुर्जर और मीणाओं में कभी कोई लड़ाई नहीं रही। एक-दूसरे के सुख-दुख में खूब काम आते थे। इतिहास में भी उल्लेख है कि हम आपस में रिश्तेदार रहे हैं, लेकिन आरक्षण की लड़ाई ने सब तबाह कर दिया। गलतियां दोनों तरफ से हुई हैं। कुछ लोगों के बहकावे में आकर दोनों जातियां भ्रमित हो रही हैं।' एक-दूसरे से सटे दोनों जातियों के गांवों में लोगों को थोड़ा सा कुरेदने पर ही पता लग जाता है कि मीणा और गुर्जरों के बीच संबंध कितने प्रगाढ़ रहे हैं। 72 साल के गोविंद गुर्जर कहते हैं कि 'गुर्जर-मीणा एकता के किस्सों की कमी नहीं हैं। महावीर जी में शोभायात्रा का रथ दोनों जातियों के लोग मिलकर खींचते हैं, सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और शादी-समारोह में आते-जाते हैं।'
देश की सबसे बड़ी पंचायत में कई बार दौसा की नुमाइंदगी करने वाले स्वर्गीय राजेश पायलट ने गुर्जर-मीणा रिश्तों में मिठास घोलने के लिए खूब काम किया। कभी-कभार दोनों जातियों के बीच तनाव होता तो पायलट बड़ी सहजता से हल कर देते। आरक्षण आंदोलन में अपना एक हाथ गंवा देने वाले जगन कहते हैं, 'पायलट साहब होते तो आंदोलन में इतना खून-खराबा नहीं होता। दोनों जातियों में उनकी पकड़ थी। गुर्जरों के वोट तो उन्हें मिलते ही थे, मीणाओं के भी वोट भी एकतरफा उन्हें ही मिलते थे। एक बार किरोड़ी लाल उनके खिलाफ चुनाव लड़े थे, तब भी मीणाओं ने पायलट को वोट दिए थे। सब उनकी बात मानते थे। कोई कितने भी गुस्से में हो वे उसे शांत कर देते थे।'
मीणा-गुर्जरों में पनपी इस कटुता के कारणों पर जाएं तो इसके लिए विशुद्ध रूप से कुछ लोगों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं जिम्मेदार हैं। आरक्षण आंदोलन की अगुवाई करने वाले कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के भाजपा का दामन थाम लोकसभा चुनाव लडऩे से यह बात साबित हो गई हैं। आंदोलन के दौरान कर्नल बार-बार यह कहते थे कि यह एक गैर राजनीतिक आंदोलन है। वे इसमें शामिल होने वाले नेताओं के सामने शर्त रखते थे कि भविष्य में चुनाव नहीं लडऩा हो तो आंदोलन में शिरकत कर सकते हैं। आज वही कर्नल स्वयं राजनीति में कूद चुके हैं। वो भी उस पार्टी से जिसकी सरकार को वे तानाशाह और हत्यारी कहते हुए नहीं थकते थे। कर्नल के एक इशारे पर मरने-मारने के लिए तैयार रहने वाले ज्यादातर गुर्जर उनकी राजनीति महत्वाकांक्षा से अभी तक अनभिज्ञ हैं। गुर्जरों का बहुमत आज भी बैंसला के पीछे है जो यह मानता है कि कर्नल गुर्जरों की भलाई के लिए ही राजनीति में आए हैं, लेकिन एक वर्ग जो पढ़ा-लिखा है उनसे खासा खफा है। पत्रकारिता का कोर्स कर रहे राजेश खटाना कहते हैं कि 'कर्नल साहब ने राजनेताओं के साथ रहते-रहते जल्दी ही राजनीति सीख ली। 71 लोगों की लाशों पर चढ़कर वे संसद में पहुंचना चाहते हैं। ये किसी व्यक्ति की महत्वाकांक्षा की अति है। कर्नल साहब के इस कदम से साफ हो गया है कि अपने फायदे के लिए उन्होंने समाज का इस्तेमाल किया।'
बरसों से साथ रहते आ रहे मीणा-गुर्जरों के बीच चौड़ी होती खाई के बीच डॉ. किरोड़ी लाल मीणा का जिक्र करना जरूरी है। किराड़ी हमेशा शीर्ष पर रहने के आदी हैं। मात खाना उन्हें पसंद नहीं है। वे अपना मकसद पूरा करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। आरक्षण आंदोलन के दौरान मीणाओं को उकसाने वालों में वे सबसे ऊपर थे। गुर्जर आरक्षण संघर्ष समिति के प्रवक्ता रहे डॉ. रूप सिंह की मानें तो किरोड़ी ने ही मीणा और गुर्जरों के बीच नफरत के बीज बोए। वे कहते हैं, 'किरोड़ी ने गांवों में जा-जाकर मीणा भाइयों से कहा कि गुर्जरों को आरक्षण मिल गया तो उनके बच्चों को नौकरियां नहीं मिलेंगी। गुर्जर आरक्षण मांग कर हमारा हक मार रहे हैं।' वे आगे कहते हैं कि 'आम मीणाओं को गुर्जरों को आरक्षण मिलने पर कोई आपत्ति नहीं थी, दिक्कत तो किरोड़ी सरीखे नेताओं को थी जिनकी सियासत संकट में आ सकती थी, ऐसे नेताओं ने ही लोगों को बरगलाया।'

शनिवार, मई 02, 2009

पानी न कंठ को न खेत को


पश्चिमी राजस्थान में बाड़मेर जिले के तिलवाड़ा गांव की 48 वर्षीय भूरी देवी पेड़ के नीचे छितराई हुइ छांव में पानी के टैंकर का इंतजार कर रही है। यह जगह उसके घर से पांच किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है। वह पिछले दो घंटे से टैंकर आने की उम्मीद लगाए बैठी है। वह यहां एक घंटे और रुकेगी, यदि टैंकर आ जाता है तो ठीक नहीं तो उसे तीन किलोमीटर आगे बने टांके पर जाकर पानी लाना होगा। यानी अपने परिवार की प्यास बुझाने के लिए भूरी देवी सिर पर 25 लीटर वजन लिए हुए आठ किलोमीटर से भी ज्यादा पैदल चलकर घर पहुंचेंगी। इस इलाके में पीने का पानी जुटाने के लिए इतनी मशक्कत करने वाली भूरी देवी अकेली महिला नहीं हैं। पश्चिमी राजस्थान के ज्यादातर इलाकों में पेयजल की यही स्थिति है। हालांकि इंदिरा गांधी नहर के आने से कई जिलों में हालात पहले से बेहतर जरूर हुए हैं।
वैसे पश्चिमी राजस्थान ही नहीं समूचे राज्य में ही पीने के पानी की समस्या है। गांव ही नहीं शहरी क्षेत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। सैकड़ों शहर ऐसे हैं जहां सात दिन में एक बार जलापूर्ति होती है। फिर भी शहरों में तो लोग जैसे-तैसे करके पीने का पानी जुटा लेते हैं, पर गांवों में स्थिति बेहद खराब है। गांव हो या शहर, यहां पेयजल की आपूर्ति भूमिगत जल स्रोतों से होती है। गर्मियां आते-आते इनमें से अधिकांश जलस्रोत पूरी तरह से सूख जाते हैं। दरअसल, बीते सालों में भूमिगत का अंधाधुंध दोहन होने से जलस्तर तेजी से नीचे गिरा है। वर्षा की मात्रा कम होने के कारण किसानों को सिंचाई के लिए भूमिगत जलस्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। राज्य में कुओं और नलकूपों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है और भूमिगत जल के दोहन की गति बढ़ती ही जा रही है, जबकि धरती में जल समाने की गति उससे आधी भी नहीं है। ऐसी स्थिति में आने वाले समय में हालात बेहद खराब होने वाले हैं, क्योंकि एक सीमा के बाद भूमिगत जल भी समाप्त हो जाएगा।
सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के आंकड़ों पर गौर करें तो समस्या की बिकरालता का अंदाजा लग जाता है। बोर्ड के मुताबिक राज्य के 236 ब्लॉकों में से 140 में भूमिगत जल का दोहन अपनी सीमा को कब का पार कर चुका है। 50 ब्लॉकों में यह खतरनाक स्तर है और 14 में अद्र्धखतरनाक स्थिति में। यदि समय रहते नहीं चेते तो इन ब्लॉकों में ऐसा समय आने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा जब यहां सिंचाई के पानी तो दूर पीने का पानी भी नसीब नहीं होगा। राजस्थान में समस्या महज भूमिगत जल तक ही सीमित नहीं है। जो पानी यहां उपलब्ध है, उसका अधिकांश भाग सिंचाई करने व पानी पीने के लिए उपयुक्त नहीं है। राज्य के 32 में से 30 जिले किसी न किसी रूप से पानी में फ्लोराइड की समस्या से ग्रस्त हैं। कई जिलों में तो हालात बेहद खराब है और लोग इससे गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। खारे पानी की समस्या भी यहां व्यापक स्तर पर है। राजस्थान में जल संकट को दूर करने के लिए परंपरागत जल स्रोतों को फिर से ध्यान देकर जल संग्रहण क्षेत्रों को बढ़ाना होगा। जल पुरूष राजेंद्र सिंह ने यह सब करके दिखाया है। जब वे अलवर जिले में इसका सफल प्रयोग कर सकते हैं तो राज्य के बाकी हिस्सों या यूं कहें देश भर में इस तरह का अभियान क्यों नहीं चलाया जाता। इसके अलावा इस समस्या के समाधान का और कोइ रास्ता भी नहीं है।

सोमवार, अप्रैल 20, 2009

अलझती उम्मीदें


सूबे में कांग्रेस 'टारगेट-25' के इर्द-गिर्द और भाजपा पिछले प्रदर्शन के आसपास ठहरने की उम्मीद कर रही है, लेकिन दोनों दलों की ये उम्मीदें कई मोर्चों पर उलझी होने से पूरी होती हुई दिखाई नहीं दे रही हैं। असल में कौन कितने पानी में है? एक आकलन!

राजनीति में जीत मिले या हार संकट पीछा नहीं छोड़ते। सूबे की दोनों पार्टियां इन दिनों सियासत के इसी सच से रूबरू हो रही हैं। जहां कांग्रेस विधानसभा चुनाव में मिली जीत को लोकसभा चुनाव में दोहराने के लिए जूझ रही हैं वहीं, भारतीय जनता पार्टी एक और हार को टालने के लिए संघर्ष कर रही है। सूबे में कांग्रेस ने आम चुनाव की तिथियां घोषित होने से पहले ही तैयारियां शुरू कर दी थीं। 'टारगेट-25' बना पार्टी क्लीन स्वीप के इरादे से मैदान में उतरी। समूचे राजस्थान में कांग्रेस के पक्ष में माहौल को देखकर एकबारगी तो लग रहा था कि पार्टी अपने तय लक्ष्य के करीब पहुंचने में कामयाब हो जाएगी, लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने तेजी से अपनी स्थिति में सुधार किया। बिखरी-बिखरी सी दिखने वाली भाजपा अब एकजुट होती दिखाई दे रही है। ताजा हालातों में दोनों पार्टियों के बीच कांटे की टक्कर है।
वैसे इसमें कोई दो राय नहीं है कि राज्य में कांग्रेस की सीटों में इजाफा होगा। गौरतलब है कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस को 25 में से महज 4 सीटों पर कामयाबी मिली थी और शेष सभी 21 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। यदि विधानसभा चुनाव में हुए वोटिंग पैटर्न को आधार माना जाए तो कांग्रेस आसानी से 12 से 14 सीटें जीतने में सफल हो जाएगी। हालांकि कांग्रेसी इससे कहीं ज्यादा की उम्मीद लगाए बैठे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक 10 सीटों पर तो कांग्रेस एकतरफा जीत की स्थिति में है और बाकी 15 में से आधी सीटों पर जीत की पूरी उम्मीद है। इस तरह से कांगे्रसी 17 से 18 सीटों पर जीत का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस आंकड़े तक पहुंचने के लिए कांग्रेस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी। सूबे में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व टिकट वितरण से भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं है। गुटबाजी से बचने के लिए कांग्रेस ने कई सीटों पर बेहद कमजोर प्रत्याशी मैदान में उतार अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है। टिकट वितरण में हुई देरी कांग्रेस के लिए नुकसानदायक हो सकती है। कई सीटों पर तो भाजपा उम्मीदवारों की घोषणा के 20 दिन बाद कांगेस ने अपने प्रत्याशी तय किए हैं। इन उम्मीदवारों को पूरे क्षेत्र को कवर करने लायक समय ही नहीं बचा है। पार्टी को कई जगह बगावत का भी सामना करना पड़ रहा है। बूटा सिंह सरीखे दिग्गज नेता के अदावत पर उतर आने का खामियाजा कांग्रेस को उठाना पड़ेगा।
विधानसभा चुनावों में भाजपा की खुली खिलाफत करने वाले डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और प्रह्लाद गुंजल की नाराजगी भी कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है। निर्दलीय मैदान में उतरे किरोड़ी दौसा में तो कांग्रेस उम्मीदवार लक्ष्मण मीणा के लिए मुसीबतें खड़ी कर ही रहे हैं, बाकी सीटों पर भी समीकरण उलझाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इस पूरे मामले में अशोक गहलोत की रणनीति कारगर तरीके से काम कर रही है। पहले बसपा विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर और फिर परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी को अपने साथ लेकर वे किरोड़ी के पर कतरने में कामयाब हो गए हैं। अब न तो मीणा समाज में उनकी उतनी पकड़ बची है और न ही स्वयं की उम्मीदवारी में उतना दम। किरोड़ी एपीसोड को लंबा खींचना कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो रहा है। किरोड़ी अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए दौसा सीट पर ही उलझकर रह गए हैं। अन्य सीटों पर कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने के लिए उनके पास समय ही नहीं बचा है। प्रह्लाद गुंजल जरूर कांग्रेस के लिए दिक्कतें खड़ी कर सकते हैं। गुंजल को कोटा से टिकट दिलवाने का वादा सूबे के कांग्रेसी निजाम सी.पी. जोशी को भारी पड़ सकता है।
लोकसभा चुनाव में भाजपा की उम्मीदों की बात करें तो विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद वसुंधरा राजे पार्टी को काफी हद तक एकजुट करने में कामयाब रही है। पार्टी पूरी तैयारी के साथ चुनाव मैदान में है। एकाध सीट को छोड़ दें तो पार्टी ने टिकट वितरण भी पूरी मुस्तैदी से किया है। बसपा विधायकों के कांग्रेस में शामिल हो जाने के बाद भाजपा ने अपने कई विधायकों को भी मैदान में उतारा है। ये सभी कांग्रेस उम्मीदवार को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। भाजपा ने मौजूदा सांसदों के खिलाफ एंटीइंकंबेंसी को ध्यान में रखते हुए कई सीटों पर नए और युवा चेहरों का उम्मीदवार बना दांव खेला है। हालांकि विधानसभा चुनाव में पार्टी का यह दांव उल्टा पड़ गया था और कई दिग्गजों ने खुली खिलाफत कर दी थी। भाजपा को बगावत का सामना इस बार भी करना पड़ रहा है। कई सीटों पर बागी उम्मीदवार खड़े हो गए हैं। भाजपा में स्टार प्रचारकों की कमी भी खल रही है। प्रदेश में वसुंधरा राजे ही एक ऐसा चेहरा हैं जो भीड़ खींचने में सक्षम हैं। वे भी मुकाबले मं फंसे अपने बेटे दुष्यंत के कारण झालावाड़ से बाहर निकल ही नहीं पा रही हैं।
भाजपा ने कास्ट केमिस्ट्री को भी दुरूस्त करने का प्रयास किया है। पार्टी ने कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को टिकट देकर नाराज चल रहे गुर्जरों को मनाने का प्रयास किया है। हालांकि यह पक्का नहीं है कि बैंसला के कहने से गुर्जर वोट भाजपा को मिल जाएंगे। गोया किरोड़ी लाल मीणा और प्रह्लाद गुंजल की कांग्रेस से नाराजगी का सीधा फायदा भाजपा को होगा। मीणा और गुंजल कांग्रेस को सबक सिखाने के लिए भाजपा के उम्मीदवारों को लाभ पहुंचा सकते हैं। बदले हुए हालातों में भाजपा 10 सीटों पर तो अपनी जीत पक्की मान रही है और बाकी पर फिफ्टी-फिफ्टी की संभावना जता रही है। यदि भाजपा इसके आसपास पहुंचने में कामयाब हो जाती है तो यह पार्टी के जिए बड़ी जीत होगी।

शनिवार, अप्रैल 11, 2009

कमल के कर्नल!


जाति की जाजम पर बैठकर कर सियासत में सफलता के ख्वाब देखने वालों में कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला का नाम भी जुडऩे जा रहा है। वे भाजपा का दामन थाम संसद की सीढ़ीयां चढऩे को बेताब हैं। तो क्या आंदोलन के समय हुए समझौते में यह भी शामिल था? अंदर की कहानी!

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला। सूबे में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के अगुवा। जिनके नेतृत्व में गुर्जरों ने दो ऐसे आंदोलन किए कि समूचे राजस्थान में जनजीवन ठहर गया और सरकार की चूलें हिल गईं। हालांकि इस आंदोलन में गुर्जरों के साथ हर कदम पर छल हुआ। इतनी जान कुर्बान करने के बाद भी उन्हें आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं मिला। गुर्जर समाज का एक तबका इसके लिए कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला को जिम्मेदार मानता है। इनके मुताबिक कर्नल ने भाजपा सरकार के सामने घुटने टेक दिए। गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल ने तो उन्हें सरकार का एजेंट तक कहा। कोई कुछ भी कहे, लेकिन आज भी गुर्जर समाज में कर्नल की पकड़ सबसे ज्यादा है। भारतीय जनता पार्टी गुर्जरों में उनके इसी रुतबे का फायदा उठाने की फिराक में है। भाजपा काफी दिनों से बैंसला को पार्टी में लाने और चुनाव लडऩे के लिए मना रही है। सूत्रों के मुताबिक कर्नल इसके लिए राजी हो गए हैं और सवाई माधोपुर संसदीय सीट से मैदान में उतरने की तैयारी में हैं। यहां से कांग्रेस की और से केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा चुनाव लड़ रहे हैं।
बैंसला का भाजपा मोह नया नहीं है। सेना से रिटायर होने के बाद वे भाजपा के सैनिक प्रकोष्ठ में पदाधिकारी रहे। 2003 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के लिए वोट भी मांगे। वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री के बाद वे उनसे गुर्जरों को एसटी आरक्षण की वादे को याद दिलाने के लिए कई बार मिले। बात बनती नहीं दिखी तो प्रदर्शन भी किया। जब उन्हें लगा कि सरकार कुछ करने की बजाय मामले को टाल रही तो बड़े आंदोलन की तैयारी शुरू हो गई। बैंसला ने गांव-गांव जाकर लोगों को तैयार किया। एकदम सेना की मानिंद। आरपार की लड़ाई के लिए। कर्नल की मेहनत का नतीजा भी निकला। उनके नेतृत्व में एक अविश्वसनिय आंदोलन शुरू हुआ। दर्जनों लोग मारे गए, पर गुर्जर हिले तक नहीं। कर्नल के एक इशारे पर हजारों गुर्जर मरने-मारने को तैयार थे। सरकार को मामले का कोई हल नहीं दिखा। वह इस इंतजार में थी कि गुर्जर थक-हार कर खुद ही रास्ता खोल दें। इस बीच ये आंदोलन कर्नल के हाथों में से निकल कर उत्तर भारत के कई हिस्सों में फैल गया। बैंसला पर समझौते का दबाव बढऩे लगा। वार्ताओं के कई दौर चले और आखिरकार समझौता हुआ। इसमें गुर्जरों को एसटी आरक्षण की संभावनाओं का अध्ययन करने के लिए चोपड़ा कमेटी का गठन, मृतकों के आश्रितों को मुआवजा व नौकरी और आंदोलनकारियों से मुकदमें वापस लेने की घोषणा हुई। कई गुर्जर नेता इस समझौते से खुश नहीं थे। इनके मुताबिक कर्नल आंदोलन के चरम पर ढीले पड़ गए और समझौते के दौरान बहुत कम में मान गए।
समझौते के बाद बैंसला पूरी तरह से महारानी के मुरीद हो गए। कर्नल ने उनकी खूब तारीफ भी की, लेकिन जब सरकार ने अपने वादों से मुकरना शुरू किया तो वे भौचक रह गए। सरकार ने न तो आंदोलनकारियों पर लदे मुकदमों को वापस लिया और न ही मृतकों के आश्रितों को नौकरियां दीं। इतने में ही चोपड़ा कमेटी की रिपोर्ट भी आ गई जिसमें गुर्जरों को एसटी में शामिल करने के दावे को खारिज कर दिया गया। गुर्जरों का गुस्सा उबाल लेने लगा और कर्नल पर आंदोलन के लिए दबाव बढ़ता गया। आखिर उन्हें आंदोलन की घोषणा करनी पड़ी। हालांकि इस घोषणा में गुर्जरों के अलावा महारानी के दबाव ने भी काम किया। दरअसल, उन दिनों बसपा के बेनर तले कई गुर्जर नेता सक्रिय थे और पहले आंदोलन की बरसी पर मायावती की बड़ी सभा की तैयारी कर रहे थे। प्रह्लाद गुंजल भी इनमें शामिल थे। महारानी को डर था कि मायावती की सभा के बहाने गुर्जर आंदोलन का नेतृत्व बैंसला के हाथों से छिटक ओर किसी के हाथों में जा सकता है। इस बारे में गुंजल बताते हैं, 'जगह-जगह गुर्जरों की पंचायतें हो रही थीं। सरकार के साथ समझौते के नाम पर समाज के सम्मान को गिरवी रखने वाले कर्नल साहब के प्रति लोगों में गुस्सा बढ़ रहा था। गुर्जर अपने हक के लिए एक बड़े आंदोलन की तैयारी कर रहे थे। महारानी नहीं चाहती थीं कि गुर्जरों का नेतृत्व कर्नल साहब के अलावा कोई करे, इसलिए उन्होंने एक सुनियोजित आंदोलन शुरू करवाया। इसकी पूरी पटकथा महारानी ने लिखी, कर्नल साहब ने उसी के अनुसार काम किया।'
आंदोलन के दूसरे दौर में गुर्जरों ने सड़क की बजाय रेल की पटरियों पर कब्जा कर दिल्ली-मुंबई रेलवे ट्रेक को बाधित कर दिया। इस दौरान खूब खून बहा और दर्जनों गुर्जर मारे गए। कई दिनों के बाद सरकार ने आंदोलनकारियों से वार्ता प्रांरभ की। इस बातचीत में राज्य के बाहर के गुर्जर नेता भी शामिल हुए। सरकार पर गुर्जरों की मांगे मानने के लिए दबाव बढ़ ही रहा था कि बैंसला ने फिर से पाला बदल लिया। वे साफ तौर पर महारानी क पक्ष में आ गए। बाहर से आए गुर्जर नेता बैंसला के इस व्यवहार परिवर्तन से रुष्ट होकर वापस हो लिए। कश्मीर से ताल्लुक रखने वाले रिटायर्ड पुलिस अधिकारी और गुर्जर नेता मसूद चौधरी ने तो साफ तौर पर कहा कि कर्नल समाज का भला नहीं कर रहे हैं, वे साफ तौर पर सरकार के साथ सौदबाजी कर रहे हैं। गुर्जर नेताओं के लाख विरोध के बाद भी बैंसला ने सरकार के साथ समझौता कर लिया। जिसके तहत गुर्जरों को विशेष श्रेणी में आरक्षण का प्रावधान किया गया। वसुंधरा सरकार ने इस विधेयक को विधानसभा में पास कर राज्यपाल के पास भेज दिया था, जहां यह आज तक लंबित है। इस आरक्षण का कोई संवैधानिक औचित्य नहीं है। यदि राज्यपाल इस पर हस्ताक्षर कर भी देते हैं तो इसमें सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण की सीमा पचास प्रतिशत से ज्यादा नहीं होने संबंधी निर्देश का पेंच फंस जाएगा।
वसुंधरा सरकार के साथ हुए समझौते के बाद से ही बैंसला यह प्रचारित कर रहे थे कि 'वसुंधरा सरकार गुर्जरों की भलाई के लिए अपनी सीमाओं के हिसाब से बहुत कुछ कर चुकी है। महारानी तो आरक्षण भी दे चुकीं हैं, लेकिन कांग्रेस के इशारे पर राज्यपाल विधेयक पर हस्ताक्षर नहीं कर रहे हैं। गेंद अब केंद्र की यूपीए सरकार के पाले में है। यदि आरक्षण विधेयक को लागू करने में दिक्कत आ रही है तो सरकार को संविधान में संशोधन कर आरक्षण की सीमा बढ़ानी चाहिए।' कुल मिलाकर बैंसला इस पूरे मामले को कांग्रेस के ऊपर थोप देना चाहते हैं। महारानी का भी शुरू से यही मकसद था कि कैसे भी करके उनके यह बला टल, कांग्रेस के पाले में चली जाए। कुछ हद तक कर्नल ने यह काम कर दिखाया। इस बीच गुर्जरों पर बैंसला की पकड़ लगातार कमजोर होती जा रही थी। विधानसभा चुनावों में यह साबित हो गया कि गुर्जर अब कर्नल की सारी बातें मानने वाले नहीं हैं। गौरतलब है कि विधानसभा चुनावों में बैंसला ने गुर्जरों से भाजपा को वोट देने की अपील की थी, पर उसका कोई खास असर नहीं हुआ। गुर्जरों ने भाजपा को वोट नहीं दिए।
विधानसभा चुनावों में कर्नल का जादू नहीं चलने के बाद भाजपा का एक धड़ा उन्हें किनारे करने के पक्ष में है। इसका मानना है कि बैंसला का ज्यादा तवज्जों देने से मीणा वोट पूरी तरह से पार्टी से कट जाएंगे। किरोड़ी लाल मीणा के पार्टी छोड़ देने के बाद पहले ही अधिकांश मीणा वोटर भाजपा से रूठ चुके हैं, लेकिन महारानी कर्नल का पूरा पक्ष ले रही हंै। इसके पीछे एक बड़ी वजह है। वसुंधरा के बेटे दुष्यंत सिंह झालावाड़-बारां सीट पर मुकाबले में फंस गए हैं। इस सीट पर गुर्जर वोटर अच्छी संख्या में हैं। यदि दुष्यंत गुर्जर वोट हासिल कर लेते हैं तो उनकी जीत की संभावनाएं बन जाएंगी। बेटे को जिताने के लिए महारानी बैंसला का सक्रिय समर्थन चाहती हैं। इतने समय से नेताओं के संपर्क में रहने के बाद कर्नल ने भी अब सियासत सीख ली है। उन्होंने दुष्यंत की मदद करने की एवज में टोंक-सवाई माधोपुर सीट से भाजपा का टिकट मांग लिया है।
बैंसला को करीब से जानने खुले तौर पर स्वीकारते हैं कि सियासत का कहकरा उन्हें नहीं आता है। वे बहुत जल्दी राजनीतिक चालों में फंस जाते हैं। कर्नल के चुनाव लडऩे के निर्णय से आरक्षण आंदोलन के दौरान उनके दाएं-बाएं खड़े रहने वाले गुर्जर नेता खासे खिन्न हैं। वे कहते हैं कि कर्नल साहब ने ही यह तय किया था कि आरक्षण आंदोलन संघर्ष समिति से जुड़ा कोई भी शख्स चुनाव नहीं लड़ेगा और अब उसके मुखिया ही मैदान में कूद पड़े हैं। आंदोलन के दौरान बैंसला के प्रवक्ता रहे डॉ. रूप सिंह भी उनके राजनीति में आने के निर्णय से खासे खफा हैं। सिंह बताते हैं कि 'जिनकी अगुवाई में हमने सामाजिक आंदोलन शुरू किया था आज वे ही राह भटक गए हैं। कर्नल साहब के चुनाव लडऩे के फैसले ने समाज को पीछे धकेल दिया है। समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा। वे उस दल के साथ जा रहे हैं जिनकी सरकार ने 71 निर्दोष गुर्जरों को मार डाला। समाज उन्हें कभी माफ नहीं करेगा।'
बैंसला के पास राजनीति में आने का अपना ही तर्क है। वे मानते हैं कि राजनीतिक रूप से सक्षम हुए बिना किसी भी समाज का भला नहीं हो सकता। चुनाव लडऩे के मकसद के बार में उन्होंने बताया कि 'मैं राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं, लेकिन समाज के भले के लिए चुनाव लड़ रहा हूं। आंदोलन के दौरान हमारे पास कोई मजबूत नेता होता तो हमें आरक्षण मिल चुका होता। 2010 में आरक्षण की अवधि समाप्त हो रही है। आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा होने चाहिए। मैं संसद में जाकर यही मांग करुंगा। आरक्षण सामाजिक समानता लाने के उद्देश्य से भटक गया है।' शुरू से ही बैंसला के खिलाफ रहे गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल उनके इस तर्क से सहमत नहीं है। वे कहते हैं, 'कर्नल साहब समाज के मान-सम्मान पर पैर रखकर उस कुनबे में शामिल हो रहे हैं जिसने गुर्जरों के 71 बेटों की हत्या करवाई हो। समाज में अब उनकी कोई इज्जत नहीं बची है।'

मंगलवार, अप्रैल 07, 2009

वाकई जादूगर!


अशोक गहलोत सियासत में भी सफल जादूगर साबित हो रहे हैं। बसपा के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर उन्होंने भाजपा से जोड़तोड़ का विकल्प छीन लिया है, किरोड़ी को कहीं का नहीं छोड़ा है और बसपा के बढ़ते कदमों को रोक दिया है। आखिर कैसे चला गहलोत का जादू? अंदर की कहानी!

सूबे में चल रही सियासी उठापठक के बीच अशोक गहलोत एक बार फिर अपने राजनीतिक कौशल का जौहर दिखाते हुए विजेता साबित हुए हैं। बहुजन पार्टी के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर उन्होंने सरकार का पांच साल का बीमा तो करा ही लिया है, डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और भारतीय जनता पार्टी को भी पटकनी दे दी है। राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या अब 102 हो गई है, यानी सरकार को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। अब गहलोत को न तो उन्हें 'डिक्टेट' करने वाले किरोड़ी लाल मीणा की जरूरत है और न ही अन्य किसी के समर्थन की। उन्होंने सुकून से पांच साल सरकार चलाने का इंतजाम कर लिया है।
राजस्थान में पैर जमाने की कोशिश कर रही बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार विधानसभा चुनाव गंभीरता से लड़ा था। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव लडऩे तक पार्टी ने खूब मेहनत की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती और उनकी सरकार के कई मंत्रियों ने राज्य में जमकर प्रचार किया। चुनाव परिणामों में भी इसका असर दिखा और पार्टी छह सीटें जीतने में सफल हुई। साथ ही पार्टी के उम्मीदवार 10 सीटों पर दूसरे और 71 पर तीसरे स्थान पर रहे। वैसे तो बसपा ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान पहुंचाया, पर ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ। बसपा कई सीटों पर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रही। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस के कई आला नेताओं ने साफ तौर पर माना कि बसपा नहीं होती तो राज्य में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलता। हालांकि सरकार के गठन में कांग्रेस को कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़े। किरोड़ी लाल मीणा के समर्थन से गहलोत की राह और आसान हो गई।
गहलोत सरकार के गठन में बसपा की भी भूमिका रही। पार्टी ने सरकार को बाहर से समर्थन तो दिया, लेकिन लंबी जद्दोजहद के बाद। दरअसल, बसपा के ज्यादातर विधायक सरकार में शामिल होना चाहते थे। सूत्रों के मुताबिक पार्टी नेतृत्व की ओर से मनाही होने के बाद कई विधायकों ने कांग्रेस में शामिल होने का मन बना लिया था, लेकिन दलबदल कानून और कांग्रेस की ओर से ज्यादा तवज्जों नहीं मिलने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। इस बीच बसपा में आपसी फूट सार्वजनिक होने लगी। प्रदेश प्रभारी व राष्ट्रीय महासचिव धर्मवीर अशोक पर पैसे लेकर टिकट बांटने के आरोपों की झड़ी लग गई। बसपा विधायक दल के नेता राजेंद्र सिंह गुढ़ा सहित कई विधायक भी इसमें शामिल हो गए। उन्होंने तो यहां तक कहा कि 'धर्मवीर अशोक ने टिकटों के नाम पर 100 करोड़ रुपए डकार गए। मुझसे भी पांच लाख रुपए मांगे गए।' पार्टी के भीतर बढ़ते विवाद के बीच विधायकों ने कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ाना शुरू कर दिया। सूत्रों के मुताबिक बसपा विधायकों ने तो काफी समय पहले ही कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा जाहिर कर दी थी, लेकिन गहलोत किसी जल्दबाजी के मूड में नहीं थे।
इस दौरान लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गईं। उम्मीदवार तय करने की बारी आई तो डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा कर दी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस को साफ तौर पर कह दिया कि 'मेरा समर्थन चाहिए तो सात सीटों पर मेरे हिसाब से टिकट देने होंगे।' किरोड़ी की इस डिमांड से कांग्रेसी हक्के-बक्के रह गए। कई नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की, पर नहीं माने। अशोक गहलोत ऐसी स्थितियों में काम करने के आदी नहीं है। लिहाजा, वे बोल पड़े 'किरोड़ी कांग्रेस को डिक्टेट नहीं करें। वे पहले पार्टी में शामिल हों और फिर टिकटों पर बात करें।' कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो गहलोत किरोड़ी को एक सीट से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं, वह भी उनके पार्टी में शामिल होने के बाद। दरअसल, किरोड़ी दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वे दौसा से चुनाव तो लडऩा तो चाहते तो हैं पर कांग्रेस के सिंबल पर नहीं। वे कांग्रेस में शामिल हो कर चुनाव लड़ते हैं तो दलबदल कानून के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ऐसे में वे लोकसभा चुनाव हार गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। किरोड़ी इतनी बड़ी रिस्क लेने को तैयार नहीं है।
कांग्रसी नेताओं की ओर से किरोड़ी की मान-मनौव्वल के बीच केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा के एक बयान से खलबली मच गई। उन्होंने गहलोत की उपस्थिति में कहा कि 'किरोड़ी टोंक-सवाई माधोपुर से मेरा टिकट कटवाने में लगे हैं। उनका टिकट कटा तो वे किरोड़ी के प्रचार रथ को गांवों में घुसने नहीं देंगे।' नमोनारायण के इस बयान से किरोड़ी लाल पीले हो गए। उन्होंने गहलोत पर दबाव बनाने के लिए पत्नी गोलमा देवी का इस्तीफा मुख्यमत्री को भिजवाते हुए तल्ख लहजे में कहा कि 'मैं भाजपा को हराने के मकसद से कांग्रेस के साथ आया था। मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष की उपस्थिति में नमोनारायण मीणा की टिप्पणी दुर्भाग्यजनक है। कांग्रेस मुझ पर हमले करना बंद करे। मैं कांग्रेस के टिकट को ठोकर मारता हूं। उसे जो भी करना है जल्दी करे। देरी कर मुझे बदनाम नहीं करे।' किरोड़ी को पूरी उम्मीद थी कि गहलोत उनके सामने घुटने टेक देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। गहलोत ने नमोनारायण के बयान को 'एक्शन का रिएक्शन' बताते हुए किरोड़ी को पार्टी ज्वाइन करने की सलाह दे डाली।
तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा ने अशोक गहलोत को सत्ता से बाहर करने अवसर तलाश लिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक पार्टी के आला नेताओं ने किरोड़ी लाल मीणा से संपर्क कर उन्हें मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया। शर्त यह थी कि बसपा समेत सभी निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में गहलोत सरकार को गिराएं। गहलोत के जाने पर किरोड़ी सरकार बनाने का दावा पेश करें जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे। किरोड़ी को यह ऑफर पूरी तरह से पसंद आ गया था। हालांकि पहले भाजपा का स्थानीय नेतृत्व इस फॉर्मूले पर राजी नहीं था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के दबाव के बाद वह भी तैयार हो गया। इतना ही नहीं वसुंधरा राजे ने तो 2003 के चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाले सुधांशु मित्तल को भी जयपुर बुला कर धनबल का खेल खेलने की पूरी तैयारी कर ली थी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने किरोड़ी को खुश करने के लिए उनके रथ को गांवों में नहीं घुसने देने का बयान देने वाले नमोनारायण मीणा पर रासुका लगाने की मांग कर डाली। भाजपा ने चुनाव आयोग से किरोड़ी लाल और गोलमा देवी की सुरक्षा बढ़ाने की लिखित में मांग भी की।
इससे पहले कि भाजपा की यह योजना आगे बढ़ पाती, गहलोत को इसकी भनक लग गई। उन्होंने इसे एनकाउंटर करने के लिए ऐसा कदम उठाया कि सब भौचक रह गए। राज्य में बसपा के सभी छह के छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। गहलोत ने यह कदम उठा एक तीर से कई शिकार किए हैं। किरोड़ी को तो उन्होंने जमीन सुंघा दी है। किरोड़ी अब घर के रहे हैं न घाट के। सूबे के सीएम बनने का ख्बाव पालने के चक्कर में उन्होंने राज्य सरकार में मजबूत स्थित को गंवा दिया है। हालांकि वे सरकार को महज एक विधायक की हैसियत से सरकार को समर्थन दे रहे थे, पर उनकी मंत्री से ज्यादा चलती थी। स्वयं की पत्नी के अलावा परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी तो उनके कहे में चलते ही थे। गहलोत उन्हें अब पहले की बराबर तवज्जों नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें अब सरकार चलाने के लिए किरोड़ी के समर्थन की जरूरत नहीं है। जहां तक दौसा से टिकट का सवाल है, गहलोत ने साफ कर दिया है कि किरोड़ी कांग्रेस के टिकट पर यहां से लड़ सकते हैं। कुल मिलाकर समूचे घटनाक्रम के बाद किरोड़ी स्वयं को लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं। भाजपा भी अब उन पर उतना ध्यान नहीं देगी। भाजपा तो उन्हें गहलोत सरकार को गिराने तक यूज करने के मूड में थी। इसी बहाने किरोड़ी लोकसभा चुनाव में भाजपा की मदद भी कर देते। यदि किरोड़ी अब फिर से भाजपा का दामन थामते हैं तो घाटे में रहेंगे, क्योंकि जिस भाजपा को पिछले कई महीनों से जमकर कोस रहे थे, उसी के लिए जनता से वोट किस मुंह से मांगेंगे?
गहलोत एक ही झटके में बसपा इफैक्ट से निपटने में भी कामयाब रहे हैं। राज्य में पिछले कुछ समय से बसपा का जनाधार तेजी से बढ़ रहा था। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हो रहा था। बसपा के विधायकों के पाला बदलने के बाद कम से कम लोकसभा चुनावों तक तो हाथी हाथ का हुलिया नहीं बिगाड़ पाएगा। विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने से बसपा को नेताओं की कमी से जूझना पड़ेगा। लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी बुरी तरह से प्रभावित होंगी। कई सीटों पर ये विधायक ही लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में थे। इस पूरे मामले से भाजपा को भी सबक मिला है। पार्टी के पास आगामी पांच साल तक विपक्ष में बैठे रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। वैसे भाजपा को जनादेश भी यही मिला था और लोकतंत्र में जनादेश ही सर्वोपरी होता है।

शनिवार, मार्च 28, 2009

सिमटते सीपी


प्रदेश के कांग्रेसी मुखिया डॉ। सी.पी. जोशी एक बार फिर संकट में हैं। मुख्यमंत्री बनने का सपना टूटने के बाद लोकसभा में पहुंचने की उनकी उम्मीदें भी तार-तार हो सकती हैं। कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार तो बनाया है, पर चाही गई सीट से नहीं। आखिर क्यों सिमट रही है सीपी की सियासत? अंदर की कहानी!

राजनीति को यदि खेल माना जाए तो यह क्रिकेट के काफी करीब है। गौर से देखें तो क्रिकेट के कई केरेक्टर राजनीति की पिच पर खेलते हुए मिल जाएंगे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी उन्हीं धुरंधरों में से एक हैं। सूबे के कांग्रेसी निजाम डॉ. सी.पी. जोशी के नजरिए से देखें तो उनके लिए गहलोत 'स्लो डेथ' यानी वेस्टइंडीज के अंपायर स्टीव बकनर से कम नहीं हैं। वैसे बकनर की माफिक गहलोत कई नेताओं के लिए घातक साबित हुए हैं, लेकिन डॉ. जोशी के साथ उनका वैर ठीक वैसा ही है जैसा वेस्टइंडीज के अंपायर का मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के साथ। संकेतों को छोड़ सीधी भाषा में बात करें तो कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी एक बार फिर दिक्कत में हैं। वजह एक बार फिर अशोक गहलोत की सक्रियता बनी है। दरअसल, जोशी चित्तौडग़ढ़ से लोकसभा का चुनाव लडऩा चाहते थे, पर पार्टी ने उन्हें भीलवाड़ा से टिकट दे दिया। जोशी के लिए यहां के रास्ते लोकसभा में पहुंचना बेहद कठिन साबित हो रहा है। प्रदेश में कांग्रेस का मुखिया होते हुए भी उनकी बात नहीं मानने का यह वाकया पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी उन्हें साइड लाईन करने के कई प्रयास होते रहे हैं।
लोकसभा के टिकट वितरण में जोशी हर स्तर पर कमजोर नजर आए। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते पार्टी ने उनसे सलाह-मशविरा प्रत्येक सीट के लिए किया, लेकिन उनकी चली कितनी इसका अंदाजा स्वयं को मिले टिकट के आधार पर लगाया जा सकता है। जोशी ने चित्तौडग़ढ़ से टिकट पाने के लिए पूरा जोर लगाया था। वे इसके लिए पूरी तरह आश्वस्त भी हो गए थे, पर उनका मुकाबला राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास से होने से पूरी गणित बिगड़ गई। दस जनपथ की चहेती होने लाभ स्पष्ट रूप से व्यास को मिला। कल तक जोशी के पीछे खड़े रहने वाले केंद्रीय नेता एक-एक करके व्यास के साथ हो लिए और वे टिकट हासिल करने में कामयाब हो गईं। उनकी उम्मीदवारी में अशोक गहलोत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रही। शुरूआत में गहलोत कांग्रेस की इस नेत्री के समर्थन में आने से ठिठक रहे थे। वहज थी विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए हुई रस्साकशी। गौरतलब है कि गिरिजा व्यास भी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में थीं। गहलोत को जब इसका अंदाजा हुआ कि वे गिरिजा की पैरवी नहीं कर जोशी को मदद पहुंचा रहे हैं तो उन्होंने रुख बदल लिया।
चित्तौडग़ढ़ से टिकट नहीं मिलने से तिलमिलाए जोशी पर भीलवाड़ा सीट निकालने का भारी दवाब है। यहां से जीतने के लिए वे कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते, पर विरोधी उन्हें हर चाल पर मात देने पर जुटे हैं। भीलवाड़ा में गुर्जर मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। जोशी ने इन्हें रिझाने के लिए गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल से संपर्क किया तो वे मदद करने की एवज में कोटा से कांग्रेस के टिकट की जिद पर अड़ गए। जोशी को गुंजल की इस जिद को पूरा करने में पसीना आ रहा है। पार्टी के ज्यादातर नेता गुंजल को टिकट दिए जाने की खिलाफत कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी इनमें शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक जोशी की तो पिछले दिनों में मंडावा में आयोजित मुख्यमंत्री की सभा में गुंजल को पार्टी में शामिल करने की योजना थी, पर संभावित विरोध को देखते हुए उन्होंने ऐन वक्त पर इरादा त्याग दिया। मीडियाकर्मियों ने जब इस बारे में गहलोत से पूछा तो उन्होंने 'इस बारे में सीपी जी ही बता सकते हैं' कहते हुए पूरी बात जोशी के ऊपर डाल दी। गुंजल की पैरवी करने के चक्कर में पार्टी के कई नेता तो उनसे नाराज हो ही गए हैं, कई जातियां भी उनके खिलाफ लामबंद हो रही हैं। ऐसी खबरें हैं कि भीलवाड़ा संसदीय क्षेत्र में कई जगह मीणा जाति के लोगों ने गुंजल को कोटा से कांग्रेस प्रत्याशी बनाए जाने की स्थिति में जोशी के विरूद्ध मतदान करने का निर्णय लिया है। सूत्रों के मुताबिक डॉ. किरोड़ी लाल मीणा भी गुंजल का खैरख्वाह बनने के कारण जोशी से खासे नाराज हैं। यदि मीणा वोटरों ने जोशी का साथ नहीं दिया तो वे मुश्किल में पड़ सकते हैं। वैसे भी इस बात की संभावना कम ही है कि गुंजल, जोशी को गुर्जर वोट दिला पाएंगे, क्योंकि विधानसभा चुनावों में गुंजल गुर्जर बाहुल्य हिण्डोली से तीसरे स्थान पर रहे थे। यदि वोटों के गणित पर जाएं तो उन्हें पूरे गुर्जर मत भी नहीं मिले। ऐसे में वे जोशी की नैया कैसे पार लगा पाएंगे? गौरतलब है कि हिण्डोली विधानसभा क्षेत्र भीलवाड़ा संसदीय सीट का ही एक हिस्सा है।
जोशी की मुश्किलें यहीं तक सिमट जाती तो भी ठीक था, लेकिन उन्हें और भी कई मुश्किलों से रूबरू होना पड़ रहा है। दरअसल, अशोक गहलोत बड़े सलीके के साथ जोशी को किनारे कर रहे हैं। टिकट वितरण में जो कुछ भी अच्छा हुआ उसका पूरा श्रेय तो गहलोत ले गए और विवादों का ठीकरा जोशी के सिर फोड़ दिया। उम्मीदवारों के चयन को लेकर जहां भी विवाद पैदा हो रहे हैं, सबके लिए जोशी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, क्योंकि प्रदेश में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते वे ही संभावितों के पैनल बनाने व नाम फाइनल करने में सक्रिय नजर आए। यह बात अलग है कि इसमें उनकी ज्यादा चली नहीं। जिन नेताओं के टिकट कटे हैं, उनसे तो जोशी का वैर बंध ही गया है। कुल मिलाकर निर्णय लेने की प्रक्रिया में जोशी नीचे के पायदानों पर खिसकते चले गए और गहलोत ऊपर चढ़ते गए। किरोड़ी लाल मीणा का ही मामला लें। किरोड़ी लंबे समय से कांग्रेस को आदेश देने वाली भाषा में बात कर रहे थे। वे सात सीटों पर अपने अनुसार कांग्रेस के टिकट दिलवाना चाहते थे। इससे पहले कि जोशी कुछ बोलते गहलोत के एक बयान ने ही पूरा श्रेय लूट लिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 'किरोड़ी जिस तरह से बात कर रहे हैं वह कांग्रेस की परंपरा नहीं है। अभी तो वे हमारी पार्टी में ही नहीं हैं। यह तय करना बाकी है कि वे पार्टी में आ रहे हैं या पार्टी उन्हें ले रही है। उनके कहने से पार्टी टिकट नहीं देने वाली है। जहां तक उनकी पत्नी गोलमा देवी, परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी की बात है तो वे हमारे साथ हैं। ये तीनों मंत्री किरोड़ी की बात नहीं मानेंगे।'
ऐसा नहीं है कि जोशी हमेशा गहलोत के कोप से पीडि़त रहे हैं। एक समय पार्टी में दोनों की दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। हालांकि राजनैतिक हैसियत के नजरिए से गहलोत हमेशा जोशी से उन्नसी ही रहे। वे उनसे पहले प्रदेश अध्यक्ष बने और फिर मुख्यमंत्री। गहलोत के मुख्यमंत्रित्वकाल में जोशी एक सक्रिय सिपेहसालार की भूमिका में रहे। सूबे के सीएम के रूप में उन्होंने काम तो अच्छा किया, पर वे लोकलुभावन साबित नहीं हुए। चुनावों में जनता ने उन्हें नकार वसुंधरा के सिर ताज सजा दिया। चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस का भी वही हश्र हुआ जो सत्ता चली जाने के बाद सभी पार्टियों का होता है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया। कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए तो नेता हतोत्साहित। आलाकमान ने पार्टी में जान फूंकने के लिए एक के बाद एक कई अध्यक्ष बदले, लेकिन पार्टी पटरी पर नहीं आई। आखिर में सी.पी. जोशी को अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने पार्टी को संगठनात्मक रूप से पुनर्गठित तो किया, पर उनके मन में मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब पलने लगा। इस दौरान विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए। कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में टिकट के दावेदारों की भीड़ बढऩे लगी। स्वाभाव से तल्ख जोशी की भौंहें उस समय तन गईं जब दावेदार उनकी बजाय गहलोत की इर्दगिर्द घूमने लगे। जोशी को इस बात के संकेत मिल गए थे कि गहलोत उनकी मेहनत को मटियामेट करने में जुटे हैं। विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान राज्य में कांग्रेस की पूरी कमान गहलोत ने ली। उनके धुंआधार प्रचार के सामने जोशी बेबस नजर आए। अभी भी उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी, लेकिन चुनाव परिणामों ने जोशी की उम्मीदों को तबाह कर दिया। वे स्वयं महज एक वोट से चुनाव हार गए। हालांकि इसके बाद भी उन्होंने प्रयास किए, पर तब तक गहलोत उनसे कोसों आगे निकल गद्दीनशीं हो चुके थे।
मुख्यमंत्री बनने का सपना टूटने के बाद जोशी ने एक बार राजनीति से तौबा करने की ठान ली थी। उन्होंने इसकी तैयार भी कर ली थी, पर पार्टी आलाकमान से मिले सकारात्मक संकेतों के बाद उन्होंने मन बदल लिया। पहले राहुल गांधी और फिर सोनिया गांधी के राजस्थान दौरे के समय जोशी को जिस तरह से अहमियत मिली, उसे देखकर लगता था कि पार्टी नेतृत्व उन पर पूरी तरह से मेहरबान है। इसी आशा के सहारो जोशी फिर से जोश में आ गए। लोकसभा चुनावों के लिए 'टारगेट-25' बना डाला। आलाकमान को राज्य की पूरी सीटें जिताने का दावा करने वाले जोशी अब स्वयं अपनी सीट पर जीत के लिए जूझ रहे हैं। लगता है हर कदम पर हार जाना ही उनकी किस्मत में है, लेकिन यदि वे अब हारे तो कहीं के नहीं रहेंगे। जोशी को भी इसका अहसास है, इसलिए वे पूरी ताकत लगा रहे हैं।

बुधवार, मार्च 25, 2009

सब मोदी की माया


देश में आम चुनाव, केंद्र सरकार की अर्द्ध सैनिक बल मुहैया कराने के लिए साफ मनाही और राज्य सरकारों के आयोजन से हाथ खड़े करने के बाद एक बार तो लगा था कि आईपीएल का दूसरा संस्करण शुरू नहीं हो पाएगा, लेकिन इसकी कमान एक ऐसी शख्सियत से संभाल रखी है जो धुन के पक्के हैं। वो जो चाहते है, कर गुजरते हैं। जी हां! हम बात कर रहे हैं आईपीएल कमिश्नर और बीसीसीआई उपाध्यक्ष ललित मोदी की। मोदी अपने संपर्कों के के चलते हमेशा चर्चाओं में रहे हैं। चाहे बात फिल्मी सितारों की हो, राजनेताओं की, उद्यागपतियों की या खेल से जुड़ी हस्तियों की। इस बार भारत में भले ही उनके संपर्क जबाव दे गए, पर दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट बोर्ड के सीईओ जेराल्ड मजोला से उनकी मित्रता ने रंग दिखाया। दक्षिण अफ्रीका में ही सही, लेकिन आईपीएल का आयोजन होगा। ऐसा पहली बार नहीं है जब मोदी की मेहनत से फटाफट क्रिकेट का यह महाकुंभ आयोजित होने जा रहा है। दरअसल, सुपरहिट आईपीएल का मजा लेने वाले बहुत कम लोग यह जानते हैं कि क्रिकेट में क्रांति ला देने वाले इस स्वरूप की रूपरेखा ललित मोदी ने ही आज से उन्नीस साल पहले बनाई थी।
1963 में दिल्ली में जन्में मोदी का खिलाड़ी के तौर पर क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। एक उद्योगपति के रूप में उनके 'के.के. मोदी ग्रुप' का वास्ता तंबाकू, धातु, स्वास्थ्य सेवाओं, अचल संपत्ति एवं वित्त तक ही है। उनके अंदर क्रिकेट में कुछ कर गुजरने का जुनून का जन्म अमरीका प्रवास के दौरान हुआ। यहां मोदी को ख्याल आया कि यदि अमरीका में ह्यूस्टन टेक्सन और डिज्नी की माइटी टेक्सन जैसी टीमें करोड़ो डॉलर कमा सकती हैं तो हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? मोदी ने इसके लिए रूपरेखा बनाना प्रारंभ किया। उन्होंने आईपीएल का पहला प्रस्ताव 1990 में बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष माधवराव सिंधिया के सामने रखा। खिलाडिय़ों से अनुबंध किया गया और मुंबई स्टालियंस, कैलकटा टाइगर्स, बंगलूर ब्रेव्स, हैदराबाद हॉक्स एवं ग्वालियर कोब्राज सरीखी टीमें भी बनाई गईं। लेकिन, बात पूरी तरह से बन नहीं पाई और आइडिया फ्लॉप हो गया।
मोदी ने हार नहीं मानी उन्होंने कुछ वर्षों बाद फिर कोशिश की। इस बार उन्होंने पंजाब क्रिकेट एशोसिएशन (पीसीए) का सहारा लेकर अपनी योजना को अमली जामा पहनाने की कोशिश की। मोदी ने सारा मसला पीसीए की वेबसाइट पर डाल दिया। बीसीसीआई को इसकी भनक लगी तो बात बिगड़ गई। इस पूरे घटनाक्रम से मोदी के प्रोजेक्ट को तो कोई फायदा नहीं हुआ पर इंद्रजीत सिंह बिंद्रा के रूप में उन्हें एक भरोसेमंद जरूर मिल गया। बिंद्रा बीसीसीआई के अध्यक्ष रह चुके हैं। बिंद्रा ने मोदी को एक ही मंत्र दिया 'कुछ करना है तो बीसीसीआई में एंट्री कर लो।' मोदी ने इसकी शुरूआत राजस्थान क्रिकेट एशोसिएशन (आरसीए) का अध्यक्ष बन कर की। मौके की नजाकत को समझकर उन्होंने जगमोहन डालमिया के खिलाफ शरद पवार का साथ दिया। पवार ने डालमिया को पटकनी दी और मोदी को पुरस्कार स्वरूप बीसीसीआई के उपाध्यक्ष का पद मिल गया। फिर क्या था, कल तक अपने प्रोजेक्ट के लिए लोगों से मिन्नतें करने वाले मोदी आज उसे खुद स्वीकृत करने की स्थिति में थे। अंतत: अक्टूबर, 2007 में मोदी की सोच पर मुहर लगी। उन्हें आईपीएल का कमिश्नर भी बना दिया गया।
शुरूआत में 9 देशों के आईसीसी स्तर के अस्सी खिलाडिय़ों को सूचीबद्ध किया गया। प्रतियोगिता का कार्यक्रम बनाया। 4080 करोड़ रूपए की भारी राशि में प्रसारण के अधिकार बेचे गए। तय किया गया कि कुल आठ टीमें हिस्सा लेंगी। इन टीमों को खरीदने के लिए 14 औद्योगिक घराने मैदान में कूद पड़े। अपने पसंदीदा खिलाडिय़ों को खरीदने के लिए खुली बोली लगी। भाव करोड़ों में गए। मुकाबले के लिए टीमें तैयार थी। मुकाबले शुरू होने वाले थे। सबके मन में संदेह था कि क्रिकेट का यह नया दौर सफल होगा कि नहीं? पहला मैच बंगलौर के चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेला गया। खचाखच भरे इस स्टेडियम को देखकर सारे संदेह दूर हो रहे थे। दर्शकों को क्रिकेट का यह नया संस्करण बेहद पसंद आ रहा था। खेल के साथ रोमांच और मनोरंजन का यह मिश्रण लोगों को खूब भाया। स्टेडियम तो फुल थे ही टीवी पर भी करोड़ों लोगों ने मैचों का पूरा मजा लिया। टेलीविजन के प्राइम टाईम में लोगों ने एकता कपूर के नाटकों को भुला दिया। मोदी की यह कल्पना जब साकार हुई तो उसे 'उम्मीद से दुगनी' सफलता मिली। मोदी ने प्रतियोगिता के दौरान गजब का तालमैल बिठाया। काम कहीं रूके नहीं इसके लिए अपने अधिकार, अनुभव और रसूख तीनों का सही इस्तेमाल किया। उन्होंने मैचों के दौरान स्थानीय क्रिकेट एशोसिएशनों को मुनाफे का लालच दिखाकर तमाम सुविधाएं बटोरने में कामयाबी हासिल की।
आईपीएल की कामयाबी से बुलंदियों पर पहुंचे ललित मोदी विवादों में भी घिरे रहे हैं। आईपीएल से जुड़े हुए विवादों की ही बात करें तो लीग की तीन टीमों में उनका पैसा लगा होने की चर्चाएं आम हैं। राजस्थान रॉयल्स, जिसके मालिकों में से एक अफ्रीका में व्यवसाय करने वाले उनके बहनोई हैं। किंग्स इलेवन के मालिकों में से एक मोहित बर्मन के भाई उनके दामाद हैं। इसके अलावा कोलकाता नाइट राइडर्स में भी उनका काफी पैसा लगे होने की खबर है। बहरहाल तमाम तरह के विवादों से दूर मोदी आईपीएल के दूसरे ऐपीसोड के सफल आयोजन की तैयारी में जुटे हैं।

शनिवार, मार्च 21, 2009

संकट में सल्तनत


विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद भी महारानी की दिक्कतें कम नहीं हो रही हैं। झालावाड़ लोकसभा सीट पर उनके पुत्र दुष्यंत सिंह इस बार पसीना आ रहा है। वसुंधरा को अपने बेटे को जीत सुनिश्चित करने के लिए दम लगाना पड़ रहा है। आखिर क्यों फंस गए हैं दुष्यंत मुकाबले में?

प्रत्याशियों की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी ने प्रचार अभियान में भी कांग्रेस से बाजी मार लेने के बाद भी महारानी का मूड इन दिनों कुछ ठीक नहीं है। बारां जिले से पार्टी के प्रचार अभियान की शुरूआत करते वक्त उनके माथे पर चिंता की लकीरों के बीच चमकता पसीना परेशानी का संकेत कर रहा था। महारानी कुछ दिन पहले भी यहां मतदाताओं की नब्ज टटोलने आईं थीं। वैसे वसुंधरा ही नहीं, राजस्थान की राजनीति को समझने वाले हर शख्स की नजरें इस क्षेत्र पर हैं, क्योंकि महारानी के लाड़ले दुष्यंत सिंह यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में आसानी से जीत संसद की देहरी चढऩे वाले दुष्यंत इस बार मुकाबले में फंस गए हैं। बेटे को फंसता देख एक बार तो वसुंधरा ने ही मैदान में उतरने की तैयारी कर ली थी, लेकिन खुद का बनाया हुआ एक नियम ही आड़े आ गया, जिसके तहत विधायकों को टिकट नहीं देने का फैसला हुआ था। हालांकि सूबे की सियासत में सक्रिय रहने का मोह भी इसकी एक वजह था। फिलहाल, दुष्यंत को ही झालावाड़-बारां सीट से मैदान में उतार दिया गया है और महारानी वोटरों को बेटे के पक्ष में मोडऩे के लिए दिन-रात एक कर रही हैं। करें भी क्यों नहीं, यदि दुष्यंत हार गए तो वसुंधरा की 20 साल पुरानी सियासी विरासत हाथ से निकल जाएगी।
झालावाड़ के साथ वसुंधरा के राजनीतिक रिश्ते की बात करें तो वे यहां से 1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव लडऩे क्या आईं, यहीं की होकर रह गईं। यहां की जनता को वे और उन्हें यहां की जनता खूब रास आई। महारानी यहां से लगातार पांच बार सांसद का चुनाव जीतीं। कांग्रेस हर चुनाव में प्रत्याशी बदल उन्हें हराने का प्रयास करती रही, पर सफलता नहीं मिली। 2003 उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनका झालावाड़ जिले के प्रति प्रेम बरकार रहा। वे जिले की झालरापाटन सीट से विधायक का चुनाव लड़ीं। स्वयं के सूबे की सियासत में सक्रिय होने के बाद जब अपनी विरासत को संभालाने की बारी आई तो बेटे दुष्यंत से अच्छा विकल्प क्या हो सकता था। उन्हें राजनीति में लाने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था। राज्य में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में चली लहर और तेज हो गई थी। लिहाजा उन्होंने दुष्यंत को झालावाड़ से मैदान में उतार दिया। इन चुनावों में झालावाड़ के मतदाताओं ने दुष्यंत को भी उतना ही समर्थन दिया जितना कि महारानी को मिलता था। वे आसानी से चुनाव जीत गए।
झालावाड़ के रास्ते संसद की सीढिय़ा चढ़ते ही दुष्यंत का राजनीति में सफल पदार्पण तो हो गया, पर इस एंट्री के मुताबिक प्रदर्शन करने का दबाव भी उन पर आ गया। राज्य की मुख्यमंत्री का बेटा होना उनके लिए फायदेमंद और नुकसानदायक, दोनों रहा। फायदा यह हुआ कि राज्य सरकार ने उनके क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए धन की कोई कमी नहीं आने दी। विकास के काम भी खूब हुए, पर सबका श्रेय मुख्यमंत्री को मिलता चला गया। सियासत के शुरूआती दौर में एक राजनेता के लिए इससे बड़ा नुकसान और क्या हो सकता है कि काम भी होता रहे और श्रेय भी नहीं मिले। महारानी को जब इसका आभास हुआ तो उन्होंने दुष्यंत का आगे करना शुरू किया, पर क्षेत्र में वसुंधरा की लोकप्रियता के सामने वे कहीं दिखे ही नहीं। वे अपनी मां के आभामंडल में ओझल ही होते चले गए। कुल मिलाकर वे अपनी अलग पहचान बनाने में नाकाम रहे।
क्षेत्र की जनता कई मुद्दों को लेकर दुष्यंत सिंह से खासी नाराज है। एक सांसद के रूप में वे ज्यादातर मोर्चों पर नाकाम साबित हुए। झालावाड़ को रेलवे लाइन से जोडऩे और अफीम काश्तकारों के पट्टों की बहाली में उन्होंने लोगों को निराश ही किया। पिछले लोकसभा चुनाव में दुष्यंत सिंह के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े संजय गुर्जर की मानें तो महारानी के बेटे ने सांसद धर्म का पालन ही नहीं किया। गुर्जर बताते हैं कि 'दुष्यंत सिंह राजस्थान की पूरी सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से चुनाव जीते थे। जीतते पर उन्होंने सांसद धर्म का पालन करने की बजाय सरकार का कर्ज उतारना शुरू किया। यहां तक की सांसद कोष की राशि भी राजस्थान सरकार की योजनाओं में खर्च की गई। उन्होंने अपने क्षेत्र की कम राज्य सरकार के कामकाज की चिंता ज्यादा रहती थी।' दुष्यंत सिंह की ओर से विकास कार्यों के दावों पर गुर्जर कहते हैं, 'जिन विकास कार्यों की दुहाई देकर वोट मांग रहे हैं, उन्हें क्षेत्र की जनता विधानसभा चुनाव में ही नकार चुकी है। पूरे क्षेत्र में कांगे्रस ने भाजपा पर भारी बढ़त बनाई थी। लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग का यही पैटर्न रहेगा और दुष्यंत सिंह चुनाव हारेंगे।' हालांकि दुष्यंत सिंह अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नजर आते हैं। वे कहते हैं, 'मेरे संसदीय क्षेत्र में विकास से कोई भी अछूता नहीं रहा है। पर्यटन, पेयजल, कृषि और रोजगार समेत लगभग सभी क्षेत्रों में रिकॉर्ड विकास हुआ है। केंद्र सरकार की भारी उपेक्षा के बाद भी हम विकास की गंगा बहाने में कामयाब रहे हैं। केंद्र सरकार ने हर स्तर पर विकास का अवरुद्ध करने का प्रयास किया। मैंने बड़ी कोशिशों के बाद काली सिंध बांध के लिए चार सौ करोड़ रुपए मंजूर करवाए, लेकिन केंद्रीय जल आयोग ने ही इस पर अडंगा लगा दिया। अफीम काश्तकारों के पट्टे निरस्त करने में भी केंद्र सरकार की साजिश है, लेकिन क्षेत्र की जनता जागरुक है। वह असलियत जानती है। मुझे इस बार भी भारी समर्थन मिलेगा और मैं जीतूंगा।'
विकास के दावों और लोगों की नाराजगी को अपनी जगह छोड़ दें तो भी दुष्यंत की राह आसान नहीं है, क्योंकि परिसीमन के बाद उनके संसदीय क्षेत्र में शामिल हुए बारां जिले में भारतीय जनता पार्टी का जनाधार में भारी कमी आई है। यह वही बारां जिला है, जहां विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को एक भी सीट नसीब नहीं हुई थी। मदन दिलावर और प्रताप सिंह सिंघवी सरीखे दिग्गज भाजपाई भी चुनाव हार गए थे। वसुंधरा राजे भी यह अच्छी तरह जानती हैं कि बारां जिले में अच्छा प्रदर्शन किए बिना दुष्यंत का जीतना संभव नहीं है। लिहाजा उन्होंने पूरा ध्यान यहीं लगा रखा है। कुछ दिन पहले ही वे यहां तीन दिन तक रुककर गई हैं। वे यहां क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों से मिलीं और बेटे दुष्यंत के लिए समर्थन मांगा। भाजपा के प्रचार अभियान की शुरूआत भी उन्होंने न केवल यहां से की, बल्कि कई दिनों तक यहीं डटी रहीं। महरानी यहां मेहनत तो खूब कर रही हैं, पर उतनी सफलता नहीं मिल रही है। इसका बड़ा कारण यह है कि इस क्षेत्र में परंपरागत रूप से कांग्रेस के वोटर ज्यादा है।
क्षेत्र में गुर्जर मतदाताओं की भारी संख्या भी दुष्यंत के लिए चिंता का विषय है। आरक्षण आंदोलन के बाद इस बात की संभावना कम ही है कि गुर्जर भाजपा को वोट देंगे। भले ही उम्मीदवार के रूप में उनकी समधन का बेटा ही क्यों न हो। हालांकि कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला अभी भी महारानी के सुर में सुर मिला रहे हैं, पर आम गुर्जर उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के समय भी उन्होंने गुर्जरों से भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ था। वैसे भी कर्नल बैंसला का इस क्षेत्र में उतना प्रभाव नहीं है। हालांकि गुर्जरों को मनाने के लिए दुष्यंत के साथ-साथ उनकी पत्नी निहारिका पिछले काफी समय से क्षेत्र में सक्रिय है। निहारिका गुर्जरों से बेटी की लाज रखने के लिए मिन्नते कर रही हैं। उनकी अपील कुछ काम कर सकती है।
बेटे की कमजोर स्थिति के चलते सल्तनत पर आए संकट से निपटने के लिए महारानी सभी रास्तों पर एक साथ चल रही हैं। चलना उनकी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। मजबूरी अपनी सल्तनत को बचाने की है और जिम्मेदारी दिक्कत में फंसे बेटे को निकालने की है। हार के खतरे से जूझ रहे दुष्यंत स्वयं कोई हल ढूंढऩे की बजाय एक बार फिर से महारानी के पीछे-पीछे चल रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि मां की अंगुली पकड़ कर वे एक बार फिर से संसद की सीढिय़ां चढ़ जाएंगे। वहीं, रास्ते में आ रही रुकावटों को देख महारानी शायद ये सोचने पर मजबूर हो रही कि 'इससे अच्छा तो मैं ही चुनाव लड़ लेतीं।'

रविवार, मार्च 15, 2009

जूझते जादूगर


अशोक गहलोत इन दिनों तीन-तीन मोर्चों पर एक साथ जूझ रहे हैं। सहयोगी साथ चलने के बजाय आगे चलने पर आमादा हैं, संगठन में कई नेता कुर्सी पाने का ख्वाब बुन रहे हैं और सरकार में अनुभवी मंत्रियों की कमी खल रही है। गहलोत कैसे पार पाएंगे इन मुश्किलों से? अंदर की कहानी!

सहयोगी, संगठन और सरकार, तीनों में से किसी का नाम सुनते ही अशोक गहलोत के माथे पर बल पड़ जाते हैं। पड़ें भी क्यों नहीं, तीनों ओर से संकट खड़े होते रहते हैं। सहयोगी आए दिन आंखे दिखाकर यह याद दिलाना नहीं भूलते कि सरकार उन्हीं के सहारे चल रही है, संगठन यानी कांग्रेस के कई दिग्गज गहलोत के गद्दीनशीं होने के सच को अभी तक पचा नहीं पा रहे हैं और अनुभवी मंत्रियों की कमी के चलते सरकार चलाने में भी उन्हें दिक्कत आ रही है। एक साथ तीन-तीन मोर्चों पर जूझना गहलोत के लिए नया अनुभव है, क्योंकि पिछली सरकार वे भारी बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने थे। सहयोगी तो थे ही नहीं, संगठन में किसी ने उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटाई और सरकार तो वे अपने ढंग से चलाते ही थे, लेकिन इस बार कहानी अलहदा है। लिहाजा, गहलोत के तेवर इस बार बदले-बदले से हैं। वे इन दिनों सियासत में सफल होने के लिए 'संतुलन' नाम का नया सलीका सीख रहे हैं।
गहलोत के सामने आए संकटों की फेहरिस्त में सबसे पहले सहयोगियों की बात करें तो राज्य में कांग्रेस पहली बार इनके सहारे सरकार चला रही है। हालांकि सरकार बनाते समय अशोक गहलोत को कोई परेशानी नहीं आई थी, क्योंकि साधारण बहुमत का आंकड़ा तो जीत कर आए कांग्रेस के बागियों के घर वापसी से ही पूरा हो गया। किरोड़ी लाल मीणा के समर्थन देने से बहुमत और पुख्ता हो गया। गहलोत ने भी सरकार बनाते ही यह सीख लिया कि समर्थन देने वालों को कैसे खुश रखना है। किसी को मंत्री बना दिया तो किसी को संसदीय सचिव। किरोड़ी लाल मीणा को भी मंत्री पद का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने पत्नी गोलमा देवी को मंत्री बनवा दिया। ऐसा नहीं है कि किरोड़ी को मंत्री पद का मोह नहीं रहा, लेकिन उनका इरादा सांसद का चुनाव लडऩे का है। वो भी परिसीमन के चलते अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हुई दौसा सीट से। किरोड़ी की इस मंशा ने गहलोत के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है, क्योंकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा भी यहीं से चुनाव लडऩा चाहते हैं। बात यहीं तक होती तो ठीक थी, लेकिन सूबे की सरकार के तीन मंत्रियों परसादी लाल मीणा, गोलमा देवी और रामकिशोर सैनी के रुख ने गहलोत को मुश्किल में डाल रखा है।
यूं तो परसादी लाल गहलोत मंत्रिमंडल में कैबीनेट मंत्री हैं, पर वे सरकार के साथ चलने की बजाय किरोड़ी के पीछे-पीछे चलना ज्यादा पसंद करते हैं। वैसे परसादी पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। वे किरोड़ी के समर्थन पर निर्दलीय ही मैदान में कूद पड़े और अच्छे मतों से जीत भी गए। जीतते ही उन्होंने साफ कर दिया कि वे किरोड़ी के कहे अनुसार सरकार को तो समर्थन दे रहे हैं, पर कांग्रेस में वापसी नहीं कर रहे हैं। मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कई मौकों पर यह साबित किया कि उनके असली मुखिया अशोक गहलोत नहीं किरोड़ी लाल हैं। किरोड़ी के दौसा से लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा पर भी उनका साफ रुख है। वे कहते हैं, 'कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है तो दौसा से किरोड़ी लाल को उम्मीदवार बनाए, नहीं तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे।' गहलोत को परसादी लाल इस चेतावनी भरी सलाह में गोलमा देवी भी सुर मिलाती हैं। उनसे तो उम्मीद भी यही है। वैसे भी वे पत्नी धर्म निभाकर गलत भी क्या कर रही हैं? किरोड़ी के सहारे ही वे विधायक बनीं, फिर मंत्री बनीं। अब पति को संसद पहुंचाने के लिए सरकार को आंख दिखाने का काम तो वे कर ही सकती हैं। रामकिशोर सैनी के साथ भी ऐसा ही है। किरोड़ी का हाथ थामकर ही वे विधानसभा चुनाव जीते और फिर मंत्री बने, फिर अब उनका साथ कैसे छोड़ सकते हैं। बहरहाल, किरोड़ी लाल के बाद अपनी सरकार के तीन मंत्रियों के जिद पर अडऩे के बाद उपजे हालातों से निपटना गहलोत के लिए बेहद मुश्किल है, वे किरोड़ी को दौसा से उम्मीदवार बनाए जाने की पैरवी करते हैं तो नमोनारायण नाराज होते हैं और नहीं करते हैं तो किरोड़ी के साथ-साथ स्वयं की सरकार के ही दो मंत्री नाराज होते हैं। अब यह गहलोत को तय करना है कि वे किसे नाराज करते हैं।
सहयोगियों की अलावा संगठन के स्तर पर भी गहलोत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के कई नेता अभी भी सीएम की कुर्सी को मोह नहीं त्याग पाए हैं। वैसे गहलोत विरोधी धड़े के नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है, लेकिन अभी सी.पी. जोशी उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के समय गहलोत और जोशी के बीच पनपी खाई निरंतर चौड़ी ही होती जा रही है। जोशी को एक वोट से मिली शिकस्त और गहलोत की ताजपोशी के बाद दोनों के बीच की दूरियां और बढ़ गईं। पिछले दिनों राहुल गांधी और सोनिया गांधी के कार्यक्रमों में भी यह साफ तौर पर दिखाई दिया कि आने वाले दिनों में गहलोत की राह आसान नहीं होगी। मंत्रिमंडल विस्तार में हुई देरी से यह बात साबित हो जाती है कि न तो कांग्रेस में संगठन स्तर पर सब कुछ ठीक चल रहा है और न ही आलाकमान ने इस बार गहलोत को फ्रीहैंड दे रखा है। लाख कोशिशों के बाद भी गहलोत अपने कई चहेतों को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दिला पाए, जबकि कई लोगों को मजबूरी में शपथ दिलवानी पड़ी। रघुवीर मीणा को ही लें। मीणा तीसरी बार विधायक बने हैं। उन्हें गहलोत का भी खास माना जाता है। राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही सभी ने कयास लगाए थे कि मीणा का कैबीनेट मंत्री बनना तय है, लेकिन गहलोत लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें उप मुख्य सचेतक ही बना पाए। वैसे विरोधी धड़ा चाहे कितनी ही कोशिश क्यों न करे, पर वे आज भी आलाकमान की पहली पसंद है और उनकी इस पोजीशन को हिलाना भी आसान नहीं है।
अशोक गहलोत को सहयोगियों और संगठन के स्तर पर ही समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ रहा है, सरकार के स्तर पर भी उन्हें कई परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। कांग्रेस के ज्यादातर अनुभवी नेताओं के चुनाव हार जाने के कारण सरकार के सुचारू संचालन में गहलोत को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी के चलते स्वयं को जनता का मुनीम और सरकार को जनता की ट्रस्टी बताने वाले गहलोत 39 विभागों का काम स्वयं ही देख रहे थे। हालांकि मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद इनमें से कई विभाग उन्होंने सहयोगियों को सौंप दिए हैं, लेकिन अभी भी उनके पास एक दर्जन से ज्यादा विभाग है। परेशानी अनुभवी मंत्रियों की कमी की ही नहीं है, सरकार के काम करने के तरीके को लेकर भी है। गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल से काफी सबक सीखा है। उन्होंने यह बात तो साफ तौर पर समझ में आ गई हैं कि सियासत में सफल होने के लिए चुस्त-दुरुस्त से ज्यादा लोकलुभावन सरकार ज्यादा कारगर रहती है। गौरतलब है कि गहलोत के पिछले कार्यकाल में शासन तो अच्छा किया था, लेकिन कर्मचारियों और युवा वर्ग से नाराजगी ले ली थी। गहलोत इस बार पिछला शासन दोहराना नहीं चाहते हैं। वे इस कलंक को भी धोना चाहते हैं कि गहलोत का शासन आर्थिक दृष्टि से राज्य पर भारी पड़ता है। हालांकि ऐसा करना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि छठे वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने, वैश्विक मंदी और घटते राजस्व के चलते लोकलुभावन घोषणाएं करना आसान नहीं होगा।
एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहे अशोक गहलोत ने कई मौकों पर यह साबित किया है कि वे इनसे निपट लेंगे। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे प्रत्येक चीज को सकारात्मक ढंग से लेते हैं। पिछले दिनों किए गए निर्णयों में इसकी साफ झलक देखने को मिलती है। सुरूर पर सख्ती, भू-माफियाओं पर शिकंजा और 17 हजार करोड़ रुपए की वार्षिक योजना बनाने व उसे क्रियान्वित करने के निर्णय इस बात के संकेत देते हैं कि वे सहयोगी, संगठन और सरकार के स्तर पर मिल रही चुनौतियों से पार पा लेंगे और राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी सफलतापूर्वक पूरी करेंगे।