शनिवार, जनवरी 31, 2009

एक और सिंह ...


जसंवत सिंह और वसुंधरा राजे के बीच चल रहा सियासी संघर्ष चरम पर है। जहां जसवंत सिंह ने शेखावत के कंधे पर बंदूक रखकर निशान साध दिया है वहीं, महारानी मानवेंद्र सिंह की सियासत समाप्त कर पटकनी देने की तैयारी कर रही हैं। राजपूताने के दो भाजपाई दिग्गजों में छिड़ी जंग की परतें खोलती अंतर्कथा।

भैरों सिंह शेखावत के तल्ख बयानों से थर्रायी वसुंधरा राजे की सेहत आने वाले दिनों में भी सुधरने के आसार नहीं हैं। बाबोसा के बवंडर के बाद जसवंत सिंह की आंधी आने के हालात बन रहे हैं। सूबे की राजनीति में स्वयं के सियासी सपनों के चकनाचूर होने के बाद पुत्र मानवेंद्र की सियासत पर आए संकट से जसवंत सिंह की भृकुटि तन गई है। निशाने पर हमेशा की तरह वसुंधरा राजे ही हैं। ताजा संघर्ष की वजह मानवेंद्र सिंह की लोकसभा चुनाव में सीट बदलने की इच्छा है। वे इस बार बाड़मेर की बजाय जोधपुर या जालौर से चुनाव लडऩे का मानस बना रहे हैं। दरअसल, बाड़मेर में मानवेंद्र की हालत इस बार पतली है जबकि जोधपुर व जालौर में राजपूत वोटों की अच्छी संख्या के चलते जीत की संभावना ज्यादा है, लेकिन वसुंधरा उन्हें यह एडवांटेज लेने नहीं देना चाहतीं। जसवंत सिंह को भी इस बात का आभास है, इसलिए इन दिनों वे बाड़मेर में डेरा डाले हुए हैं।
ऐसा नहीं है कि जसवंत सिंह और वसुंधरा राजे के बीच हमेशा से छत्तीस का आंकड़ा रहा है। पांच-छह साल पहले तक दोनों के बीच अच्छे संबंध थे। एनडीए सरकार में साथ-साथ मंत्री भी रहे। भैरों सिंह शेखावत के उपराष्ट्रपति बन कर दिल्ली जाने और वसुंधरा को अपनी विरासत संभलाने तक भी सबकुछ ठीक था। दिक्कतों का दौर 2003 में हुए विधानसभा चुनाव से शुरू हुआ। इन चुनावों ने महारनी ने 'बाबोसा' की उम्मीद के मुताबिक अहमियत नहीं दी। अपने 'गुरू' की यह अनदेखी जसवंत सिंह को रास नहीं आई। गौरतलब है कि राजपूताने के इस ठाकुर को राजनीति में भैरों सिंह शेखावत ही लाए थे। विधानसभा चुनाव हुए और भाजपा को राजस्थान में पहली बार पूर्ण बहुमत मिला। विधायक दल का नेता चुनने के लिए जसवंत सिंह ही पार्टी के केंद्रीय पर्यवेक्षक की हैसियत से जयपुर आए और वसुंधरा के नाम पर मुहर लगाई। इसी दिन जब वसुंधरा ने सार्वजनिक तौर पर जसवंत सिंह के पैर छूं कर आशीर्वाद लिया तो लगा कि दोनों के बीच कोई मनमुटाव नहीं है।
वसुंधरा के सीएम बनने के कुछ ही महीनों बाद लोकसभा चुनाव हुए। एनडीए को तो बहुमत नहीं मिला पर राजस्थान में वसुंधरा का जादू चला और पार्टी 25 में से 21 सीटें जीतने में कामयाब रही। बदले हुए हालातों में वसुंधरा और जसंवत की राजनैतिक हैसियत में बड़ा फेरबदल हो गया। जहां सिंह महज एक सांसद रह गए वहीं, वसुंधरा एक अहम सूबे की मुख्यमंत्री तो थी हीं पार्टी में भी उनका कद बड़ गया। जसवंत सिंह को वसुंधरा के बड़ते कद से ज्यादा चिंता खुद की सियासत बचाए रखने की थी। उन्होंने एक बार तो राजस्थान की राजनीति में सक्रिय होने का मानस बनाया, लेकिन वसुंधरा के आभामंडल के चलते उनके लिए गुजांइश ही नहीं बची थी। कदम पीछे खीचने के अलावा उनके पास कोई रास्ता ही नहीं था। वे यह सोच कर पीछे हटे कि सूबे में सरकार तो अपनी ही है। सत्ता सुख तो भोगा ही जा सकता है, लेकिन उनके लिए यह गलतफहमी साबित हुई। वसुंधरा ने धीरे-धीरे आंखे दिखाना शुरू कर दिया। कई मसलों पर दोनों में तनातनी होने लगी। जसवंत सिंह को सबसे ज्यादा बुरा तब लगा जब वे बाड़मेर के एक दल के साथ हिंगलाज माता के दर्शन करने के लिए पाकिस्तान गए। सिंह को उम्मीद थी महारानी इस दल को बॉर्डर तक विदा करने आएंगी, लेकिन वे नहीं आईं। सीमा के दूसरी ओर सिंध के मुख्यमंत्री द्वारा किए गए भव्य स्वागत और बलुचिस्तान के मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए भोज ने जले पर नमक छिड़कने का काम किया।
बाड़मेर में आई बाढ़ के बाद दोनों के रिश्तों में और तनाव आ गया। बाढ़ से मची भारी तबाही के बाद राहत पहुंचाने के लिए मानवेंद्र सिंह और जसवंत सिंह ने वसुंधरा से कई बार गुहार की, लेकिन रस्म निभाने के लिए ही राहत कार्य शुरू हो सके। राहत कार्यों की धीमी गति से नाराज जसवंत सिंह उस समय आग बबूला हो गए जब महारानी ने अपने बेटे दुष्यंत सिंह को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के हालात का जायजा लेने के लिए बाड़मेर भेज दिया । सूत्रों को मुताबिक जसवंत सिंह ने दुष्यंत को खूब खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने यहां तक कहा कि 'तुम यहां क्या करने आए हो। मैं मानवेंद्र को झालावाड़ जायजा लेने के लिए भेजूं तो तुम्हें कैसा लगेगा।' भीषण बाढ़ के दौरान राहत में हुई देरी से स्थानीय लोगों का सांसद मानवेंद्र सिंह से नाराज होना स्वाभाविक था। वसुंधरा राजे ने मुख्यमंत्री रहते हुए बाड़मेर के साथ बाढ़ की स्थिति के अलावा भी सौतेला व्यवहार ही किया। राज्य की विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत यहां नाममात्र का ही काम हुआ। उन्होंने यह सब तयशुदा रणनीति के तहत किया ताकि यहां से सिंह परिवार का पत्ता साफ हो जाए।
वसुंधरा राजे जब मुख्यमंत्री थीं तो उन्हें चाहने वालों की कमी नहीं थी। एक महाशय ने तो वाकायदा मंदिर बना देवी रूप में उन्हें स्थापित कर पूजा शुरू कर दी। महारानी को घेरने का जसवंत सिंह के पास यह अच्छा मौका था। जसवंत सिंह की पत्नी शीतल कंवर इसे हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का खिलवाड़ बताते हुए थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंच गईं। उन्होंने कई बार थाने के चक्कर काटे पर किसी ने रिपोर्ट नहीं लिखी। शीतल कंवर ने न्यायालय में गुहार लगाई। न्यायालय ने रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दिए, लेकिन फिर भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई। मामला जब न्यायालय की अवमानना तक जा पहुंचा तो शिकायत दर्ज हुई। हालांकि पुलिस ने इसे कुछ ही दिनों में यह कहते हुए रफादफा कर दिया कि इस मसले में किसी ने कुछ भी गलत नहीं किया। इस घटना के कुछ दिनों बाद ही जसवंत सिंह ने अपने पैतृक गांव जसोल में 'रियाण' का आयोजन किया। उल्लेखनीय है कि 'रियाण' मारवाड़ में दशकों से चली आ रही एक परंपरा है जिसमें आए हुए महमानों से अफीम की मनुहार की जाती है। जसवंत सिंह अपने गांव में हर साल यह आयोजन करते हैं। इस बार फर्क सिर्फ इतना था कि मेहमान के तौर पर वसुंधरा विरोधी खेमे के नेताओं ने अफीम की मनुहार ली। वसुंधरा के लिए विरोधियों को घेरने का यह अच्छा मौका था। महारानी के इशारों पर पुलिस ने अगले ही दिन जसवंत व अन्य के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया।
जसवंत सिंह ने पार्टी के स्तर पर भी कई बार वसुंधरा राजे को पटकनी देने की कोशिश की, लेकिन प्रतीक्षारत आडवाणी के आशीर्वाद के चलते वे महारानी का कुछ नहीं बिगाड़ पाए। हालांकि वसुंधरा विरोधी खेमे के कमांडर के तौर पर उनके सैनिकों की संख्या में निरंतर इजाफा हुआ। कई बार अपनी फौज के साथ दिल्ली में डेरा भी डाला। एक बार तो उन्होंने वसुंधरा को सीएम की कुर्सी से हटाने के लिए राजनाथ सिंह को भी राजी कर लिया था, पर आडवाणी ने सारा खेल खराब कर दिया। आखिर में प्रदेशाध्यक्ष के तौर पर महेश शर्मा की जगह ओम माथुर के भेजने पर बात थमी। इस दौरान जसवंत सिंह ने वाकयुद्ध लगातार जारी रखा और वसुंधरा सरकार की कई नीतियों की खुलेआम आलोचना की। बोलने में वसुंधरा भी कहां पीछे रहने वाली। उन्होंने जसवंत की अगुवाई में उनके खिलाफ लामबंद हुए नेताओं को 'खंडहर' और 'पुरानी हवेली' तक कह डाला। हर चाल पर मात खाने से हताश जसवंत सिंह वसुंधरा को यही कह पाए कि 'एक दिन तो सभी को खंडहर होना है।'
मुख्यमंत्री रहते हुए तो वसुंधरा राजे ने जसवंत को हर चाल पर मात दी, लेकिन अब ऐसा करना मुश्किल है। महारानी के पास अब सरकारी तंत्र नहीं है। उनके खास सिपेहसालार भी अब पाला बदलने लगे हैं। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद पार्टी में भी उनकी पोजीशन पहले जैसी नहीं रही है। जसवंत सिंह भी ऐसे ही मौके की तलाश में थे। सूत्रों के मुताबिक शेखावत के बदले हुए तेवरों के पीछे जसवंत सिंह का ही दिमाग काम कर रहा है। महारानी को सूबे की सियासत से विदा करने का पूरा एक्शन प्लान उन्होंने ही तैयार किया है। दूसरी ओर जसवंत के 'बाबोसा ब्रह्मास्त्र' को एनकाउंटर करने के लिए वसुंधरा ने मानवेंद्र सिंह की सियासी जमीन खिसकाने का रास्ता अपनाया है। यानि दोनों एक-दूसरे को पटकनी देने पर आमादा है। यह तो आने वाला वक्त की बताया कि इस सियासी संघर्ष में किसे जीत मिलती है और किसके हिस्से में हार आती है।

शुक्रवार, जनवरी 23, 2009

जोश में आए जोशी


सूबे के दो कांग्रेसी दिग्गजों के बीच इन दिनों 'नंबर वन' बनने के लिए होड़ मची हुई है। रस्साकशी में एक छोर पर अशोक गहलोत हैं तो दूसरे पर सी।पी. जोशी। सियासत की इस जुगलजोड़ी पर कांग्रेस कभी फक्र किया करती थी, फिर कैसे पनपा दोनों के रिश्तों में छत्तीस का आंकड़ा?

वे कभी अशोक गहलोत के दाएं-बाएं नजर आते थे। लेकिन, अब गहलोत का नाम सुनते ही उनके माथे पर बल पड़ जाते हैं। अक्सर किस्मत को भी कोसते हैं, 'एक वोट से नहीं हारता तो मैं ही गद्दीनशीं होता'। जी हां, आपने ठीक पहचाना हम सूबे के कांग्रेसी निजाम डॉ. सी.पी. जोशी की ही बात कर रहे हैं। मुख्यमंत्री बनने का सपना टूट जाने के बाद जोशी आजकल दस जनपथ के 'लाड़ले' बनने की मुहिम में जुटे हैं। पिछले दिनों वे सोनिया दरबार में लोकसभा चुनाव की तैयारियों की रिपोर्ट के बहाने दिल्ली गए और अपनी बिसात बिछा कर आ गए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भनक तक नहीं लगी और राजस्थान में राहुल गांधी का कार्यक्रम तय हो गया। जयपुर में हुए इस कार्यक्रम के दौरान यह साफ तौर पर दिखाई दिया कि सूबे की कांग्रेस में इन दिनों वर्चस्व की जंग छिड़ी हुई है। इस कार्यक्रम से जोशी को 'अपरहैंड' मिलता देख गहलोत आलाकमान को ये समझाने में जुटे हैं कि राजस्थान में वे ही कांग्रेस का भला कर सकते हैं। अपनी अहमियत पर आंच आते देख गहलोत, राहुल के साथ ही दिल्ली के लिए उड़ लिए और आलाकमान की मिन्नतें करने में जुट गए।
जोशी और गहलोत के बीच छिड़ी अस्तित्व की यह लड़ाई पारंपरिक नहीं है। कांग्रेस कभी इस जुगलजोड़ी की मिसालें दिया करती थी। छोटे-छोटे निर्णयों पर भी दोनों के बीच गुफ्तगु होती थी, लेकिन अब दोनों एक दूसरे को पटकनी देने पर आमादा है। जब हमने जोशी और गहलोत के बीच पनपे इस मनमुटाव की तह में जाने की कोशिश की तो पता चला कि तनातनी का यह दौर बहुत पहले से चल रहा है। दरअसल, प्रदेशाध्यक्ष बनते ही जोशी ने यह ख्याल पाल लिया कि सूबे की कांग्रेस उनके इर्द-गिर्द ही चक्कर काटेगी। गहलोत भी उन्हें सलाम ठोकेंगे, लेकिन हुआ इसके उलट। गहलोत ने उन्हें किनारे करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे जोशी को भी इस बात का आभास होने लगा कि वे 'नंबर वन' होने का भ्रम पाले हुए हैं। लिहाजा उन्होंने शीर्ष पर पहुंचने के लिए हाथ-पैर मारना शुरू किया। आलाकमान की नजरों में छा जाने के मकसद से उन्होंने विधानसभा चुनाव से पहले जयपुर में एक बड़ी रैली का प्लान बनाया। दिन-रात मेहनत की। मेहनत रंग भी लाई। रैली में भारी भीड़ उमड़ी। पर, सीपी की सिट्टी-पिट्टी उस समय गुम हो गई जब पूरे आयोजन के लिए सोनिया गांधी ने अशोक गहलोत की पीठ थपथपाई। खुद की बोई फसल को गहलोत के हाथों कटती देखते जोशी के पास तिलमिलाने के अलावा और कोई चारा न था।
विधानसभा चुनाव के दौरान दोनों के बीच की खाई और चौड़ी हो गई। टिकट के दावेदार जोशी को किनारा कर गहलोत की तरफ दौड़ रहे थे। गहलोत चाहे जयपुर रहें या दिल्ली दावेदारों की भीड़ उन्हें घेरे रहती वहीं, जोशी प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में मक्खी मारते हुए दिखते। उपेक्षा से आहत जोशी आखिर कब तक चुप रहते। वे दावेदारों पर यह कहते हुए बरस पड़े कि 'आप लोगों को क्या लोकसभा का चुनाव लडऩा है जो गहलोत जी को घेरे हुए हो, विधानसभा चुनावों के टिकट तो मैं ही फाइनल करूंगा।' जोशी का गुस्सा उस समय और बढ़ जाता है जब आलाकमान टिकट फाइनल करने में गहलोत को उनसे ज्यादा तवज्जो देने लगा। हालांकि टिकट वितरण में उनकी भी चली, लेकिन 'नंबर दो' की हैसियत से। सूत्रों के मुताबिक जोशी ने इस उपेक्षा पर सोनिया गांधी में सामने नाराजगी भी जाहिर की, लेकिन खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। वजह साफ थी। टिकट वितरण पर दस जनपथ को नाराज कर जोशी, सीएम की दौड़ में पिछडऩा नहीं चाहते थे।
विधानसभा के चुनाव हुए। परिणाम कांग्रेस के लिए तो मुफीद रहे, लेकिन जोशी की उम्मीदों को तीन तेरह कर गए। खुद ही चुनाव हार गए। वो भी महज एक वोट से। फिर भी उन्होंने यह समझ कर प्रयास किए कि क्या पता किस्मत जोर मार जाए। जोशी ने खुले तौर पर मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जाहिर की। उन्होंने यह कई बार कहा कि 'चुनाव हारने वाला मुख्यमंत्री नहीं बन सकता है, ऐसा संविधान में कहीं नहीं लिखा है।' वरिष्ठ नेता परसराम मदेरणा के हाथ रखने पर एकबारगी तो लगा कि बात बन सकती है। परंतु, एक वोट से मिली हार के बाद फूटी किस्मत पर दस जनपथ ने फेवीकॉल का जोड़ लगाने का मन नहीं बनाया। धीरे-धीरे उनके बगलगीर रहने वाले विश्वासपात्र भी गहलोत के पीछे हो लिए। आखिर में जोशी अकेले पड़ गए और हुआ वही जो वे नहीं चाहते थे। गहलोत को गद्दी मिली। मुख्यमंत्री बनने के बाद गहलोत के तेवर कड़े होने ही थे। टीम बनाने की बारी आई तो गहलोत ने जोशी से रस्म निभाने के लिए मशवरा किया। किया वही जो उन्हें करना था।
सियासत में हर कदम पर मिली मात के बाद दुखियाए जोशी ने एक बार तो राजनीति से तौबा कर हाथ में चॉक थाम फिर से शिक्षक बन कक्षा में जाने का मन बना लिया था। सूत्रों के मुताबिक जोशी ने इसकी तैयारियां भी शुरू कर दी थीं, लेकिन दस जनपथ से मिले संकेतों के बाद उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। सूत्रों के मुताबिक सोनिया गांधी ने लोकसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने पर उन्हें उपकृत करने का वादा किया है। इसी के चलते जोशी ने अपना पूरा ध्यान लोकसभा चुनावों पर केंद्रित कर दिया है। उन्होंने 'टारगेट-25' बनाकर आलाकमान को बड़ा सपना दिखाया है। जोशी ने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा है कि आम चुनाव में अच्छे प्रदर्शन का श्रेय हमेशा की तरह अशोक गहलोत न हड़प जाएं। वे चुनाव की रणनीति बनाने में गहलोत को एक सीमा तक ही शामिल कर रहे हैं। 'टारगेट-25' भी अकेले जोशी के दिमाग की उपज है।
राहुल गांधी के जयपुर दौरे ने सी.पी. जोशी के लिए 'ऑक्सीजन' का काम किया है। वैस जोशी ने 'युवराज' के दौरे का बेहतरीन उपयोग किया। वे चाहते तो किसी खुले मैदान में भीड़ के सामने राहुल को मंच पर उतार कर शक्ति प्रदर्शन कर सकते थे। पर, जोशी ने कार्यकत्र्ताओं की बजाय बड़े नेताओं के सामने ताकत दिखाना ज्यादा मुनासिब समझा। उनका यह तरीका कारगर भी रहा। आखिर कांग्रेसी दिग्गजों ने भी मान लिया कि पार्टी प्रदेशाध्यक्ष अभी चुके नहीं है। दस जनपथ तक उनके भी रसूख हैं। कार्यक्रम में राहुल गांधी के 'मैं विधानसभा में कांग्रेस की जीत से संतुष्ट नहीं हूं' कहने पर जोशी के चेहरे पर आई मुस्कान और गहलोत के माथे पर उभरी चिंता की लकीरों से कई संकेत मिलते हैं।
राहुल गांधी की उपस्थिति में जोशी ने यह कहते हुए अशोक गहलोत को कठघरे में खड़ा कर दिया कि 'राज में कार्यकत्र्ताओं की भागीदारी के बिना सत्ता परिर्वतन का लक्ष्य अधूरा है।' जोशी यहीं नहीं रूके उन्होंने यह कहते हुए गहलोत पर तंज कसा कि 'विधानसभा चुनावों में जीत पर ज्यादा इतराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कांग्रेस का वोट महज 1.6 प्रतिशत बढ़ा है। लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करना है तो इसे 10 फीसदी तक बढ़ाना होगा।' जोशी-गहलोत में पनपे मनमुटाव से सबसे ज्यादा उलझन में लोकसभा चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे नेता हैं। दो दिग्गजों के बीच हो रही रस्साकशी के बीच कांग्रेसी नेता यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे टिकट की दावेदारी के लिए किसके पास जाएं। वैसे फिलहाल तो दोनों के पास जाने में ही समझदारी है।

रविवार, जनवरी 18, 2009

बोलती बंद


चौतरफा हमलों ने बिंदास बोलने वाली वसुंधरा को बेजुबां कर दिया है। धड़ाधड़ लग रहे आरोपों के बाद भी उनका मौन नहीं टूट रहा है। शेखावत के हमलों के बाद गहलोत सरकार ने भी महारानी पर शिकंजा कस दिया है। आखिर क्यों नहीं निकल पा रही हैं वसुंधरा इस चक्रव्यूह से?

सियासत में सिंहासन पर सवारी करने वालों को ही सलामी मिलती है। वसुंधरा राजे आजकल राजनीति के इसी सच से रूबरू हो रही हैं। विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद शुरू हुए मुसीबतों के दौर ने रफ्तार पकड़ ली है। बाबोसा का बवंडर भयानक तूफान की शक्ल अख्तियार कर रहा है। विरोधी खेमा शेखावत के साथ हो लिया है। संघ हिसाब चुकता करने पर आमादा है। किरोड़ी सुलह के मूड में नहीं हैं। परंपरागत झालावाड़ सीट खतरे में है। अशोक गहलोत ने पिछली सरकार की करतूतों पर कार्रवाई का मन बना लिया है। कुल मिलाकर महारानी को सियासी पटकनी देने की पूरी तैयारी हो रही है। इस चक्रव्यूह से निकलने के लिए वसु मैडम इधर-अधर हाथ-पैर मार रही हैं, लेकिन इस किलेबंदी को भेदने का कोई तरीका नहीं सूझ रहा है।
विधानसभा चुनाव में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं आने पर महारानी को सूबे की सियासत से विदा करने की अटकलें लगाई जा रही थीं। सूत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह ने तो इसके लिए पूरा मन बना लिया था, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी की पहल पर वसुंधरा को 'जीवनदान' मिल गया। दरअसल, महारानी प्रतीक्षारत आडवाणी को यह समझाने में कामयाब रहीं कि सूबे में बागियों की वजह से उनका करिश्मा काम नहीं आया, लोकसभा चुनाव में यदि उन्हें 'फ्री हैंड' दिया गया तो वे पिछला प्रदर्शन दोहराने में कामयाब होंगी। आडवाणी के कहने पर राजनाथ सिंह ने सूबे की भाजपा में वसुंधरा की बादशाहत तो कायम रखी, लेकिन लोकसभा चुनाव तक सबकुछ ठीक करने की नसीहत के साथ।
नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद वसुंधरा 'डेमेज कंट्रोल' की तैयारी कर ही रही थीं कि 'बाबोसा' ने ताल ठोक दी। शेखावत थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, एक के बाद एक आरोप लगाते जा रहे हैं। भैरों सिंह की इस मुहीम से महारानी की छवि को खासा नुकसान हुआ है। शेखावत, वसुंधरा के लिए बड़ा सिरदर्द हैं। उनका हर कदम महारानी के लिए परेशानी बढ़ाने वाला है। वैसे भी भाजपा के पास शेखावत को लेकर तीन ही विकल्प हैं पहला, उन्हें मान-मनौव्वल कर शांत किया जाए दूसरा, उन्हें पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ाया जाए और तीसरा उन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया जाए। शेखावत के तल्ख रुख को देखकर पक्के तौर पर यह कहा जा सकता है कि वे चुप बैठने वालों में से नहीं हैं। यदि पार्टी उन्हें टिकट देती है और वे जीत कर आते हैं तो फिर सूबे की सियासत से वसुंधरा का पत्ता साफ होने में देर नहीं लगेगी। पार्टी उन्हें टिकट नहीं देती है तो वे खुद तो चुनाव लड़ेगे ही बाकी सीटों पर उम्मीदवार भी खड़े करेंगे। हालांकि इनमें से जीतने वालों की संख्या बहुत कम होगी, लेकिन वे भाजपा के उम्मीदवारों को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में तो रहेंगे ही।
शेखावत इफैक्ट को अपने हाल पर छोड़ दें तो भी महारानी की मुसीबतें कम नहीं हैं। विधानसभा चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला 'कास्ट फैक्टर' अभी भी भाजपा के पक्ष में नहीं है। भाजपा की ओर से सुलह के ठंडे पड़ते प्रयासों के बीच किरोड़ी लाल मीणा ने कांग्रेस की ओर रुख कर लिया है। कांग्रेस पहले ही उनकी पत्नी गोलमा देवी को मंत्री बनाकर उपकृत कर चुकी है। सूत्रों के मुताबिक किरोड़ी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लडऩा चाहते हैं। कांग्रेस भी इसके लिए तैयार हो गई है, बस सीट को लेकर मशक्कत चल रही है। यदि ऐसा होता है तो भाजपा को बड़ा नुकसान होना तय है, क्योंकि मीणा वोटर आधा दर्जन से ज्यादा सीटों पर हार-जीत तय करने की स्थिति में हैं। दूसरी ओर, विश्वेंद्र सिंह भले ही विधानसभा चुनाव में हार गए हों, लेकिन वसुंधरा के जाट विरोधी होने के मैसेज की मरहम-पट्टी अभी तक नहीं हुई है। जाटों को मनाने में देरी घातक हो सकती है, क्योंकि कांग्रेस जाटों को कुछ ज्यादा ही तवज्जों दे रही है। गुर्जरों के मामले में वसुंधरा अभी भी दुविधा में है। भाजपा के खैरख्वाह कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की समाज पर कमजोर होती पकड़ से उलझन और बढ़ गई है। फिलहाल, भाजपा गुर्जर आरक्षण का ठीकरा कांग्रेस के सिर फोडऩे की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी राज्यपाल के पास लंबित आरक्षण विधेयक पर हस्ताक्षर करने की लगातार मांग कर गुर्जरों को यह समझाने का प्रयास कर रही है कि वसुंधरा सरकार ने तो आरक्षण दे दिया है, पर कांग्रेस की वजह से उन्हें इसका लाभ नहीं मिल रहा है। हालांकि आम गुर्जर इस बात को मानने को तैयार नहीं है।
लोकसभा चुनाव में पिछले प्रदर्शन को दोहराने में वसुंधरा के लिए संघ का रवैया भी एक बड़ी बाधा है। पुष्ट सूत्रों के मुताबिक संघ का एक धड़ा भाजपा में महारानी के बढ़ते कद से चिंतित है। संघ को इस बात का डर सता रहा है कि वसुंधरा आने वाले समय में नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती बन सकती हैं। संघ महारानी को मोदी के मुकाबले खड़ा करना नहीं चाहता। वैसे भी मुख्यमंत्री बनने के बाद वसुंधरा और संघ के रिश्तों में कड़वाहट ही आती गई। मुख्यमंत्री रहते हुए महारानी ने कभी भी आरएसएस को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। संघ ने भी उनकी कई नीतियों की खुली आलोचना की। शेखावत के सक्रिय होने से वसुंधरा और संघ में समझौता होने के आसार और कम हो गए हैं। संघ के सक्रिय नहीं होने की स्थिति में आडवाणी द्वारा दिए टारगेट को पूरा कर पाना वसुंधरा के बूते में नहीं होगा।
लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के दबाव के बीच वसुंधरा को स्वयं के सियासी भविष्य की चिंता भी सता रही है। उनकी दो चिंताए हैं पहली, लोकसभा चुनाव में पार्टी की कम से कम 15 सीटें निकालना और अपने पुत्र दुष्यंत सिंह को झालावाड़ में विजयी बनाना। यदि उनकी दोनों चिंताएं सही साबित हुर्इं तो महारानी की स्थिति 'न घर की रहेगी न घाट की'। एक ओर लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन नहीं करने पर उनका नेता प्रतिपक्ष का ओहदा बचा पाना मुमकिन नहीं होगा वहीं, दुष्यंत सिंह हार गए तो परंपरागत झालावाड़ सीट से भी हाथ धोना पड़ेगा। इस दुविधा से निकलने के लिए वसुंधरा कई रास्तों पर विचार कर रही हैं। उनके पास पहला विकल्प यह है कि वे 'रणछोड़' बन कर झालवाड़ से लोकसभा का चुनाव लड़ केंद्र की राजनीति की ओर रुख करें और फिर दुष्यंत सिंह का झालारापाटन से विधायक का चुनाव लड़वाया जाए। इससे उनकी परंपरागत सीटें भी बच जाएंगी और भैरों सिंह शेखावत सहित विरोधियों के तेवर भी ढीले पढ़ जाएंगे। बस, दिक्कत एक ही है, यदि केंद्र में एनडीए की सरकार नहीं बनी तो वे महज एक सांसद बन कर रह जाएंगी। दूसरे विकल्प के तौर पर ऐसे में महारानी राज्य की राजनीति में ही सक्रिय रहकर झालावाड़ से किसी और को उम्मीदवार बनाने के बारे में भी सोच रही हैं।
चारों ओर से घिरी महारानी को शिकस्त देने का अशोक गहलोत को अच्छा मौका मिला है। उन्होंने वसुंधरा के शासनकाल की खामियों को ढूंढ़, घेरने की पूरी तैयारी कर ली है। शेखावत की सनसनी के बाद गहलोत ने अपना अभियान और तेज कर दिया है। दीनदयाल ट्रस्ट मामले में वसुंधरा सहित छह लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो चुकी है और इसी प्रकार के अन्य मामलों की पड़ताल हो रही है। गहलोत बड़ी चतुराई से रणनीति पर काम कर रहे हैं। वे जांच को तसल्ली से आगे बढ़ा रहे हैं ताकि लोगों को यह नहीं लगे कि 'बदले की भावना' से कार्रवाई हो रही है, बल्कि यह मैसेज जाए कि 'वे इसी लायक थीं।'

शुक्रवार, जनवरी 09, 2009

शेखावत की सनसनी


सूबे की सियासत में भैरों सिंह शेखावत की सक्रियता से वसुंधरा खेमा स्तब्ध है। महारानी को राजनीति में 'एंट्री' दिलाने वाले शेखावत अब उन्हें 'आउट' करने में जुटे हैं। आखिर क्यों आई दोनों के मधुर रिश्तों में खटास?

भैरों सिंह शेखावत। ग्यारह बार विधायक चुने गए। तीन बार मुख्यमंत्री रहे। और फिर देश के उपराष्ट्रपति बने। राजनीति का ऐसे मंझे हुए खिलाड़ी से किसी गलती की उम्मीद करना बेमानी है। लेकिन उनसे गलती हुई। गलती सियासत का वारिस चुनने में। इस गलती को उन्होंने मान भी लिया है और ठीक करने की मुहीम भी शुरू कर दी है। संकेतों को छोड़ सीधी बात करें तो भैरों सिंह शेखावत ने वसुंधरा राजे को सूबे की सियासत से विदा करने के योजना पर अमल करना शुरू कर दिया है। शेखावत ने वसुंधरा को राजस्थान से हटाने और पार्टी के शुद्धिकरण की बात कहकर भाजपा में भूचाल ला दिया है। उन्होंने वसुंधरा के नेतृत्व वाली पूर्व सरकार के खिलाफ 22 हजार करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में करा पूरा पैसा दोषियों से वसूलने की मांग करके पार्टी के लिए नया संकट खड़ा कर दिया है। शेखावत के राजस्थान से लोकसभा का चुनाव लडऩे की घोषणा करने के बाद भले ही राजनैतिक विश्लेषक इसे आडवाणी के लिए खतरा और राजनाथ सिंह के लिए चुनौती बता रहे हों, लेकिन भैरों सिंह को करीब से जानने वालों की मानें तो उनका निशाने पर केवल वसुंधरा हैं। वे उन्हें राजस्थान से विदा करके ही दम लेंगे। 'बाबोसा' के तीखे तेवरों से घबराई महारानी यह पता लगाने में जुटी हुई हैं कि शेखावत किस बात से नाराज हुए हैं? कौनसा फैसला उन्हें खटक गया है?
वसुंधरा राजे को सियासत में सफलता का स्वाद चखाने का श्रेय भैरों सिंह शेखावत को ही जाता है। वसुंधरा भिंड-मुरैना से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद शेखावत के संपर्क में आईं। राजमाता विजयराजे सिंधिया की बेटी होने के कारण शेखावत ने भी उनकी तरफ पूरा ध्यान दिया और 1985 के विधानसभा चुनाव में धौलपुर से टिकट दिया। वसुंधरा यहां से जीत तो गईं, लेकिन शेखावत इससे संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने वसुंधरा को लोकसभा में भेजने के लिए झालावाड़ में मैदान तैयार किया। यहां से 1989 में पहली बार जीतने के बाद महारानी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। वे यहां से लगातार पांच बार सांसद रहीं। इस दौरान शेखावत उपराष्ट्रपति का चुनाव जीत गए। राजस्थान से विदा होने से पहले शेखावत ने एक ऐसे नेता की तलाश शुरू की जो उनकी राजनीतिक विरासत को संभाल सके। आखिर में वसुंधरा को उन्होंने अपना वारिस बनाया। युवा, तेजतर्रार और भरोसेमंद मानकर शेखावत अपनी विरासत उन्हें संभला गए। विधानसभा चुनाव नजदीक थे। पार्टी ने उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट कर दिया। चुनावों में महारानी का जादू चला और भाजपा ने ऐतिहासिक सफलता हासिल करते हुए 120 सीटें हासिल कीं। वसुंधरा राज्य की पहली मुख्यमंत्री बनीं। शेखावत और महारानी के बीच गुरू-शिष्य परंपरा ने यहीं से दम तोडऩा शुरू कर दिया।
राजनीति में सत्ता का सुरूर बहुत जल्दी सिर चढ़ता है। वसुंधरा ने सत्ता संभालते ही पार्टी अपना अलग कैडर विकसित करने की चाहत से शेखावत समर्थकों को किनारे करना शुरू किया। शेखावत का दूत बनकर जसवंत सिंह ने कई बार रिश्तों में आई खटास में चाशनी घोलने की कोशिश की, लेकिन बात बनने की बजाय बिगड़ती ही गई। तवज्जो नहीं मिलने सेे जसवंत सिंह नाराज अलग से हो गए। उन्होंने विरोधी खेमे को लामबंद कर मोर्चा खोल लिया। शेखावत के विश्वस्त होने के नाते पार्टी के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष ललित किशोर चतुर्वेदी भी उनके साथ हो लिए। वसुंधरा सरकार की नीतियों की खुलेआम आलोचना की जाने लगी। सांसद कैलाश मेघवाल ने तो मुख्यमंत्री पर करोड़ों के घोटाले का आरोप जड़ दिया। मेघवाल, शेखावत के खास सिपेहसालार हैं। वे उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में तीनों बार मंत्री रहे। इन बयानों ने वसु मैडम के तेवरों को और तीखा कर दिया। उन्होंने ललित किशोर चतुर्वेदी की जगह महेश शर्मा को सूबे में पार्टी का निजाम बनवाकर विरोधियों को पस्त करने का कोशिश की, लेकिन इससे अदावत और तेज हो गई।
गुर्जर आरक्षण आंदोलन के दौरान दोनों खेमों के बीच रिश्ते और पेचीदा हो गए। सूत्रों के मुताबिक आंदोलन के दौरान उपजे हालातों से शेखावत काफी व्यथित थे। उन्होंने इसके लिए वसुंधरा राजे को जिम्मेदार ठहराते हुए केंद्रीय नेतृत्व से राज्य में मुख्यमंत्री बदलने की मांग भी की। राजस्थान के कई भाजपा नेताओं ने नेतृत्व परिर्वतन की मांग को लेकर दिल्ली में डेरा डाले रखा। राजनाथ सिंह तो एक बार वसुंधरा को विदा पर राजी हो गए थे, लेकिन आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हुए। मामले को दबाने के लिए फेरबदल के नाम पर महेश शर्मा की जगह ओम माथुर प्रदेशाध्यक्ष बना दिया। ओम माथुर के साथ काम करने में भी महारानी ने काफी ना-नुकर किया। लालकृष्ण आडवाणी तक से गुहार लगाई कि चुनाव से ऐन पहले कोई परिवर्तन करना सही नहीं है। लेकिन राजनाथ सिंह ने निर्णय नहीं बदला। विरोधी खेमा अभी भी महारानी की विदाई की कोशिश कर रहा था। एक-दूसरे की ओर से तल्ख टिप्पणियां भी हो रही थीं। वसुंधरा ने बोखलाहट में पार्टी के दिग्गज नेताओं को 'खंडहर' तक कह दिया। उनका सीधा इशारा भैरों सिंह शेखावत की ओर ही था। कुलीनों का कुनबा कही जाने वाली भाजपा में पार्टी स्तर पर इतनी तल्ख बयानबाजी पहली बार देखने को मिली।
उपराष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल समाप्त होने के बाद शेखावत समर्थकों ने उन पर फिर से राज्य की राजनीति में सक्रिय होने का दबाव बनाना शुरू किया, लेकिन वे इसे टालते रहे। राज्य के अलग-अलग हिस्सों से नेता और कार्यकर्ता बड़ी संख्या उनसे वसुंधरा सरकार की कार्यशैली का विरोध जताने आने लगे। कई लोग तो यहां तक उलाहना देते थे कि 'बाबोसा आप ही लाए थे इन्हें'। इस बीच चुनाव का समय नजदीक आ गया। टिकट की मारामारी शुरू हो गई। लाख कोशिशों के बाद भी शेखावत के कुछ ही समर्थक टिकट पाने में कामयाब रहे। उन्हें अपने दामाद नरपत सिंह राजवी को टिकट दिलवाने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ी। सूत्रों के मुताबिक शेखावत की गुहार पर राजनाथ सिंह के दखल के बाद राजवी का टिकट दिया गया। राजवी को यह कहकर टिकट देने में आनाकानी की गई कि किसी को भी सीट बदलने की इजाजत नहीं दी जाएगी। जबकि राजेंद्र सिंह राठौड़ का नाम बदली हुई सीट पर पहली लिस्ट में ही फाइनल हो गया। इतना ही नहीं राजवी को हराने के लिए भी कई भाजपाईयों ने खूब कोशिश की। पार्टी सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा नहीं चाहती थीं कि राजवी जीतें। अपने दामाद की हालत पतली होते देख आखिर में प्रचार अभियान की कमान शेखावत को संभालनी पड़ी। सभाएं की, जनसंपर्क किया, फोन किए। राजवी तो जीत गए, लेकिन शेखावत की टीस और गहरी हो गई।
विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार के बाद शेखावत ने वसुंधरा को राजस्थान की राजनीति से विदा करने का पूरा प्रयास किया। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने राजनाथ-आडवाणी के सामने भाजपा की हार के लिए जिम्मेदार वसुंधरा की कारिस्तानियों का तफसील से ब्योरा रखा। उन्होंने लोकसभा चुनावों का वास्ता देकर वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष नहीं बनाने की बात भी कही। पर उनकी एक नहीं सुनी गई। पार्टी स्तर पर हर मोर्चे पर लगातर हुई उपेक्षा से आहत शेखावत का लावा उस समय फूट पड़ा जब कोटा में उनके समर्थकों ने वसुंधरा सरकार की कारगुजारियों के लिए उन्हें ब्लेम किया। शेखावत ने लोकसभा चुनाव लडऩे की घोषणा करते हुए वसुंधरा पर खूब बरसे। उन्होंने इस बात पर अफसोस जाहिर किया कि मैं ही उन्हें राजस्थान की राजनीति में लाया था, लेकिन उनके नेतृत्व में सरकार राह भटक गई और लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी। वे यहीं नहीं रुके। उन्होंने वसुंधरा को विदा करने की बात भी कही। शेखावत को करीब से जानने वाले यह अच्छी तरह जानते हैं कि वे जो कहते हैं कर गुजरते हैं। शेखावत बयान देकर ठहरने वालों में से नहीं हैं। अब सिर्फ यह देखना बाकी है कि वे अपने कहे को अंजाम तक कैसे पहुंचाते हैं।

शुक्रवार, जनवरी 02, 2009

सुरूर पर सख्ती


गहलोत ने नशे पर नकेल कसते हुए अवैध शराब कारोबारियों को शिकंजे में लेने के बाद मयखाने खुलने के समय में चार घंटे की कटौती की है। मदहोश होकर वाहन चलाने वालों के खिलाफ अभियान पहले से ही चल रहा है। सुरा के खिलाफ सरकार के इस संघर्ष को लोगों का भारी समर्थन मिल रहा है।

रात के आठ बजने को हैं। दुकान के बाहर ग्राहकों की अच्छी खासी भीड़ जमा है। लेकिन दुकानदार की नजरें ग्राहकों पर कम घड़ी पर ज्यादा हैं। ठीक आठ बजते ही हाथ में पैसे लिए खड़े ग्राहकों को किनारे कर दुकानदार शटर खींच ताला जड़ देता है। चौंकिए मत, यह नजारा आजकल सूबे की शराब की दुकानों पर आम है। सरकार के आदेश के बाद राज्य के मयखाने सुबह दस बजे खुलते हैं और रात को आठ बजे बंद हो जाते हैं। पहले शराब की दुकानों का समय सुबह नौ बजे से रात ग्यारह बजे तक था, लेकिन सच्चाई यह थी कि ये दुकानें अल सुबह खुलने वाली दूध की डेयरियों से पहले खुल जाती थीं और रात को इन पर समय का कोई नियंत्रण नहीं था।
विधानसभा चुनाव में वसुंधरा सरकार की आबकारी नीति भी एक बड़ा मुद्दा थी। कांग्रेस ने प्रचार के दौरान 'बातें दूध की और दुकाने दारू की' जुमले के साथ वसुंधरा राजे पर खूब कटाक्ष किए। दरअसल, पिछली सरकार ने शराब माफिया पर शिकंजा कसने के नाम पर आबकारी नीति में किए गए बदलावों का दूसरा ही रूप सामने आया। सरकार ने बेहिसाब शराब की दुकानों के लाइसेंस बांटे। सरकार पर सुरा का ऐसा सुरूर चढ़ा की मयखाना खोलने के लिए न तो मंदिर से गुरेज किया और न ही पाठशाला से परहेज। दुकान खोलने के लिए बने सारे नियम-कायदों को ताक पर रख दिया। गली-गली मदिरालय खुल गए। सरकार ने इनके भीतर-बाहर पीने की अघोषित अनुमति दे दी। शराब की दुकानें बार में तब्दील हो गईं। खुलेआम जाम छलकाने की पाबंदी का असर गायब हो गया। नशे में धुत्त लोग खुलेआम सड़कों पर नजर आने लगे। छेड़छाड़ की घटनाएं बढ़ गईं। दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ। कुल मिलाकर पूरे राज्य में नशे के कारोबारियों की एक समानांतर व्यवस्था विकसित हो गई। धीरे-धीरे परंपरागत रूप से हथकढ़ शराब से जुड़े तत्व भी इससे जुड़ते गए। आबकारी विभाग के उस संशोधन ने जिसके अनुसार पुलिस का दखल लगभग समाप्त कर दिया था, अवैध शराब के कारोबारियों के हौसलों को परवान चढ़ाया। कुल मिलाकर एक ऐसी सुरा संस्कृति का जन्म हुआ, जिसकी कल्पना प्रदेशवासियों ने नहीं की थी।
गहलोत के सत्ता संभालने से ठीक पहले जयपुर जिले के हनतपुरा में जहरीली शराब पीने से 23 लोगों की मौत हो गई थी। पीडि़त लोगों के दर्द ने मुख्यमंत्री को झकझोर कर रख दिया। वहीं से उन्होंने नशे पर नकेल डालने की ठान ली। सबसे पहले अवैध शराब के कारोबारियों पर शिकंजा कसने के लिए मुख्यमंत्री ने तीन महीने की कार्ययोजना तैयार की। इसके तहत आबकारी विभाग और पुलिस ने संयुक्त रूप से अभियान शुरू कर दिया है। अब तक हजारों लीटर अवैध शराब नष्ट की जा चुकी है। यह कार्रवाई पहले से अलग है। पहले आबकारी विभाग अवैध शराब को नष्ट तो कर देता था, लेकिन कुछ समय बाद वहां फिर से कारोबार शुरू हो जाता था। कई स्थानों पर तो आबकारी विभाग की शह पर ही यह काम होता था। ऐसा नहीं हो इसके लिए मुख्यमंत्री ने दोनों विभाग के अधिकारियों को पाबंद करते हुए जबावदारी तय कर दी है। गहलोत ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि कहीं भी दुबारा काम शुरू नहीं होना चाहिए। राज्य में मुख्यमंत्री स्तर पर अवैध शराब के खिलाफ इस तरह की पहल पहली बार देखने में आ रही है।
राजमाता गायत्री देवी के पोते और होटल रामबाग के निदेशक विजित सिंह के 'हिट एंड रन' मामले के बाद गहलोत ने नशे के कारोबार के खिलाफ बड़ी कार्रवाई का मन बना लिया। गौरतलब है कि शराब के नशे में धुत्त विजित सिंह कॉलेज छात्रा बबीता को कार से कुचलने के बाद भाग गया था। पुलिस ने विजित पर धारा 304 ए व 185 के तहत मुकदमा दर्ज कर कुछ ही देर में जमानत पर छोड़ दिया। लोगों में आक्रोश बढऩे पर गहलोत ने पुलिस अधिकारियों की क्लास लेते हुआ पूछा कि जब सलमान और संजीव नंदा के मामले में धारा 304 लग सकती है तो विजित के खिलाफ क्यों नही? सीएम की फटकार के बाद पुलिस ने विजित के केस में धारा 304 भी जोड़ दी। विजित मामले के बाद परिवहन विभाग के तेवर भी सख्त हो गए। ट्रेफिक पुलिस ने शराब पीकर वाहन चलाने वालों पर कार्रवाई तेज हो गई है। इससे दुर्घटनाओं के अलावा छेड़छाड़ की घटनाओं में भी कमी आने की उम्मीद है।
गहलोत ने जिस समय शराब की दुकानें खुलने के समय में कटौती का आदेश जारी किया तो लोगों ने शराब माफिया के सक्रिय होने, गश्त के दौरान पुलिस के भ्रष्ट होने और तस्करी बढऩे सरीखी आशंका जताई थी। लेकिन सरकार के कड़े रवैये के चलते सारी आशंकाएं निर्मूल साबित हुईं। सरकार की सख्ती के चलते आठ बजते ही दुकानें पूरी तरह से बंद हो जाती हैं। अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे नियमों की पालना सुनिश्चित करें। नियम तोडऩे वाले दुकानदारों के लाइसेंस निरस्त किए जाएं। सरकार ने इसके लिए आबकारी प्रवर्तन दस्ते को पुलिस के बराबर अधिकार दिए हैं। शराब माफिया-आबकारी-पुलिस गठजोड़ को पनपने से रोकने के लिए ढिलाई बरबतने वाले अफसरों पर कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है। सरकार इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि सिस्टम की ओर से कोई चूक नहीं हो। गहलोत के इरादों को अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शराब की दुकानों के समय में कटौती का आदेश जारी होते ही आबकारी विभाग ने तुरत-फुरत में फोन और एसएमएस से दुकानदारों को सूचना दी और आठ बजते-बजते पुलिस ने समूचे प्रदेश में दुकानें बंद करा दीं। नशाखोरी के खिलाफ सरकार की ओर से चलाए जा रहे अभियान का लोगों का भारी समर्थन मिल रहा है। लोग शराब माफिया के खिलाफ धीरे-धीरे लामबंद हो रहे हैं। राज्यों के अलग-अलग हिस्सों से शराब की दुकानों को जबरन बंद कराने की घटनाएं एकाएक बढ़ गई हैं। अनेक स्थानों पर विद्यार्थियों, महिलाओं एवं व्यापारियों ने नशे के खिलाफ मुहिम छेड़ रखी है।
शराब की दुकान खुलने के समय में की गई कटौती को मिले व्यापक जनसमर्थन के बाद सरकार ने नई आबकारी नीति बनाने की कसरत शुरू कर दी है। धार्मिक स्थलों और शैक्षणिक संस्थानों के पास खुली दुकानों का बंद होना तो तय माना जा रहा है। नई नीति में सरकार राजस्व में न्यूनतम कटौती पर शराब की दुकानों में अधिकतम कमी करना चाहती है। सूत्रों के मुताबिक सरकार का मयखानों में 30 फीसदी कमी का इरादा है। इसके लिए सरकार के पास दो विकल्प हैं। पहले विकल्प के तहत सरकार अंग्रेजी व देशी शराब की दुकान का एक ही लाइसेंस जारी कर सकती है। इससे दुकानों की संख्या में भारी कमी आएगी और राजस्व पर भी असर नहीं पड़ेगा। राज्य में देशी शराब की 6660 दुकानें हैं। दूसरे विकल्प के तहत दुकानों की लाइसेंस फीस दुगुनी की जा सकती है। इससे दुकानें कम होने पर भी राजस्व में कमी नहीं होगी। इसके अलावा सरकार केरल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु व कर्नाटक की तर्ज पर देशी शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की संभावना पर भी विचार कर रही है। इसके विकल्प के तौर पर सस्ती अंग्रेजी शराब की बिक्री शुरू की जा सकती है। इससे शराब की दुकानों की संख्या में तो कमी आएगी ही शराब तस्करी और अवैध हथकढ़ शराब के उत्पादन पर भी अंकुश लगेगा। सरकार ने 'ड्राई डे' की संख्या को फिर से सात करने का मन बनाया है। नई आबकारी नीति में इनकी संख्या घटाकर चार कर दी गई थी।

शनिवार, दिसंबर 27, 2008

कीमती किरोड़ी

किरोड़ी लाल मीणा सूबे की सियासत के केंद्र में हैं। जहां भाजपा घर वापसी के लिए मान-मनौव्वल में जुटी है वहीं, कांग्रेस सत्कार को तैयार खड़ी है। किरोड़ी पत्ते खोलने की बजाय दोनों के बीच कदमताल कर रहे हैं। क्या होगी उनकी अगली चाल?

कथाक्रम मई 2007 से शुरू होता है। गुर्जर आरक्षण के मसले पर सरकार के रवैये से तिलमिलाए किरोड़ी लाल मीणा सीएम हाऊस जाकर वसुंधरा राजे को खूब खरी-खोटी सुनाते हैं। महारानी मौन रहती हैं। सियासत की अपनी शैली के एकदम विपरीत। आंदोलन समाप्त होता है। महारानी एक-एक की खबर लेना शुरू करती हैं। निशाने पर होते हैं किरोड़ी। उन्हें किनारे करने की रणनीति के तहत कई मीणा विधायकों को समानांतर खड़ा किया जाता है। खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय के अधिकारों पर भी केंची चलती है। इस बीच गुर्जर आरक्षण आंदोलन का दूसरा दौर शुरू हो जाता है। किरोड़ी फिर सक्रिय होते हैं। सरकार पर दबाव बनाने के लिए मीणा विधायकों से इस्तीफे का आह्वान करते हुए पत्नी के हाथों खुद का इस्तीफा भिजवाते हैं। भाजपा और किरोड़ी के रिश्तों को लगी शनि की साढ़े साती यहीं समाप्त नहीं होती है। वसुंधरा के राज को जंगलराज बताते हुए मीणा समूचे सूबे का दौरा करते हैं। चुनाव का मौसम आते ही प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर और कोषाध्यक्ष रामदास अग्रवाल को भी लपेटे में ले लेते हैं। दोनों को टिकटों का सौदागर बताते हुए कहते हैं, 'जिनकी हैसियत वार्ड पंच का चुनाव जीतने की नहीं है वे प्रत्याशियों का चयन करते हैं।' अदावत पर आमादा किरोड़ी के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई तय होती है। टिकट काटा जाता है। विरोधियों को चुन-चुनकर टिकट बांटे जाते हैं। किरोड़ी भाजपा के खिलाफ खुली जंग का ऐलान करते हैं। परिणाम भी उनके मुताबिक आते हैं। भाजपा को एक दर्जन से ज्यादा सीटों का सीधा नुकसान। वसुंधरा सरकार की विदाई में अहम भूमिका निभाने वाले 'किरोड़ी फैक्टर' को नहीं सुलझाने की यह टीस भाजपा के किसी भी नेता के मुंह से सुनी जा सकती है।
विधानसभा चुनाव में पार्टी की खिलाफत कर मैदान में उतरने वालों में से किरोड़ी सबसे ज्यादा फायदे में रहे। खुद जीते, पत्नी गोलमा देवी को मंत्री पद मिला, समर्थक विजयी हुए और विरोधियों को करारी शिकस्त मिली। चुनाव परिणामों ने इस दिग्गज मीणा नेता के लिए संजीवनी का काम किया। कल तक उनकी सियासत समाप्त करने में जुटे भाजपाई अब उनकी मान-मनौव्वल में लगे हैं। पार्टी लोकसभा चुनाव से पहले 'किरोड़ी फैक्टरÓ को सुलझाना चाहती है। पार्टी की ओर से राजेंद्र सिंह राठौड़ और एस.एन. गुप्ता लगातार किरोड़ी के संपर्क में हैं। चर्चा तो यहां तक चली थी कि मीणा को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी दी जा सकती है। सूत्रों के मुताबिक मीणा का घर वापसी का मन भी बना था, लेकिन प्रदेश भाजपा का शीर्ष नेतृत्व राह में रोड़ा बन गया। जहां किरोड़ी, ओम माथुर और वसुंधरा के रहते घर वापसी के मूड में नहीं है वहीं, लोकसभा चुनाव सिर पर होने की वजह से केंद्रीय नेतृत्व बदलाव नहीं करना चाहता है। राजनाथ सिंह की ओर से ओम माथुर को 'फ्री हैंड' मिलने के बाद किरोड़ी से सुलह की संभावना और कम हो गई है। माथुर ने बागियों के लिए 'प्रवेश निषेध' की नीति अपनाते हुए कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। वैसे दोनों के बीच शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा रहा है। माथुर को बाहरी और थोपा हुआ अध्यक्ष कहने के बाद किरोड़ी उन्हें 'टिकटों का दलाल' तक कह चुके हैं। हालांकि माथुर ने खुले तौर पर किरोड़ी के खिलाफ कुछ नहीं बोले, लेकिन अंदरखाने सबक सिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। सूत्रों के मुताबिक महारानी तो किरोड़ी से सुलह के पक्ष में थीं पर माथुर नहीं माने। उन्हीं के कहने पर किरोड़ी का टिकट काटा गया। ऐसे में यदि वसुंधरा खेम की ओर से किरोड़ी को मनाने के प्रयास जारी रहे तो माथुर के अंदर की घुटन गरम लावे की तरह कभी भी बाहर आ सकती है।
सूबे में भाजपा से रूठने वालों का स्वाभाविक ठिकाना कांग्रेस होता है। पर किरोड़ी के कदम कुछ ठिठके हुए हैं। वहज साफ है वे 'यूज एंड थ्रो' की स्थिति से दो-चार होना नहीं चाहते। विश्लेषकों के मुताबिक कांग्रेस को किरोड़ी की जरूरत तो है, लेकिन सरकार चलाने के लिए कम लोकसभा चुनाव के लिए ज्यादा। यही वहज है कि कांग्रेस की ओर से न तो किरोड़ी को मनाने की ज्यादा कोशिशें नहीं हुईं और न ही किसी बड़े नेता ने उनसे संपर्क किया। हालांकि किरोड़ी, राहुल गांधी और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल के अलावा अशोक गहलोत, दिग्विजय सिंह व मुकुल वासनिक से कई बार मिल चुके हैं। कांग्रेस की ओर से इस बात का ध्यान जरूर रखा गया कि किरोड़ी को नाराज होना का कोई बहाना न मिले। गहलोत सरकार के गठन के समय भी उनसे बात की गई। सूत्रों के मुताबिक उन्हें मंत्री बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया। राजी नहीं होने पर उनकी पत्नी को राज्य मंत्री बनाया। केंद्रीय मंत्री नमोनारायण मीणा की उपस्थिति के कारण भी कांग्रेस सोच-समझकर कदम उठा रही है। किरोड़ी के कांग्रेस में आने से दोनों नेताओं में वर्चस्व की लड़ाई छिड़ सकती है। आने वाले दिनों में मीणा बिरादरी के दो दिग्गजों के बीच संतुलन कायम करना कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती होगी। किरोड़ी को भी इसका अहसास है कि कांग्रेसे के कुनबे में जाने से उन्हें नमोनारायण की कड़ी चुनौती मिलेगी। भाजपा में वे मीणा समाज के इकलौते बड़े नेता थे, लेकिन कांग्रेस में ऐसा नहीं होगा। किरोड़ी किसी कीमत पर समाज में अपनी पकड़ कमजोर नहीं करना चाहेंगे।
किरोड़ी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि उनकी मनोदशा को भांपना सहज नहीं है। 'वेट एंड वॉच' की स्थिति के बीच पल-पल बदलते बयान राजनैतिक विश्लेषकों को उलझा देते हैं। किरोड़ी एक ओर कहते हैं कि मैं राजनीति में शुद्धिकरण की लड़ाई लड़ रहा हूं। ओम माथुर और वसुंधरा राजे की तानाशाही के खिलाफ मैंने आवाज उठाई और जनता ने हमारा साथ दिया। भाजपा का नेतृत्व अभी भी उन्हीं पर भरोसा कर रहा है। लोकसभा चुनाव में फिर से सबक सिखाएंगे। भाजपा की करारी हार तय है। साथ ही संघ की विचारधारा पर कायम रखने का जिक्र करते हुए कहते हैं भाजपा तो मेरा घर है। वहीं, दूसरी ओर गहलोत सरकार को समर्थन देने, पत्नी गोलमा का मंत्री पद लेने और बार-बार कांग्रेस के बड़े नेताओं से संपर्क साधने की वजह से कांग्रेस के कुनबे में जाने के कयास भी ठंडे नहीं पड़ते हैं। किरोड़ी का मन टटोलने की कोशिश की तो 'कांग्रेस और भाजपा के बीच खड़े होकर कदमताल कर रहा हूं' कहते हुए सवाल को टाल गए। कांग्रेस के प्रति 'सॉफ्ट कॉर्नर' के बारे में पूछे जाने पर 'अब कोई इतना ख्याल रखे तो हमारा भी तो कुछ फर्ज बनता है...' कहते हुए आगामी कदम का संकेत दे दिया। कांग्रेस में जाने के कयासों को पुष्ट करते हुए उनकी पत्नी गोलमा देवी कहती हैं 'मैं कांग्रेस के समर्थन पर कायम रहूंगी। न तो खुद भाजपा में जाऊंगी और न ही इन्हें जाने दूंगी।'

गुरुवार, दिसंबर 18, 2008

हाथी ने उड़ाए होश


सूबे की सियासत में तेज रफ्तार से बढ़ता हाथी, हाथ के लिए चुनौती बन गया है। विधानसभा चुनाव में बसपा के प्रदर्शन से कांग्रेस के कान खड़े हो गए हैं। लोकसभा चुनावों में मायावती की टीम कई सीटों पर कांग्रेस को उलझा सकती है। क्या सोनिया बिग्रेड बसपा इफेक्ट से निपट पाएगी?

मरुधरा में सियासत का सिरमौर बनने के बाद कांग्रेस ने दिल्ली की गद्दी पर फिर से काबिज होने की कवायद तेज कर दी है। गहलोत की ताजपोशी के बाद पार्टी को लोकसभा चुनाव में राजस्थान से काफी उम्मीदें हैं, लेकिन कड़ी टक्कर देने की तैयारी कर रही भाजपा के अलावा मजबूत होती बसपा ने कांग्रेस को मुसीबत में डाल दिया है। मायावती की प्रधानमंत्री बनने की महत्त्वाकांक्षा यहां भी खतरा बनती नजर आ रही है। विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के दमदार प्रदर्शन से कांग्रेस में खलबली मची हुई है। पार्टी को परंपरागत वोट बैंक खिसकने का भय सता रहा है। प्रदेश में बसपा को सीटें तो 6 ही मिलीं, लेकिन बाकी आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पार्टी के उम्मीदवार 10 सीटों पर दूसरे और 71 पर तीसरे स्थान पर रहे। वोट प्रतिशत तकरीबन दोगुना होकर 7.6 प्रतिशत पर पहुंच गया। बसपा विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को आम चुनावों में भी दोहराने की पूरी तैयारी कर ली है। छह सीटों पर तो उम्मीदवार भी घोषित कर दिए हैं और प्रचार अभियान भी शुरू हो गया है।
राजस्थान का वोटर शुरू से ही द्विदलीय व्यवस्था में विश्वास रखता आया है। तीसरी ताकत बनने का प्रयास कई सियासी पार्टियों ने किए पर सफलता नहीं मिली। फिलहाल बसपा इस मकसद में कुछ हद तक कामयाब होती दिख रही है। उत्तर प्रदेश में सफल हुई 'सोशल इंजीनियरिंग' को राजस्थान में भी शुरूआती सफलता मिल रही है। मायावती ने उत्तर प्रदेश में सत्ता संभालने के बाद जिन क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति मजबूत करने की दिशा में ध्यान देना शुरू किया उनमें राजस्थान मुख्य है। उन्होंने सबसे पहले पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया। प्रदेश के कई हिस्सों में सभाएं की। अप्रैल में आयोजित 'सर्वसमाज भाईचारा बनाओ रेली' में उमड़ी भारी भीड़ के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि पार्टी इस बार के चुनावों में अच्छी उपस्थिति दर्ज करवा सकती है।
बसपा की रणनीति देखकर साफ संकेत मिलता है कि मायावती राजस्थान की 'कास्ट केमिस्‍िटी' को अच्छी तरह समझ गई हैं। वे दलित व अल्पसंख्यकों के अलावा राज्य की राजनीति में दखल रखने वाले 'प्रेशर ग्रुप्स' को अपना टारगेट बना रही हैं। हालांकि वे अपनी रणनीति में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई हैं। उत्तर प्रदेश में सोशल इंजीनियरिंग के सूत्रधार माने जाने वाले अनंत मिश्र ने राजस्थान ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष व कांग्रेसी नेता भंवर लाल शर्मा को पार्टी में लाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली। जाट मतदाताओं पर पकड़ बनाने के लिए मायावती ने अपनी सरकार के काबीना मंत्री लक्ष्मीनारायण चौधरी को राजस्थान भेजा। उन्होंने जाट बाहुल्य इलाकों का सघन दौरा किया। बसपा को समर्थन देने पर जाट मुख्यमंत्री का शगूफा भी छोड़ा पर बात नहीं बनी। गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल ने जरूर बसपा का दामन थामा परंतु मायावती को उनका काम करने का तरीका रास नहीं आया। उनके रहते मीणा मतदाताओं के अलगाव का भी खतरा था। कुछ ही दिनों में पार्टी ने गुंजल को बाहर का रास्ता दिखा दिया। कांग्रेसी दिग्गज नटवर सिंह व उनके पुत्र जगत सिंह के साथ बसपा की ज्यादा नहीं निभी। बसपा भी उन्हें ठुकराने वालों की जमात में शामिल हो गई।
शुरूआती असफताओं के वाबजूद विधानसभा चुनाव में पार्टी पूरी तैयारी के साथ उतरी। चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही ज्यादातर उम्मीदवार तय हो गए थे। प्रचार अभियान में भी पार्टी ने पूरी ताकत झोंकी। मायावती ने क्षेत्र के तूफानी दौरे किए। उनकी सरकार के कई मंत्री यही डेरा डाले रहे। पहली बार लगा कि बसपा राज्य में रस्मी तौर पर चुनाव नहीं लड़ रही है। परिणाम भी पहले से बेहतर रहे। सीट और मतों का हिस्सा तो बड़ा ही दूसरी पार्टियों की जीत-हार में भी अहम भूमिका निभाई। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व विधानसभा चुनावों में बसपा के प्रदर्शन से खासा खुश है। प्रदेशाध्यक्ष डूंगरराम गेदर ने बताया कि 'इन चुनावों में हमारा जनाधार तेजी से बढ़ा। सीटों की संख्या को नहीं देखें। हमें और ज्यादा सीटें मिलती यदि हमने कुछ बुनियादी गलतियां नहीं की होतीं। हम इन गलतियों को दूर कर लोकसभा चुनावों में और अच्छा प्रदर्शन करेंगे। हम जल्दी ही सभी सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर देंगे।'
राज्य की राजनीति में बसपा के बढ़ते प्रभाव से कांग्रेस का परेशान होना लाजमी है। पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी ने बताया कि 'बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश में कांग्रेस के लिए नई चुनौती पेश की है। विधानसभा चुनाव में हमें इसका नुकसान हुआ। यदि बसपा नहीं होती तो हमें विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत मिलता। लोकसभा चुनावों में यह नुकसान नहीं हो, इसके उपाय किए जा रहे हैं।' विश्लेषकों के मुताबिक बसपा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकती है। हाथी 8 से 10 सीटों पर हाथ का हुलिया बिगाड़ सकता है। सूबे में सरकार बनाने के बाद कांग्रेस इतना बड़ा नुकसान नहीं उठाना चाहेगी। कांग्रेस को सबसे ज्यादा नुकसान डांग, बृज व मेवात क्षेत्र में होने का अनुमान है। बसपा यहां कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब हो गई है। क्षेत्र में दलितों व अल्पसंख्यकों के अलावा मीणा जाति का बसपा को भरपूर समर्थन मिल रहा है। क्षेत्र में दिग्गज जाट नेता विश्वेंद्र सिंह भी बसपा का तोड़ नहीं ढूंढ पाए। विधानसभा की कई सीटों पर तो कांग्रेस तीसरे से चौथे स्थान पर खिसक गई। विश्वेंद्र को भी हार का मुंह देखना पड़ा।
राजस्थान में बसपा के बढ़ते जनाधार से कांग्रेस आलाकमान भी चिंतित है। सोनिया गांधी के सिपेहसालार बसपा फेक्टर का एनकाउंटर करने में जुटे हुए हैं। पार्टी परंपरागत वोटों में बसपा के सेंधमारी के लिए कोई रास्ता नहीं छोडऩा चाहती। मुख्यमंत्री के रूप में गहलोत के चयन एवं मंत्रिमंडल के गठन में हुई देरी से साफ हो गया है कि आलाकमान हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहा है। पार्टी लोकसभा चुनाव से ऐन पहले कोई बड़ी चूक नहीं करना चाहती। गहलोत सरकार के गठन में यह ध्यान रखा गया कि किसी बड़े नेता की अनदेखी नहीं हो। हर वर्ग, हर जाति को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया। पार्टी को अच्छी तरह पता है कि बसपा के बाद बड़ी संख्या में बागी में मैदान में आ गए तो मुश्किल खड़ी हो सकती है। हालांकि पार्टी का मानना है कि लोकसभा चुनाव में बसपा इतनी प्रभावशाली नहीं रहेगी। प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सी.पी. जोशी इसका कारण बताते हुए कहते हैं, 'लोकसभा चुनाव, विधानसभा के चुनावों से अलग होते हैं। यहां क्षेत्र बड़ा होता है और मुद्दे अलग। इन चुनावों में बसपा उतना प्रभाव नहीं डालेगी।'

शुक्रवार, दिसंबर 12, 2008

गहलोत की गुगली


अशोक गहलोत सूबे के नए सरदार बन गए हैं। मरुधरा की सियासत का सिरमौर बनने की दौड़ में बाकी दावेदार उनके सामने बोने साबित हुए। दूसरा धड़ा गहलोत के बढ़ते कद के सामने खुद ही हलकान हो गया। आखिर क्यों पड़े गहलोत सब पर भारी?

'उन्हें है शौक अगर बिजलियां गिराने का, हमारा काम भी है आशियां बनाने का' माजिद देवबंदी का यह शेर सूबे के नए सीएम अशोक गहलोत की ताजपोशी पर फिट बैठता है। कांग्रेस के पक्ष में चुनाव परिणाम आने पर यह तय माना जा रहा था कि सहरा गहलोत के सिर ही सजेगा। डॉ. सी.पी जोशी और हरेंद्र मिर्धा सरीखे दिग्गजों के हार जाने के बाद लग रहा था कि गहलोत को चुनौती देने वाला कोई नहीं हैं, लेकिन एक नहीं, चार-चार दावेदार सामने आ गए। शीशराम ओला, सी.पी. जोशी, गिरिजा व्यास और कर्नल सोनाराम। पर गहलोत के सामने एक न टिक सका। चारों की दावेदारी का पटाखा फुस्स हो गया। गहलोत पर हाइकमान ने तो विश्वास जताया ही विधायक भी उनके पक्ष में लामबंद हो गए। 'मारवाड के गांधी' की इस कामयाबी के बाद यह कहना पड़ेगा कि गहलोत सिर्फ जादू के ही नहीं, राजनीति के भी बेहतरीन फनकार हैं।
चुनाव परिणाम आते ही दिग्गज कांग्रेसी परसराम मदेरणा की सक्रियता को देखकर लगा कि गहलोत की राह आसान नहीं होगी। मदेरणा ने किसान मुख्यमंत्री के बहाने किसी जाट को मुख्यमंत्री बनाने की योजना पर काम किया। इससे पहले कि वे कोई नाम सामने लाते, जाट नेता शीशराम ओला और कर्नल सोनाराम ने दावेदारी जता दी। मदेरणा ने दोनों में से किसी का खुला समर्थन नहीं किया। गहमागहमी के बीच गहलोत जाट विधायकों में सेंध लगाने में कामयाब हो गए। आठ विधायक खुले तौर पर गहलोत के समर्थन में उतर आए। इन्होंने दिग्गज जाट नेताओं कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि 'मुख्यमंत्री जाति नहीं, योग्यता के आधार पर चुना जाना चाहिए। जाति की राजनीति का कांग्रेस को पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है, यदि रवैया नहीं बदला तो लोकसभा चुनाव में भी बड़ा नुकसान होगा।' विधायकों की यह पीड़ा सही भी है। इस चुनाव में मतदाताओं ने साफ संकेत दे दिया है कि जाति का जोर अब नहीं चलेगा। गौरतलब है कि जाति की जाजम पर बैठकर सियासत करने वाले ज्यादातर दिग्गजों को चुनाव में हार ही नसीब हुई है। कांग्रेस की ओर से विश्वेंद्र सिंह, हरेंद्र मिर्धा, नारायण सिंह, परसराम मोरदिया, भंवर लाल शर्मा और अतर सिंह भड़ाना को मुंह की खानी पड़ी। भाजपा में सुमित्रा सिंह, जसकौर मीणा, ऊषा मीणा तथा मदन दिलावर को भी वोटरों ने ठेंगा दिखा दिया। गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल तो तीसरे स्थान पर रहे।
राजस्थान जाट महासभा के रुख से भी गहलोत की दावेदारी मजबूत हुई। महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने पहली पसंद शीशराम ओला को बताया, लेकिन साथ ही कहा कि गहलोत से भी गुरेज नहीं है। उल्लेखनीय है कि पिछले चुनावों में महासभा ने गहलोत की खुली खिलाफत कर कांग्रेस के सफाये में अहम भूमिका निभाई थी। बड़ी संख्या में जाटों के गहलोत की ओर हो जाने से मदेरणा की पूरी रणनीति फ्लॉप हो गई। सूत्रों के मुताबिक उन्होंने आखिरी कोशिश के रूप में सी.पी. जोशी की ओर रुख किया। जोशी को भी लगा बात बन सकती है। कुछ विधायकों का समर्थन भी मिला, लेकिन चुनाव में एक वोट से मिली हार ने यहां भी दुख दिया। तल्ख मिजाज जोशी के समर्थक बढऩे की बजाय घटते ही गए। उधर गिरिजा व्यास अकेले के दम पर ही ताल ठोंकती रहीं। कोई बड़ा नेता उनके साथ नहीं लगा। कम सक्रियता की वजह विधायकों का समर्थन भी नहीं मिला। समर्थकों की भीड़ के अलावा शीशराम ओला के साथ भी कोई दिग्गज सक्रिय नहीं हुआ। उन्हें अपनी कौम का भी पूरा समर्थन नहीं मिला। अधिक उम्र भी आड़े आ गई। महज शेखाबाटी तक ही प्रभाव होना भी नुकसानदायक रहा। हालांकि गिरिजा व्यास और ओला की महत्त्वाकांक्षा भी इतनी प्रबल नहीं रही, क्योंकि दोनों को पहले से ही अच्छे पद मिले हुए हैं।
पूरे घटनाक्रम में गहलोत की दावेदारी कभी भी कमजोर नहीं पड़ी। गहलोत ने सिर्फ दो जगह नजर रखी, आलाकमान और विधायक। आलाकमान तो पहले से ही उनके साथ था। गहलोत ने पूरा ध्यान समर्थक विधायकों की फेहरिस्त लंबी करने में लगाया। मदेरणा का 'किसान कार्ड' गहलोत के 'जो खेती करे, वही किसान' बयान से फेल हो गया। गहलोत का खेमा 'किसान का मतलब जाट नहीं' आवाज बुलंद करवाने में कामयाब रहा। विधायक दल की बैठक से पहले कांग्रेस कार्यालय के बाहर ओला और गहलोत समर्थकों के बीच हुई तीखी तकरार को देखकर लग रहा था कि मुख्यमंत्री बनने के बाद भी गहलोत की राह आसान नहीं रहेगी। पर जिस सलीके से मुख्यमंत्री का चयन हुआ और जिस तरह से आलाकमान से सहमति ली गई, उसके बाद विरोध की ज्यादा गुंजाइश नहीं बची है। दिग्विजय सिंह और मुकुल वासनिक ने आलाकमान से गहलोत के नाम पर मुहर लगाने के बाद सर्वसम्मति बनाने पर जोर दिया। रायशुमारी में 96 में से 82 विधायकों ने गहलोत का समर्थन किया। इतने भारी समर्थन के बाद गहलोत के वर्चस्व को चुनौती देना आसान नहीं होगा।

इधर मचा बबाल

विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद भाजपा में मचा बबाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। बोले चाहे कोई, लेकिन लहजा तल्ख ही होता है। कई दिग्गज तो मीडिया के सामने भी भला-बुरा कहे से गुरेज नहीं कर रहे हैं। निशाने पर हैं मात खाई महारानी वसुंधरा राजे। साथ में ओम माथुर भी हैं। भाजपा में चल रही अंदरूनी जंग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जहां कांग्रेस विधायक दल के नेता बनने के बाद अशोक गहलोत मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं वहीं, भाजपा विधायक दल की बैठक तक तय नहीं हुई है। दो खेमों में बंटी भाजपा में अब नेता प्रतिपक्ष पर जोर-आजमाइश हो रही है। पार्टी के ज्यादातर नेता वसुंधरा राजे को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के पक्ष में नहीं हैं। इसके लिए घनश्याम तिवाड़ी और गुलाबचंद कटारिया का नाम सामने आ रहा है। दोनों नेताओं को संघ का भी समर्थन मिल रहा है। सूत्रों की मानें तो वसुंधरा खेमा किरोड़ी लाल मीणा को आगे करने की रणनीति में जुटा है। महारानी के विश्वस्त राजेंद्र सिंह राठौड़ और एस.एन. गुप्ता, किरोड़ी को मनाने में जुटे हैं। सूत्रों के मुताबिक किरोड़ी का पार्टी में वापसी का मन भी बन रहा है। मन टटोलने की कोशिश की तो किरोड़ी बोले, 'मैंने पार्टी छोड़ी ही नहीं तो वापस ज्वाइन करने का सवाल कहां से आया। मैं तो आज भी भाजपा की विचारधारा को मान रहा हूं। कुछ लोगों ने पार्टी को बंधक बना रखा है, बेड़ा गर्क करने में लगे हुए हैं। मैंने उसकी खिलाफत की तो मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जनता ने यह दिखाया कि मैं सही था और वो गलत।'
पार्टी में चल रही उठापटक से केंद्रीय नेतृत्व भी चिंतित है। आसन्न लोकसभा चुनाव से मुश्किलें और बढ़ गई हैं। वसुंधरा राजे और ओम माथुर को दिल्ली तलब किए जाने के बाद पार्टी में व्यापक फेरबदल के कसास लगाए जा रहे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक राजनाथ सिंह वसुंधरा को राजस्थान की राजनीति से विदा करने के मूड में हैं। प्रतिक्षारत लालकृष्ण आडवाणी भी खुले तौर पर महारानी का पक्ष नहीं ले रहे हैं। दरअसल, आडवाणी को लोकसभा चुनाव में राजस्थान से इसी तरह के परिणाम आने का डर सता रहा है। चुनाव में गुजरात मॉडल का मैजिक नहीं चलने के बाद ओम माथुर पर भी तलवार लटकी हुई है।

सोमवार, दिसंबर 08, 2008

नहीं रहा राजे का राज


सूबे की जनता ने वसुंधरा सरकार को नकार दिया है। महारानी के विकास के दावों पर आंदोलनों और भ्रष्टाचार की गूंज भारी पड़ी। दूसरी ओर कांग्रेस के सरकार बनाने की स्थिति में आने के बाद मुख्यमंत्री पद के लिए दौड़ तेज हो गई है। फिलहाल अशोक गहलोत सबसे आगे हैं।

'हमें तो अपनों ने लूटा गैरों में कहां दम था, मेरी कश्ती डूबी थी वहां जहां पानी कम था' ये पंक्तियां वसुंधरा राजे पर सौ फीसदी सच साबित होती हैं। सूबे की सल्तनत से वसुंधरा को विदाई करने में भाजपाई भी पीछे नहीं रहे। महारानी के सियासत करने के अलहदा तौर-तरीकों की वजह से पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की बड़ी फौज तैयार हो गई। विरोधियों के इस कुनबे ने महारानी को मात देकर ही दम लिया। दूसरी ओर कांग्रेसियों का एकजुट होकर चुनावी समर में उतरना कारगर रहा। हालांकि कांग्रेस पूर्ण बहुमत के मेजिकल फिगर को नहीं छू पाई, लेकिन यह तय है कि सरकार कांग्रेस की ही बनेगी।
भाजपा के हार के कारणों का विश्लेषण करें तो पिछले कुछ समय से वसुंधरा का हर दांव उल्टा पड़ा। गुर्जर आरक्षण आंदोलन उनके लिए गले की फांस बन गया। गुर्जर तो नाराज हुए साथ ही मीणाओं ने भी भाजपा से मुंह मोड़ लिया। किरोड़ी लाल मीणा को किनारे करने का फैसला महारानी के लिए भारी पड़ा। किरोड़ी, मीणा मतदाताओं को भाजपा के खिलाफ लामबंद करने में सफल रहे। उन्होंने 20 से 25 सीटों पर भाजपा को सीधा नुकसान पहुंचाया। हालांकि विश्वेंद्र की बगावत ने भाजपा के लिए उतनी भारी नहीं पड़ी। विश्वेंद्र स्वयं की सीट भी नहीं निकाल पाए। यही हाल गुर्जर नेता प्रह्लाद गुंजल का रहा। वे भी नहीं जीत पाए। देवी सिंह भाटी की बेरुखी से निश्चित रूप से पार्टी को नुकसान हुआ। एंटीइंकंबेंसी से मुकाबला करने के मकसद गुजरात की तर्ज पर विधायकों के टिकट काटने का फैसला भी महारानी के लिए मुफीद साबित नहीं हुआ। अधिकांश विधायक बगावत पर उतर आए। जीते तो कम ही, लेकिन पार्टी के उम्मीदवार को भी नहीं जीतने दिया।
इस हार के बाद सूबे की भाजपा में खलबली मचना निश्चित है। वसुंधरा विरोधी खेमे के कई नेता खुलेआम मीडिया के सामने कह रहे हैं कि हार के लिए महारानी जिम्मेदार हैं। उनके हठी स्वाभाव और तानाशाही रवैये के कारण ही राज्य में भाजपा की सरकार नहीं बनी। आने वाले दिनों में वसुंधरा विरोधियों के और मुखर होने की संभावना है। पिछले पांच वर्ष से विरोधियों को दरकिनार करने वाला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भी अब उनकी बात सुननी पड़ेगी, क्योंकि आम चुनाव ज्यादा दूर नहीं है। प्रतीक्षारत आडवाणी और राजनाथ सिंह को राजस्थान से बड़ी उम्मीद है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक हार के कारणों के पोस्टमॉर्टम के बाद राज्य भाजपा में वसुंधरा का दखल कम होना तय है। राजनैतिक विश्लेषकों द्वारा जताए जा रहे अनुमान के मुताबिक विधानसभा चुनाव में मिली हार के बाद वसुंधरा स्वयं ही राज्य की राजनीति से किनारा कर लोकसभा चुनाव लड़ केंद्र की ओर रुख कर सकती हैं। प्रदेशाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर अपना ओहदा बरकरार रखने में कामयाब हो सकते है। माथुर पहले ही राजनाथ-आडवाणी को समझा चुके हैं कि राज्य में उनके मुताबिक काम नहीं हो रहा है।
कांग्रेस इस चुनाव में पूरी रणनीति के साथ उतरी थी। टिकट वितरण में भी पूरी सावधानी बरती गई। ध्यान रखा गया कि पार्टी के किसी कद्दावर नेता की अनदेखी नहीं हो। जिन दिग्गजों के टिकट काटे गए उनके रिश्तेदारों को टिकट दिया गया। जातियों को जुटाने के जतन में कांग्रेस काफी आगे रही। पिछले चुनाव में पार्टी की हार का अहम कारण बने जाटों को मनाने में पार्टी सफल रही। राजस्थान जाट महासभा के अध्यक्ष राजाराम मील ने कांग्रेस को खुला समर्थन दिया। राजपूत नेता लोकेंद्र सिंह कालवी ने भी पार्टी का साथ दिया। कांग्रेस का आक्रामक चुनाव प्रचार भी कारगर रहा। पार्टी के निशाने पर भाजपा से ज्यादा वसुंधरा राजे रहीं। राजे के राज में हुए भ्रष्टाचार को पार्टी ने पूरे जोर-शोर से उठाया। पिछले पांच साल तक भले ही कांग्रेस विधानसभा में कोई बड़ा मुद्दा नहीं उठा पाई, लेकिन प्रचार के दौरान कांग्रेस वसुंधरा सरकार को घेरने में कामयाब रही। अशोक गहलोत धरती पकड़ खामोशी तोड़ बेहद आक्रामक हो गए। उन्होंने समूचे प्रदेश में धुंआधार प्रचार किया और सौ से अधिक सभाएं कीं।
राजस्थान में कांग्रेस की जीत के बाद मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की दौड़ शुरू हो गई है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इसमें सबसे आगे हैं। गहलोत की दावेदारी मजबूत होने के कई कारण हैं। एक तो कांग्रेस के पूरे चुनाव कैंपेन की कमान उनके हाथ में रही, दूसरा दस जनपथ से उनका निकटता। आलाकमान की सूची में गहलोत का नाम सबसे ऊपर है। प्रदेशाध्यक्ष सी।पी. जोशी, हरेंद्र मिर्धा और बी.डी. कल्ला सरीखे दिग्गजों के चुनाव हार जाने के बाद गहलोत और मुख्यमंत्री की कुर्सी के बीच दूरियां कम हो गई हैं। अब उन्हें एकमात्र खतरा दिग्गज जाट नेता परसराम मदेरणा से है। मदेरणा आलाकमान के सामने जाट मुख्यमंत्री की मांग करके दिक्कत खड़ी कर सकते हैं। टिकट वितरण के दौरान मदेरणा के तीखे तेवर देखने को मिले थे। उन्होंने गहलोत पर निशाना साधते हुए टिकट वितरण में धनबल के प्रयोग का आरोप लगाया था। मदेरणा के प्रभाव को देखते हुए आलाकमान ने उन्हें तुरंत दिल्ली तलब कर सुलह कराने का प्रयास किया था, लेकिन मदेरणा इतनी आसानी से मानने वाले नहीं हैं। हालांकि उनके लिए भी दिक्कतें कम नहीं हैं। पार्टी के सभी जाट नेता उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने के पक्ष में नहीं हैं। अधिक उम्र भी एक बाधा है। उनके बाद कर्नल सोनाराम भी दौड़ में शामिल हैं। राहुल गांधी की पसंद पर जाएं तो सचिन पायलट भी दौड़ में हैं।


''जनता भाजपा के कुशासन के तंग आ चुकी थी। जनता ने कांग्रेस को चुन सुशासन का मार्ग प्रशस्त किया है। वसुंधरा राजे के पांच साल के कार्यकाल को राजस्थान मौजमस्ती, मटरगश्ती, मुद्रा, मदिरापान और भ्रष्टाचार के रूप में याद रखेगा।''

- अशोक गहलोत, पूर्व मुख्यमंत्री


''लोकतंत्र में मतदाता का फैसला अंतिम होता है। भाजपा उसे स्वीकार करती है। हमें चुनाव परिणामों से बहुत उम्मीदे थीं, लेकिन हमारा आकलन गलत साबित हुआ। हार के लिए कौनसे कारण जिम्मेदार हैं, मिल-बैठकर पता करेंगे।''

- वसुंधरा राजे सिंधिया, मुख्यमंत्री

क्यों जीती कांग्रेस?
सत्ता विराधी लहर का फायदा मिला। भाजपा में असरदार बागियों की संख्या ज्यादा होना कांग्रेस के लिए मुफीद रहा। आक्रामक प्रचार का भी मिला लाभ।


क्यों हारी भाजपा?
चुनाव अभियान में वसुंधरा अकेली पड़ीं। भितरघात और बागियों ने बिगाड़ा गणित। जातिगत समीकरण भी रहे खिलाफ। गोलीकांड और आंदोलनों को नहीं भूले लोग।

मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

नारा ही क्या जो जुबां न चढ़े!


नारों की अपनी ताकत है। नारे वह कमाल दिखा जाते हैं, जो हजारों सभाओं-भाषणों-रैलियों के बस में नहीं होता। लेकिन, वक्त के साथ बदल रहे नारों की धार कुंद होती जा रही है। औपचारिकता भरे नारे लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ पा रहे हैं।

सतहत्तर के आम चुनाव में 'यह देखो इंदिरा का खेल, खा गई शक्कर पी गई तेल' और 'हलधर किसान, जनता पार्टी का निशान' गली-मोहल्लों में खूब गूंजा। इन नारों से जनता पार्टी के पक्ष में ऐसा माहौल बना कि कांग्रेस का सफाया हो गया। इंदिरा गांधी समेत कई दिग्गज चुनाव हार गए और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। अगले चुनाव में कांग्रेस ने 'जात पर ना पात पर, मोहर लगेगी हाथ पर' नारा देकर अपार सफलता हासिल की। भारतीय लोकतंत्र में नारों की अहमियत इन दो चुनावों तक ही सीमित नहीं रही। हर चुनाव में एक से बढ़कर एक चुटीले नारे बने। कुछ नारे तो इतने प्रभावी रहे कि कायजयी बन गए। इंदिरा गांधी का 'गरीबी हटाओ' आज भी उतना ही चर्चित और प्रासंगिक है। 'तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो .....' की गूंज से बहुजन समाज पार्टी ने दलित वोटों को अपने कब्जे में कर लिया। 'जीतेगा गुजरात' और 'आपणो गुजरात, आग्वो गुजरात' के सहारे नरेंद्र मोदी ने हेट्रिक बना ली।
नारों के सफल फसलफे के बीच सियासत का हालिया हुलिया देखें तो कहानी अलहदा है। छह राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों में किसी भी सियासी दल ने ऐसा नारा नहीं दिया जो जनता की आवाज बन सके। सबसे पहले दिल्ली की बात। दस साल से विपक्ष में बैठी भाजपा ने 'महंगी पड़ी कांग्रेस' नारा दिया है। पार्टी को उम्मीद है कि महंगाई से त्रस्त जनता शीला दीक्षित सरकार को नकार देगी। वहीं, हेट्रिक लगाने की तैयारी कर रही कांग्रेस 'विकास को थमने न दो' की दुहाई दे रही है। समूचा दिल्ली इन्हीं नारों से अटा पड़ा है। राजस्थान में भी कहानी ऐसी ही है। भाजपा ने 'जय-जय राजस्थान' के बाद 'अब नहीं रुकेगा राजस्थान' नारा बनाया। राज्य में विकास की गंगा बहाने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे इन नारों के साथ पांच साल और मांग रही हैं। दूसरी ओर कांग्रेस 'राज बदल कर दम लेगा, अब नहीं झुकेगा राजस्थान' के साथ चुनावी समर में कूदी है। छत्तीसगढ़ के चुनावों में इस बार भी चावल अहम मुद्दा बनता हुआ दिखाई दे रहा है। यहां भाजपा ने '3 रुपए चावल, फोकट में नुन, भाजपा सरकार को फिर से चुन' नारा दिया है। कांग्रेस यहां 'भ्रष्टाचारियों का राज बदल दो' के साथ रमन सिंह सरकार के खिलाफ जनादेश मांग रही है। मध्य प्रदेश में भाजपा 'हमारा प्रयास-निरंतर विकास' के साथ जनता के बीच गई है। सूबे में सत्ता संभालने का ख्वाव देख रही कांग्रेस अभी तक कोई बड़ा नारा नहीं दे पाई है। हालांकि हालिया चुनाव छह विधानसभाओं के लिए हो रहे हैं, लेकिन 'पीएम इन वेटिंग' लालकृष्ण आडवाणी ने प्रचार के दौरान 'जीतेगी भाजपा, जीतेगा भारत' के साथ आम चुनाव की तैयारी भी शुरू कर दी है।
सत्ता के सिंहासन पर बैठाने वाले नारे कभी-कभी उल्टे भी पड़ जाते हैं। भाजपा के 'इंडिया शाइनिंग' को कौन भूल सकता है। चुनावी इतिहास के सबसे महंगा, विवादित और सवालों से घिरा यह नारा भाजपा ने 2004 के आम चुनावों से पहले दिया। इलेक्ट्रोनिक व प्रिंट मीडिया के अलावा होर्डिंस में भी यही नारा छाया रहा है। टीवी पर सिर्फ पोलिया ड्रोप्स का विज्ञापन ही इससे ज्यादा दिखा। सरकार ने इसे 9,472 बार छोटे पर्दे पर दिखाया। यदि खर्चे के लिहाज से देखें तो इस पर 500 करोड़ से ज्यादा खर्चा आया। विपक्ष ने इसके खिलाफ खूब हो-हल्ला मचाया। चुनाव आयोग ने रोक भी लगाई। भाजपा को 'इंडिया शाइनिंग' अभियान से बड़ी उम्मीदे थीं, लेकिन चुनावों में वोटरों ने इस सिरे से नकारते हुए वाजपेयी सरकार को विदा कर दिया। गुजरात में कांग्रेस की कहानी भी कुछ ऐसी है। विधानसभा चुनावों में पार्टी ने मोदी से मुकाबला करने के लिए 'चक दे इंडिया' की तर्ज पर 'चक दे गुजरात' नारा दिया। नरेंद्र मोदी ने प्रत्येक चुनावी सभा में कांग्रेस इस नारे का जिक्र करते हुए लोगों से 'चक दे' का अर्थ पूछा। वाक्पटुता के बादशाह मोदी को मनमाफिक जवाब नहीं मिला तो उन्होंने इसे बाहरी नारा करार दे दिया। कुल मिलाकर कांग्रेस के पूरे केंपेन की हवा निकल गई। मोदी को मात देने का सपना भी अधूरा रह गया।
भारतीय राजनीति में नारों का इस्तेमाल मतदाताओं को उद्वेलित कर जनावेग पैदा करने में होता रहा है। लेकिन, इस बार के चुनावों को देखकर लग रहा है कि नारे बन ही नहीं पा रहे हैं। वस्तुत: चुनाव आयोग द्वारा प्रचार के तौर-तरीकों में बदलाव का असर भी नारों पर पड़ा है। भौंपू पर लगी बंदिशों के बाद अब ज्यादातर नारे विज्ञापनों तक ही सिमट कर रह गए हैं। इन्हें जनता की जुबान अभी तक नहीं मिल पाई है। मौटे तौर पर इसके दो कारण हैं पहला, नारे जनभावनाओं से नहीं जुड़ पा रहे हैं और दूसरा, राजनेता इस दिशा में उतनी क्रिएटिविटी नहीं दिखा रहे हैं। यदि वर्तमान के नारों की नब्बे के दशक तक दिए नारों से तुलना करें तो अंतर साफ दिखाई देता है। पहले जो नारे दिए जाते थे वे जनभावनाओं को ध्यान में रखकर बनाए जाते थे। जनता की नब्ज पकड़कर राजनीतिक दल नारे गढ़ते थे। नारों में उन मुद्दों को समेटा जाता था जिन पर जनता की नजरें रहती थीं। बोफोर्स तोप सौदे के समय विपक्ष का नारा 'गली-गली में शोर है, राजीव गांधी ...' खूब चर्चित रहा। यहां तक की आकाशवाणी पर प्रसारित हुए एक लाईव प्रोग्राम में एक बच्चे ने कविता की जगह इस नारे को बोल दिया था। वर्तमान में राजनीतिक दल नारों के स्थान पर चुनाव प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की मानें तो चुनाव जीतने के लिए नारे नहीं जनता को विकास चाहिए। नारों का महत्व तो है, लेकिन माहौल बनाने तक, कार्यकर्ताओं में जोश भरने तक। राजस्थान में भाजपा के निजाम ओम माथुर भी उनके सुर में सुर मिलाते हुए कहते हैं कि नारों से चुनाव नहीं जीते जाते, शिक्षित और समझदार मतदाता नारे नहीं काम देखता है। राजनेताओं के इन दावों के बीच चुनावी महासमर में चुटीले नारों की कमी अवश्य खल रही है।