मंगलवार, अप्रैल 07, 2009

वाकई जादूगर!


अशोक गहलोत सियासत में भी सफल जादूगर साबित हो रहे हैं। बसपा के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर उन्होंने भाजपा से जोड़तोड़ का विकल्प छीन लिया है, किरोड़ी को कहीं का नहीं छोड़ा है और बसपा के बढ़ते कदमों को रोक दिया है। आखिर कैसे चला गहलोत का जादू? अंदर की कहानी!

सूबे में चल रही सियासी उठापठक के बीच अशोक गहलोत एक बार फिर अपने राजनीतिक कौशल का जौहर दिखाते हुए विजेता साबित हुए हैं। बहुजन पार्टी के सभी छह विधायकों को कांग्रेस में शामिल कर उन्होंने सरकार का पांच साल का बीमा तो करा ही लिया है, डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और भारतीय जनता पार्टी को भी पटकनी दे दी है। राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस के विधायकों की संख्या अब 102 हो गई है, यानी सरकार को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। अब गहलोत को न तो उन्हें 'डिक्टेट' करने वाले किरोड़ी लाल मीणा की जरूरत है और न ही अन्य किसी के समर्थन की। उन्होंने सुकून से पांच साल सरकार चलाने का इंतजाम कर लिया है।
राजस्थान में पैर जमाने की कोशिश कर रही बहुजन समाज पार्टी ने पहली बार विधानसभा चुनाव गंभीरता से लड़ा था। उम्मीदवारों के चयन से लेकर चुनाव लडऩे तक पार्टी ने खूब मेहनत की। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती और उनकी सरकार के कई मंत्रियों ने राज्य में जमकर प्रचार किया। चुनाव परिणामों में भी इसका असर दिखा और पार्टी छह सीटें जीतने में सफल हुई। साथ ही पार्टी के उम्मीदवार 10 सीटों पर दूसरे और 71 पर तीसरे स्थान पर रहे। वैसे तो बसपा ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को नुकसान पहुंचाया, पर ज्यादा नुकसान कांग्रेस को ही हुआ। बसपा कई सीटों पर कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रही। चुनाव परिणामों के बाद कांग्रेस के कई आला नेताओं ने साफ तौर पर माना कि बसपा नहीं होती तो राज्य में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिलता। हालांकि सरकार के गठन में कांग्रेस को कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करने पड़े। किरोड़ी लाल मीणा के समर्थन से गहलोत की राह और आसान हो गई।
गहलोत सरकार के गठन में बसपा की भी भूमिका रही। पार्टी ने सरकार को बाहर से समर्थन तो दिया, लेकिन लंबी जद्दोजहद के बाद। दरअसल, बसपा के ज्यादातर विधायक सरकार में शामिल होना चाहते थे। सूत्रों के मुताबिक पार्टी नेतृत्व की ओर से मनाही होने के बाद कई विधायकों ने कांग्रेस में शामिल होने का मन बना लिया था, लेकिन दलबदल कानून और कांग्रेस की ओर से ज्यादा तवज्जों नहीं मिलने के कारण ऐसा नहीं हो पाया। इस बीच बसपा में आपसी फूट सार्वजनिक होने लगी। प्रदेश प्रभारी व राष्ट्रीय महासचिव धर्मवीर अशोक पर पैसे लेकर टिकट बांटने के आरोपों की झड़ी लग गई। बसपा विधायक दल के नेता राजेंद्र सिंह गुढ़ा सहित कई विधायक भी इसमें शामिल हो गए। उन्होंने तो यहां तक कहा कि 'धर्मवीर अशोक ने टिकटों के नाम पर 100 करोड़ रुपए डकार गए। मुझसे भी पांच लाख रुपए मांगे गए।' पार्टी के भीतर बढ़ते विवाद के बीच विधायकों ने कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ाना शुरू कर दिया। सूत्रों के मुताबिक बसपा विधायकों ने तो काफी समय पहले ही कांग्रेस में शामिल होने की इच्छा जाहिर कर दी थी, लेकिन गहलोत किसी जल्दबाजी के मूड में नहीं थे।
इस दौरान लोकसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गईं। उम्मीदवार तय करने की बारी आई तो डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा कर दी। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने कांग्रेस को साफ तौर पर कह दिया कि 'मेरा समर्थन चाहिए तो सात सीटों पर मेरे हिसाब से टिकट देने होंगे।' किरोड़ी की इस डिमांड से कांग्रेसी हक्के-बक्के रह गए। कई नेताओं ने उन्हें मनाने की कोशिश की, पर नहीं माने। अशोक गहलोत ऐसी स्थितियों में काम करने के आदी नहीं है। लिहाजा, वे बोल पड़े 'किरोड़ी कांग्रेस को डिक्टेट नहीं करें। वे पहले पार्टी में शामिल हों और फिर टिकटों पर बात करें।' कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो गहलोत किरोड़ी को एक सीट से ज्यादा देने को तैयार नहीं हैं, वह भी उनके पार्टी में शामिल होने के बाद। दरअसल, किरोड़ी दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं। वे दौसा से चुनाव तो लडऩा तो चाहते तो हैं पर कांग्रेस के सिंबल पर नहीं। वे कांग्रेस में शामिल हो कर चुनाव लड़ते हैं तो दलबदल कानून के तहत उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त हो जाएगी। ऐसे में वे लोकसभा चुनाव हार गए तो कहीं के नहीं रहेंगे। किरोड़ी इतनी बड़ी रिस्क लेने को तैयार नहीं है।
कांग्रसी नेताओं की ओर से किरोड़ी की मान-मनौव्वल के बीच केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा के एक बयान से खलबली मच गई। उन्होंने गहलोत की उपस्थिति में कहा कि 'किरोड़ी टोंक-सवाई माधोपुर से मेरा टिकट कटवाने में लगे हैं। उनका टिकट कटा तो वे किरोड़ी के प्रचार रथ को गांवों में घुसने नहीं देंगे।' नमोनारायण के इस बयान से किरोड़ी लाल पीले हो गए। उन्होंने गहलोत पर दबाव बनाने के लिए पत्नी गोलमा देवी का इस्तीफा मुख्यमत्री को भिजवाते हुए तल्ख लहजे में कहा कि 'मैं भाजपा को हराने के मकसद से कांग्रेस के साथ आया था। मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्ष की उपस्थिति में नमोनारायण मीणा की टिप्पणी दुर्भाग्यजनक है। कांग्रेस मुझ पर हमले करना बंद करे। मैं कांग्रेस के टिकट को ठोकर मारता हूं। उसे जो भी करना है जल्दी करे। देरी कर मुझे बदनाम नहीं करे।' किरोड़ी को पूरी उम्मीद थी कि गहलोत उनके सामने घुटने टेक देंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। गहलोत ने नमोनारायण के बयान को 'एक्शन का रिएक्शन' बताते हुए किरोड़ी को पार्टी ज्वाइन करने की सलाह दे डाली।
तेजी से बदले राजनीतिक घटनाक्रम में भाजपा ने अशोक गहलोत को सत्ता से बाहर करने अवसर तलाश लिया। विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक पार्टी के आला नेताओं ने किरोड़ी लाल मीणा से संपर्क कर उन्हें मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया। शर्त यह थी कि बसपा समेत सभी निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में गहलोत सरकार को गिराएं। गहलोत के जाने पर किरोड़ी सरकार बनाने का दावा पेश करें जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे। किरोड़ी को यह ऑफर पूरी तरह से पसंद आ गया था। हालांकि पहले भाजपा का स्थानीय नेतृत्व इस फॉर्मूले पर राजी नहीं था, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के दबाव के बाद वह भी तैयार हो गया। इतना ही नहीं वसुंधरा राजे ने तो 2003 के चुनावों में अहम भूमिका निभाने वाले सुधांशु मित्तल को भी जयपुर बुला कर धनबल का खेल खेलने की पूरी तैयारी कर ली थी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने किरोड़ी को खुश करने के लिए उनके रथ को गांवों में नहीं घुसने देने का बयान देने वाले नमोनारायण मीणा पर रासुका लगाने की मांग कर डाली। भाजपा ने चुनाव आयोग से किरोड़ी लाल और गोलमा देवी की सुरक्षा बढ़ाने की लिखित में मांग भी की।
इससे पहले कि भाजपा की यह योजना आगे बढ़ पाती, गहलोत को इसकी भनक लग गई। उन्होंने इसे एनकाउंटर करने के लिए ऐसा कदम उठाया कि सब भौचक रह गए। राज्य में बसपा के सभी छह के छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। गहलोत ने यह कदम उठा एक तीर से कई शिकार किए हैं। किरोड़ी को तो उन्होंने जमीन सुंघा दी है। किरोड़ी अब घर के रहे हैं न घाट के। सूबे के सीएम बनने का ख्बाव पालने के चक्कर में उन्होंने राज्य सरकार में मजबूत स्थित को गंवा दिया है। हालांकि वे सरकार को महज एक विधायक की हैसियत से सरकार को समर्थन दे रहे थे, पर उनकी मंत्री से ज्यादा चलती थी। स्वयं की पत्नी के अलावा परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी तो उनके कहे में चलते ही थे। गहलोत उन्हें अब पहले की बराबर तवज्जों नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें अब सरकार चलाने के लिए किरोड़ी के समर्थन की जरूरत नहीं है। जहां तक दौसा से टिकट का सवाल है, गहलोत ने साफ कर दिया है कि किरोड़ी कांग्रेस के टिकट पर यहां से लड़ सकते हैं। कुल मिलाकर समूचे घटनाक्रम के बाद किरोड़ी स्वयं को लुटा हुआ महसूस कर रहे हैं। भाजपा भी अब उन पर उतना ध्यान नहीं देगी। भाजपा तो उन्हें गहलोत सरकार को गिराने तक यूज करने के मूड में थी। इसी बहाने किरोड़ी लोकसभा चुनाव में भाजपा की मदद भी कर देते। यदि किरोड़ी अब फिर से भाजपा का दामन थामते हैं तो घाटे में रहेंगे, क्योंकि जिस भाजपा को पिछले कई महीनों से जमकर कोस रहे थे, उसी के लिए जनता से वोट किस मुंह से मांगेंगे?
गहलोत एक ही झटके में बसपा इफैक्ट से निपटने में भी कामयाब रहे हैं। राज्य में पिछले कुछ समय से बसपा का जनाधार तेजी से बढ़ रहा था। इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को हो रहा था। बसपा के विधायकों के पाला बदलने के बाद कम से कम लोकसभा चुनावों तक तो हाथी हाथ का हुलिया नहीं बिगाड़ पाएगा। विधायकों के कांग्रेस में शामिल होने से बसपा को नेताओं की कमी से जूझना पड़ेगा। लोकसभा चुनाव की तैयारियां भी बुरी तरह से प्रभावित होंगी। कई सीटों पर ये विधायक ही लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी में थे। इस पूरे मामले से भाजपा को भी सबक मिला है। पार्टी के पास आगामी पांच साल तक विपक्ष में बैठे रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। वैसे भाजपा को जनादेश भी यही मिला था और लोकतंत्र में जनादेश ही सर्वोपरी होता है।

शनिवार, मार्च 28, 2009

सिमटते सीपी


प्रदेश के कांग्रेसी मुखिया डॉ। सी.पी. जोशी एक बार फिर संकट में हैं। मुख्यमंत्री बनने का सपना टूटने के बाद लोकसभा में पहुंचने की उनकी उम्मीदें भी तार-तार हो सकती हैं। कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार तो बनाया है, पर चाही गई सीट से नहीं। आखिर क्यों सिमट रही है सीपी की सियासत? अंदर की कहानी!

राजनीति को यदि खेल माना जाए तो यह क्रिकेट के काफी करीब है। गौर से देखें तो क्रिकेट के कई केरेक्टर राजनीति की पिच पर खेलते हुए मिल जाएंगे। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी उन्हीं धुरंधरों में से एक हैं। सूबे के कांग्रेसी निजाम डॉ. सी.पी. जोशी के नजरिए से देखें तो उनके लिए गहलोत 'स्लो डेथ' यानी वेस्टइंडीज के अंपायर स्टीव बकनर से कम नहीं हैं। वैसे बकनर की माफिक गहलोत कई नेताओं के लिए घातक साबित हुए हैं, लेकिन डॉ. जोशी के साथ उनका वैर ठीक वैसा ही है जैसा वेस्टइंडीज के अंपायर का मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर के साथ। संकेतों को छोड़ सीधी भाषा में बात करें तो कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी एक बार फिर दिक्कत में हैं। वजह एक बार फिर अशोक गहलोत की सक्रियता बनी है। दरअसल, जोशी चित्तौडग़ढ़ से लोकसभा का चुनाव लडऩा चाहते थे, पर पार्टी ने उन्हें भीलवाड़ा से टिकट दे दिया। जोशी के लिए यहां के रास्ते लोकसभा में पहुंचना बेहद कठिन साबित हो रहा है। प्रदेश में कांग्रेस का मुखिया होते हुए भी उनकी बात नहीं मानने का यह वाकया पहली बार नहीं हुआ है। पहले भी उन्हें साइड लाईन करने के कई प्रयास होते रहे हैं।
लोकसभा के टिकट वितरण में जोशी हर स्तर पर कमजोर नजर आए। प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते पार्टी ने उनसे सलाह-मशविरा प्रत्येक सीट के लिए किया, लेकिन उनकी चली कितनी इसका अंदाजा स्वयं को मिले टिकट के आधार पर लगाया जा सकता है। जोशी ने चित्तौडग़ढ़ से टिकट पाने के लिए पूरा जोर लगाया था। वे इसके लिए पूरी तरह आश्वस्त भी हो गए थे, पर उनका मुकाबला राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष गिरिजा व्यास से होने से पूरी गणित बिगड़ गई। दस जनपथ की चहेती होने लाभ स्पष्ट रूप से व्यास को मिला। कल तक जोशी के पीछे खड़े रहने वाले केंद्रीय नेता एक-एक करके व्यास के साथ हो लिए और वे टिकट हासिल करने में कामयाब हो गईं। उनकी उम्मीदवारी में अशोक गहलोत की भूमिका सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रही। शुरूआत में गहलोत कांग्रेस की इस नेत्री के समर्थन में आने से ठिठक रहे थे। वहज थी विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए हुई रस्साकशी। गौरतलब है कि गिरिजा व्यास भी मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में थीं। गहलोत को जब इसका अंदाजा हुआ कि वे गिरिजा की पैरवी नहीं कर जोशी को मदद पहुंचा रहे हैं तो उन्होंने रुख बदल लिया।
चित्तौडग़ढ़ से टिकट नहीं मिलने से तिलमिलाए जोशी पर भीलवाड़ा सीट निकालने का भारी दवाब है। यहां से जीतने के लिए वे कोई कसर नहीं छोडऩा चाहते, पर विरोधी उन्हें हर चाल पर मात देने पर जुटे हैं। भीलवाड़ा में गुर्जर मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। जोशी ने इन्हें रिझाने के लिए गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल से संपर्क किया तो वे मदद करने की एवज में कोटा से कांग्रेस के टिकट की जिद पर अड़ गए। जोशी को गुंजल की इस जिद को पूरा करने में पसीना आ रहा है। पार्टी के ज्यादातर नेता गुंजल को टिकट दिए जाने की खिलाफत कर रहे हैं। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी इनमें शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक जोशी की तो पिछले दिनों में मंडावा में आयोजित मुख्यमंत्री की सभा में गुंजल को पार्टी में शामिल करने की योजना थी, पर संभावित विरोध को देखते हुए उन्होंने ऐन वक्त पर इरादा त्याग दिया। मीडियाकर्मियों ने जब इस बारे में गहलोत से पूछा तो उन्होंने 'इस बारे में सीपी जी ही बता सकते हैं' कहते हुए पूरी बात जोशी के ऊपर डाल दी। गुंजल की पैरवी करने के चक्कर में पार्टी के कई नेता तो उनसे नाराज हो ही गए हैं, कई जातियां भी उनके खिलाफ लामबंद हो रही हैं। ऐसी खबरें हैं कि भीलवाड़ा संसदीय क्षेत्र में कई जगह मीणा जाति के लोगों ने गुंजल को कोटा से कांग्रेस प्रत्याशी बनाए जाने की स्थिति में जोशी के विरूद्ध मतदान करने का निर्णय लिया है। सूत्रों के मुताबिक डॉ. किरोड़ी लाल मीणा भी गुंजल का खैरख्वाह बनने के कारण जोशी से खासे नाराज हैं। यदि मीणा वोटरों ने जोशी का साथ नहीं दिया तो वे मुश्किल में पड़ सकते हैं। वैसे भी इस बात की संभावना कम ही है कि गुंजल, जोशी को गुर्जर वोट दिला पाएंगे, क्योंकि विधानसभा चुनावों में गुंजल गुर्जर बाहुल्य हिण्डोली से तीसरे स्थान पर रहे थे। यदि वोटों के गणित पर जाएं तो उन्हें पूरे गुर्जर मत भी नहीं मिले। ऐसे में वे जोशी की नैया कैसे पार लगा पाएंगे? गौरतलब है कि हिण्डोली विधानसभा क्षेत्र भीलवाड़ा संसदीय सीट का ही एक हिस्सा है।
जोशी की मुश्किलें यहीं तक सिमट जाती तो भी ठीक था, लेकिन उन्हें और भी कई मुश्किलों से रूबरू होना पड़ रहा है। दरअसल, अशोक गहलोत बड़े सलीके के साथ जोशी को किनारे कर रहे हैं। टिकट वितरण में जो कुछ भी अच्छा हुआ उसका पूरा श्रेय तो गहलोत ले गए और विवादों का ठीकरा जोशी के सिर फोड़ दिया। उम्मीदवारों के चयन को लेकर जहां भी विवाद पैदा हो रहे हैं, सबके लिए जोशी को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, क्योंकि प्रदेश में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते वे ही संभावितों के पैनल बनाने व नाम फाइनल करने में सक्रिय नजर आए। यह बात अलग है कि इसमें उनकी ज्यादा चली नहीं। जिन नेताओं के टिकट कटे हैं, उनसे तो जोशी का वैर बंध ही गया है। कुल मिलाकर निर्णय लेने की प्रक्रिया में जोशी नीचे के पायदानों पर खिसकते चले गए और गहलोत ऊपर चढ़ते गए। किरोड़ी लाल मीणा का ही मामला लें। किरोड़ी लंबे समय से कांग्रेस को आदेश देने वाली भाषा में बात कर रहे थे। वे सात सीटों पर अपने अनुसार कांग्रेस के टिकट दिलवाना चाहते थे। इससे पहले कि जोशी कुछ बोलते गहलोत के एक बयान ने ही पूरा श्रेय लूट लिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि 'किरोड़ी जिस तरह से बात कर रहे हैं वह कांग्रेस की परंपरा नहीं है। अभी तो वे हमारी पार्टी में ही नहीं हैं। यह तय करना बाकी है कि वे पार्टी में आ रहे हैं या पार्टी उन्हें ले रही है। उनके कहने से पार्टी टिकट नहीं देने वाली है। जहां तक उनकी पत्नी गोलमा देवी, परसादी लाल मीणा और रामकिशोर सैनी की बात है तो वे हमारे साथ हैं। ये तीनों मंत्री किरोड़ी की बात नहीं मानेंगे।'
ऐसा नहीं है कि जोशी हमेशा गहलोत के कोप से पीडि़त रहे हैं। एक समय पार्टी में दोनों की दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। हालांकि राजनैतिक हैसियत के नजरिए से गहलोत हमेशा जोशी से उन्नसी ही रहे। वे उनसे पहले प्रदेश अध्यक्ष बने और फिर मुख्यमंत्री। गहलोत के मुख्यमंत्रित्वकाल में जोशी एक सक्रिय सिपेहसालार की भूमिका में रहे। सूबे के सीएम के रूप में उन्होंने काम तो अच्छा किया, पर वे लोकलुभावन साबित नहीं हुए। चुनावों में जनता ने उन्हें नकार वसुंधरा के सिर ताज सजा दिया। चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कांग्रेस का भी वही हश्र हुआ जो सत्ता चली जाने के बाद सभी पार्टियों का होता है। पार्टी का संगठनात्मक ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया। कार्यकर्ता निष्क्रिय हो गए तो नेता हतोत्साहित। आलाकमान ने पार्टी में जान फूंकने के लिए एक के बाद एक कई अध्यक्ष बदले, लेकिन पार्टी पटरी पर नहीं आई। आखिर में सी.पी. जोशी को अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने पार्टी को संगठनात्मक रूप से पुनर्गठित तो किया, पर उनके मन में मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब पलने लगा। इस दौरान विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए। कांग्रेस के प्रदेश मुख्यालय में टिकट के दावेदारों की भीड़ बढऩे लगी। स्वाभाव से तल्ख जोशी की भौंहें उस समय तन गईं जब दावेदार उनकी बजाय गहलोत की इर्दगिर्द घूमने लगे। जोशी को इस बात के संकेत मिल गए थे कि गहलोत उनकी मेहनत को मटियामेट करने में जुटे हैं। विधानसभा चुनाव के प्रचार के दौरान राज्य में कांग्रेस की पूरी कमान गहलोत ने ली। उनके धुंआधार प्रचार के सामने जोशी बेबस नजर आए। अभी भी उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद नहीं छोड़ी थी, लेकिन चुनाव परिणामों ने जोशी की उम्मीदों को तबाह कर दिया। वे स्वयं महज एक वोट से चुनाव हार गए। हालांकि इसके बाद भी उन्होंने प्रयास किए, पर तब तक गहलोत उनसे कोसों आगे निकल गद्दीनशीं हो चुके थे।
मुख्यमंत्री बनने का सपना टूटने के बाद जोशी ने एक बार राजनीति से तौबा करने की ठान ली थी। उन्होंने इसकी तैयार भी कर ली थी, पर पार्टी आलाकमान से मिले सकारात्मक संकेतों के बाद उन्होंने मन बदल लिया। पहले राहुल गांधी और फिर सोनिया गांधी के राजस्थान दौरे के समय जोशी को जिस तरह से अहमियत मिली, उसे देखकर लगता था कि पार्टी नेतृत्व उन पर पूरी तरह से मेहरबान है। इसी आशा के सहारो जोशी फिर से जोश में आ गए। लोकसभा चुनावों के लिए 'टारगेट-25' बना डाला। आलाकमान को राज्य की पूरी सीटें जिताने का दावा करने वाले जोशी अब स्वयं अपनी सीट पर जीत के लिए जूझ रहे हैं। लगता है हर कदम पर हार जाना ही उनकी किस्मत में है, लेकिन यदि वे अब हारे तो कहीं के नहीं रहेंगे। जोशी को भी इसका अहसास है, इसलिए वे पूरी ताकत लगा रहे हैं।

बुधवार, मार्च 25, 2009

सब मोदी की माया


देश में आम चुनाव, केंद्र सरकार की अर्द्ध सैनिक बल मुहैया कराने के लिए साफ मनाही और राज्य सरकारों के आयोजन से हाथ खड़े करने के बाद एक बार तो लगा था कि आईपीएल का दूसरा संस्करण शुरू नहीं हो पाएगा, लेकिन इसकी कमान एक ऐसी शख्सियत से संभाल रखी है जो धुन के पक्के हैं। वो जो चाहते है, कर गुजरते हैं। जी हां! हम बात कर रहे हैं आईपीएल कमिश्नर और बीसीसीआई उपाध्यक्ष ललित मोदी की। मोदी अपने संपर्कों के के चलते हमेशा चर्चाओं में रहे हैं। चाहे बात फिल्मी सितारों की हो, राजनेताओं की, उद्यागपतियों की या खेल से जुड़ी हस्तियों की। इस बार भारत में भले ही उनके संपर्क जबाव दे गए, पर दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेट बोर्ड के सीईओ जेराल्ड मजोला से उनकी मित्रता ने रंग दिखाया। दक्षिण अफ्रीका में ही सही, लेकिन आईपीएल का आयोजन होगा। ऐसा पहली बार नहीं है जब मोदी की मेहनत से फटाफट क्रिकेट का यह महाकुंभ आयोजित होने जा रहा है। दरअसल, सुपरहिट आईपीएल का मजा लेने वाले बहुत कम लोग यह जानते हैं कि क्रिकेट में क्रांति ला देने वाले इस स्वरूप की रूपरेखा ललित मोदी ने ही आज से उन्नीस साल पहले बनाई थी।
1963 में दिल्ली में जन्में मोदी का खिलाड़ी के तौर पर क्रिकेट से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। एक उद्योगपति के रूप में उनके 'के.के. मोदी ग्रुप' का वास्ता तंबाकू, धातु, स्वास्थ्य सेवाओं, अचल संपत्ति एवं वित्त तक ही है। उनके अंदर क्रिकेट में कुछ कर गुजरने का जुनून का जन्म अमरीका प्रवास के दौरान हुआ। यहां मोदी को ख्याल आया कि यदि अमरीका में ह्यूस्टन टेक्सन और डिज्नी की माइटी टेक्सन जैसी टीमें करोड़ो डॉलर कमा सकती हैं तो हमारे देश में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? मोदी ने इसके लिए रूपरेखा बनाना प्रारंभ किया। उन्होंने आईपीएल का पहला प्रस्ताव 1990 में बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष माधवराव सिंधिया के सामने रखा। खिलाडिय़ों से अनुबंध किया गया और मुंबई स्टालियंस, कैलकटा टाइगर्स, बंगलूर ब्रेव्स, हैदराबाद हॉक्स एवं ग्वालियर कोब्राज सरीखी टीमें भी बनाई गईं। लेकिन, बात पूरी तरह से बन नहीं पाई और आइडिया फ्लॉप हो गया।
मोदी ने हार नहीं मानी उन्होंने कुछ वर्षों बाद फिर कोशिश की। इस बार उन्होंने पंजाब क्रिकेट एशोसिएशन (पीसीए) का सहारा लेकर अपनी योजना को अमली जामा पहनाने की कोशिश की। मोदी ने सारा मसला पीसीए की वेबसाइट पर डाल दिया। बीसीसीआई को इसकी भनक लगी तो बात बिगड़ गई। इस पूरे घटनाक्रम से मोदी के प्रोजेक्ट को तो कोई फायदा नहीं हुआ पर इंद्रजीत सिंह बिंद्रा के रूप में उन्हें एक भरोसेमंद जरूर मिल गया। बिंद्रा बीसीसीआई के अध्यक्ष रह चुके हैं। बिंद्रा ने मोदी को एक ही मंत्र दिया 'कुछ करना है तो बीसीसीआई में एंट्री कर लो।' मोदी ने इसकी शुरूआत राजस्थान क्रिकेट एशोसिएशन (आरसीए) का अध्यक्ष बन कर की। मौके की नजाकत को समझकर उन्होंने जगमोहन डालमिया के खिलाफ शरद पवार का साथ दिया। पवार ने डालमिया को पटकनी दी और मोदी को पुरस्कार स्वरूप बीसीसीआई के उपाध्यक्ष का पद मिल गया। फिर क्या था, कल तक अपने प्रोजेक्ट के लिए लोगों से मिन्नतें करने वाले मोदी आज उसे खुद स्वीकृत करने की स्थिति में थे। अंतत: अक्टूबर, 2007 में मोदी की सोच पर मुहर लगी। उन्हें आईपीएल का कमिश्नर भी बना दिया गया।
शुरूआत में 9 देशों के आईसीसी स्तर के अस्सी खिलाडिय़ों को सूचीबद्ध किया गया। प्रतियोगिता का कार्यक्रम बनाया। 4080 करोड़ रूपए की भारी राशि में प्रसारण के अधिकार बेचे गए। तय किया गया कि कुल आठ टीमें हिस्सा लेंगी। इन टीमों को खरीदने के लिए 14 औद्योगिक घराने मैदान में कूद पड़े। अपने पसंदीदा खिलाडिय़ों को खरीदने के लिए खुली बोली लगी। भाव करोड़ों में गए। मुकाबले के लिए टीमें तैयार थी। मुकाबले शुरू होने वाले थे। सबके मन में संदेह था कि क्रिकेट का यह नया दौर सफल होगा कि नहीं? पहला मैच बंगलौर के चिन्नास्वामी स्टेडियम में खेला गया। खचाखच भरे इस स्टेडियम को देखकर सारे संदेह दूर हो रहे थे। दर्शकों को क्रिकेट का यह नया संस्करण बेहद पसंद आ रहा था। खेल के साथ रोमांच और मनोरंजन का यह मिश्रण लोगों को खूब भाया। स्टेडियम तो फुल थे ही टीवी पर भी करोड़ों लोगों ने मैचों का पूरा मजा लिया। टेलीविजन के प्राइम टाईम में लोगों ने एकता कपूर के नाटकों को भुला दिया। मोदी की यह कल्पना जब साकार हुई तो उसे 'उम्मीद से दुगनी' सफलता मिली। मोदी ने प्रतियोगिता के दौरान गजब का तालमैल बिठाया। काम कहीं रूके नहीं इसके लिए अपने अधिकार, अनुभव और रसूख तीनों का सही इस्तेमाल किया। उन्होंने मैचों के दौरान स्थानीय क्रिकेट एशोसिएशनों को मुनाफे का लालच दिखाकर तमाम सुविधाएं बटोरने में कामयाबी हासिल की।
आईपीएल की कामयाबी से बुलंदियों पर पहुंचे ललित मोदी विवादों में भी घिरे रहे हैं। आईपीएल से जुड़े हुए विवादों की ही बात करें तो लीग की तीन टीमों में उनका पैसा लगा होने की चर्चाएं आम हैं। राजस्थान रॉयल्स, जिसके मालिकों में से एक अफ्रीका में व्यवसाय करने वाले उनके बहनोई हैं। किंग्स इलेवन के मालिकों में से एक मोहित बर्मन के भाई उनके दामाद हैं। इसके अलावा कोलकाता नाइट राइडर्स में भी उनका काफी पैसा लगे होने की खबर है। बहरहाल तमाम तरह के विवादों से दूर मोदी आईपीएल के दूसरे ऐपीसोड के सफल आयोजन की तैयारी में जुटे हैं।

शनिवार, मार्च 21, 2009

संकट में सल्तनत


विधानसभा चुनाव में मात खाने के बाद भी महारानी की दिक्कतें कम नहीं हो रही हैं। झालावाड़ लोकसभा सीट पर उनके पुत्र दुष्यंत सिंह इस बार पसीना आ रहा है। वसुंधरा को अपने बेटे को जीत सुनिश्चित करने के लिए दम लगाना पड़ रहा है। आखिर क्यों फंस गए हैं दुष्यंत मुकाबले में?

प्रत्याशियों की घोषणा के बाद भारतीय जनता पार्टी ने प्रचार अभियान में भी कांग्रेस से बाजी मार लेने के बाद भी महारानी का मूड इन दिनों कुछ ठीक नहीं है। बारां जिले से पार्टी के प्रचार अभियान की शुरूआत करते वक्त उनके माथे पर चिंता की लकीरों के बीच चमकता पसीना परेशानी का संकेत कर रहा था। महारानी कुछ दिन पहले भी यहां मतदाताओं की नब्ज टटोलने आईं थीं। वैसे वसुंधरा ही नहीं, राजस्थान की राजनीति को समझने वाले हर शख्स की नजरें इस क्षेत्र पर हैं, क्योंकि महारानी के लाड़ले दुष्यंत सिंह यहां से चुनाव लड़ रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में आसानी से जीत संसद की देहरी चढऩे वाले दुष्यंत इस बार मुकाबले में फंस गए हैं। बेटे को फंसता देख एक बार तो वसुंधरा ने ही मैदान में उतरने की तैयारी कर ली थी, लेकिन खुद का बनाया हुआ एक नियम ही आड़े आ गया, जिसके तहत विधायकों को टिकट नहीं देने का फैसला हुआ था। हालांकि सूबे की सियासत में सक्रिय रहने का मोह भी इसकी एक वजह था। फिलहाल, दुष्यंत को ही झालावाड़-बारां सीट से मैदान में उतार दिया गया है और महारानी वोटरों को बेटे के पक्ष में मोडऩे के लिए दिन-रात एक कर रही हैं। करें भी क्यों नहीं, यदि दुष्यंत हार गए तो वसुंधरा की 20 साल पुरानी सियासी विरासत हाथ से निकल जाएगी।
झालावाड़ के साथ वसुंधरा के राजनीतिक रिश्ते की बात करें तो वे यहां से 1989 में पहली बार लोकसभा चुनाव लडऩे क्या आईं, यहीं की होकर रह गईं। यहां की जनता को वे और उन्हें यहां की जनता खूब रास आई। महारानी यहां से लगातार पांच बार सांसद का चुनाव जीतीं। कांग्रेस हर चुनाव में प्रत्याशी बदल उन्हें हराने का प्रयास करती रही, पर सफलता नहीं मिली। 2003 उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उनका झालावाड़ जिले के प्रति प्रेम बरकार रहा। वे जिले की झालरापाटन सीट से विधायक का चुनाव लड़ीं। स्वयं के सूबे की सियासत में सक्रिय होने के बाद जब अपनी विरासत को संभालाने की बारी आई तो बेटे दुष्यंत से अच्छा विकल्प क्या हो सकता था। उन्हें राजनीति में लाने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था। राज्य में विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के पक्ष में चली लहर और तेज हो गई थी। लिहाजा उन्होंने दुष्यंत को झालावाड़ से मैदान में उतार दिया। इन चुनावों में झालावाड़ के मतदाताओं ने दुष्यंत को भी उतना ही समर्थन दिया जितना कि महारानी को मिलता था। वे आसानी से चुनाव जीत गए।
झालावाड़ के रास्ते संसद की सीढिय़ा चढ़ते ही दुष्यंत का राजनीति में सफल पदार्पण तो हो गया, पर इस एंट्री के मुताबिक प्रदर्शन करने का दबाव भी उन पर आ गया। राज्य की मुख्यमंत्री का बेटा होना उनके लिए फायदेमंद और नुकसानदायक, दोनों रहा। फायदा यह हुआ कि राज्य सरकार ने उनके क्षेत्र में विकास कार्यों के लिए धन की कोई कमी नहीं आने दी। विकास के काम भी खूब हुए, पर सबका श्रेय मुख्यमंत्री को मिलता चला गया। सियासत के शुरूआती दौर में एक राजनेता के लिए इससे बड़ा नुकसान और क्या हो सकता है कि काम भी होता रहे और श्रेय भी नहीं मिले। महारानी को जब इसका आभास हुआ तो उन्होंने दुष्यंत का आगे करना शुरू किया, पर क्षेत्र में वसुंधरा की लोकप्रियता के सामने वे कहीं दिखे ही नहीं। वे अपनी मां के आभामंडल में ओझल ही होते चले गए। कुल मिलाकर वे अपनी अलग पहचान बनाने में नाकाम रहे।
क्षेत्र की जनता कई मुद्दों को लेकर दुष्यंत सिंह से खासी नाराज है। एक सांसद के रूप में वे ज्यादातर मोर्चों पर नाकाम साबित हुए। झालावाड़ को रेलवे लाइन से जोडऩे और अफीम काश्तकारों के पट्टों की बहाली में उन्होंने लोगों को निराश ही किया। पिछले लोकसभा चुनाव में दुष्यंत सिंह के खिलाफ कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े संजय गुर्जर की मानें तो महारानी के बेटे ने सांसद धर्म का पालन ही नहीं किया। गुर्जर बताते हैं कि 'दुष्यंत सिंह राजस्थान की पूरी सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से चुनाव जीते थे। जीतते पर उन्होंने सांसद धर्म का पालन करने की बजाय सरकार का कर्ज उतारना शुरू किया। यहां तक की सांसद कोष की राशि भी राजस्थान सरकार की योजनाओं में खर्च की गई। उन्होंने अपने क्षेत्र की कम राज्य सरकार के कामकाज की चिंता ज्यादा रहती थी।' दुष्यंत सिंह की ओर से विकास कार्यों के दावों पर गुर्जर कहते हैं, 'जिन विकास कार्यों की दुहाई देकर वोट मांग रहे हैं, उन्हें क्षेत्र की जनता विधानसभा चुनाव में ही नकार चुकी है। पूरे क्षेत्र में कांगे्रस ने भाजपा पर भारी बढ़त बनाई थी। लोकसभा चुनाव में भी वोटिंग का यही पैटर्न रहेगा और दुष्यंत सिंह चुनाव हारेंगे।' हालांकि दुष्यंत सिंह अपनी जीत के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त नजर आते हैं। वे कहते हैं, 'मेरे संसदीय क्षेत्र में विकास से कोई भी अछूता नहीं रहा है। पर्यटन, पेयजल, कृषि और रोजगार समेत लगभग सभी क्षेत्रों में रिकॉर्ड विकास हुआ है। केंद्र सरकार की भारी उपेक्षा के बाद भी हम विकास की गंगा बहाने में कामयाब रहे हैं। केंद्र सरकार ने हर स्तर पर विकास का अवरुद्ध करने का प्रयास किया। मैंने बड़ी कोशिशों के बाद काली सिंध बांध के लिए चार सौ करोड़ रुपए मंजूर करवाए, लेकिन केंद्रीय जल आयोग ने ही इस पर अडंगा लगा दिया। अफीम काश्तकारों के पट्टे निरस्त करने में भी केंद्र सरकार की साजिश है, लेकिन क्षेत्र की जनता जागरुक है। वह असलियत जानती है। मुझे इस बार भी भारी समर्थन मिलेगा और मैं जीतूंगा।'
विकास के दावों और लोगों की नाराजगी को अपनी जगह छोड़ दें तो भी दुष्यंत की राह आसान नहीं है, क्योंकि परिसीमन के बाद उनके संसदीय क्षेत्र में शामिल हुए बारां जिले में भारतीय जनता पार्टी का जनाधार में भारी कमी आई है। यह वही बारां जिला है, जहां विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को एक भी सीट नसीब नहीं हुई थी। मदन दिलावर और प्रताप सिंह सिंघवी सरीखे दिग्गज भाजपाई भी चुनाव हार गए थे। वसुंधरा राजे भी यह अच्छी तरह जानती हैं कि बारां जिले में अच्छा प्रदर्शन किए बिना दुष्यंत का जीतना संभव नहीं है। लिहाजा उन्होंने पूरा ध्यान यहीं लगा रखा है। कुछ दिन पहले ही वे यहां तीन दिन तक रुककर गई हैं। वे यहां क्षेत्र के प्रभावशाली व्यक्तियों से मिलीं और बेटे दुष्यंत के लिए समर्थन मांगा। भाजपा के प्रचार अभियान की शुरूआत भी उन्होंने न केवल यहां से की, बल्कि कई दिनों तक यहीं डटी रहीं। महरानी यहां मेहनत तो खूब कर रही हैं, पर उतनी सफलता नहीं मिल रही है। इसका बड़ा कारण यह है कि इस क्षेत्र में परंपरागत रूप से कांग्रेस के वोटर ज्यादा है।
क्षेत्र में गुर्जर मतदाताओं की भारी संख्या भी दुष्यंत के लिए चिंता का विषय है। आरक्षण आंदोलन के बाद इस बात की संभावना कम ही है कि गुर्जर भाजपा को वोट देंगे। भले ही उम्मीदवार के रूप में उनकी समधन का बेटा ही क्यों न हो। हालांकि कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला अभी भी महारानी के सुर में सुर मिला रहे हैं, पर आम गुर्जर उनकी बात मानने को तैयार नहीं हैं। विधानसभा चुनाव के समय भी उन्होंने गुर्जरों से भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी, लेकिन इसका कोई खास असर नहीं हुआ था। वैसे भी कर्नल बैंसला का इस क्षेत्र में उतना प्रभाव नहीं है। हालांकि गुर्जरों को मनाने के लिए दुष्यंत के साथ-साथ उनकी पत्नी निहारिका पिछले काफी समय से क्षेत्र में सक्रिय है। निहारिका गुर्जरों से बेटी की लाज रखने के लिए मिन्नते कर रही हैं। उनकी अपील कुछ काम कर सकती है।
बेटे की कमजोर स्थिति के चलते सल्तनत पर आए संकट से निपटने के लिए महारानी सभी रास्तों पर एक साथ चल रही हैं। चलना उनकी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी। मजबूरी अपनी सल्तनत को बचाने की है और जिम्मेदारी दिक्कत में फंसे बेटे को निकालने की है। हार के खतरे से जूझ रहे दुष्यंत स्वयं कोई हल ढूंढऩे की बजाय एक बार फिर से महारानी के पीछे-पीछे चल रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि मां की अंगुली पकड़ कर वे एक बार फिर से संसद की सीढिय़ां चढ़ जाएंगे। वहीं, रास्ते में आ रही रुकावटों को देख महारानी शायद ये सोचने पर मजबूर हो रही कि 'इससे अच्छा तो मैं ही चुनाव लड़ लेतीं।'

रविवार, मार्च 15, 2009

जूझते जादूगर


अशोक गहलोत इन दिनों तीन-तीन मोर्चों पर एक साथ जूझ रहे हैं। सहयोगी साथ चलने के बजाय आगे चलने पर आमादा हैं, संगठन में कई नेता कुर्सी पाने का ख्वाब बुन रहे हैं और सरकार में अनुभवी मंत्रियों की कमी खल रही है। गहलोत कैसे पार पाएंगे इन मुश्किलों से? अंदर की कहानी!

सहयोगी, संगठन और सरकार, तीनों में से किसी का नाम सुनते ही अशोक गहलोत के माथे पर बल पड़ जाते हैं। पड़ें भी क्यों नहीं, तीनों ओर से संकट खड़े होते रहते हैं। सहयोगी आए दिन आंखे दिखाकर यह याद दिलाना नहीं भूलते कि सरकार उन्हीं के सहारे चल रही है, संगठन यानी कांग्रेस के कई दिग्गज गहलोत के गद्दीनशीं होने के सच को अभी तक पचा नहीं पा रहे हैं और अनुभवी मंत्रियों की कमी के चलते सरकार चलाने में भी उन्हें दिक्कत आ रही है। एक साथ तीन-तीन मोर्चों पर जूझना गहलोत के लिए नया अनुभव है, क्योंकि पिछली सरकार वे भारी बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बने थे। सहयोगी तो थे ही नहीं, संगठन में किसी ने उनके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं जुटाई और सरकार तो वे अपने ढंग से चलाते ही थे, लेकिन इस बार कहानी अलहदा है। लिहाजा, गहलोत के तेवर इस बार बदले-बदले से हैं। वे इन दिनों सियासत में सफल होने के लिए 'संतुलन' नाम का नया सलीका सीख रहे हैं।
गहलोत के सामने आए संकटों की फेहरिस्त में सबसे पहले सहयोगियों की बात करें तो राज्य में कांग्रेस पहली बार इनके सहारे सरकार चला रही है। हालांकि सरकार बनाते समय अशोक गहलोत को कोई परेशानी नहीं आई थी, क्योंकि साधारण बहुमत का आंकड़ा तो जीत कर आए कांग्रेस के बागियों के घर वापसी से ही पूरा हो गया। किरोड़ी लाल मीणा के समर्थन देने से बहुमत और पुख्ता हो गया। गहलोत ने भी सरकार बनाते ही यह सीख लिया कि समर्थन देने वालों को कैसे खुश रखना है। किसी को मंत्री बना दिया तो किसी को संसदीय सचिव। किरोड़ी लाल मीणा को भी मंत्री पद का प्रस्ताव दिया, लेकिन उन्होंने पत्नी गोलमा देवी को मंत्री बनवा दिया। ऐसा नहीं है कि किरोड़ी को मंत्री पद का मोह नहीं रहा, लेकिन उनका इरादा सांसद का चुनाव लडऩे का है। वो भी परिसीमन के चलते अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हुई दौसा सीट से। किरोड़ी की इस मंशा ने गहलोत के लिए मुश्किल खड़ी कर दी है, क्योंकि केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा भी यहीं से चुनाव लडऩा चाहते हैं। बात यहीं तक होती तो ठीक थी, लेकिन सूबे की सरकार के तीन मंत्रियों परसादी लाल मीणा, गोलमा देवी और रामकिशोर सैनी के रुख ने गहलोत को मुश्किल में डाल रखा है।
यूं तो परसादी लाल गहलोत मंत्रिमंडल में कैबीनेट मंत्री हैं, पर वे सरकार के साथ चलने की बजाय किरोड़ी के पीछे-पीछे चलना ज्यादा पसंद करते हैं। वैसे परसादी पुराने कांग्रेसी हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया। वे किरोड़ी के समर्थन पर निर्दलीय ही मैदान में कूद पड़े और अच्छे मतों से जीत भी गए। जीतते ही उन्होंने साफ कर दिया कि वे किरोड़ी के कहे अनुसार सरकार को तो समर्थन दे रहे हैं, पर कांग्रेस में वापसी नहीं कर रहे हैं। मंत्री बनने के बाद भी उन्होंने कई मौकों पर यह साबित किया कि उनके असली मुखिया अशोक गहलोत नहीं किरोड़ी लाल हैं। किरोड़ी के दौसा से लोकसभा चुनाव लडऩे की इच्छा पर भी उनका साफ रुख है। वे कहते हैं, 'कांग्रेस लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना चाहती है तो दौसा से किरोड़ी लाल को उम्मीदवार बनाए, नहीं तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे।' गहलोत को परसादी लाल इस चेतावनी भरी सलाह में गोलमा देवी भी सुर मिलाती हैं। उनसे तो उम्मीद भी यही है। वैसे भी वे पत्नी धर्म निभाकर गलत भी क्या कर रही हैं? किरोड़ी के सहारे ही वे विधायक बनीं, फिर मंत्री बनीं। अब पति को संसद पहुंचाने के लिए सरकार को आंख दिखाने का काम तो वे कर ही सकती हैं। रामकिशोर सैनी के साथ भी ऐसा ही है। किरोड़ी का हाथ थामकर ही वे विधानसभा चुनाव जीते और फिर मंत्री बने, फिर अब उनका साथ कैसे छोड़ सकते हैं। बहरहाल, किरोड़ी लाल के बाद अपनी सरकार के तीन मंत्रियों के जिद पर अडऩे के बाद उपजे हालातों से निपटना गहलोत के लिए बेहद मुश्किल है, वे किरोड़ी को दौसा से उम्मीदवार बनाए जाने की पैरवी करते हैं तो नमोनारायण नाराज होते हैं और नहीं करते हैं तो किरोड़ी के साथ-साथ स्वयं की सरकार के ही दो मंत्री नाराज होते हैं। अब यह गहलोत को तय करना है कि वे किसे नाराज करते हैं।
सहयोगियों की अलावा संगठन के स्तर पर भी गहलोत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी के कई नेता अभी भी सीएम की कुर्सी को मोह नहीं त्याग पाए हैं। वैसे गहलोत विरोधी धड़े के नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है, लेकिन अभी सी.पी. जोशी उन्हें कड़ी चुनौती दे रहे हैं। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के समय गहलोत और जोशी के बीच पनपी खाई निरंतर चौड़ी ही होती जा रही है। जोशी को एक वोट से मिली शिकस्त और गहलोत की ताजपोशी के बाद दोनों के बीच की दूरियां और बढ़ गईं। पिछले दिनों राहुल गांधी और सोनिया गांधी के कार्यक्रमों में भी यह साफ तौर पर दिखाई दिया कि आने वाले दिनों में गहलोत की राह आसान नहीं होगी। मंत्रिमंडल विस्तार में हुई देरी से यह बात साबित हो जाती है कि न तो कांग्रेस में संगठन स्तर पर सब कुछ ठीक चल रहा है और न ही आलाकमान ने इस बार गहलोत को फ्रीहैंड दे रखा है। लाख कोशिशों के बाद भी गहलोत अपने कई चहेतों को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दिला पाए, जबकि कई लोगों को मजबूरी में शपथ दिलवानी पड़ी। रघुवीर मीणा को ही लें। मीणा तीसरी बार विधायक बने हैं। उन्हें गहलोत का भी खास माना जाता है। राज्य में कांग्रेस की सरकार बनते ही सभी ने कयास लगाए थे कि मीणा का कैबीनेट मंत्री बनना तय है, लेकिन गहलोत लाख कोशिशों के बाद भी उन्हें उप मुख्य सचेतक ही बना पाए। वैसे विरोधी धड़ा चाहे कितनी ही कोशिश क्यों न करे, पर वे आज भी आलाकमान की पहली पसंद है और उनकी इस पोजीशन को हिलाना भी आसान नहीं है।
अशोक गहलोत को सहयोगियों और संगठन के स्तर पर ही समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ रहा है, सरकार के स्तर पर भी उन्हें कई परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं। कांग्रेस के ज्यादातर अनुभवी नेताओं के चुनाव हार जाने के कारण सरकार के सुचारू संचालन में गहलोत को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इसी के चलते स्वयं को जनता का मुनीम और सरकार को जनता की ट्रस्टी बताने वाले गहलोत 39 विभागों का काम स्वयं ही देख रहे थे। हालांकि मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद इनमें से कई विभाग उन्होंने सहयोगियों को सौंप दिए हैं, लेकिन अभी भी उनके पास एक दर्जन से ज्यादा विभाग है। परेशानी अनुभवी मंत्रियों की कमी की ही नहीं है, सरकार के काम करने के तरीके को लेकर भी है। गहलोत ने अपने पिछले कार्यकाल से काफी सबक सीखा है। उन्होंने यह बात तो साफ तौर पर समझ में आ गई हैं कि सियासत में सफल होने के लिए चुस्त-दुरुस्त से ज्यादा लोकलुभावन सरकार ज्यादा कारगर रहती है। गौरतलब है कि गहलोत के पिछले कार्यकाल में शासन तो अच्छा किया था, लेकिन कर्मचारियों और युवा वर्ग से नाराजगी ले ली थी। गहलोत इस बार पिछला शासन दोहराना नहीं चाहते हैं। वे इस कलंक को भी धोना चाहते हैं कि गहलोत का शासन आर्थिक दृष्टि से राज्य पर भारी पड़ता है। हालांकि ऐसा करना चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि छठे वेतन आयोग की सिफारिश लागू करने, वैश्विक मंदी और घटते राजस्व के चलते लोकलुभावन घोषणाएं करना आसान नहीं होगा।
एक साथ कई मोर्चों पर जूझ रहे अशोक गहलोत ने कई मौकों पर यह साबित किया है कि वे इनसे निपट लेंगे। उनके पक्ष में सबसे बड़ी बात यह है कि वे प्रत्येक चीज को सकारात्मक ढंग से लेते हैं। पिछले दिनों किए गए निर्णयों में इसकी साफ झलक देखने को मिलती है। सुरूर पर सख्ती, भू-माफियाओं पर शिकंजा और 17 हजार करोड़ रुपए की वार्षिक योजना बनाने व उसे क्रियान्वित करने के निर्णय इस बात के संकेत देते हैं कि वे सहयोगी, संगठन और सरकार के स्तर पर मिल रही चुनौतियों से पार पा लेंगे और राजस्थान के मुख्यमंत्री के रूप में अपनी दूसरी पारी सफलतापूर्वक पूरी करेंगे।

शनिवार, मार्च 07, 2009

जाति की जय हो


सूबे की सियासत में फिर जाति का जोर दिखाई दे रहा है। अशोक गहलोत ने लोकसभा चुनाव की घोषणा होते-होते कांग्रेस की कास्ट केमिस्ट्री दुरुस्त कर दी है। पार्टी की ओर से जातियों को जुटाने के ये जतन टारगेट-25 के करीब पहुंचने के लिए किए जा रहे हैं। कितनी सफलता मिलेगी इन्हें, एक रिपोर्ट!

वसुंधरा राजे 2003 के विधानसभा चुनावों में राजपूतों की बेटी, जाटों की बहू और गुर्जरों की समधन के तौर पर मैदान में उतरी थीं। रिश्तों की इस जुगलबंदी के दम पर ही उन्होंने राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत दिलाने का ऐसा कारनामा कर दिखाया जो भैरों सिंह शेखावत सरीखे दिग्गज नेता भी नहीं कर पाए। लेकिन, पिछले विधानसभा चुनाव में महारानी की कास्ट केमिस्ट्री गड़बड़ा गई और वे मात खा गईं। वसुंधरा राजे तो अभी तक हार के इस सदमे से उबर नहीं पाई हैं, पर सूबे के नए सरदार अशोक गहलोत ऐसी स्थिति आने से पहले ही चौकस हो गए हैं। उन्होंने लोकसभा चुनाव में पार्टी को 'टारगेट-25' के आस-पास पहुंचाने के लिए सुशासन के सपने को किनारे कर सोशल इंजीनियरिंग का सहारा लिया है। प्रशासनिक फेदबदल और मंत्रिमंडल विस्तार में गहलोत ने वरिष्ठता, योग्यता और क्षमताओं को ताक पर रखते हुए राजस्थान की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले चारों प्रेशर गु्रप्स जाट, मीणा, गुर्जर और राजपूतों के अलावा अन्य जातियों को भी संतुष्ट करने की कोशिश की है। लगता है जनता के मुनीम और सॉशल ऑडिट की बात करने वाले गहलोत को भी अब सियासत में सफल होने के लिए जाति की जय बोलने में ही समझदारी दिखाई देने लगी है।
अशोक गहलोत सरकार ने बड़े प्रशासनिक फेरबदल के तहत राज्य की मुख्य सचिव के रूप में महिला आईएएस अधिकारी कुशल सिंह को नियुक्त किया है। उनके इस निर्णय को जाटों को खुश करने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। इसके लिए 1973 बैच के आईएएस अधिकारी परमेश चंद्र की दावेदारी को भी सरकार ने दरकिनार किया। कुशल सिंह 1974 के बैच की आईएएस हैं। हालांकि राज्य में वरिष्ठता को दरकिनार करने का यह पहला मौका नहीं है। राज्य की पहली महिला मुख्य सचिव बनीं कुशल सिंह को वरिष्ठ कांग्रेसी व जाट नेता परसराम मदेरणा का करीबी माना जाता है। वे मुख्य सचिव बनने के बाद मदेरणा का आशीर्वाद लेने भी गईं। कुशल सिंह को मुख्य सचिव बनाए जाने के अलावा रामलाल जाट को राज्य मंत्री बनाया गया है। अब गहलोत मंत्रिमंडल में जाट मंत्रियों की संख्या चार हो गई है। जाट राज्य की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये आठ से दस सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। वैसे जाट कांग्रेस के परंपरागत वोटर रहे हैं, लेकिन 2003 के विधानसभा चुनावों में इन्होंने भाजपा की ओर रुख कर लिया था। इसके पीछे दो वजह रहीं, पहली तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करने का ऐलान किया था और दूसरी कांग्रेस के ही कई नेताओं ने अशोक गहलोत को जाट विरोधी नेता करार दे दिया था। गहलोत को जाटों की नाराजगी भारी पड़ी थी और वे सत्ता से बाहर हो गए। हालांकि धीरे-धीरे जाटों का भाजपा से मोहभंग होने लगा। 2008 में हुए विधानसभा चुनावों में जाटों ने कांग्रेस का साथ तो दिया, लेकिन पहले जितनी सक्रियता से नहीं। गहलोत चाहते हैं कि लोकसभा चुनाव में जाट पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में आ जाएं।
राजस्थान पुलिस का मुखिया बदलकर गहलोत सरकार कास्ट केमिस्ट्री दुरुस्त करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ी है। 1976 बैच के आईपीएस हरीश चंद्र मीणा को राज्य का नया डीजीपी बनाया है। मीणा को यह नियुक्ति आईपीएस एस.एस. गिल, पी.के. तिवारी और के.एस. बैंस की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर दी गई है। मीणा को डीजीपी बना गहलोत ने कई हित साधे हैं। पहला तो मीणाओं का हिमायती होने का मैसेज दे दिया और दूसरा नमोनारायण मीणा की संभावित नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया है। गौरतलब है कि सूबे के नए डीजीपी केंद्रीय वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा के छोट भाई हैं। नमोनारायण मीणा इन दिनों सियासी संकट में घिरे हुए हैं। कारण और कोई नहीं बल्कि भाजपा छोड़ कांग्रेस के सामने कदमताल कर रहे किरोड़ी लाल मीणा हैं। किरोड़ी के भाजपा से हुए मोहभंग से कांग्रेस को तो फायदा हुआ है, लेकिन इससे नमोनारायण की उम्मीदें तीन-तेरह हो रही हैं। एक तो उनकी सवाई माधोपुर संसदीय सीट की परिसीमन में प्रकृति बदल गई है, दूसरे जिस दौसा सीट से वे दावेदारी जता रहे थे उस पर भी किरोड़ी आ धमके। इन दोनों मीणा नेताओं में छिड़े सियासी संघर्ष ने कांग्रेस को बड़ी मुश्किल में डाल दिया है। पार्टी यह तय नहीं कर पा रही है कि दौसा से किसे टिकट दिया जाए। सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस किरोड़ी लाल मीणा को दौसा से और नमोनारायण मीणा को उदयपुर अथवा टोंक-सवाई माधोपुर से टिकट दिए जाने के फॉर्मूले पर विचार कर रही है। ऐसा करने से दोनों मीणा नेता संतुष्ट हो जाएंगे। ऐसा करना कांग्रेस के लिए जरूरी भी है, क्योंकि लोकसभा चुनाव में छह से सात सीटों पर मीणा निर्णायक स्थिति में हैं।
गुर्जरों की अशोक गहलोत से यह शिकायत थी कि सरकार में उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है, लेकिन हाल ही में किए मंत्रिमंडल विस्तार के बाद यह काफी हद तक दूर हो गई है। गुर्जर नेता डॉ. जितेंद्र सिंह को केबीनेट मंत्री बना ऊर्जा विभाग सौंपा है। वे गहलोत के पिछले कार्यकाल में भी मंत्री रहे थे। समाज में उनकी अच्छी पकड़ है। उल्लेखनीय है कि डॉ. सिंह से पहले गहलोत मंत्रिमंडल में एक भी गुर्जर मंत्री नहीं था। गुर्जर समाज के कई संगठन निरंतर प्रतिनिधित्व देने की मांग कर रहे थे। गहलोत सरकार लोकसभा चुनाव के समय भाजपा से खिन्न चले रहे गुर्जरों को नाराज नहीं करना चाहती। हालांकि गुर्जर आरक्षण आंदोलन संघर्ष समिति के अध्यक्ष कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला ने कांग्रेस पर आरक्षण विधेयक को लटकाने का आरोप लगाया है और लोकसभा चुनावों में सबक सिखाने का मन बनाया है। लेकिन, कांग्रेस बैंसला के कहे पर ज्यादा ध्यान नहीं दे रही है, क्योंकि विधानसभा चुनाव में उनकी अपील के बावजूद गुर्जरों ने भाजपा को वोट नहीं दिए। राज्य में गुर्जर मतदाता परिसीमन के बाद तीन से चार सीटों पर हार-जीत तय करने की स्थिति में हैं। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में गुर्जरों के एकमुश्त वोट हासिल करने के लिए भीलवाड़ा, झालावाड़, अजमेर एवं जयपुर ग्रामीण से गुर्जर नेताओं को टिकट देने की रणनीति पर विचार कर रही है।
अशोक गहलोत के राजपूत वोटों को पक्ष में करने के प्रयासों पर जाएं तो दिपेंद्र सिंह शेखावत को विधानसभा अध्यक्ष और भरत सिंह को सरकार के गठन के समय ही कैबीनेट मंत्री बना दिया गया था। सूत्रों के मुताबिक पार्टी लोकसभा चुनाव में चार से पांच राजपूत प्रत्याशियों को मैदान में उतारने की रणनीति पर काम कर रही है। गौरतलब है कि राजपूतों का एक धड़ा आरक्षण के मसले पर भाजपा से खासा नाराज है एवं कांग्रेस से नजदीकियां बढ़ाना चाहता है। इसी धड़े के लोकेंद्र सिंह कालवी विधानसभा चुनाव से ऐन पहले कांग्रेस में शामिल हुए थे। वे भी लोकसभा चुनाव लडऩा चाहते हैं। ब्राह्मण मतों को जोड़े रखने के मकसद से गहलोत ने मंत्रिमंडल के हालिया विस्तार में राजेंद्र पारीक को केबीनेट मंत्री बनाया है। पहले उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाने पर भी चर्चा चली थी। बृजकिशोर शर्मा सरकार में पहले से ही केबीनेट मंत्री हैं।
कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी के बढ़ते कदमों से भी खासी दिक्कतों में है। विधानसभा चुनावों में बसपा, कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब रही थी। लोकसभा चुनाव में इसे रोकने के लिए अशोक गहलोत ने दलित वर्ग से संबंधित बाबू लाल नागर, भरोसी लाल जाटव एवं अशोक बैरवा को मंत्री बनया है। सूत्रों के मुताबिक इनमें से भरोसी लाल जाटव और अशोक बैरवा बसपा के प्रभाव को कम करने के लिए ही मंत्री बनाया गया है। इन दोनों के विधानसभा क्षेत्रों के आस-पास बसपा तेजी से पनप रही है। हालांकि लोकसभा चुनावों में बसपा ज्यादा नुकसान करने की स्थिति में नहीं है, लेकिन फिर भी कांग्रेस कोई रिस्क नहीं लेना चाहती। गहलोत अल्पसंख्यक वोटों को भी डेमेज नहीं होने देना चाहते। मंत्रिमंडल में अमीन खां को शामिल कर उन्होंने अल्पसंख्यक कोटा पूरा कर दिया है। दुरू मियां पहले से केबीनेट मंत्री हैं। वहीं गुरमीत सिंह कुन्नर को राज्य मंत्री बना सिखों को भी रिझाने की कोशिश की है। कास्ट केमिस्ट्री दुरुस्त कर लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने की कांग्रेस की यह रणनीति कितनी कारगर रहती है, इसका पता तो चुनाव परिणाम के बाद ही लगेगा।

सोमवार, मार्च 02, 2009

शिकंजे में भू-माफिया


सुरूर पर सख्ती के बाद अब भू-माफिया गहलोत के निशाने पर हैं। सरकार ने भू-उपयोग परिवर्तन संबंधी नियमों में फेरबदल कर जमीन के दलालों के जमींदोज करने की तैयारी कर ली है। कितनी कारगर होगी उनकी ये मुहिम। एक रिपोर्ट!

शराब माफिया पर नकेल कसने के बाद अशोक गहलोत ने भू-माफिया पर शिकंजा कसने की कवायद शुरू कर दी है। सरकार ने नई आवासीय योजनाओं के लिए 90 बी से पूर्व ली जाने वाली एनओसी की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया है। नई व्यवस्था के तहत अब यदि कोई डवलपर जमीन खरीदना चाहता है तो वह 5 हजार रुपए प्रति एकड़ या 2 लाख रुपए जमा करवाकर तकनीकी जानकारी ले सकता है। अब 90 बी, मानचित्र अनुमोदन और भू-परिवर्तन के लिए एक बार में ही आवेदन लिए जाएंगे और पूरी कार्रवाई एक साथ चलेगी। इसके लिए 60 और 120 दिन की अवधि तय की गई है। पहले भू-उपयोग परिवर्तन होगा, फिर 90 बी की कार्रवाई होगी और आजरी 15 दिन में नक्शे जारी कर दिए जाएंगे।
वसुंधरा सरकार के समय 90 बी भारी धांधलियां हुई थीं। इस नियम की आड़ में भू-माफियाओं ने जमकर मौज मनाई और अनाप-शनाप भू-उपयोग परिवर्तन कराए। दरअसल, पुरानी व्यवस्था में अनगिनत कमजोर कडिय़ां थीं जिनका डवलपर्स ने बेजां इस्तेमाल किया। खुलेआम भ्रष्टाचार हुआ और हजारों एकड़ जमीन उपयोग परिवर्तन कराया गया। भ्रष्टाचार की शुरुआत एनओसी लेने की प्रक्रिया से ही शुरू हो जाती थी। एनओसी स्थानीय निकाय या राज्य सरकार द्वारा जारी की जाती थी। एनओसी लेने के बाद डवलपर को 90 बी, भू-उपयोग परिवर्तन और मानचित्र अनुमोदन के लिए आवेदन करना होता था। ये आवेदन एक साथ न होकर अलग-अलग किए जाते थे। एक ही मामले की फाइल बार-बार सरकार के पास जाने से समय तो ज्यादा लगता ही था। भ्रष्टाचार की गुंजाइश भी बढ़ जाती थी। ज्यादा गफलत सरकार की ओर से मॉनीटरिंग के अभाव में होती थी। कई आवेदनों का निपटारा तो कुछ ही दिनों में हो जाता था और कई महीने तक लंबित रहते थे।
पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में जमीनों में आए बूम पर नजर दौड़ाएं तो पूरी कहानी समझ में आ जाती है। हालांकि यह बूम पूरे देश में ही आया था, लेकिन वसुंधरा सरकार की ओर से बरती गई शिथिलता के चलते राज्य के बाहर के डवलपर्स और उद्योगपतियों के लिए राजस्थान पसंदीदा जगह बन गया। इसकी वहज अन्य राज्यों सीमावर्ती राज्यों के मुकाबले यहां जमीन की दरें काफी कम होना व क्षेत्रफल की दृष्टि से देश का सबसे बड़ा राज्य होने के कारण यहां जमीन की कोई कमी नहीं होना भी रहा। धीरे-धारे यहां भी जमीन के भाव आसमान छूने लगे। फिर भी जमकर खरीद-फरोख्त हुई। हालात यह हो गए कि बड़े शहरों के कई किलोमीटर तक के दायरे में एक एकड़ जमीन भी किसानों के पास नहीं बची। यहीं स्थिति नेशनल हाइवे के किनारे भी है। यहां की भी ज्यादातर जमीन डवलपर्स ने खरीद ली। मामला जमीन खरीदने तक ही सीमित रहता तो ठीक था, लेकिन भू-उपयोग परिवर्तन को लेकर गजब की आपाधापी मच गई। खुले तौर पर भ्रष्टाचार हुआ। और देखते-देखते हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि आवासीय योजनाओं मे तब्दील हो गई। जहां न तो कोई सड़क थी और न ही कोई आधारभूत सुविधा।
पुरानी व्यवस्था आवासीय कॉलोनी विकसित करने वाले डवलपर्स लोगों को 90 बी की जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं थे। कुई डवलपर्स तो भू-परिवर्तन हुए बिना ही आवासीय योजनाओं के भ्रामक विज्ञापन जारी कर देते थे। लोग इन्हें देखकर राशि जमा करा देते थे, लेकिन बाद में उन्हें कब्जा नहीं मिलता था। अब ऐसा करने पर डवलपर्स एवं निजी खातेदारों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाएगी। गहलोत सरकार ने बड़े स्तर पर होने वाली धांधलियों को रोकने के लिए नया मास्टर प्लान मंजूर होने के बाद 2 साल तक राज्य सरकार की अनुमति के बिना भू-उपयोग परिवर्तन नहीं करने का निर्णय लिया है। सरकार आगामी 2-3 सालों में सभी 105 शहरों के मास्टर प्लान तैयार कर लेगी। जिन शहरों के मास्टर प्लान तैयार हो रहे है उनके ड्राफ्ट 30 जून तक प्रकाशित हो जाएंगे। एक अन्य बड़े कदम के तहत सरकार ने रूरल बैल्ट में भू-उपयोग परिवर्तन पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी है। यह रोक इकोलॉजिकल व पेराफेरी क्षेत्र में भी लागू की गई है।
सरकार ने निजी योजनाओं में प्रोवीजल पट्टे और कब्जा पत्र जारी करने के लिए प्रारूप भी तय कर दिए हैं। अब स्थानीय निकाय भू- उपयोग परिवर्तन की आवश्यकता नहीं होने पर 10 हजार और गैर आवासीय योजना में 4 हजार वर्ग मीटर तक के पट्टे जारी करने का अधिकार दे दिया है। कार्य का विकेन्द्रीकरण करते हुए सरकार ने 25 हजार वर्ग मीटर जमीन तक के भू-उपयोग परिवर्तन का अधिकार राज्य स्तरीय समिति और 1500 वर्ग गज तक स्थानीय निगम को दे दिया है। नगरीय विकास मंत्री के पास 25 हजार वर्ग मीटर से ज्यादा जमीन के मामले ही जाया करेंगे। लोगों को होने वाली परेशानियों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने बिना संपर्क सड़कों के 90 बी की कार्रवाई नहीं करने का फैसला किया है। अब 5 एकड़ की आवासीय योजना में 40 फीट, 10 एकड़ में 60 फीट, 50 एकड़ में 100 फीट एवं इससे अधिक में 100 फीट चौड़ी सड़क होना जरूरी है। इस पूरी व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार ने कोड नंबर सिस्टम बनाया है। आवेदक कोड नंबर के माध्यम से वेबसाइट या नागरिक सेवा केन्द्र पर अपने प्रकरण की प्रगति देख सकेगा। कुल मिलाकर सरकार ने एक प्रभावी व पारदर्शी व्यवस्था लागू की है उम्मीद है इससे भू-माफियाओं का सफाया होगा।

रविवार, मार्च 01, 2009

जादूगर की जय हो... (होली स्‍पेशल)


स्लमडॉग मिलियनेयर ने आठ ऑस्कर क्या जीते अचानक ही पुरस्कारों की डिमांड बढ़ गई। लॉस एंजिल्स में जय हो... की गूंज से अपने दिग्गज तो पगला ही गए। बोले, जिंदाबाद-जिंदाबाद बहुत हो चुका अब तो जय हो... का जमाना है। कैसे भी करो, पर जय हो... का जुगाड़ करो। दोनों ने खूब माथापच्ची की तो आखिर में एक आइडिया जम गया। ऑस्कर सरीखे एक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार हो गई। बस एक अंतर रहा यहां पुरस्कार की एक ही कैटेगरी रखी गई। इसके पीछे उनका तर्क था, 'ज्यादा श्रेणियों से बादशाहत बंट जाती है।'
पुरस्कार के लिए एंट्री आने लगीं। सबसे पहले 'महारानी' ने दावेदारी जताई। बोलीं, यह अवॉर्ड तो बना ही मेरे लिए हैं। एक से बढ़कर एक कारनामे किए हैं मैंने। सब सूखा-सूखा चिल्लाते रहते थे। मैंने नदियां बहा दीं। गली-गली में खुलवा दीं। आखिर दवा-दारू पर इतनी बंदिश क्यों? लोग बहकेंगे नहीं तो सरकार कैसे चलेगी? हाथ वाली पार्टी वादों से बहकाती थी, हमने सुरूर में बहका दिया। लीक से हटकर काम किया मैंने, एकदम ओरिजिनल। और हां, विकास तो बेहिसाब हुआ मेरे जमाने में। अब हमारा स्टेट बीमारू नहीं रहा। लोगों की सेहत पर आप ध्यान न दें, उन्हें तो मामूली नजला-जुकाम है। पद को गरिमा दिलाने का काम भी मेरे जमाने में हुआ। वर्ना पहले यूं ही कोई ऐरा गैरा नत्थू खैरा मिलने चला आता था। लोगों के काम से क्या है? उसी से मिलो जो अपने काम का है।
महारानी काम गिना ही रही थीं कि 'बाबोसा' बोले पुरस्कार के असली हकदार तो हम हैं। महारानी का क्या है, इन्हें तो बनाया ही हमने है। हमारी नर्सरी में ही ये पली-बढ़ी हैं। हमारा निर्देशन नहीं होता तो कब का कोई भी पटकनी दे चुका होता। स्लमडॉग वाले निर्देशक का काम तो हमारे सामने कुछ भी नहीं है। उसने तो कहानी में किसी को करोड़पति बनाया है पर पर हमने तो यदि किसी कांच पर भी हाथ रख दिया तो वो कोहीनूर बन गया। यानी हम हुए किंगमेकर। वैसे हम किंग भी रहे हैं। उपराष्ट्रपति रहे और राष्ट्रपति बनते-बनते रह गए। तीन बार सीएम बनकर भी दिखाया। वो भी बिना पूरे बहुमत के। जोड़-तोड़ की राजनीति क्या होती है? पहले यहां जानता कौन था? सब हमने सिखाया।
बाबोसा आगे कुछ और बोलते उससे पहले ही 'जादूगर' मोर्चे पर आ गए। बोले, हमारा दावा एकदम धांसू है। हम धारावी की झोपड़पट्टी से भी कठिन परिस्थितियों यानी रेत के धोरों से निकल कर आगे बढ़े हैं। इस दौड़ में कई दावेदार थे, लेकिन हमने सबको पछाड़ दिया। गजब के एथलीट हुए ना हम। ऊंचाई पर पहुंच कर भी हम जनता को नहीं भूले हैं। हम तो जनता के मुनीम हैं। अब पिछली बार खजाना खाली था तो हम क्या करें? गलतियों से सीखने का गुण भी हमारे अंदर है। पिछली बार कर्मचारियों और जाटों को नाराज करने की गलती की थी, इस बार नहीं करेंगे। भगवान को भी नाराज नहीं होने देंगे, पिछले राज के चार अकाल अभी तक याद हैं। लिहाजा अभी से चोखट चूमना चालू कर दिया है। और हां, हमारे आज्ञाकारी होने के भी नंबर देना। हम दस जनपथ की एक भी बात नहीं टालते हैं।
जादूगर की बातें सुनते-सुनते गुस्से से लाल-पीला हुआ एक शख्स भी अपना दावा जताने आ धमका। वह एक वोट, एक वोट... से आगे कुछ बोल पाता इससे पहले ही ज्यूरी ने फैसला तैयार कर दिया। फैसला सुनाया गया, 'महारानी जिन कारनामों के दम पर दावा जता रही हैं, उन्हीं से वे मात खा गईं। बाबोसा न तो अब किंग रहे और न किंगमैकर और एक वोट से हारने वाले तो इस अवॉर्ड के लिए क्वालिफाई ही नहीं करते हैं। सो जय हो अवार्ड गोज टू जादूगर...।' पुरस्कार की घोषणा होते ही श्वेत-धवल कुर्ता-पायजामा पहने जादूगर स्टेज पर आते हैं तो सीधे दस जनपथ से दूधिया रोशनी का पुंज उनके ऊपर आकर गिरता है। धीरे-धीरे जादूगर की जय हो... गाने वालों का स्वर तेज होने लगता है। निराश मुद्रा में बाहर निकलते हुए महारानी और बाबोसा की नजरें मिलती हैं तो दोनों एक साथ बोलते हैं जय हो... पीछे से एक वोट से हारने वाला शख्स पूछता है, किसकी?

रविवार, फ़रवरी 22, 2009

रणछोड़ शेखावत


भाजपा को हिला देने वाले बाबोसा के बवंडर ने राह बदल ली है। शेखावत ने लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा कर मैदान से हटने के संकेत दे दिए हैं। उन्होंने महारानी से हार मान ली है या आडवाणी की वेटिंग क्लियर करने के लिए ऐसा किया है? भैरों सिंह के बदलते रुख की असल वजह तलाशती अंतर्कथा!

उस दिन भैरों सिंह शेखावत कुछ घंटे के लिए ही दिल्ली में 31, औरंगजेब रोड स्थित अपने सरकारी आवास पर रुके थे, पर बड़ा धमाका कर गए। धमाका भी ऐसा जिससे समूची भाजपा थर्रा गई। सबसे ज्यादा असर हुआ लालकृष्ण आडवाणी पर। वैसे शेखावत के निशाने पर वे कभी नहीं थे। उनका निशाना तो वसुंधरा राजे पर था। महारानी को राजस्थान की राजनीति से रुखसत करने के मकसद से ही बाबोसा बवंडर बने थे। बवंडर तेजी से आगे भी बढ़ा। एक बार तो लगा राजपूताने इस के इस ठाकुर की फतह पक्की है, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। असल लड़ाई में उतरने से पहले ही उन्होंने एक कदम पीछे हटते हुए लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का ऐलान कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने संभावित हारे से बचने के लिए यह निर्णय लिया है, क्योंकि उम्र और सियासत के इस पड़ाव पर शेखावत सरीखे कद्दावर राजनेता से यह आशा नहीं की जा सकती है कि वे राजनीति में फुलझडिय़ां छोड़ेंगे और तमाशा करेंगे अथवा प्रतिक्रिया में बोलेंगे।
भैरों सिंह शेखावत को शुरूआत से ही चतुर राजनीतिज्ञ माना जाता है। 11 बार विधायक, तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री और देश के उपराष्ट्रपति बनने तक उन्होंने कई बार अपनी इस चतुराई को सफलतापूर्वक काम में लिया। एक जमाना था जब जोड़-तोड़ की राजनीति में सिद्धहस्त भाजपाईयों में शेखावत शीर्ष में गिने जाते थे। पर राष्ट्रपति चुनाव में राजनीति के इस मंझे हुए खिलाड़ी की पूरी गणित गड़बड़ा गई और हार गए। इस हार से उन्होंने यह सबक तो सीख ही लिया कि राजनीति में फंसने की स्थिति से बचना चाहिए। महारानी को मात देने के मामले में उन्होंने इसे काम में भी लिया। उन्होंने वसुंधरा पर निशाना साधते वक्त 'यदि स्वास्थ्य ने साथ दिया तो चुनाव जरूर लडूंगा।' कहते हुए बड़ी चतुराई से सक्रिय राजनीति में आने की मंशा जाहिर की थी। हालांकि चुनाव लडऩे के लिए सेहत से ज्यादा राजनीतिक स्वास्थ्य का सही होना ज्यादा जरूरी है। शेखावत के मामले में तो दोनों ही साथ नहीं दे रहे हैं। लिहाजा उन्होंने चुनाव नहीं लडऩे की घोषणा कर दी।
शेखावत के चुनाव नहीं लडऩे के फैसले के पीछे उनके स्वास्थ्य से ज्यादा महत्त्वपूर्ण और कई वजह हैं। दरअसल, महारानी को मात देने की मुहीम में शेखावत की शुरूआत तो शानदार रही, लेकिन बाद में वे अपनी व्यूह-रचना में खुद ही उलझते चले गए। उन्होंने लोकसभा चुनाव लडऩे का ऐलान तो इस मकसद से किया था कि वे राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर से सक्रिय हो वसुंधरा का पत्ता साफ कर देंगे, पर उनका यह कदम लालकृष्ण आडवाणी और राजनाथ सिंह के लिए चुनौती बन गया। शेखावत के बयान 'यदि जनता ने चाहा ता प्रधानमंत्री भी बनूंगा' से आडवाणी के कान खड़े हो गए। उधर, राजनाथ सिंह को एक बड़े राजपूत नेता के फिर से पार्टी में सक्रिय होने से स्वयं की सियासत पर संकट नजर आने लगा। हालांकि शेखावत ने कई मर्तबा स्पष्ट किया कि आडवाणी से उनके मित्रवत संबंध हैं और वे प्रधानमंत्री बनने के लिए उनके साथ दौड़ में नहीं हैं। राजनाथ सिंह से वे जरूर 'गंगा स्नान और कुए के पानी' संबंधी बयान से नाराज थे। लिहाजा उन्हें 'जब राजनाथ सिंह पैदा भी नहीं हुए थे, तब से राजनीति में हूं' कहते हुए आड़े हाथों भी लिया। शेखावत के तल्ख रुख को देखते हुए राजनाथ सिंह ने मामले को रफा-दफा करने की कोशिश भी की। शेखावत यह समझ कर बात को भूल गए कि पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार महारानी को मात देने में उनकी मदद करेंगे। लेकिन आडवाणी और राजनाथ सिंह ने उन्हें हाशिए पर रखने की रणनीति पर पहले से ही काम शुरू कर दिया था। जिस समय शेखावत, गहलोत सरकार से वसुंधरा राजे के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की मांग कर रहे थे, उस समय भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने महारानी का साथ देने का फैसला दिया था। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव में शेखावत को पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनाए जाने की संभावना पर भी किसी नेता ने हामी नहीं भरी।
शेखावत की रणनीति को एनकाउंटर करने के लिए वसुंधरा राजे का तरीका पूरी तरह कारगर रहा। वैसे उन्हें शेखावत की सक्रियता से आडवाणी और राजनाथ सिंह को नुकसान होने की आशंका का भी फायदा मिला। बाबोसा ने कितनी भी कोशिश कर ली, लेकिन भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उनके पीछे ही खड़ा रहा। शेखावत के न चाहते हुए भी महारानी को नेता प्रतिपक्ष बना दिया और फिर लोकसभा चुनाव के लिए फ्रीहैंड भी दे दिया। विधानसभा चुनाव तक शेखावत के खिलाफ तल्ख टिप्पणी करने वाली वसुंधरा बदले हालातों में चुप्पी साधे रहीं। जब उनसे शेखावत के बारे में पूछा जाता तो वे इतना ही कहती कि 'वे हमारे वरिष्ठ नेता हैं, हमारे मार्गदर्शक हैं।' गहलोत सरकार द्वारा उनके कार्यकाल में हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग गठित करने पर भी उन्होंने इतना ही कहा कि 'मुझे जांच से कोई आपत्ति नहीं है, मैं तो पहले भी चांज के लिए कहती रही हूं।' इसी दौरान वसुंधरा खेमे ने शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी के उस प्रस्ताव को भी सार्वजनिक कर दिया जिसमें उन्होंने राजनाथ सिंह से उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने की स्थिति में भाजपा की सरकार बनाने का दावा किया था। सांसद रामदास अग्रवाल ने तो इसके लिए एक पत्र भी राजनाथ सिंह को लिखा। इससे लोगों में यह मैसेज गया कि भैरों सिंह दामाद को मुख्यमंत्री बनाने के मकसद से काम कर रहे हैं। राजनीति में शुद्धता की बात तो वे यूं ही कर रहे हैं।
शेखावत ने जब महारानी के खिलाफ अभियान छेड़ा था तो उन्हें उम्मीद थी कि उनके विरोधी एक-एक करके उनके पाले में आते जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वसुंधरा विरोधी खेमें ने उनसे संपर्क तो साधा, पर खुले तौर पर साथ नहीं दिया। ऐसे में शेखावत के पास चुनाव लडऩे से इंकार करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था, क्योंकि यदि वे निर्दलीय चुनाव लड़ते तो जीत की संभावनाएं काफी क्षीण हो जाती। शेखावत उम्र के इस पड़ाव पर हार बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं हैं। जब हमने चुनाव नहीं लडऩे की वजह जाननी चाही तो वे तपाक से बोले 'मैंने तो पहले भी कहा था, स्वास्थ्य ने साथ दिया तो चुनाव लडूंगा। तबियत कई दिन से नासाज है, इसलिए लोकसभा चुनाव नहीं लडऩे का फैसला किया है। वैस भी मेरा ज्यादा ध्यान चुनाव लडऩे की बजाय राजनीति से भ्रष्टाचार का सफाया करने की ओर है। भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं अपनी मुहिम जारी रखूंगा।' आडवाणी से प्रतिद्वंद्विता के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने अगर-मगर कह इतना ही कहा कि 'आडवाणी मेरे पुराने मित्र हैं, उनसे प्रतिद्वंद्विता कैसी। मैंने कभी नहीं कहा कि मैं प्रधानमंत्री की दौड़ में हूं। प्रधानमंत्री वही बनेगा जिसे जनता चाहेगी।'

रविवार, फ़रवरी 08, 2009

ऑपरेशन 'एम'


जहां ललित मोदी को राजस्थान क्रिकेट संघ से बाहर का रास्ता दिखाकर सरकार वसुंधरा राजे को एक और शिकस्त देना चाहती है वहीं, मोदी आरसीए में स्वयं का वजूद बचाए रखने के साथ-साथ महारानी की नाक बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। समूचे विवाद की परतें खोलती रिपोर्ट!

विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस का नारा 'मोदी, मुद्रा, मदिरापान याद रखेगा राजस्थान' खासा चर्चित रहा था। पार्टी के सत्ता में आते ही इस बात के संकेत मिल गए थे कि वसुंधरा राजे के कार्यकाल का पोस्टमार्टम इन तीन 'एम' के इर्द-गिर्द होना तो तय है। लिहाजा, ऑपरेशन 'एम' शुरू हुआ। पहले दौर में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने शराब की दुकानों के समय में कटौती कर नशे पर नकेल कसी। दूसरे दौर में पिछली सरकार में हुए भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग का गठन हुआ। मदिरा और मुद्रा के बाद अब तीसरे 'एम' यानि मोदी की बारी है। जी हां, ललित मोदी को राजस्थान क्रिकेट संघ (आरसीए) से विदा करने की पूरी तैयारी हो गई है। हालांकि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने यह कहते हुए समूचे मसले से पल्ला झाडऩे की कोशिश की है कि सरकार खेलों में राजनीति हस्तक्षेप नहीं करेगी। लेकिन, कल तक मोदी के दाएं-बाएं रहने वाले आरसीए सचिव सुभाष जोशी शायद ही कभी अपने दम पर बगावत का झंडा बुलंद कर पाते। जाहिर तौर पर सरकार उनके पीछे है। इसकी वजह भी है। पिछले चार साल में ललित मोदी कांग्रेस की आंखों में नश्तर की तरह चुभते रहे। हालांकि मोदी जिला संघों के पदाधिकारियों को अपने पाले में ही रखने के लिए पूरा दम लगा रहे हैं, लेकिन पिछली बार की तरह सरकार उनके साथ नहीं है।
ललित मोदी का क्रिकेट प्रेम नया नहीं है। 1990 में तो उन्होंने बीसीसीआई के तत्कालीन अध्यक्ष माधवराव सिंधिया के सामने इंडियन प्रीमियर लीग का पहला प्रस्ताव रख दिया था। हालांकि उस समय उनका यह आइडिया पूरी तरह फ्लॉप हो गया था। मोदी ने कई बार दुबारा भी कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। इस दौरान उनकी नजदीकियां इंद्रजीत सिंह बिंद्रा से बढ़ गईं। बिंद्रा ने उन्हें एक ही मंत्र दिया, 'कुछ करना है तो बीसीसीआई में घुस जाओ।' मोदी ने जब बीसीसीआई में जाने की संभावनाओं को तलाशा तो नजरें राजस्थान पर आकर अटक गईं। इसकी बड़ी वजह वसुंधरा राजे का मुख्यमंत्री होना था। गौरतलब है कि महारानी और मोदी के बीच पारिवारिक संबंध हैं। मोदी ने राजस्थान में क्रिकेट का कर्ता-धर्ता बनने की ठान ली। जिला संघों के पदाधिकारियों से संपर्क साधा। अपने पक्ष में करने के लिए साम-दाम का जमकर प्रयोग किया। सरकार ने भी पूरा साथ दिया। कानून तक बदल डाला। आरसीए में वोटर की हैसियत रखने वाले अधिकारियों को मोदी के पक्ष में वोट डालने के लिए कहा गया। आखिरकार वे राजस्थान की क्रिकेट में वर्षों से चले आ रहे रूंगटा राज को समाप्त करने में सफल रहे और 21 फरवरी, 2005 को हुए आरसीए के चुनाव में अध्यक्ष बन गए। आरसीए अध्यक्ष बनते ही उनकी किस्मत ही पलट गई। उस समय शरद पवार की अगुवाई में जगमोहन डालमिया को बीसीसीआई से विदा करने की तैयारी चल रही थी। मौके की नजाकत को समझते हुए मोदी पवार के साथ हो लिए। पवार ने जीतते ही उन्हें बीसीसीआई का उपाध्यक्ष बना दिया। उन्होंने जल्द ही आईपीएल पर भी बोर्ड की मुहर लगवा ली। आईपीएल को जबरदस्त कामयाबी मिली और ललित मोदी 'हीरो' बन गए।
क्रिकेट में मोदी की सफलता को यहीं छोड़ बात राजस्थान की ही करें तो पिछले चार साल में वे कई कारणों से विवादों में घिरे रहे। ज्यादातर विवाद वसुंधरा राजे की नजदीकियों के चलते ही हुए। दरअसल, सरकार मोदी पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रही। भाजपा के एक बड़े नेता ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि 'वसुंधरा राजे कॉर्पोरेट सबंधी मसलों को ललित मोदी के मशवरे के बिना नहीं निपटाती थीं। कई मामलों में तो अकेले मोदी ने ही निर्णय लिया। मुख्यमंत्री के निर्देश पर सरकारी अफसर तक फाइल लेकर मोदी के पास जाते थे... कई मामलों में वे वसुंधरा राजे का दूसरा चेहरा थे।' वसुंधरा सरकार ने आमेर की कई बेशकीमती हवेलियां ओने-पोने दामों में मोदी के पारिवारिक सदस्यों के नाम कर दीं। एक बड़ा हंगामा पाकिस्तान क्रिकेट टीम के दौरे के समय हुआ। दौरे का अंतिम मैच जयपुर के सवाई मान सिंह स्टेडियम में था। मैच शुरू होना वाला था। लोग स्टेडियम में प्रवेश कर रहे थे। मोदी मेहमानों का स्वागत करने के लिए मुख्य द्वार पर खड़े थे। तभी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी महेंद्र सुराणा के प्रवेश को लेकर विवाद खड़ा हो गया। मोदी ने सुराणा से गाली-गलोच करते हुए कहा कि 'यह स्टेडियम मेरा है, मैं जिसे चाहूं उसे ही एंट्री मिलेगी।' हाथापाई पर आमादा मोदी ने यह कहते हुए सीएम को फोन मिलाया कि 'आईएएस है... मेरे राज में दादागिरी करता है... अभी सीएम को कहता हूं... अभी संस्पेंड कराता हूं।' दरअसल, महेंद्र सुराणा अपने एक रिश्तेदार के साथ मैच देखने आए थे। जयपुर में क्रिकेट एकेडमी चलाने वाला उनका यह रिश्तेदार रूंगटा गुट का व्यक्ति माना जाता है। अपने विरोधी गुट के व्यक्ति को देखकर मोदी तिलमिला गए और आपा खो बैठे। आईपीएल के दौरान जयपुर में हुए मैच भी विवादों से नहीं बच पाए। एक मैच के दौरान आरसीए की ओर से मेहमानों को खुले तौर पर शराब परोसी जा रही थी। कुछ विदेशी मेहमानों ने तिरंगे के ऊपर रखकर खूब जाम छलकाए। जब मीडिया में यह बात आई तो हंगामा खड़ा हो गया। मोदी के खिलाफ मुकदमे भी दर्ज हुए।
सार्वजनिक हुए विवादों को छोड़ हमने जब मोदी के कार्यकाल की पड़ताल की तो कई कमजोर कडिय़ां सामने आईं। मोदी के आरसीए अध्यक्ष का चुनाव लडऩे में आई कानूनी अड़चन को दूर करने के मकसद से उनके नाम नागौर में खरीदी गई जमीन पर भी संदेह हो रहा है। जमीन के सौदे के दौरान मोदी कभी भी नागौर नहीं गए, फिर रजिस्ट्री में उनके हस्ताक्षर किसने किए और अंगूठे का निशान किसने लगाया? अब आरसीए के ही एक पदाधिकारी ने मोदी के खिलाफ फर्जी रजिस्ट्री का मामला दर्ज कराया है। आरसीए अध्यक्ष बनने के बाद मोदी ने मनमाफिक संविधान बनाने के लिए संघ की बैठक बुलाई। इस बैठक में भीलवाड़ा, डूंगरपुर, जयपुर, झुंझुनू व जोधपुर जिलों के पदाधिकारी नहीं आए थे, लेकिन इनके हस्ताक्षर संविधान पर हो गए, ये हस्ताक्षर किसने किए? फटाफट क्रिकेट के संस्करण आईपीएल में भी ललित मोदी की भूमिका संदेहास्पद रही। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने अफ्रीका में रहने वाले अपने बहनोई एवं अन्य रिश्तेदारों के माध्यम से राजस्थान रॉयल्स, किंग्स इलेवन एवं कोलकाता नाइट राइडर्स में पैसा लगाया।
ललित मोदी यह कहते हुए नहीं थकते हैं कि 'मैंने आज तक क्रिकेट का एक पैसा नहीं खाया, जबकि राजस्थान में क्रिकेट सुविधाओं के विकास पर करोड़ों रुपए लगा चुका हूं।' यह बात सही है कि मोदी के कार्यकाल में ही सवाई मान सिंह स्टेडियम को विश्वस्तरीय स्वरूप मिला और अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्रिकेट एकेडमी का निर्माण हुआ, लेकिन यह सब मोदी ने अपने पैसे से नहीं किया। पूरा पैसा बीसीसीआई ने दिया। यह बात अलग है कि मोदी के बीसीसीआई उपाध्यक्ष और आईपीएल कमिश्नर होने की वजह से आरसीए को अन्य राज्यों के क्रिकेट संघों से ज्यादा पैसा मिला। राज्य में क्रिकेट की सत्ता संभालते वक्त मोदी ने कहा था कि वे राजस्थान में कम से कम पांच टैस्ट क्रिकेटर बनाएंगे, पर फिलहाल तो राज्य की रणजी टीम एलीट गु्रप से खिसक कर प्लेट ग्रुप में पहुंच गई है। प्रत्येक सत्र में मोदी ने अपनी मर्जी से बाहरी खिलाडिय़ों को राजस्थान की टीम में खेलने के लिए भेजा। टीम के सदस्यों से पूछा तक नहीं गया। वर्तमान सत्र में वेणुगोपाल राव को खेलने के लिए बुलाया गया। आरसीए ने खूब पैसा भी दिया। पर प्रदर्शन बेहद खराब रहा। बीच में उन्हें हटाने की मांग भी उठी, लेकिन मोदी ने किसी की नहीं सुनी। मोदी ने राजस्थान में क्रिकेट के विकास के नाम पर जो सुविधाएं विकसित कीं, उनका भी जमकर दुरूपयोग हुआ। फ्यूचर अकेडमी खिलाडिय़ों की नर्सरी की जगह अय्याशी का अड्डा बन गई। कोई भी पैसे देकर यहां ठहरने लगा।
सूबे की सत्ता कांग्रेस के हाथों में आते ही इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी का आरसीए में टिक पाना मुश्किल होगा। केबीनेट मंत्री हेमाराम चौधरी को आरसीए का संरक्षक बना सुभाष जोशी ने एक तरह से सरकार की मदद मांगी। सूत्रों के मुताबिक सरकार के आश्वासन के बाद ही जोशी ने बगावत की है, लेकिन गहलोत खुलकर मोदी की खिलाफत करने से बच रहे हैं। दरअसल, गहलोत के काम करने का तरीका ही यही है। वे अति सक्रिय होकर लोगों की नजरों में सरकार को पार्टी नहीं बनाना चाहते। वैसे मोदी को आरसीए से बाहर करना आसान नहीं है, क्योंकि मोदी के भाजपा ही नहीं कांग्रेस के भी कई बड़े नेताओं से अच्छे संबंध हैं। बीसीसीआई में भी उनकी तूती बोलती है। जहां मोदी अपने इन रसूखों के सहारे आरसीए अध्यक्ष पद पर बरकरार रहने का विश्वास जता रहे हैं वहीं, विरोधी खेमा उनकी विदाई की तैयारी कर रहा है। आरसीए में अस्तित्व की यह लड़ाई पूरे क्लाइमेक्स पर है। इसका हैप्पी एंड किसके लिए होगा, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।