<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150</id><updated>2011-12-19T20:23:59.212+05:30</updated><category term='गहलोत सरकार'/><category term='द रेड साड़ी'/><category term='राज ठाकरे'/><category term='अमेरिका'/><category term='तालिबान'/><category term='मुलायम सिंह'/><category term='इस्लाम'/><category term='शिक्षा का अधिकार'/><category term='राजस्थान'/><category term='ओलंपिक'/><category term='बाघ'/><category term='ब्राह्मण'/><category term='राज्‍यसभा'/><category term='पार्क'/><category term='मायावती'/><category term='घुसपैठ'/><category term='गृह'/><category term='तेरा मेरा साथ'/><category term='सूचना का अधिकार'/><category 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सिंह'/><category term='स्वायत्त शासन व नगरीय विकास मंत्री'/><category term='जलवायु परिवर्तन'/><title type='text'>रोज़नामचा</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><generator version='7.00' 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href="http://3.bp.blogspot.com/-F4VGuFkQk0Q/TiFq4PdXBKI/AAAAAAAAAIo/4gPBQIAxZdc/s1600/DSC_0683.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 152px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/-F4VGuFkQk0Q/TiFq4PdXBKI/AAAAAAAAAIo/4gPBQIAxZdc/s200/DSC_0683.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5629898523644724386" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संविधान ने देश के नागरिकों को कई अधिकार दिए हैं, लेकिन पिछले एक अरसे से सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है। भोजन का अधिकार तो अभी अंजाम तक नहीं पहुंचा है और शिक्षा का अधिकार स्थापित होने के लिए जद्दोजहद कर रहा है, लेकिन सूचना का अधिकार ने हर ओर से वाहवाही लूटी है। तमाम तरह के तालों में बंद रहने वाली सूचनाएं अब लोगों को सहजता से उपलब्ध हो रही हैं और इससे कई घपलों व घोटालों से भी परदा उठ रहा है। इस बीच राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक और नए अधिकार का शिगूफा छोड़ दिया है। उन्होंने न केवल 'आवास के अधिकार' की वकालत की है, बल्कि इसे अगली पंचवर्षीय योजना में भी शामिल करने की भी मांग की है। &lt;br /&gt;गहलोत गरीब और कमजोर वर्ग को आवास उपलब्ध करवाने के लिए पूर्व में भी विशेष प्रयास करते रहे हैं, लेकिन 'आवास के अधिकार' की बात कर उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। जोधपुर में एक आवासीय योजना का शिलान्यास करते हुए उन्होंने कहा कि 'आम आदमी के लिए रोटी एवं कपड़ा के बाद मकान की आवश्यकता होती है। हर व्यक्ति को मकान मिले यह सुनिश्चित करने के लिए 'राइट टू एज्यूकेशन' और 'राइट टू फूड' की तर्ज  पर 'राइट टू शेल्टर' कानून बनाया जाना चाहिए और इसे बारहवीं पंचवर्षीय योजना में शामिल किया जाना चाहिए।' उन्होंने कहा कि 'लोगों को सूचना, शिक्षा एवं भोजन का अधिकार मिलने के बाद यह जरूरी लगता है कि अब 'राइट टू शेल्टर' कानून भी बनना चाहिए। रोटी व कपड़ा के बाद सबसे बड़ी बुनियादी जरूरत मकान ही है। हर व्यक्ति के पास अपना मकान होना नितंात जरूरी है। इस बारे में मैं अपने स्तर पर हर संभव प्रयास कर रहा हूं, लेकिन बारहवीं पंचवर्षीय योजना में सबके पास मकान हो इसके लिए 'राइट टू शेल्टर' का अधिकार भी योजना में प्रस्तावित होना जरूरी है।'&lt;br /&gt;मंहगाई के इस दौर में अपना घर बनाने का सपना अब सपना ही बन कर रह गया है। अव्वल तो मकान बनाने की लिए जमीन का टुकड़ा खरीदना ही मुश्किल है और यदि खरीद भी जाए तो उस पर भवन बनाना आसान काम नहीं है। निर्माण सामग्री के भाव आसमान छू रहे हैं। बैंकों से कर्ज लेकर घर बनाना भी अब महंगा सौदा हो गया है। छत का इंतजाम करना कितना दूभर होता जा रहा है, इसकी बानगी इससे मिलती है कि जहां भी थोड़ी कम दर पर सरकारी स्कीम लांच होती है, वहां आवेदकों की भीड़ लग जाती है। ऐसे में गहलोत की 'राइट टू शेल्टर' की मांग को अच्छा समर्थन मिला है और यह संभव है कि केंद्र सरकार जल्द ही 'राइट टू शेल्टर' की दिशा में काम करना शुरू कर दे। इस संदर्भ ने जितने भी विशेषज्ञों, बुद्धिजीवियों और लोगों से बात की, ज्यादातर ने गहलोत की मांग को जायज बताया और सिद्धांतत: उनका समर्थन किया। &lt;br /&gt;राज्य के नगरीय विकास व आवासन मंत्री शांति धारीवाल कहते हैं कि घर व्यक्ति की जरूरत है और किसी कानून के माध्यम से सरकार प्रत्येक व्यक्ति को छत उपलब्ध करवा पाती है तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। धारीवाल बताते हैं कि राजस्थान पहले ही गरीब व कमजोर तबके को आवास उपलब्ध करवाने में अग्रणी है। अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी के तहत राज्य में 363 करोड़ रुपए लगात की 15 आवासीय योजनाओं में 10,696 मकानों का निर्माण कार्य प्रगति पर है। भारत सरकार ने राज्य सरकार की अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी की सराहना की और इन योजनाओं के लिए प्रत्येक घर के निर्माण पर 12 हजार 500 रुपए का अनुदान दिया जा रहा है। इसका सीधा लाभ मकान मालिक को होगा। इस दृष्टि सें राजस्थान पहला राज्य है जिसे केंद्र सरकार द्वारा गृह निर्माण के लिये अनुदान स्वीकृत किया गया है। आवास निर्माण के मेटेरियल की गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा जा रहा है और नियमानुसार यथा समय स्वतंत्र एजेंसियों से जांच करवाई जा रही है। अफोर्डेबल हाउसिंग के लिए लोगों की मांग निरन्तर बढ़ रही है और अधिकाधिक बिल्डर भी आगे आ रहे हैं। अभी जयपुर, चाकसु, भिवाडी, कुचामन और दौसा में कार्य प्रगति पर है। इसके अतिरिक्त चूरू, सरदारशहर, झुंझुनूं, पिंडवाडा, बाडमेर, देवली, चित्तौडगढ और भीलवाडा में भी इस प्रकार की आवास गृह निर्माण योजना के संबंध में प्रयास किए जा रहे हैं। &lt;br /&gt;वहीं, वसुंधरा सरकार में नगरीय विकास एवं आवासन मंत्री रहे प्रताप सिंह सिंघवी हर व्यक्ति को घर की मांग का तो समर्थन करते हैं, लेकिन इसके अमल पर उन्हें संदेह है। वे सवाल उठाते हैं कि शिक्षा के अधिकार के समय भी खूब हो हल्ला किया जा रहा था, लेकिन उसका हश्र सबके सामने है। वे कहते हैं कि देश के सभी राज्यों में आवास एक गंभीर मसला है। करोड़ों परिवारों को अपना घर नहीं है। सरकार ने पहले भी खूब योजनाएं बनाई हैं, लेकिन इनमें से एक भी स्पष्ट रूप से आगे नहीं गई। गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे लोगों को आवास उपलब्ध करवाने के लिए बनी योजनाओं पर कितनी ईमानदारी से अमल हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। सबको अपना घर मुहैया करवाने के लिए कई स्तर पर कोशिशों की जरूरत है। सही योजना बनना और उसका लाभ सही लोगों तक पहुंचाना सबसे ज्यादा जरूरी है। जब तक हम इस दिशा में ध्यान नहीं देंगे 'राइट टू शेल्टर' की बात करना बेमानी है। &lt;br /&gt;टाउन प्लानिंग के विशेषज्ञ डॉ. नंदकिशोर जेतवाल कहते हैं कि यदि ऐसा कोई कानून भविष्य में आकार लेता है तो इससे कई समस्याओं का हल स्वत: ही निकल जाएगा। शहरों में मास्टर प्लान को लागू करना आसान हो जाएगा। स्लम की समस्या भी पूरी तरह हल हो जाएगी। जब सरकार ही सबको आवास उपलब्ध करवा देगी तो कच्ची बस्तियां विकसित ही नहीं हो पाएगी। शहरों की सीवरेज, पानी सप्लाई आदि भी बेहतर हो जाएंगे। वे बताते हैं कि गांवों के मुकाबले शहरों में घर बनाना मुश्किल है। केंद्र सरकार ने शुरू से इस जटिलता को हल करने के प्रयास किए हैं। अब तक की सभी पंचवर्षीय योजनाओं का उद्देश्य आवास और शहरी विकास है। कई योजनाओं में संस्था निर्माण तथा सरकारी कर्मचारियों एवं कमजोर वर्गों के लिए मकानों के निर्माण पर जोर दिया गया। सभी कारीगरों को शामिल करने के लिए औद्योगिक आवास योजना को व्यापक बनाया गया। 'ग्लोबल शेल्टर स्ट्रेटजी (जीएसएस) की अनुवर्ती कार्रवाई के रूप में, 1988 में राष्ट्रीय आवास नीति की घोषणा की गई जिसका दीर्घकालिक उद्देश्य आवासों की कमी की समस्याओं को दूर करना, अपर्याप्त आवास व्यवस्था की आवासीय स्थितियों को सुधारना तथा सबके लिए बुनियादी सेवाओं एवं सुविधाओं का एक न्यूनतम स्तर मुहैया कराना था। सरकार की भूमिका में निर्धनता एवं कमजोर वर्गों के लिए प्रदाता के रूप में, और बाधाओं को हटाकर एवं भूमि तथा सेवाओं की अधिक आपूर्ति करा कर अन्य आय वर्गों एवं निजी क्षेत्र के लिए सुविधाकर्ता के रूप में परिकल्पना की गई।&lt;br /&gt;समाजशास्त्री सूरजभान सिंह बताते हैं कि आवास परिवार को व्यवस्थित आकार प्रदान करता है। आवास के अभाव में समाज सभ्य कम आदिम ज्यादा लगता है। आवासों की दृष्टि से भारत की स्थिति दयनीय है। सेंटर फॉर हाउसिंग राइट्स एंड एविक्शंस की रिपोर्ट के मुताबिक देश में लोअर और मिडल क्लास के लिए तीन करोड़ मकानों की कमी है। यह कमी पूरी भी नहीं होती दिख रही है। सरकारी योजनाएं तो दम तोड़ती नजर आ ही रही हैं, वे भी अब घर नहीं बना पा रहे हैं, जो बैंके से लोन लेकर ऐसा करने की सोच सकते हैं। जमीन की आसमान छूती कीमतों और एक साल के भीतर हाउसिंग लोन में चार से पांच फीसदी की बढ़ोतरी ने लोगों की उम्मीदें तोड़ दी हैं। फिक्की की एक रिपोर्ट के मुताबिक, हाउसिंग सेक्टर किसी भी अर्थव्यवस्था का एक पाया होता है। इस पर गलत असर पड़ा, तो पूरी अर्थव्यवस्था मुरझा सकती है। दुनिया के बड़े देशों के मुकाबले भारत में हाउसिंग लोन का दायरा अब भी बहुत छोटा है- कुल कर्ज का महज चार फीसदी, जबकि चीन में यह 17 और थाईलैंड में 14 फीसदी है। &lt;br /&gt;राजस्थान उच्च न्यायालय के वकील आनंद सिंह नरूका इस संदर्भ में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा फरवरी 2010 में दिए एक फैसले का हवाला देते हुए कहते हैं कि कमजोर व गरीबों के लिए जगह तलाश करना सरकार की जिम्मेदारी है। न्यायालय ने यह फैसला झुग्गी बस्तियों से हटाए गए लोगों की याचिका पर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर सरकारी नीति के तहत झुग्गी में रहने वाले लोगों को हटाया जाता है, तो उन्हें किसी और जगह पर शिफ्ट किया जाए। साथ ही नई जगह पर भी इन लोगों के लिए सभी बुनियादी सुविधाएं होना चाहिए, ताकि उन्हें अपने जीवन-यापन में कोई परेशानी न आए। अदालत ने कहा कि संविधान ने सबको जीने का अधिकार दिया हुआ है और लोगों के इस मूल अधिकार का उल्लंघन नहीं किया सकता। रिलोकेशन पॉलिसी कहती है कि अगर नवंबर 1998 से पहले अगर कोई झुग्गी बस्ती में रहता है और अगर वह आम रास्ते पर नहीं है, तो उसे वहां से हटाने कहीं और बसाना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि झुग्गी में रहने वाले लोग दोयम दर्जे के नागरिक नहीं हैं। अन्य लोगों की तरह वो भी बुनियादी सुविधाओं के हकदार हैं। शहर को सुंदर बनाने के लिए कई बार सिविक एजेंसी इन्हें शहर के दूर बसा देती हैं, लेकिन वहां पानी, ट्रांसपोर्ट, स्कूल व हेल्थ फैसिलिटी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होतीं। तमाम बातों को ध्यान में रखकर उन्हें रिलोकेट किया जाना चाहिए। सरकारी रिकॉर्ड में नाम न होने की बात कहकर उन्हें हटाने के बारे में सोचना सही नहीं है। ये वो हैं जो शहर के बाकी लोगों के बेहतर जीवन में उनकी मदद करते हैं। ऐसे में ये प्रोटेक्शन के हकदार हैं। &lt;br /&gt;कुल मिलाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 'राइट टू शेल्टर' जो शिगूफा छोड़ा है, उसके नेक होने पर तो सवाल नहीं उठाए जा सकते, लेकिन इसे अंजाम तक पहुंचाना वाकई टेढ़ी खीर है। ऐसे परिवारों की संख्या करोड़ों में है जिनके पास खुद का मकान नहीं है। इन लोगों की पहचान करना, उन्हें घर उपलब्ध करवाने की योजना बनाना और इसे अमजीजामा पहनाना आसान काम नहीं है। यदि सरकार ऐसे काम करने में पारंगत होती तो यह संभव नहीं था कि देश में करोड़ों लोग अब भी बेघर होते। योजनाओं की यहां हमारे देश में कमी नहीं है, लेकिन इन पर अमल ईमानदारी से नहीं हो पाता है। ऐसे में यदि 'राइट टू शेल्टर' को भी सियासी नजरिये ही देखा गया तो इससे कोई बड़ा बदलाव होने वाला नहीं है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-8517410791750939649?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/8517410791750939649/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2011/07/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8517410791750939649'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8517410791750939649'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2011/07/blog-post.html' title='&apos;राइट टू शेल्‍टर&apos; का गहलोती शिगूफा'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/-F4VGuFkQk0Q/TiFq4PdXBKI/AAAAAAAAAIo/4gPBQIAxZdc/s72-c/DSC_0683.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6540345252432610849</id><published>2011-04-04T14:55:00.003+05:30</published><updated>2011-04-04T15:06:25.552+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरिस्का'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कॉरबेट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पर्यावरण व वन मंत्रालय'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाघ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रणथंभोर'/><title type='text'>अब मद्धम नहीं होगी बाघों की दहाड़</title><content type='html'>ऐसे में जब दुनिया के हर कोने से बाघों के विलुप्त होने की आशंका जाहिर की जा रही है, तब भारत में इनकी तादात बढऩा नई उम्मीद जगाता है। ताजा गणना के अनुसार देश में बाघों का औसत अनुमानित आंकड़ा 1,706 है। गौरतलब है कि बाघों की पिछली गणना 2006 में हुई थी और तब इनकी संख्या 1,411 बताई गई थी। यानी पिछले चार साल में देश में बाघों की संख्या में 12 फीसदी का इजाफा हुआ है। यह बढ़ोतरी ऐतिहासिक तो नहीं है, फिर भी यह मायने रखती है। ऐसा इसलिए भी है, क्योंकि इस अवधि में ज्यादातर बाघ संरक्षित क्षेत्रों से निराशजनक तथ्य ही ज्यादा बाहर आए थे। इस दौरान बाघों की संख्या में भारी कमी की आशंका जताने वाले तथाकथित गैर सरकारी संगठनों और वन्य जीव विशेषज्ञों की कमी नहीं थी। ऐसे निराशजनक माहौल में यदि बाघों को बचाने के अभियान ने यदि मामूली सफलता भी हासिल की है, तो इसकी तारीफ होनी चाहिए। हमारे यहां बाघ संरक्षण हमेशा से विवाद का विषय रहा है। कभी बाघों की गणना पर तो कभी इनके संरक्षण के तौर-तरीकों पर सवाल उठते रहे हैं। चूंकि इस बार गणना अत्याधुनिक वैज्ञानिक तरीके से की गई है, इसलिए इस पर सवाल खड़ा करना न्यायसंगत नहीं होगा। हां, संरक्षण की दिशा और दशा पर अभी भी मंथन की व्यापक गुंजाइश है। &lt;br /&gt;पर्यावरण व वन मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों पर गौर करें तो साफ हो जाता है कि बाघ संरक्षण के अभियान में कील-कांटों की कमी नहीं है। सबसे ज्यादा चिंता की बात है बाघों के प्रवास का क्षेत्र निंरतर कम होना। 2006 में जहां बाघ 93,600 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विचरण करते थे, वहीं अब यह क्षेत्र 72,800 वर्ग किलोमीटर ही रह गया है। इसी का नतीजा है कि कुल बाघों में से 30 फीसदी संरक्षित क्षेत्रों से बाहर रह रहे हैं। रणथंभोर, कॉरबेट और सरिस्का सरीखे नामी और बड़े संरक्षित क्षेत्र से बाहर भी बड़ी संख्या में बाघ विचरण कर रहे हैं। इससे बाघ और मानव के बीच संघर्ष की आशंका बढ़ जाती है। बाघों का संरक्षण आने वाले वर्षों में और बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि देश पर जनसांख्यिकी और विकास के लिहाज से दबाव बढ़ रहा है। बाघों का संरक्षित क्षेत्र से बाहर जाना खतरनाक है। ये यहां या तो शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं या निवास क्षेत्र में प्रवेश करने पर गांव वाले इन्हें मार देते हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि बाघ संरक्षित क्षेत्र में किसी भी कीमत पर कम नहीं हो। देश में इस समय 39 बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं, लेकिन इनमें से एकाध ही अपने क्षेत्रफल को बरकरार रख पाया है। कहीं खनन माफिया ने कब्जा जमा लिया है तो कहीं भूमाफिया ने। कई जगह सिंचाई परियोजनाओं की वजह से भी बाघ संरक्षित क्षेत्रों का दायरा कम हुआ है। एक तथ्य यह भी है कि देश के कई क्षेत्रों में बाघों का अस्तित्व अभी भी खतरे में है। नई गणना के मुताबिक जहां उत्तराखंड, महाराष्ट्र, असम, तमिलनाडु और कर्नाटक में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, वहीं बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उड़ीसा, मिजोरम, पश्चिम बंगाल और केरल इनकी संख्या स्थिर है। चिंताजनक यह है कि मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश में बाघ की संख्या घट रही है।&lt;br /&gt;इलाका भले कोई भी हो हमारे यहां बाघों के दो ही दुश्मन हैं- शिकारी और स्थानीय निवासी। तमाम कानूनी बंदिशें के बाद भी देश में बाघों का शिकार होता है। चीन इनके अंगों का बड़ा बाजार है। हालांकि चीन में बाघ के अंगों का व्यापार 1993 से ही प्रतिबंधित है, फिर भी यहां यह धडल्ले से होता है। यहां बाघ की खाल 11,660 डॉलर से 21,860 डॉलर के बीच बिकती है, जबकि हड्डियों का दाम 1,250 डॉलर प्रति किलो है। पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश कई बार इस मसले को चीन के सामने उठा चुके हैं, लेकिन चीन सहयोग नहीं कर रहा है। यह सही है कि चीन का हठ अनैतिक है, मगर हम भी तो बाघों के शिकार का ठीकरा चीन के सिर फोड़ अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। माना कि चीन में बाघ से जुड़े उत्पादों का विशाल बाजार उपलब्ध है, लेकिन हम यह नजरअंदाज नहीं कर सकते कि शिकार हमारे यहां होता है और कई स्तरों की सुरक्षा को धता बताकर यह चीन तक पहुंच जाता है। यदि हम ईमानदारी से शिकंजा कस दें तो मजाल है कि चीन के बाजार में हमारे बाघों के अवशेष पहुंच जाएं। जहां तक बाघ संरक्षित क्षेत्रों और आसपास रह रहे लोगों को सवाल है, तो इन्हें दोष देने से पहले इनकी मजबूरी समझना भी जरूरी है। खुद जयराम रमेश ने यह स्वीकार किया है कि 50 हजार परिवार अभी भी ऐसे हैं, जिनका पुनर्वास होना बाकी है। बाघों के पूरी तरह विलुप्त होने के कारण बदनाम हुए सरिस्का की ही बात करें तो यहां कोर सेक्टर और उसके आसपास करीब 20 गांव अभी भी ऐसे हैं, जहां करीब दस हजार की आबादी बसी हुई है और 25 हजार से अधिक मवेशी विचरण कर रही है। होता यह है कि सरिस्का के बाघ अक्सर मवेशियों का शिकार करने पहुंच जाते हैं। पशुपालक इसे बर्दाश्त नहीं करते। &lt;br /&gt;अब तक की नीतियों से अभयारण्यों के आस पास रहने वाले लोगों को संरक्षण से कुछ हासिल नहीं हुआ है। लोग मजबूरी में संरक्षित इलाकों में मवेशी चराने ले जाते हैं और कई बार बाघ उन पर हमला कर देते हैं। उनकी एक परेशानी यह भी है कि बाघ और अन्य मांसाहारी जानवरों से बचने के लिए कई शाकाहारी जानवर जंगल से निकल कर खेतों में फसलों को बरबाद करते हैं। इस तरह ऐसे लोगों और बाघों में द्वंद्व बढ़ता ही जा रहा है। ग्रामीणों को जंगली जानवरों से अपने मवेशियों और फसलों को बचाने के लिए दिन-रात सचेत रहना पड़ता है। जब तक बाघ संरक्षण के अभियानों में ग्रामीणों के फायदों को नहीं तलाशा नहीं जाएगा, इसका सफलता संदिग्ध ही रहेगी। एक तो सरकार को यह देखना होगा कि संरक्षित क्षेत्र के आसपास जिन लोगों की फसलें बरबाद हुई हैं और जिनकी मवेशी मारी गई है, उन्हें मुआवजा दिया जाए। दूसरी बात यह कि बाघों के अभयारण्यों के आस पास के इलाकों को तीव्र गति से विकास किया जाए। जो लोग इन इलाकों में रह रहे हैं उन्हें इसका फायदा दिया जाना चाहिए। तीसरी बात कि उन्हें संरक्षण का सीधा लाभ मिलना चाहिए। उन्हें संरक्षण से जुड़ी नौकरियों में तवज्जो मिलनी चाहिए। बाघों की वजह से पर्यटन के जरिए होने वाली कमाई में भी उनका हिस्सा होना चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6540345252432610849?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6540345252432610849/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2011/04/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6540345252432610849'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6540345252432610849'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2011/04/blog-post.html' title='अब मद्धम नहीं होगी बाघों की दहाड़'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-5109553837205555872</id><published>2010-12-25T12:59:00.005+05:30</published><updated>2010-12-25T13:05:42.977+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्‍थान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अशोक गहलोत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस'/><title type='text'>किस-किसको संभाले गहलोत</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TRWd73NRS0I/AAAAAAAAAFg/5SBOSilGXJ4/s1600/Ashok%2BGahlot%2B02.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 144px;" src="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TRWd73NRS0I/AAAAAAAAAFg/5SBOSilGXJ4/s200/Ashok%2BGahlot%2B02.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5554519367188826946" /&gt;&lt;/a&gt; &lt;span style="font-weight:bold;"&gt;अशोक गहलोत को सूबे की सत्ता संभाले दो साल पूरे हो गए। इस दौरान ऐसे मौके कम ही आए जब सरकार उनके मुताबिक चली। कभी मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने ही उन्हें मुसीबत में डाला तो कभी उन्हें टीम के नौसिखिया होने का खामियाजा भुगतना पड़ा।&lt;/span&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;अपनी सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विपक्ष के आरोपों का तो आक्रामक अंदाज में जबाव दे दिया, लेकिन सरकार में शामिल उन ‘अपनों’ को वे कोई सबक नहीं सिखा पाए जो पिछले दो साल उनके लिए सिरदर्द बने हुए हैं। संभवत: ऐसा इसलिए है कि गहलोत को इन्हें सुधारने का कोई तरीका ही नहीं सूझ रहा है। वरना कोई वजह नहीं है कि सरकार को रफ्तार देने में बाधा बन रहे इन साथियों को वे कब का सीधा कर चुके होते। ऐसा नहीं है कि गहलोत ने इन पर लगाम कसने की कोशिश नहीं की। उन्होंने कई बार सरकार की चाल चुस्त करनी चाही, लेकिन हर बार नाकामी के सिवा कुछ न मिला। अब गहलोत को यह चिंता सता रही है कि यदि ऐसे ही चलता रहा था तो वे तीन साल बाद किस मुंह से जनता से वोट मांगेंगे। &lt;br /&gt;मौजूदा सरकार में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद नंबर दो की हैसियत शांति धारीवाल की है। वे सरकार के सबसे अनुभवी मंत्रियों में से एक हैं और उनके पास गृह, विधि, नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन सरीखे महत्वपूर्ण मंत्रालय भी हैं। मुख्यमंत्री ने उनको फ्रीहैंड दे रखा है, लेकिन पिछले दो साल में उनके खाते में उपलब्धियां कम और नाकामियां ज्यादा आई हैं। इनका विस्तृत ब्यौरा ‘शुक्रवार’ पहले ही दे चुका। गहलोत धारीवाल के कामकाज से तो खिन्न हैं ही, इस बात से खासे नाखुश हैं कि धारीवाल उनकी नसीहतों पर ध्यान देने की बजाय स्थानीय स्तर की राजनीति में उलझ रहे हैं। &lt;br /&gt;असल में धारीवाल पर इन दिनों हाड़ौती का सबसे बड़ा नेता बनने की सनक सवार है। कल तक दूसरी पंक्ति के नेताओं को निपटाने में लगे धारीवाल ने अब पंचायतीराज मंत्री भरत सिंह को भी निशाने पर ले लिया है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोटा आए तो उन्हें जानबूझकर सभी कार्यक्रमों से दूर रखा गया। जब गहलोत को इसका पता लगा तो उन्होंने तब तो कुछ नहीं कहा, लेकिन कुछ दिन बाद धारीवाल को बिना बताए भरत सिंह के साथ क्षेत्र को दौरा कर संकेतों में बहुत कुछ समझाने की कोशिश की। हालांकि इसके बाद भी धारीवाल के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। &lt;br /&gt;धारीवाल के अलावा हाड़ौती क्षेत्र से दो और मंत्रियों- प्रमोद जैन ‘भाया’ और भरत सिंह के कामकाज से भी गहलोत संतुष्ट नहीं बताए जा रहे हैं। भाया सार्वजनिक निर्माण मंत्री हैं और धारीवाल से उनकी अदावत जगजाहिर हैं। इस तनातनी के अलावा गहलोत उनके काम करने के तरीके से भी नाखुश हैं। सडक़ों और अन्य निर्माण कार्यों के मामले में उन्हें बारां के अलावा राज्य का कोई दूसरा क्षेत्र नजर ही नहीं आता है। हालांकि स्थानीय लोग भी उनके कामकाज से संतुष्ट नहीं है। मसलन राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 90 की खस्ता हालत लोगों को बेहद अखर रही है। इस सडक़ को बारां जिले की लाइफ लाइन माना जाता है। भाया ही नहीं पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री भरत सिंह का राजनीति करने का अंदाज भी गहलोत को नहीं भा रहा है। हालांकि भरत सिंह साफ छवि के नेता हैं, लेकिन उनका अडियल रवैया कई बार सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी कर चुका है। खुद की पार्टी के विधायकों के विरोध के बाद भी वे मनरेगा की सॉशल ऑडिल करवाने की बात पर अड़े रहे। इस पर विधायक रघु शर्मा ने विधानसभा में ही उन्हें मानसिक अवसाद का शिकार बता मेडिकल मुआयना करवाने की सीख दे डाली। हाड़ौती के कांग्रेसी नेताओं में उनकी शांति धारीवाल से तो बिल्कुल नहीं बनती है। हालांकि प्रमोद जैन ‘भाया’ से उनकी कुछ हद तक सुलह हो गई है। इसी तनातनी की वजह से कोटा जिला प्रमुख के चुनाव में कांग्रेस का उम्मीदवार बहुमत के बाद भी हार गया। इस मामले में भरत सिंह की भूमिका संदिग्ध रही थी। इस मामले में आलाकमान भी उनको दो बार तलब कर चुका है। &lt;br /&gt;गहलोत के साथ परेशानी यह भी यह है कि जिन्हें वे अपना मानते थे वे भी उनकी किरकिरी करवाने में लगे हुए हैं। इस फेहरिस्त में पहला नाम खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री बाबू लाल नागर का आता है। नागर को गहलोत का खास माना जाता है। नागर ने ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ अभियान के मार्फत खूब चर्चाओं में रहे थे, लेकिन गेहूं पिसाई के ठेके में गड़बड़ी का मामला उन पर भारी पड़ गया है। प्रधानमंत्री कार्यालय के दखल के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो इस मामले की जांच कर रहा है। मजेदार बात यह है कि जांच शुरू होने के बाद भी नागर उसी विभाग के मंत्री बने हुए हैं। मंत्री पद से इस्तीफा देना तो दूर उन्होंने पार्टी के आला नेताओं को इस मामले में अब तक सफाई भी नहीं दी है। उल्टे वे जांच को प्रभावित करने में लगे हैं। गौरतलब है कि इस पूरे मामले की फाइल कई दिनों तक भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को नहीं दी गई और अब पता चला है कि काफी रिकॉर्ड गायब भी हो चुका है। &lt;br /&gt;शिक्षा मंत्री मास्टर भंवर लाल मेघवाल को भी गहलोत का खास माना जाता है, लेकिन वे भी आए दिन उनके लिए मुसीबतें खड़ी करते रहते हैं। उल्टी-सीधी देसी कहावतों का इस्तेमाल करते हुए मेघवाल कब क्या बोल जाएं, कोई कुछ नहीं कह सकता। बयान देने से वे चूकते नहीं है और ऐसा कोई बयान होता नहीं है जिससे बवाल खड़ा न हो। मेघवाल ने पिछले साल विदेश यात्रा पर जाते हुए वहां मौज-मस्ती करने की बात कही थी बाद में इस पर विवाद हुआ। पिछले दिनों राजस्थान विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने समानीकरण मामले में शिक्षकों की पत्नियों को लेकर अभद्र टिप्पणी की और हल्ला मचने पर उन्हें माफी तक मांगनी पड़ी। इसके बाद उन्होंने कहा कि महंगाई कहां है, गरीब आदमी भी दिन में चार बार कपड़े बदलता है। उन पर अपनी ही पार्टी की एक महिला नेता से दुव्र्यवहार का आरोप भी लगा।  शिक्षक तबादलों पर ही विपक्ष ही कांग्रेस के कई नेताओं ने खुले तौर पर उन पर आरोप लगाए। गहलोत के सामने मेघवाल को लेकर एक परेशानी यह भी है कि वे उनके विभाग के राज्य मंत्री मांगी लाल गरासिया को जरा भी भाव नहीं देते। इस पर गरासिया कई बार खुले तौर पर नाराजगी जता चुके हैं। शिक्षा मंत्री द्वारा विभागीय बैठकों में नहीं बुलाने व विज्ञापनो में फोटो नहीं छपाने की गरासिया ने मुख्यमंत्री से शिकायत की, लेकिन हालात अभी भी पहले के जैसे ही बने हुए हैं। &lt;br /&gt;वन, पर्यावरण और खान मंत्री राम लाल जाट को भी गहलोत का खास माना जाता है। जाट दो साल पहले उस समय भी गहलोत के साथ खड़े नजर आए थे जब प्रदेश के जाट नेता किसी ‘किसान’ को मुख्यमंत्री बनाने के लिए लॉबिंग कर रहे थे। इतना ही नहीं उन्होंने पहली-दूसरी बार विधायक बने जाट नेताओं का समर्थन जुटाने में भी गहलोत की खूब मदद की। गहलोत ने भी उन्होंने उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्हें अच्छा पोर्टफोलियो दिया, लेकिन उनके तौर-तरीकों पर भी खूब अंगुलियां उठ रही हैं। राज्य में अवैध खनन पहले के मुकाबले बढ़ा ही है और रणथंभौर-सरिस्का बाघ अभयारण्यों की बदइंतजामी भी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रही है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश सार्वजनिक रूप से यह कह चुके हैं कि बाघों की मौत के लिए राज्य सरकार का कुप्रबंधन जिम्मेदार है। इसके अलावा राम लाल जाट भीलवाड़ा में जिंदल समूह को खनन पट्टा देने के मामले में खान मंत्री रामलाल जाट विधानसभा के अन्दर व बाहर काफी चर्चित रहे। &lt;br /&gt;गहलोत ऐसे मंत्रियों से भी परेशान हैं जो उनके सादगी और अनुशासन के मंत्र की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इस मामले में बीना काक शीर्ष पर हैं। वे चुनाव जीतने तक ही कांग्रेस की रीति-नीतियों को याद रखती हैं। उन्हें राजसी ठाठ-बाट से रहना पसंद है और उनका सियासत का अंदाज भी वैसा ही है। उनके नेतृत्व में पर्यटन मंत्रालय तो कोई तरक्की नहीं कर रहा है, लेकिन उनकी खूब तरक्की हो रही है। उनके पुत्र अंकुर काक की कंपनी मेजस्टिक रियलमार्ट को सरकार की अफोर्डेबल हाउसिंग पॉलिसी के तहत सस्ते मकान बनाने का टेंडर भी मिल गया। उनके पास ‘प्रशासन गांव के संग’ अभियान में जाने का तो वक्त नहीं है, लेकिन वे विदेश जाने का कोई मौका नहीं चूकती। गहलोत की सादगी-सादगी की रट के बावजूद वे अधिकारियों के लवाजमे के साथ कई बार विदेश जा चुकी हैं। &lt;br /&gt;जनजाति विकास मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय का काम करने का सलीका भी मुख्यमंत्री को खूब खटक रहा है। मालवीय के पास न तो विधानसभा में आने का वक्त है और न ही विभागीय कामकाज निपटाने का। विधानसभा के बजट सत्र में वे बीमारी का बहाना बनाकर गायब हो गए और सहकारिता मंत्री परसादी लाल मीणा को उनके विभाग की बजट मांगों का जबाव देना पड़ा। इतना ही नहीं मीडिया में यह सामने आने के बाद कि वे बीमार नहीं है, बल्कि घर पर ही जरूरी फाइल निपटा रहे हैं, उन्होंने विधानसभा आना उचित नहीं समझा। हां, इस दौरान उन्होंने अपने क्षेत्र में एक मेले में खूब जश्र जरूर मनाया। जयपुर आने के बाद भी वे विभागीय कामकाज के लिए समय नहीं निकाल पाते हैं। यहां तक कि उन्हें कर्मचारियों के तबादला आदेशों पर हस्ताक्षर करने तक का समय नहीं मिल पाता। कई आदेश उनके पीए के हस्ताक्षर से निकले। इस दौरान एक मीडियाकर्मी से मारपीट का आरोप भी उन पर लगा और उनके खिलाफ मुकदमा भी दर्ज हुआ। &lt;br /&gt;जब अपने ही इस तरह से पेश आ रहे हैं तो गहलोत उन मंत्रियों से तो उम्मीद ही क्या कर सकते हैं जिन्हें मजबूरी में मंत्री बनाया गया। &lt;br /&gt;गहलोत को ऐसे मंत्रियों से तो पहले से ही उम्मीद नहीं थी, जिन्हें मजबूरी में मंत्रिमंडल में जगह दी गई। इस सूची में पहला नाम गोलमा देवी का आता है। गोलमा के पास खादी एवं ग्रामोद्योग मंत्रालय है। वे कांग्रेस के कई नेताओं को शुरू से ही खटकती रही हैं, लेकिन अब गहलोत भी उनके कार्यप्रणाली से आजिज आ चुके हैं। पहला तो विभागीय काम में उनका योगदान शून्य है और दूसरा वे सरकार का कहा भी नहीं मान रही हैं। राज्यसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा उम्मीदवार राम जेठमलानी को वोट देकर आग में घी डालने का काम किया। असल में गोलमा को सरकार से ज्यादा चिंता अपने पति दौसा सांसद डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की रहती है। इसी के चलते वे एक बार उनके किरोड़ी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाने वाले केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री नमोनारायण मीणा के एक कार्यक्रम में जा धमकी थीं। हालांकि यह उनके विभाग का ही कार्यक्रम था और उन्हें यहां बुलाया नहीं गया था। कांग्रेस हलकों में भी यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है कि सरकार को परेशानी में डालने वाली गोलमा देवी को मंत्री बनाए रखने की आखिर क्या मजबूरी है। &lt;br /&gt;आपदा राहत राज्य मंत्री बृजेंद्र ओला की सुस्ती से भी गहलोत का माथा ठनका हुआ है। गहलोत ने जब सत्ता संभाली थी तो उन्होंने तय किया था कि पहली बार विधायक बनने वालों को मंत्री नहीं बनाया जाएगा, लेकिन बृजेंद्र ओला के मामले में उन्हें ही यह आचार संहिता तोडऩी पड़ी। गहलोत के साथ मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल शीशराम ओला को संतुष्ट करने के मकसद से बृजेंद्र को मंत्री तो बना दिया, पर वे अब तक कोई छाप नहीं छोड़ पाए हैं। उल्टे उन्होंने सरकार को कई बार मुश्किल में ही डाला है। राज्यसभा चुनाव में दूसरी वरीयता का वोट कांग्रेस के बजाय भाजपा उम्मीदवार को डाल दिया। आलाकमान ने ओला को नोटिस दिया, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। ओला के पास उतना बड़ा मंत्रालय तो नहीं है, लेकिन उनकी सुस्ती ने आपदा राहत विभाग को बिना काम मंत्रालय बना दिया है। कुल मिलाकर काम में हाथ बंटाने की बजाय गहलोत मंत्रिमंडल के कई मंत्री सरकार के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। गहलोत जितना जल्दी ‘मुसीबत’ बने इन मंत्रियों से निपट लें अच्छा है, वरना बाकी बचे तीन साल भी उन्हें कांटो पर ही चलना होगा। &lt;br /&gt;(शुक्रवार के ताजा अंक में प्रकाशित)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-5109553837205555872?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/5109553837205555872/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_25.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5109553837205555872'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5109553837205555872'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_25.html' title='किस-किसको संभाले गहलोत'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' 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सिंधिया। दरअसल, वे महारानी कॉलेज में हुए इस जलसे में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत कर रही थीं। पहले तो उन्होंने भाषण में दौरान नारी उत्थान की बातें कर खूब तालियां बटोरीं और जब नाचने-गाने का दौर शुरु हुआ तो मंच पर लड़कियों के साथ ठुमके लगा सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। सूबे के राजनीतिज्ञों को भले ही यह अटपटा लगे, लेकिन वसुंधरा राजे का सियासत करने का यही अंदाज है और इसी के दम सत्ता छिनने के बाद भी जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बरकरार है। &lt;br /&gt;वसुंधरा राजे ने केवल राजस्थान की राजनीति में कई मिथकों को तोड़ते हुए आगे बढ़ीं, बल्कि आज भी उन्हें तोड़ रही हैं। जनता से जुडऩे की प्रक्रिया में उन्हें ऐसे तौर-तरीके अपनाने से कोई गुरेज नहीं है, जो प्रदेश के राजनीतिज्ञों के लिए अब तक अछूत रहे हैं। वे सूबे के जिस भी कोने में जाती हैं, उसी रंग में रंग जाती हैं। वे लोगों की हर मनुहार स्वीकार करती हैं। इससे न केवल उनकी लोकप्रियता में बढ़ोतरी हुई, बल्कि जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता भी बढ़ी। इसी के दम पर भाजपा के भीतर उनकी कद-काठी मजबूत हुई। आज स्थिति यह है कि उनका विरोध करने वाले नेता भी दबे स्वर से यह स्वीकार करते हैं कि राजस्थान भाजपा में ‘जनाधार’ के मामले में उनके कद का कोई नेता नहीं है। वसुंधरा भी यह जानती हैं और इसी के दम पर अपने विरोधियों को कई बार जमीन भी दिखा चुकी हैं। इतना ही नहीं राजस्थान की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले भैरों सिंह शेखावत और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भी सीधी चुनौती दे चुकी हैं। यहां सवाल यह है कि आखिर इतना सब होने के बाद भी सूबे की सियासत में महारानी की जड़े कैसे मजबूत होती गईं, उनका जादू आज भी कैसे बरकरार है? &lt;br /&gt;वसुंधरा राजे के सियासी सफर पर नजर डालें तो साफ हो जाता है कि वे बड़े ही केलकूलेटिव तरीके से आगे बढ़ीं। न तो कभी जल्दबाजी की और न ही कभी जरूरत से ज्यादा महत्वाकांक्षी हुईं। और इन सबके बीच उन्होंने जनता और खुद के बीच दूरियां पैदा नहीं होने दीं। उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय निश्चित रूप से भैरों सिंह शेखावत को जाता है। उनकी अंगुली पकड़ कर 1985 में वे विधानसभा चुनाव में धौलपुर से विजयी रहीं, लेकिन वे जैसे-जैसे आगे बढ़ती गईं आत्मनिर्भर होती गईं। 1989 के लोकसभा चुनाव में वे झालावाड़  सीट पर किस्मत आजमाने पहुंचीं और अच्छे अंतर से जीतने में सफल रहीं। वसुंधरा को झालावाड़ और झालावाड़ की जनता को वसुंधरा खूब रास आईं। उन्होंने लगातार पांच बार संसद में झालावाड़ की नुमाइंदगी की। इस दौरान केंद्र में अटल बिहारी सरकार में उन्हें राज्य मंत्री का ओहदा भी मिला। 2003 में भैरों सिंह शेखावत का उप राष्ट्रपति बनना वसुंधरा के लिए वरदान साबित हुआ। बाबोसा उन्हें अपना राजनीतिक वारिस बनाकर दिल्ली रवाना हो गए। वसुंधरा के विरोध में पहली बार स्वर इसी समय उभरे थे। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उनकी नियुक्ति का विरोध किया। &lt;br /&gt;यह वह समय था जब राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। गहलोत के 1998 में प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पहुंच गई थी। चुनाव नजदीक आते ही टिकट चाहने वाले नेता जरूर सक्रिय हुए, लेकिन कार्यकर्ता अभी भी पार्टी से कटे हुए थे। कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और भाजपा के पक्ष में जनसमर्थन जुटाने के लिए महारानी की ‘परिवर्तन यात्रा’ बेहद सफल रही। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो इस यात्रा के बाद ही वसुंधरा को इस बात का आभास हुआ कि वे अब राजनीति के सही ट्रेक पर हैं। &lt;br /&gt;महारानी की राजनीति करने की अपनी ही शैली है, एकदम रजवाड़ों की मानिंद। ना-नुकुर करने और ऑर्डर देने वालों को वे पसंद नहीं करती हैं। भैरों सिंह शेखावत से तनातनी इसी वजह से शुरू हुई। हालांकि उनके ‘खास’ कहे जाने वाले कई लोगों ने भी दूरियां बढ़ाने के काम किए। इस तनातनी के बीच विधानसभा चुनाव उन्होंने अपनी रणनीति से लड़ा। परिणाम आए तो वसुंधरा ने इतिहास रच दिया। राजस्थान में भाजपा के लिए जो करिश्मा शेखावत सरीखे दिग्गज नहीं कर पाए, महारानी ने करके दिखाया। भाजपा को विधानसभा में पहली दफा पूर्ण बहुमत मिला। मुख्यमंत्री बनते ही महारानी ने अपनों को उपकृत और विरोधियों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। इधर वसुंधरा के समर्थकों का कारवां तेजी से बढ़ रहा था तो विरोधी ‘बाबोसा’ का आशीर्वाद प्राप्त जसवंत सिंह के नेतृत्व में एकजुट हो रहे थे। वसुंधरा विरोधी खेमे ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने के लिए हर संभव प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। मिलती भी कैसे, वसुंधरा को आडवाणी का वरदहस्त जो प्राप्त था। खैर विरोधी खेमा भी कहा मानने वाला था। उन्होंने वसुंधरा न सही उनके चहेते डॉ. महेश शर्मा को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटवाकर ही दम लिया। &lt;br /&gt;नए अध्यक्ष ओम माथुर से वसुंधरा की पटरी बैठती इससे पहले ही गुर्जर आरक्षण आंदोलन हो गया। आंदोलन से वसुंधरा की सियासी सफलता में अहम भूमिका निभाने वाली ‘कास्ट केमिस्ट्री’ तो गड़बड़ाई ही कद्दावर नेता किरोड़ी लाल मीणा से भी बैर बंध गया। खैर, जैसे-तैसे कर आंदोलन समाप्त हुआ तो विधानसभा चुनाव नजदीक आ गए। महारानी मन मुताबिक चुनाव की तैयारी नहीं कर पाईं। पूरे प्रचार अभियान में वे अकेली तो थीं ही, गहलोत के आक्रामक प्रचार के अलावा अपनी ही पार्टी के लोगों की ओर से उनके खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को भी झेल रही थीं। खुद के कार्यकाल में हुए विकास कार्यों की दुहाई देने के बाद भी वे क्लोज फाइट में हारकर सत्ता से बाहर हो गईं। विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद वसुंधरा विरोधी उन्हें राजस्थान से रुखसत करने के लिए सक्रिय हो गए, लेकिन विधायकों के समर्थन के चलते वे नेता प्रतिपक्ष बनने में कामयाब हो गईं। कुछ दिनों में ही आम चुनाव का कार्यक्रम घोषित हो गया। इनके परिणाम भी निराशाजनक आए। पिछली बार 21 सीटें जीतने वाली भाजपा इस बार 4 सीटों पर सिमट गई। &lt;br /&gt;वसुंधरा इस हार का कोई बहाना ढूंढ़ती इससे पहले ही उत्तराखंड में खंडूरी और यहां ओम माथुर ने हार की जिम्मेदारी लेते हुए पद छोडऩे की पेशकश कर दी। वसुंधरा पर भी पद छोडऩे का दबाव बढऩे लगा, पर खंडूरी और माथुर के इस्तीफे स्वीकार करने में हुई देरी को उन्होंने मौके की तरह लिया। इतने में अरुण चतुर्वेदी सूबे में भाजपा के नए निजाम बन गए। वसुंधरा ने अपने किसी सिपेहसालार को अध्यक्ष बनाने की लाख कोशिश की, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। चतुर्वेदी ने आते ही ऐसा कोई काम नहीं किया कि वे वसुंधरा को शिकस्त देना चाहते हैं, लेकिन सियासत की अपनी शैली के अनुरूप महारानी ने चतुर्वेदी को हलकान करने के काम करना शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने जो तरीका और समय चुना, वह पार्टी आलाकमान को अखर गया। वसुंधरा ने पार्टी दफ्तर में बैठकर कायकर्ताओं से मिलना शुरु किया तो विरोधियों ने प्रचारित किया कि महारानी पार्टी दफ्तर में दरबार लगा रही हैं। उन्होंने इसकी रिपोर्ट तुरंत केंद्रीय नेतृत्व को भी भेज दी। वसुंधरा की इस हरकत को आलाकमान ने पार्टी के भीतर समानांतर संगठन चलाने के तौर पर देखा। &lt;br /&gt;महारानी से पहले से ही नाराज चल रहे राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने अकेले कोई निर्णय करने की बजाय लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, जसवंत सिंह, रामलाल, गोपीनाथ मुंडे, श्योदान सिंह एवं बालआप्टे के अलावा संघ के वरिष्ठ प्रचारक मदनदास देवी और सुरेश सोनी से चर्चा कर वसुंधरा को इस्तीफा देने के लिए कहा। वसुंधरा ने इस्तीफा तो दिया, लेकिन कई महीने बाद। इस दौरान उन्होंने पार्टी के आला नेताओं को यह अहसास करा दिया कि राजस्थान में जनता और कार्यकर्ताओं के बीच उनकी जड़े कितनी गहरी हैं। पार्टी के ज्यादातर विधायकों ने खुलेआम यहां तक कह दिया कि ‘विधायक दल का नेता चुनने का अधिकार विधायकों का है। हमने वसुंधरा राजे को नेता चुना है। पार्टी उन्हें हटा नहीं सकती है। जहां तक हार की जिम्मेदारी लेने का सवाल है तो लोकसभा चुनावों में हुई हार की जिम्मेदारी लेते हुए सबसे पहले आडवाणी जी और राजनाथ सिंह जी को इस्तीफा देना चाहिए। वसुंधरा ही हमारी नेता रहेंगी भले ही हमे पार्टी ही क्यों न छोडऩी पड़े।’ &lt;br /&gt;आलाकमान ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के पद से तो हटा दिया, लेकिन प्रदेश भाजपा में आज भी उनकी मर्जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता। सीधे तौर पर उनकी मर्जी के खिलाफ जाने की हिम्मत केंद्रीय नेतृत्व में भी नहीं है। नए नेता प्रतिपक्ष के मसले को ही ले लें। इतने महीने बीत जाने के बाद भी पार्टी को नेता प्रतिपक्ष नहीं मिला है। पार्टी से जुड़े सूत्रों की मानें तो बजट सत्र यानी तीन-चार महीने तक नेता प्रतिपक्ष का चुनाव टल गया है। प्रदेश प्रभारी कप्तान सिंह सोलंकी और सह प्रभारी किरीट सामैया ने नेता प्रतिपक्ष के लिए प्रदेश के विधायकों और वरिष्ठ नेताओं से जो रायशुमारी की, वह कोरी कवायद साबित हुई। नेता प्रतिपक्ष तो दूर अब तक प्रदेश कार्यकारिणी का ही गठन पूरी तरह से नहीं हो पाया है। खुद सोलंकी ने स्वीकार किया है कि ‘कार्यकारिणी का गठन सही ढंग से नहीं किया गया है। मोर्चा-प्रकोष्ठों तक का गठन अधूरा है। इसमें क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सही तरीके से नहीं है, कई अच्छे लोग शामिल होने से रह गए है। कुछ जातियों के प्रतिनिधियों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, उन पर विचार किया जाएगा और कार्यकारिणी में नाम जोड़े जाएंगे।’ &lt;br /&gt;पार्टी आलाकमान आज तक यह तय नहीं कर पाया है कि वसुंधरा पर दबाव कैसे बनाया जाए। सूत्रों की मानें तो केंद्रीय नेतृत्व ने महारानी को किस तरह से राजनीति करनी है, इसकी स्पष्ट लकीर भी खींच दी है। बताया जा रहा है कि आलाकमान ने वसुंधरा के सरकारी आवास पर विधायकों के साथ-साथ अन्य बैठकों पर रोक लगाते हुए निर्देश जारी किए हैं कि सभी बैठकें प्रदेश कार्यालय में आयोजित की जाएं। ऐसे आदेशों के पीछे कारण यही बताया जा रहा है कि किसी नेता के निवास पर पार्टी के किसी नेता के आवास पर पार्टी की किसी भी प्रकार की बैठक आयोजित होने से समानांतर संगठन का संदेश जाता है, जो पार्टी के लिए ठीक नहीं है। गौरतलब है कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद से इस्तीफा देने के बाद से लगातार अपने निवास पर समर्थक विधायकों और नेताओं की बैठकें करती रही हैं। इस सख्ती के बाद भी आलाकमान को यह पता है कि यदि पार्टी को राजस्थान में सत्ता में फिर से आना है तो यह वसुंधरा राजे के मार्फत ही हो सकता है। प्रदेश में जनता के बीच उनकी बराबर लोकप्रियता और स्वीकार्यता किसी नेता की नहीं है। ऐसे में वसुंधरा को भी इसका अहसास है कि वर्तमान में भले ही कैसी ही परिस्थिति हो, देर-सवेर कमान उनके हाथ में ही आनी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-7109455359694081131?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/7109455359694081131/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7109455359694081131'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7109455359694081131'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_18.html' title='ताज गया, राज बरकरार'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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है कि सरकार में हैसियत के नजरिए से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बाद उनका ही नंबर आता है। अशोक गहलोत ने भी उन्हें पूरी तवज्जों दी और कई मौकों पर साबित भी किया कि धारीवाल उनके सबसे पसंदीदा हैं, लेकिन यह धारीवाल की बदकिस्मती ही है कि वे गहलोत की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। जाने-अनजाने इस तरह की परिस्थितियां बन जाती हैं जो धारीवाल की सियासी सेहत के लिए माकूल नहीं होतीं। मुख्यमंत्री की नजरों में उनकी इमेज अब पहले जैसी नहीं रही है। पार्टी से जुड़े सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि गहलोत ने उनके पर कतरना शुरू कर दिया है और वे उनके विकल्प की तलाश में हैं। &lt;br /&gt;वैसे ऐसो नहीं है कि धारीवाल और गहलोत भी कोई पुरानी दोस्ती रही हो। इसे महज एक संयोग कहें या धारीवाल की बुलंद किस्मत कि इस बार के विधानसभा चुनाव में गहलोत के साख माने जाने वाले ज्यादातर दिग्गज नेता चुनाव हार गए। जब मंत्रिमंडल गठन की बात आई तो अनुभवी, वरिष्ठ, तेजतर्रार की कसौटी पर धारीवाल सबसे ज्यादा खरे उतरे लिहाजा उन्हें मुख्यमंत्री ने सबसे अहम जिम्मेदारियां सौंप दीं। यहां तक कि विधानसभा में मुख्यमंत्री से पूछे जाने वाले प्रश्नों का उत्तर भी धारीवाल देते। एक बार विधानसभा सत्र के दौरान जब धारीवाल सीने में दर्द के चलते अस्पताल में भर्ती हो गए तो गहलोत बहुत असहज हो गए थे। शुरूआती दौर में धारीवाल का प्रदर्शन भी शानदार रहा और उन्होंने गहलोत का दिल जीत लिया। चाहे कानून व्यवस्था की बात हो या नगरीय विकास की नई योजनाओं की या फिर कोई सियासी मुसीबत, धारीवाल ने अपने कामकाज की छाप हमेशा छोड़ी। प्रदेश में कोई बड़ा आंदोलन नहीं हुआ, अपराधों का ग्राफ नहीं बढ़े, पुलिस की साख भी सलामत रही, जयपुर में मेट्रो की महत्वाकांक्षी परियोजना को मंजूरी मिली, भूमाफिया पर शिकंजा कसा गया, वसुंधरा सरकार में भ्रष्टाचार की बड़ी वजह बने भूमि नियमन के 90बी नियम में संशोधन किया गया...। लेकिन, ये सब धारीवाल के शुरुआती दिनों की उपलब्धियां हैं, धीरे-धीरे उनके कामकाज में सुस्ती आने लगी और गहलोत की नजरों में उनका तिलिस्त भी बरकरार नहीं रहा। &lt;br /&gt;उन्हें सबसे ज्यादा असफलता गृह मंत्री होने के नाते मिल रही है। पिछले कुछ समय में ही दो-तीन ऐसी घटनाएं हुई हैं जो गृह मंत्रालय की असफलता को इंगित करने के लिए काफी हैं। भला कौन यकीन करेगा कि एक पुलिस स्टेशन में कुछ पुलिसवाले, उसी थाने में तैनात अपनी एक साथी महिला कांस्टेबल का रेप और मर्डर कर दें। दिल दहला देने वाला ये वाकया और कहीं का नहीं बल्कि धारीवाल के गृह जिले कोटा जिले के चेचट पुलिस स्टेशन का है। कांस्टेबल माया यादव चेचट थाने में ही दो पुलिसवालों देशराज और तुलसीराम ने न सिर्फ उसके साथ बलात्कार किया बल्कि उसका मर्डर भी कर डाला। बात यहीं खत्म नहीं हुई, महिला कांस्टेबल के रेप और मर्डर के बाद पूरे मामले को दूसरा रंग देने की भी कोशिश की गई। चेचट में हुई इस शर्मनाक घटना से कुछ दिन पहले ही झालावाड़ जिले के मनोरहथाना में भी पुलिस ने आतंक मचाया था। हुआ यूं था कि एक युवती के साथ सामूहिक ज्यादती करने वालों के खिलाफ भील समाज के लोग प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान ही स्थिति बिगड़ गई और पुलिस ने फायरिंग कर दी तो भीलों ने पथराव। पत्थरबाजी में घायलों की तादाद 36 से ज्यादा पहुंची जबकि फायरिंग की घटना में भील समाज के एक युवक की मौके पर ही मौत हो गई और एक अन्य युवक ने झालावाड़ अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। जब हाड़ौती में कानून-व्यवस्था की स्थिति इतनी बदतर है तो प्रदेश के बाकी हिस्सों में क्या हाल होगा इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। कुछ महीने पहले उदयपुर के सराड़ा में भी पुलिस ने खूब किरकिरी कराई थी। असल में यहां दो शराब व्यावसायियों के बीच विवाद था, जिसमें शहजाद और मोहन मीणा दोनों ही शराब का कारोबार करते थे। दोनों के बीच किसी बात को लेकर विवाद बढ़ा तो शहजाद ने मोहन का अपहरण कर हत्या कर दी। मोहन मीणा के अपहरण और हत्या के कुकृत्य से आम अल्पसंख्यक समुदाय को कोई लेना देना नहीं था, लेकिन घटना के लगभग एक पखवाड़े बाद जानबूझकर तनाव पैदा करने की कोशिश की गई। वहीं नावां में तो पुलिस ने ऐसी बर्बरता की कि एक युवक ने पेरशान होकर आत्महत्या ही कर ली। युवक की मौत की खबर सुनते ही क्षेत्र के लेागों का पुलिस के प्रति गुस्सा फूट पड़ा। &lt;br /&gt;प्रदेश की कानून-व्यवस्था का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दो बार तो मुख्यमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लग चुकी है। दौसा संसदीय क्षेत्र से सांसद और कभी भाजपा के लिए मुसीबत बने किरोड़ी लाल मीणा एक मामले को लेकर रात के अंधेर में पुलिस पहरे के बावजूद मुख्यमंत्री निवास में घुस गए और राजधानी के एक कार्यक्रम में छात्राओं ने इतना हंगामा किया कि मुख्यमंत्री को भाषण अधूरा छोड़ कार्यक्रम से जाना पड़ा। हद तो तब हो गई जब इन छात्राओं ने चंद घंटों बाद ही सुनियोजित तरीके से कांग्रेस के प्रदेश कार्यालय पर कब्जा जमा लिया और पुलिस को भनक तक नहीं लगी। छात्राओं ने यहां काफी समय तक हंगामा किया और वे वहां से तब ही गईं जब पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान सिंह ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि पंद्रह दिन के भीतर उनकी सारी मांगे मान ली जाएंगी। सूत्रों के मुताबिक इन तीनों घटनाओं से गहलोत काफी खिन्न है और इस तरह की चर्चाएं हैं कि उन्होंने धारीवाल को बुलाकर उनकी क्लास भी ली है। धारीवाल ने उन्हें यह भरोसा भी दिलाया है कि जल्द ही व्यवस्था के कील-कांटों को दुरुस्त कर लिया जाएगा, लेकिन गहलोत उनके जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। इन मामलों के अलावा गहलोत पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था की स्थिति से भी खुश नहीं हैं। प्रदेश में हत्या, लूट, चोरी आदि वारदातों में खास इजाफा हुआ है। गहलोत इस बात से खासे चिंतित है कि उनकी मंशा के बावजूद अपराधों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। &lt;br /&gt;मंत्रालय की नाकामियों के अलावा धारीवाल के राजनीति निर्णयों से भी गहलोत खुश नहीं है। पहले स्थानीय निकाय चुनाव और फिर पंचायत चुनावों में उन्होंने आलाकमान और संबंधित क्षेत्र के विधायक-सांसदों की इच्छा को दरकिनार कर अपने चहेते को खूब टिकट बांटे। कोटा नगर निगम से उन्होंने डॉ. रत्ना जैन को टिकट दिलाया था और जीत सुनिश्चित करने के लिए उनके दिन-रात एक भी कर दी थी। ऐसा पहली बार देखा गया कि धारीवाल खुद के अलावा किसी और के चुनाव में इतनी सघनता से प्रचार किया। वे शहर की हर गली, हर मौहल्ले में घूमे और रत्ना जैन के लिए वोट मांगे। उन्हें सबसे ज्यादा मशक्कत क्षेत्र के अल्पसंख्यक मतदाताओं को मनाने में करनी पड़ी। ये हमेशा से धारीवाल के साथ रहे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उपेक्षा की शिकायत के साथ ने केवल इन्होंने दूरी बना ली थी, बल्कि मंत्रीजी के खिलाफ अभियान भी छेड़ दिया था। यहां तक कि उनके जन्मदिन के आयोजन में भी उनके खिलाफ नारोबाजी हो गई। &lt;br /&gt;खैर, इसे धारीवाल की मेहनत का नतीजा कहें या कांग्रेस के पक्ष में चल रही लहर कि डॉ. रत्ना जैन समेत ज्यादातर ने स्थानीय निकाय चुनावों में जीत भी हासिल की, लेकिन साथ ही पार्टी के भीतर उनके विरोधियों की संख्या में भी इजाफा हो गया। ये नेता अब अंदरूनी तौर पर धारीवाल को हलकान करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इन नेताओं को यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा है कि धारीवाल महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर धौंस जमाए बैठे रहे और और उनकी नंबर दो की हैसियत बरकरार रहे। पंचायत चुनाव में तो उनका हर दाव उल्टा पड़ा। अपने चहेतों को टिकट बांटने के चक्कर में उन्होंने अपने विरोधियों को तो खूब पैदा कर ही लिया, उन्हें भी गद्दीनशीं नहीं करवा पाए जिनके लिए इतनी मशक्कत की। पूरे घटनाक्रम के बाद धारीवाल समर्थकों ने जिस तरह से सांसद इज्यराज सिंह के घर पर पत्थरबाजी की, उससे मुख्यमंत्री खासे नाराज बताऐ जाते हैं। &lt;br /&gt;एक चतुर राजनेता की यह सबसे बड़ी खूबी होती है कि वह अपनी गलतियों का ठीकरा बड़ी चालाकी से दूसरे के माथे पर फोड़ देता है। धारीवाल धडल्ले से इसी सलीके से सियासत कर रहे हैं। राज्य में अब तक हुए कलेक्टर-एसपी सम्मेलन में यह परंपरा रही है कि गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन दोनों के साथ खड़े हुए नजर आते हैं, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह से बदली हुई थी। खुद गृह मंत्री पुलिस और प्रशासन की खिंचाई करने में लगे हुए थे। जरा गौर फरमाइए सम्मेलन में गृह मंत्री शांति धारीवाल ने क्या कहा- ‘पिछले दिनों जब सीएम जेएलएन मार्ग पर एक कार्यक्रम में गए तो आंदोलनकारी छात्राएं उनके सामने आ गईं। इंटेलीजेंस को पता ही नहीं था। इस तरह की इंटेलीजेंस से कैसे अपराध नियंत्रित होंगे? इट्स कंपलीट फेल्योर। शहरों के थाने ऐसे लगते हैं, जैसे प्रॉपर्टी डीलिंग की दुकान हो। भूमाफिया ने थानों को शरणस्थली बना रखा है।’ धारीवाल ने ऐसा क्यों कहा यह अलग विषय है, लेकिन इससे प्रदेश की कानून-व्यवस्था की पोल तो खुल ही गई। &lt;br /&gt;सूत्रों के मुताबिक धारीवाल को लगातार मिल रही नाकामियों और इनके बावजूद उनके तीखे होते तेवरों ने गहलोत बेहद खिन्न हैं। यह भी चर्चा है कि गहलोत ने धारीवाल के पर कतरना भी शुरू कर दिया है। प्रतिकूल परिस्थितियों की बढ़ती फेहरिस्त से धारीवाल कितने परेशान हैं, ये उनके बुझे हुए चेहरे से आसानी से देखा जा सकता है। बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव उनके ऊपर साफ तौर पर देखा जा सकता है। अक्सर संयम बरतने वाले धारीवाल का धीरज भी जबाव देने लगा है और वे बात-बात पर खीज प्रकट करने लगे हैं। हालांकि उन्हें इस बात की तसल्ली भी है कि गहलोत भले ही उनसे कितने ही नाराज क्यों न हों, उन्हें बदलना आसान नहीं होगा, क्योंकि उन जैसे अनुभवी और काम के जानकार विधायक इस बार कांग्रेस के टिकट से कम ही जीत कर आए हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-9186700206291201397?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/9186700206291201397/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_14.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/9186700206291201397'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/9186700206291201397'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post_14.html' title='नाकाम निजाम'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TQcf-zPgnRI/AAAAAAAAAFM/etiM3XLMe9w/s72-c/Shanti%2BDhariwal.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-8449108365461686251</id><published>2010-12-07T19:19:00.003+05:30</published><updated>2010-12-07T19:23:57.526+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ब्राह्मण'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डॉ. सीपी जोशी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रदेशाध्यक्ष'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्थान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस'/><title type='text'>ब्राह्मण के बदले ब्राह्मण!</title><content type='html'>&lt;a onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}" href="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TP48ZzqadcI/AAAAAAAAAFE/lj-lwgue6gA/s1600/cp_joshi_20100419.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 114px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TP48ZzqadcI/AAAAAAAAAFE/lj-lwgue6gA/s200/cp_joshi_20100419.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5547938205029529026" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो महाराष्ट्र की राजनीति से राजस्थान का कोई सीधा कनेक्शन नहीं है, लेकिन आदर्श सोसायटी घोटाले की भेंट चढ़े अशोक चव्हाण की जगह की पृथ्वीराज चव्हाण की ताजपोशी ने सूबे में कांग्रेस का कप्तान बनने का ख्वाव सजा रहे ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदों के पंख लगा दिए हैं। आलाकमान ने महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन करते समय जिस तरह से कास्ट केमिस्ट्री का ध्यान रखा है, उसके बाद कयास लगाया जा रहा है कि राजस्थान में पार्टी प्रदेशाध्यक्ष का मसला भी इसी फॉर्मूले से सुलझाया जाएगा। यदि ऐसा होता है तो डॉ. सीपी जोशी की जगह कोई ब्राह्मण नेता ही लेगा। ब्राह्मण की जगह ब्राह्मण फॉर्मूले से मोहन प्रकाश, सांसद डॉ. महेश जोशी, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष डॉ. गिरिजा व्यास, महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा, पूर्व प्रदेशाध्यक्ष बीडी कल्ला, विधायक रघु शर्मा और मंत्री बृजकिशोर शर्मा के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं। &lt;br /&gt;महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन से पहले भी प्रदेशाध्यक्ष पद पर ब्राह्मण नेताओं की दावेदारी मजबूत थी, क्योंकि सोशल इंजीनियरिंग की लिहाज से ओबीसी, अल्पसंख्यक और एससी-एसटी को पहले ही बहुत कुछ मिल चुका है। ओबीसी वर्ग में सबसे मजबूत जाटों की बात करें तो छह जाट लोकसभा में हैं और नरेंद्र बुडानिया दूसरी मर्तबा राज्यसभा में पहुंच चुका है। केंद्र में महादेव सिंह खंडेला मंत्री हैं तो कमला गुजरात में राज्यपाल हैं। युवक कांग्रेस और एनएसयूआई के प्रदेश अध्यक्ष भी इसी वर्ग से हैं। ओबीसी वर्ग के अशोक गहलोत मुख्यमंत्री हैं तो डॉ. प्रभा ठाकुर महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। सचिन पायलट केंद्र में असरदार मंत्री हैं। विजयलक्ष्मी बिश्नोई महिला कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। मूल ओबीसी के 14 और 17 जाटों सहित कुल 31 विधायक हैं। इनमें से छह जाट, एक जट सिख और तीन मूल ओबीसी के मंत्री हैं। साफ है पार्टी अब किसी जाट या ओबीसी को ही प्रदेशाध्यक्ष बनाए जाने की राजनीतिक मजबूरी से उबर चुकी है। जहां तक अल्पसंख्यक का सवाल है विधानसभा चुनाव हारे अश्क अली टाक को राज्यसभा पहुंच गए हैं। मुख्य सचिव भी मुस्लिम हैं। विधायकों में से दस अल्पसंख्यक हैं तो मंत्रिमंडल में दो हैं। एससी-एसटी को देखें तो दोनों के तीन-तीन सांसद राज्यसभा और लोकसभा में हैं। नमोनारायण मीणा केंद्र में मंत्री हैं। उन्हें सामान्य कोटे की सीट मिली है। जगन्नाथ पहाडिय़ा हरियाणा के राज्यपाल हैं। विधायकों में से 18 एससी और 20 एसटी के हैं। गहलोत कैबिनेट में चार एससी और आठ एसटी के हैं। &lt;br /&gt;इस लिहाज से देखें तो ब्राह्मणों को भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। तीन ब्राह्मण लोकसभा और एक राज्यसभा में हैं। आनंद शर्मा और सीपी जोशी केंद्र में मंत्री हैं। बीएल जोशी राज्यपाल हैं। गिरिजा व्यास महिला आयोग की अध्यक्ष हैं। इसके बावजूद भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का सोच रही कांग्रेस में इस वर्ग को प्रतिनिधित्व की उम्मीद जताई जा रही है। ब्राह्मण नेताओं में डॉ. महेश जोशी, ममता शर्मा, रघु शर्मा, ममता शर्मा, बीडी कल्ला और बृजकिशोर शर्मा के नाम तो पहले से चल रहे थे अब इसमें मोहन प्रकाश और डॉ. गिरिजा व्यास का नाम नया जुड़ा है। मोहन प्रकाश पूर्व राज्यपाल नवलकिशोर शर्मा की पसंद माने जाते हैं। उनकी छवि वैचारिक दृढ़ता वाले नेता की है। बीएचयू के छात्र संघ अध्यक्ष रहे मोहन प्रकाश आठवीं विधानसभा में धौलपुर के राजाखेड़ा से लोकदल के विधायक थे। उनके पिता डॉ. मंगल सिंह बाड़ी से कांग्रेस की टिकट पर पहली विधानसभा के सदस्य बने थे। माना जाता है कि जनार्दन द्विवेदी और नवलकिशोर शर्मा जैसे नेताओं ने उनका नाम आगे बढ़ाया है। गिरिजा व्यास उन्हें टक्कर दे रही हैं। उनको लेकर आलाकमान के ध्यान में यह बात भी है कि वरिष्ठ होने के बाद भी उन्हें मनमोहन मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली थी। सीपी जोशी को केबिनेट में एडजस्ट करना गिरिजा को ही भारी पड़ा था। ऐसे में आलाकमान जोशी की जगह उनकी ताजपोशी कर सकता है।&lt;br /&gt;मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने से पहले डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को तगड़ा दावेदार माना जा रहा था। लोकसभा चुनाव में भाजपा का गढ़ कही जाने वाली जयपुर सीट से फतह हासिल कर संसद में पहुंचे महेश जोशी का नाम प्रदेशाध्यक्ष के लिए तब से चल रहा है, जबसे डॉ. सीपी जोशी केंद्र में मंत्री बने हैं। वे इसके लिए लॉबिंग भी अच्छे से कर रहे हैं। उन्हें पता है कि आलाकमान उसे ही यह जिम्मेदारी देगा, जो गहलोत और सीपी दोनों की पसंद हो। इसलिए वे एक अरसे से इस तरह की राजनीति कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी खुश रहें और सीपी जोशी भी नाराज न हो। हालांकि जयपुर नगर निगम चुनाव के दौरान उम्मीदवार चयन पर सीपी के साथ उनकी तनातनी हो गई थी, लेकिन राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव में उन्होंने सभी गिले-शिकवे दूर कर दिए। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली में कई आला नेता उनकी आवाज दस जनपथ तक भी पहुंचा रहे हैं। हालांकि मोहन प्रकाश और गिरिजा व्यास का नाम सामने आने के बाद उनकी पैरवी करने वाले नेताओं की संख्या कम हुई है। &lt;br /&gt;इधर महिला कांग्रेस की पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ममता शर्मा भी अपने दावे पर डटी हुई हैं। उन्हें महिला होने का फायदा मिल रहा है, लेकिन सीपी जोशी से उनका छत्तीस का आंकड़ा भारी पड़ रहा है। सीपी से उनकी प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर है। ममता शर्मा ने लोकसभा चुनाव में उन्होंने कोटा-बंूदी सीट से टिकट मांगा था, लेकिन सीपी जोशी ने उनके खिलाफ लॉबिंग की और कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के करीबी माने जाने वाले इज्येराज सिंह को टिकट दिलवा दिया। इतना ही नहीं स्थानीय निकाय चुनाव में बूंदी जिला प्रमुख के लिए ममता शर्मा के खास माने जाने वाले राकेश बोयत को टिकट नहीं दिया। और जब वे बागी ही मैदान में कूद जीतने में सफल रहे तो ममता शर्मा से महिला कांग्रेस की जिम्मेदारी छीन आलाकमान से उनकी शिकायत कर दी। हालांकि दस जनपथ अपने जोरदार रसूखों के दम पर ममता ने इसका करारा जबाव दिया और आलाकमान ने उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए भी ममता शर्मा का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट यही है राजस्थान में गहलोत कैंप और दिल्ली में जर्नादन द्विवेदी कैंप उनकी पैरवी कर रहा है। सूत्रों के मुताबिक इसी के दम पर उनका राज्यसभा जाना तय हो गया था, लेकिन ऐनवक्त पर आनंद शर्मा के राजस्थान आने से गणित बिगड़ गया। ममता का प्रदेशाध्यक्ष बनना इस पर निर्भर करेगा कि अशोक गहलोत उन्हें कितना सपोर्ट करते हैं। &lt;br /&gt;जहां तक अन्य ब्राह्मण दावेदारों का सवाल है तो वे डॉ. महेश जोशी और ममता शर्मा को टक्कर नहीं दे पा रहे हैं। जहां बीडी कल्ला पूर्व में भी अध्यक्ष रह चुके हैं और उम्र भी उनके आड़े आ रही है, वहीं विधायक रघु शर्मा पर खुद का बड़बोलापन भारी पड़ रहा है। गौरतलब है कि रघु एक अरसे से पार्टी और सरकार के खिलाफ सार्वजनिक रूप से बयानबाजी कर रहे हैं। यहां तक कि विधानसभा में भी कई मंत्रियों की घेराबंदी कर चुके हैं। पिछले सत्र में तो उन्होंने पंचायतीराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री भरत सिंह को अवसाद का शिकार बता सनसनी फैला दी। हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्राम सेवकों का मामला उठाते हुए उन्होंने कहा कि ‘मंत्री मानसिक अवसाद के शिकार हैं। इनको डॉक्टर को दिखाने की आवश्यकता है। ग्रामसेवक और सरपंच हड़ताल कर रहे हैं। ग्रामीण विकास की नोडल एजेंसी का काम ठप है। मंत्री ने हड़ताल कर रहे सरपंचों और ग्रामसेवकों सें ज्ञापन तक नहीं लिया। मंत्री को यह तक पता नहीं है कि इनका मांग पत्र क्या है। ये खुद ईमानदारी की प्रतिमूर्ति बन रहे हैं, लेकिन कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। ईमानदार हैं तो जनता के निर्वाचित राजस्थान के सभी सरपंचों को चोर ठहराने का इनका कोई अधिकार नहीं बनता। आज नरेगा में 500 सरपंचों के खिलाफ एफआईआर करवा दी गई हैं, ऐसे में काम कैसे होगा। सरपंच को 14 फंदों में फांसकर उससे कैसे उम्मीद करते हैं कि नरेगा का काम ठीक तरह से होगा।’ इस तरह की चर्चा है कि सीपी जोशी के इशारे पर रघु शर्मा ऐसा कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस मुहिम से गहलोत खासे खिन्न हैं। सूत्रों की मानें तो उन्होंने यह तय कर लिया है कि रघु को किसी भी स्थिति में अध्यक्ष नहीं बनने देना हैं। जहां तक गहलोत सरकार में मंत्री बृजकिशोर शर्मा का सवाल है, तो इसके लिए वे खुद ही ज्यादा रुचि नहीं ले रहे हैं। &lt;br /&gt;महाराष्ट्र में नेतृत्व परिवर्तन के बाद प्रदेशाध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल गैर ब्राह्मण नेताओं की उम्मीदें धूमिल जरूर हुई हैं, लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं हुई हैं। कई नेताओं अभी भी लॉबिंग में लगे हुए हैं। जाट नेताओं में पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान, सांसद लालचंद कटारिया और नेरंद्र बुड़ानिया का नाम चर्चा में है। इन तीनों नेताओं को मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का विश्वासपात्र माना जाता है। पूर्व मंत्री डॉ. चंद्रभान विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, लेकिन कद्दावर नेता हैं। सॉफ्ट जाट के रूप में उनकी स्वीकार्यता सभी गुटों में है। सांसद कटारिया भी प्रदेशाध्यक्ष बनने की कोशिश में हैं। उनका एकमात्र सहारा गहलोत हैं। पिछले दिनों जब पार्टी उपाध्यक्ष डॉ. हरी सिंह ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर हमला किया तो बचाव में आने वाले प्रमुख जाट नेता थे। गहलोत से नजदीकियों के चलते राज्यसभा सांसद नरेंद्र बुडानिया का नाम भी सुर्खियों में है। यदि जाट अध्यक्ष चुना जाता है तो उनकी दावेदारी प्रबल है। हालांकि किसी जाट को मौका मिलने की संभावना कम ही लग रही है। ठीक इसी तरह से अल्पसंख्यक समुदाय की दावेदारी भी कमजोर पड़ रही है। अश्क अली टांक के राज्यसभा जाने और एस. अहमद के मुख्य सचिव बनने के बाद किसी अल्पसंख्यके प्रदेशाध्यक्ष बनने की संभावना कम ही है। वैसे चिकित्सा मंत्री दुर्रू मियां और अश्क अली टांक इस वर्ग के दावेदारों में शामिल हैं। अनुसूचित जाति व जनजाति कोटे से सांसद रघुवीर मीणा और कार्यकारी अध्यक्ष परस राम मोरदिया का नाम चर्चाओं में है। &lt;br /&gt;राजपूत दावेदारों में भंवर जितेंद्र सिंह का नाम चर्चा में है। वे राहुल के काफी नजदीकी हैं, लेकिन राहुल के संगठन संबंधी जरूरी कामों को संभालने वाले जितेंद्र प्रदेश की राजनीति में शायद ही रुचि लें। वैश्य दावेदारों में पूर्व वित्त मंत्री प्रद्युम्न सिंह और संयम लोढ़ा का नाम लिया जा रहा है। दोनों पहले गहलोत कैंप में थे, लेकिन संयम अब सीपी के साथ हैं। बहरहाल, निर्णय अब सोनिया गांधी, राहुल गांधी, अहमद पटेल, राजस्थान के प्रभारी मुकुल वासनिक और चुनाव प्रभारी जनार्दन द्विवेदी के हाथों में है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की राय महत्वपूर्ण रहेगी। सीपी जोशी, भंवर जितेंद्र सिंह और सचिन पायलट से भी सलाह मशविरा किया जाएगा। हालांकि कोई चौकाने वाला फैसला तब ही आ सकता है जब राहुल गांधी इस मामले में विशेष रुचि लें। उनके हस्तक्षेप के बाद ही किसी ऐसे नए चेहरे को प्रदेश की कमान दी सकती है, जिसकी उम्मीद किसी को भी नहीं हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-8449108365461686251?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/8449108365461686251/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8449108365461686251'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8449108365461686251'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='ब्राह्मण के बदले ब्राह्मण!'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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मोरो'/><title type='text'>दो कोड़ी के लेखक और करोड़ों की किताब</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TBy_F6cgWtI/AAAAAAAAAEs/6ZLILZ0SO4c/s1600/kn1906ca.JPG"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 130px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TBy_F6cgWtI/AAAAAAAAAEs/6ZLILZ0SO4c/s200/kn1906ca.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5484468554539490002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं किताबों से बेहतर कोई दोस्त नहीं होता, लेकिन जिंदगी को राह दिखाने वाली किताबें जब आधे-अधूरे तथ्यों और कही-सुनी बातों को प्रमाणित करती हुई दिखाई दें, तो यह दोस्ती से दगा नहीं तो और क्या है? ऐसी पुस्तकों को लिखने वाले या तो जानी-मानी हस्तियों की जिंदगी के अंतरंग और निहायत निजी क्षणों को मिर्च-मसाला लगाकर पाठकों को परोसते हैं या धार्मिक मान्यताओं पर कटाक्ष करते हैं।&lt;br /&gt;यदि कोई लेखक पाठकों को सचाई से रूबरू कराने के लिए ऐसा करे, तो वह शाबासी का हकदार है, लेकिन पिछले पांच-छह साल में मुझे तो ऐसी कोई पुस्तक याद नहीं आती, जिसमें लेखक ने इतिहास के अनछुए पक्ष को उजागर किया हो। साफ है, जल्द प्रसिद्ध होने की लालसा रखने वाले लेखक जानबूझकर ऐसे विषयों पर अपनी कलम चलाते हैं, जो विवादित हैं और जो पुस्तक और लेखक को फटाफट हिट करने की की कुव्वत रखते हैं। क्या यह लेखकीय धर्म से धोखा नहीं है? इसी पृष्ठभूमि में इन दिनों जो पुस्तक चर्चाओं में है वह है- जेवियर मोरो की 'एल सारी रोजो'। 2008 में ही स्पेनिश में छप चुकी है। यह पुस्तक सोनिया गांधी की जिंदगी पर आधारित है और इसका फे्रंच व डच में भी अनुवाद हो चुका है, लेकिन भारतीयों के एक बड़े वर्ग का इन भाषाओं से खास वास्ता नहीं होने से इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। परंतु जैसे ही इसे अंग्रेजी में प्रकाशित करने की तैयारी शुरू हुई कांग्रेसी नेताओं ने बखेड़ा खड़ा कर दिया।&lt;br /&gt;अभिषेक मनु सिंघवी ने तो सार्वजनिक रूप से यहां तक कह दिया कि वे इस पुस्तक को भारत में नहीं छपने देंगे। हो सकता है सिंघवी सोनिया गांधी की नजरों में अपनी साख मजबूत करने के लिए ऐसा कर रहे हों, लेकिन जेवियर मोरो ने भी छोटा अपराध नहीं किया है। माना कि 'एल सारी रोजो' इतिहास की पुस्तक न होकर एक उपन्यास है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वे इतिहास की ही मनचाही व्याख्या कर दें। जब उन्हें अपनी कल्पना शक्ति का ही प्रदर्शन करना था, तो सोनिया गांधी को पात्र बनाने की जरूरत क्या थी? वे किसी काल्पनिक पात्र के इर्द-गिर्द ही कथानक बुनते। &lt;br /&gt;हो सकता है सोनिया गांधी के बारे में मोरो ने सच लिखा हो, लेकिन इसके प्रमाण के रूप में वे उनके कुछ गिने-चुने करीबियों के नाम ही बता पाए हैं। जब किसी 'रियल' व्यक्ति को पात्र बनाया जाए, तो लेखक से यह उम्मीद तो की ही जाती है कि वह तथ्यों को भी 'रियल' तरीके से पेश करे। उपन्यास में भी लेखक को तथ्यों से छेड़छाड़ की आजादी नहीं दी जा सकती, लेकिन ऐसा हो रहा है। साहित्यिक विधाओं में ही नहीं विशुद्ध रूप से इतिहास के लेखक भी सुर्खियां बटोरने के लिए तथ्यों को अपने हिसाब से पेश कर रहे हैं। जसवंत सिंह का उदाहरण हमारे सामने है। 'ए कॉल टू ऑनर' में उन्होंने दावा किया था कि कांग्रेस के शासनकाल में प्रधानमंत्री कार्यालय में विदेशी जासूस रहा करता था, लेकिन पूछे जाने पर वे उसका नाम भी नहीं बता पाए। 'जिन्ना- इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस' में जिन्ना के महिमा मंडन और सरदार पटेल की आलोचना उन्होंने किस आधार पर की, यह उनकी पार्टी भी नहीं समझ पाई। हां, उनकी पुस्तक जरूर धड़ाधड़ बिकी। जहां तक जेवियर मोरो का सवाल है, तो वे परिवार की परंपरा को ही निभा रहे हैं। उनके चाचा डोमिनिक लापियर भारत की आजादी और बंटवारे पर आधारित विवादित पुस्तक 'फ्रीडम एट मिडनाइट' लिखकर ही लोकप्रिय हुए थे। 'एल सारी रोजो' के अंग्रेजी अनुवाद 'द रेड साड़ी' ने छपने से पहले ही धूम मचा दी है। यहां तक कि हिंदी के खांटी पाठक भी अब 'लाल साड़ी' का इंतजार कर रहे हैं। &lt;br /&gt;कभी-कभी ऐसा लगता है कि नए दौर के लेखक सफल होने के जुनून में इतने उतावले हो गए हैं कि नए तथ्य और पात्र खोजने का उनके पास समय ही नहीं है। यही वजह है विवादित पुस्तकों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है और कालजयी रचनाएं ढूंढने से भी नहीं मिल रही हंै। जरा गौर कीजिए वर्तमान में ऐसे कितने लेखक हैं, जिन्हें उनके कृतित्व के लिए आने वाली पीढिय़ां भी याद करेंगी? जब लेखक का लेखन कार्य से ज्यादा ध्यान खुद की ब्रांडिंग और किताब की मार्केटिंग पर रहेगा, तो वह क्या मौलिक रच पाएगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-7993402923516997036?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/7993402923516997036/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7993402923516997036'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7993402923516997036'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/06/blog-post_19.html' title='दो कोड़ी के लेखक और करोड़ों की किताब'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TBy_F6cgWtI/AAAAAAAAAEs/6ZLILZ0SO4c/s72-c/kn1906ca.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-9068674001319190183</id><published>2010-06-08T13:53:00.002+05:30</published><updated>2010-06-08T13:57:22.414+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वाम राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ममता बनर्जी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तृणमूल कांग्रेस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पश्चिम बंगाल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वामपंथ'/><title type='text'>अब तो संभल जाओ कॉमरेडों</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TA3-woG78AI/AAAAAAAAAEk/6WGH9Oq2V30/s1600/communist-party-of-india-marxist-2009-election-manifesto.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TA3-woG78AI/AAAAAAAAAEk/6WGH9Oq2V30/s200/communist-party-of-india-marxist-2009-election-manifesto.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5480316432933449730" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भले ही आज के दौर में किस्से-कहानियां सुनने-सुनाने की परंपरा जीवित नहीं बची हो, लेकिन भेडिय़ा वाली कहानी ज्यादातर लोगों की स्मृति में है। इसमें एक भेड़पालक भेडिय़ा आया...भेडिय़ा आया... कहकर गांव वालों के साथ मसखरी करता, लेकिन एक दिन सचमुच भेडिय़ा आ जाता है और वह मुश्किल में पड़ जाता है। पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही है। राजनीतिक विश्लेषक प्रत्येक विधानसभा चुनाव से पहले यह कयास लगाते कि इस बार उनका गढ़ ढहने वाला है, लेकिन परिणाम आते और वाम मोर्चा फिर सत्ता में आ जाता। बाकी राजनीतिक दलों के लिए पहेली बन चुकी इस उपलब्धि पर वाम नेता इतराये भी खूब, किंतु आजकल उनकी बोलती बंद है और वजह है ममता बनर्जी। ममता बनर्जी ने पहले पंचायत चुनाव, फिर लोकसभा चुनाव और अब स्थानीय निकाय चुनाव में उन्हें जिस तरह से शिकस्त दी है, उसके बाद यह कहा जाने लगा है कि इस बार सचमुच हार का भेडिय़ा आने वाला है। स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों से जाहिर है कि राज्य की जनता बदलाव के लिए बेचैन है।  जब पंचायत चुनावों में वाम मोर्चा की हार हुई थी, तब इसके कुछ नेताओं ने कहा था कि जनता ने गलती की है, लेकिन यह क्षणिक है। अब उन्हें इस बात का अहसास होना चाहिए कि जनता बार-बार गलती नहीं कर रही है, बल्कि वह यह संकेत दे रही है कि वह वाम शासन से उकता चुकी है। तृणमूल कांग्रेस का शानदार प्रदर्शन यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि ममता बनर्जी का आत्मविश्वास हवाई नहीं है। अब वे केवल शहरी मध्यवर्ग की लीडर नहीं रह गई हैं, बल्कि किसानों-मजदूरों और राज्य के बुद्धिजीवियों का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। सिंगूर और नंदीग्राम के बाद गांव का वंचित तबका भी उनके साथ खड़ा हो गया है।  &lt;br /&gt;वाम दलों को पश्चिम बंगाल में स्थापित करने का श्रेय ज्योति बसु को है। उन्होंने अपने कार्यकाल की शुरुआत में भूमि सुधारों के एजेंडे को लागू कर पश्चिम बंगाल में क्रांतिकारी परिवर्तन की नींव रखी। भूमिहीन मजदूरों को जमीन का मालिक बनाया। एक फसली जमीन को बहुफसली बनाया। नतीजतन, एक ऐसा राज्य जो अकाल की मार झेलने के लिए अभिशप्त था, अपने पैरों पर उठ खड़ा हुआ। 1980 के दशक में खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के साथ ही यह दूसरे राज्यों को निर्यात करने लगा, लेकिन यहीं आकर विकास की कहानी ठहर गई। कृषि पैदावार में कुलांचे भर रहा राज्य औद्योगिक विकास में पिछडऩे लगा। इसके लिए भी वामपंथी राजनीति जिम्मेदार थी। आंदोलन की आग से तपकर निकली राजनीति बदली हुई परिस्थितियों को समझ नहीं पाई और एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गई जहां आगे कोई रास्ता ही नहीं है। फिर भी ज्योति बसु ने यह भ्रम बरकरार रखा कि बंगाल तरक्की कर रहा है, लेकिन राजनीति के रंगमंच से उनके हटते ही पर्दे के पीछे की असलियत सामने आने लगी। सर्वहारा की राजनीति करने वाले वामपंथी नेता जब जमीनी हकीकत से कटने लगे, तो इससे पैदा होने वाले शून्य को भरने के लिए किसी राजनीतिक ताकत की जरूरत बढ़ती ही जा रही थी। लंबे समय से वामपंथियों के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी बंगाल की अग्निकन्या ममता बनर्जी उन ताकतों में शीर्ष बनकर उभरीं। उनका साथ दिया माओवादियों और दूसरे गैर-राजनीतिक दलों और संगठनों ने। इन नई ताकतों को वामपंथ से निराश पूर्व वामपंथी लेखकों, कलाकारों और विचारकों का भी खुला समर्थन मिला। मजबूत विकल्प की संभावना देखकर राज्य की जनता ने भी उन पर पूरा भरोसा जताया। ऐसे में राज्य में अगले विधानसभा चुनाव में वामपंथियों की सत्ता छिन जाए, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। &lt;br /&gt;वाम मोर्चे की पतली हालत का ठीकरा पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टïाचार्य के सिर फोड़ा जा रहा है। हो सकता है कि राज्य के औद्योगिक विकास और निवेश के लिए उनकी पहल में कोई खोट न हो, लेकिन उन्होंने नंदीग्राम और सिंगूर के जनाक्रोश का ठोस समाधान खोजने की बजाय विवाद का कुप्रबंधन किया। इससे पार्टी न केवल किसानों में अलोकप्रिय हुई, अपितु शहरी मध्यवर्ग में भी उसकी तीखी आलोचना हुई। वैसे वाम राजनीति आज दोराहे पर खड़ी है, तो उसके लिए ज्योति बसु की राजनीति भी कम कसूरवार नहीं है। साठ के दशक में राज्य में कांग्रेस सरकार के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंकने वाले बसु ने रास्ता तो लोकतंत्र का चुना, लेकिन उनके तरीके नक्सलवादियों के थे। उस खूनी दौर के गवाह रहे लोग जानते हैं कि कैसे वामपंथ और नक्सलवाद की जुगलबंदी ने राज्य में कहर बरपाया था। उस उद्वेलनकारी समय के गर्भ से भले ही वामपंथी सत्ता के शिशु ने जन्म लिया, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने बड़े होकर अर्थ से ज्यादा अनर्थ किए। उन्हीं अनर्र्थों का नतीजा हुआ कि बसु के रिटायर होते ही वामपंथी किले की दीवारें ढहने लगीं। इसकी वजह यह थी कि आंदोलन की कोख से निकले वामपंथी आरामतलब हो गए। आम जनता से कटने लगे। जिन दीन-हीन लोगों की आवाज बनकर वे सत्ता के सिंहासन पर पहुंचे थे, उनकी चीख-पुकार को भी अनसुना करने लगे। नतीजतन, जनता से कटा हुआ नेतृत्व अपने पार्टीजनों के बीच भी विवाद का विषय बनने लगा। चूंकि ज्योति बसु राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी थे, इसलिए इस लड़ाई को उन्होंने सार्वजनिक नहीं होने दिया, लेकिन बुद्धदेव भट्टïाचार्य ऐसा नहीं कर पाए। वे हाथ-पांव तो खूब मार रहे हैं, लेकिन पार्टी की अंदरूनी खींचतान ने उन्हें निढाल कर रखा है।&lt;br /&gt;इसे वाम मोर्चे की भयंकर राजनीतिक भूल ही माना जाएगा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का डटकर मुकाबला करने की बजाय उसके नेता केंद्र में यूपीए सरकार को मुसीबत में डालने में मशगूल रहे। भारत-अमेरिका न्यूक्लियर डील के सवाल पर यूपीए सरकार से समर्थन वापसी और कांग्रेस को सबक सिखाने के इरादे के साथ की गई तीसरे मोर्चे की स्थापना की भूमिका सबसे अहम रही। सबसे बुरी बात यह हुई कि आम लोगों ने सीपीएम के नेतृत्व में रची गई इस रणनीति को जनपक्षी मूल्यों में दृढ़ निष्ठा की मिसाल की तरह लेने के बजाय अवसरवाद और सिद्धांतप्रियता के अजब घालमेल की तरह लिया। 2004 के आम चुनाव में सीपीएम ने इराक पर अमेरिकी हमले को केरल और बंगाल में बाकायदा चुनावी मुद्दा बनाया था और इसके आधार पर भारत के साम्राज्यवाद विरोधी जनमत के अलावा मुस्लिम वोटों की भी भरपूर फसल काटी थी। अपनी इस मुहिम को खींचकर उसके नेता 2005 में न्यूक्लियर डील के लिए की गई जॉर्ज डब्ल्यु. बुश की भारत यात्रा तक ले गए और समर्थन वापसी के बाद इसका विस्तार पिछले साल हुए आम चुनाव तक करने की उन्हें पूरी उम्मीद थी, लेकिन चुनाव नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में एक वोट बैंक के रूप में वाम मोर्चे को सबसे बड़ा झटका मुसलमानों की तरफ से ही लगा है। इस उलटबांसी को समझना वाम नेताओं के लिए बहुत आसान नहीं है, लेकिन इसे समझे बगैर उनका गुजारा भी नहीं हो सकता। यूपीए सरकार में रहते हुए वाम दलों ने गरीब, मजदूर, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक तबकों की पैरवी करने का खूब दिखावा किया, लेकिन चुनाव में इसका रत्ती भर भी लाभ उन्हें नहीं मिला, तो इसके लिए वे खुद ही जिम्मेदार हैं। वे जिन मुद्दों पर केंद्र की यूपीए सरकार का विरोध कर रहे थे बुद्धदेव उन्हीं नीतियों का अनुसरण कर रहे थे।&lt;br /&gt;वाम मोर्चा यह भी उम्मीद नहीं कर सकता कि भविष्य में सब कुछ ठीक हो जाएगा। उनके पास अब न तो मुद्दे बचे हैं और न ही ममता बनर्जी के मुकाबले का कोई जनप्रिय नेता। ममता बनर्जी आज उन्हीं मुद्दों को लेकर राजनीति कर रही हैं, जिन पर किसी जमाने में वामपंथियों का एकाधिकार हुआ करता था। उन्होंने बड़ी चतुराई से बुद्धदेव भट्टïाचार्य के औद्योगिक विकास के एजेंडे को किसान और मजदूर विरोधी करार दे दिया। भट्टïाचार्य ने किसानों को समझाने की बजाय उद्योगों के लिए उनकी जमीन अधिग्रहण के धड़ाधड़ फरमान जारी कर दिए। विरोध में सिंगूर और नंदीग्राम उबल पड़े और जमकर खून-खराबा हुआ। इस दौरान ममता बनर्जी ने यह सफलतापूर्वक प्रचारित किया कि इस अत्याचार से उन्हें वे ही बचा सकती हैं। लिहाजा जनता के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ती गई। इससे हुआ यह कि बरसों से वाम दलों को वोट देते आए लोग उनके नेतृत्व पर भरोसा जाहिर करने लगे। इसी वोट बैंक के दम पर ही तो वाम दल बरसों से सत्ता में बने हुए थे। पंचायत, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनाव के परिणाम यह साबित करते हैं कि वाम दलों के परंपरागत वोट बैंक में सेंध लग चुकी है। वाम नेताओं को परेशानी यह है कि उन्हें इस वोट बैंक को फिर से समेटने का कोई रास्ता भी नहीं सूझ रहा है। ज्योति बसु के देहावसान के बाद ऐसा कोई नेता भी नजर आता, जो अपने दम पर जनाधार बढ़ा सके। वाम नेताओं की जिस पीढ़ी ने गरीबों की झोपडिय़ों में रह कर राजनीति का ककहरा सीखा था, वह अब या तो विदा हो चुकी है या नेपथ्य में है। शायद इसी का दुष्परिणाम है कि जिस अनुशासन के लिए वाम दलों को जाना जाता था, अब वह तार-तार होने लगा है। कुल मिलाकर देश की वाम राजनीति जाने-अनजाने कई व्याधियों से घिर चुकी है और फिलहाल यह संभावना भी कम ही है कि वह इनसे जल्द उबर पाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-9068674001319190183?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/9068674001319190183/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/06/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/9068674001319190183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/9068674001319190183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='अब तो संभल जाओ कॉमरेडों'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TA3-woG78AI/AAAAAAAAAEk/6WGH9Oq2V30/s72-c/communist-party-of-india-marxist-2009-election-manifesto.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-930310032115173776</id><published>2010-03-17T18:05:00.004+05:30</published><updated>2010-06-01T18:03:20.725+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इस्लाम'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मौलाना कल्बे जव्वाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महिला'/><title type='text'>जुबान संभालिए मौलाना साब...</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S6DN_uhCHMI/AAAAAAAAADk/-it0jBRuKug/s1600-h/people-democratic-front-kal.jpg"&gt;&lt;img style="MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 118px; FLOAT: left; HEIGHT: 200px; CURSOR: hand" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5449582043820334274" border="0" alt="" src="http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S6DN_uhCHMI/AAAAAAAAADk/-it0jBRuKug/s200/people-democratic-front-kal.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;मौलाना कल्बे जव्वाद का यह कहना कि खुदा ने महिलाओं को अच्छे नस्ल के बच्चे पैदा करने के लिए बनाया है, यदि वे घर छोड़कर राजनीति में आ जाएंगी तो घर कौन संभालेगा, महिला विरोधी तो है ही, इस्लाम की गलत व्याख्या करने का दुस्साहस भी है। ऐसा आए दिन होता है, जब इस्लामिक धर्मग्रंथों का हवाला देकर महिलाओं के लिए कई कार्य वर्जित बताए जाते हैं। उन्हें पुरुषों के मुकाबले समाज में कम अधिकार दिए जाने को सही ठहराया जाता है। इसकी सबसे अहम वजह मौलवियों द्वारा इस्लाम में औरतों के अधिकारों और प्रतिष्ठा को गलत तरीके से वर्णित करना है। ये उलेमा ऐसा अपने रूढि़वादी नजरिए के कारण करते हैं, वे इस्लाम के संदर्भ में हेरफेर करके शिक्षा, पर्दा, शादी, तलाक और औरतों के कामकाज के बारे में गलत विचार पेश करते हैं। इस्लाम में ऐसा उल्लेख कहीं नहीं है कि औरतों को फलां काम करना चाहिए और फलां नहीं। मिसाल के तौर पर कुरान के संदर्भ को ही लें। कुरान का पहला शब्द है 'इकराÓ जिसका अर्थ है 'पढ़ोÓ। इसमें यह कहीं नहीं कहा गया है कि पुरुष ही पढं़े, औरतें नहीं। इस्लाम में यह बात हर जगह जोर देकर कही गई है कि महिलाओं की पढ़ाई भी पुरुषों की तरह ही जरूरी है। ऐसे कई और भी उदाहरण हैं, जो साबित करते हैं कि मौलाना-मौलवी धर्म को किनारे रख कोरी लफ्फाजी करते हैं। हैरत की बात यह है कि मौलवी-उलेमा इस्लाम में महिलाओं के अधिकारों से अच्छी तरह वाकिफ हो सकते हैं, लेकिन वे उन्हें नजरअंदाज करते हैं। वे महिलाओं के कर्तव्यों की चर्चा तो हमेशा करते हैं, लेकिन उनके अधिकारों या सुविधाओं का जिक्र नहीं करते। इतिहास में कई जगह उल्लेख है कि मुस्लिम महिलाओं ने उन सब कार्र्यों को अंजाम दिया है, जो पुरुष किया करते थे। यहां तक कि वे युद्ध के दौरान फौजों के साथ रहती थीं और घायलों की सेवा करती थीं। कई औरतें व्यापार के लिए दूसरे शहरों की यात्रा तक करती थीं। इस्लाम का उद्देश्य साफ है कि औरतें अपने काम के लिए घर से बाहर जा सकती हैं, किंतु उस सीमा तक कि ऐसा करने से उनकी मर्यादा, जिंदगी और परिवार पर कोई विपरीत असर न पड़ता हो। औरतों के लिए इस्लाम की भूमिका एक अभिभावक की तरह है। इस्लाम धर्म को मानने का यह आशय कदापि नहीं है कि औरतों को दयनीय अवस्था में रखा जाए। जरा सोचें कि वे मौलवी कभी भी उन विवाहित मुस्लिम महिलाओं की समस्याओं के बारे में चर्चा क्यों नहीं करते, जिनके पति खाड़ी और अरब देशों में कई साल तक अपनी पत्नी को घर पर अकेला छोड़कर नौकरी कर रहे हैं, जबकि इस्लाम यह छूट नहीं देता कि कोई भी पति चार महीने से अधिक अपनी पत्नी से अलग रहे। आखिर क्यों इस्लाम के तथाकथित ठेकेदार सिर्फ औरतों के कर्तव्यों की ही बातें करते हैं? वे महिलाओं के अधिकारों और इस्लाम के उन तोहफों पर रोशनी नहीं डालते, जो औरतों की बेहतरी के लिए उन्हें दिए गए हैं। वक्त आ गया है कि इस्लाम की नुमाइंदगी करने वाले इस पर गंभीरता से विचार करें। मौलाना-मौलवी बेतुके बयान और फतवे जारी करने की बजाय इस पर ज्यादा जोर दें कि महिलाओं के कल्याण के लिए क्या किया जा सकता है। यदि उन्होंने वक्त रहते ऐसा नहीं किया तो समाज में उनका ही आदर कम होगा। रही बात महिलाओं की, तो उनका हर क्षेत्र में आगे बढऩा तय है, राजनीति भी इसमें शामिल है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-930310032115173776?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/930310032115173776/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post_2632.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/930310032115173776'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/930310032115173776'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post_2632.html' title='जुबान संभालिए मौलाना साब...'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S6DN_uhCHMI/AAAAAAAAADk/-it0jBRuKug/s72-c/people-democratic-front-kal.jpg' height='72' 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नामों को देखकर लगता है कि उन्हें मजबूरी में शामिल किया गया है, फिर भी गडकरी बिना काम किए दाएं-बाएं बने रहकर पार्टी की छवि बिगाडऩे वालों से परहेज करते हुए दिखाई दिए हैं। यह तो समय ही बताएगा कि इस नई टीम के साथ गडकरी जैसा प्रदर्शन करना चाह रहे हैं, वैसा कर पाते हैं या नहीं, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के पार्टी की व्याधियों को दुरुस्त करने की ठानी है। यह किसी से नहीं छिपा है कि भाजपा में राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व में मतभेद मनभेद में बदल गए हैं और ऐसी ही स्थिति अनेक राज्यों में भी है। यद्यपि फिलहाल शांति नजर आ रही है, लेकिन यह कहना कठिन है कि पार्टी के नेता गिले-शिकवे दूर कर गडकरी के नेतृत्व में एकजुट हो गए हैं। भाजपा की समस्याएं इसलिए और बढ़ गई हैं, क्योंकि एक तो वह औरों से अलग दल की अपनी छवि खो चुकी है और दूसरे उसके पास ऐसे मुद्दों का अभाव है, जो कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार कर सकें। भाजपा अपने जिन मुद्दों के लिए जानी जाती थी, वे अब उसकी नैया पार नहीं लगा सकते, क्योंकि एक तो उसने ही उन्हें मझधार में छोड़ा और दूसरे अब आम जनमानस की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। इसके बावजूद भाजपा अपनी खोई हुई शक्ति इसलिए फिर से प्राप्त कर सकती है, क्योंकि राष्ट्रीय दल के रूप में कांग्रेस के विकल्प की आवश्यकता महसूस की जा रही है। नितिन गडकरी ने अपनी नई टीम तो बना ली है, लेकिन यह परिणाम तब ही देगी जब यह सुधार और बदलाव की योजना पर एकजुट होकर, ईमानदारी से अमल करे। यह किसी से छिपा नहीं है कि गुटबाजी भाजपा पर किस कदर हावी हो चुकी है। अन्यथा आज भी लोकसभा में १५० से अधिक सांसदों वाली मुख्य विपक्षी पार्टी के प्रति निराशा का वैसा भाव नहीं होता, जैसा पिछले कुछ अरसे से देखने को मिल रहा है। गडकरी सही कहते हैं कि कार्यकर्ताओं की पहचान बड़े नेताओं के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने से नहीं, गांव-गांव घूमने से होगी। यह तब ही संभव है, जब परिक्रमा के पराक्रम से प्रतिष्ठापित होने की परंपरा को समाप्त किया जाए। गुटबाजी समाप्त करने के अलावा फिलहाल राजनीतिक स्तर पर भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बिहार से है, जहां इस वर्ष चुनाव होने हैं। दूसरी चुनौती उत्तर प्रदेश है, जहां से लोकसभा के लिए 80 सदस्य चुने जाते हैं। इस राज्य में पार्टी पहले ही खिसककर चौथे स्थान पर पहुंच गई है। व्यक्तियों के लिए पदों का सृजन करने के बजाय पदों पर व्यक्तियों के चयन का जैसा स्वरूप उभरेगा, गडकरी भाजपा को उसका खोया हुआ स्थान दिलाने में उतने ही सफल रहेंगे। पिछले दिनों लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा था कि राजनीतिक लोगों के बारे में आम धारणा है कि वे बेईमान हैं। नई परिस्थितियों में भाजपा के सामने इस माहौल को बदलने की भी चुनौती है। इस चुनौती से आचरण की शुचिता और जनहित की प्राथमिकता के बल पर ही निपटा जा सकता है। अपने अनुकरणीय कार्य-व्यवहार से ही भाजपा जन समर्थन हासिल कर सकती है। बेहतर होगा कि नितिन गडकरी के नेतृत्व में भाजपा की नई टीम यह प्रदर्शित करे कि वह अपनी राजनीति के जरिये समाज को दिशा देने और उसका उत्थान करने के लिए समर्पित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-735787461603842809?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/735787461603842809/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post_17.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/735787461603842809'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/735787461603842809'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post_17.html' title='गडकरी गुड करी'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S6DKvz5LYJI/AAAAAAAAADc/4ogjEtuhF9Y/s72-c/untitled.bmp' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6803929430046920439</id><published>2010-03-11T18:35:00.001+05:30</published><updated>2010-03-11T18:42:32.824+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महिला आरक्षण विधेयक'/><title type='text'>अभी दूर है दिल्ली</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S5jr_GTZM8I/AAAAAAAAADU/LvgtgbzKUpY/s1600-h/womensBill.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5447363218560857026" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 144px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S5jr_GTZM8I/AAAAAAAAADU/LvgtgbzKUpY/s200/womensBill.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा में मंगलवार को इतिहास बना भी और घटा भी। आधी आबादी को संवैधानिक हक देने के लिए सिर्फ संख्याबल के साथ-साथ बाहुबल की भी जरूरत पड़ेगी, इसकी उम्मीद जरा कम थी। जो भी हो सदन से सात सांसदों के निलंबन, मार्शलों के जरिए माननीयों का निष्कासन और अभूतपूर्व हंगामे के बाद अंतत: राज्यसभा में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाला 108वां संविधान संशोधन विधेयक पारित हो ही गया। इससे महिलाओं के राजनीतिक हक की शुरुआत भले ही हो गई हो, लेकिन असल में उनके लिए दिल्ली अभी बहुत दूर है। राज्यसभा में तमाम लानत-मलानत के बाद मंजूर हुए महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा की अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा। साथ ही कम से कम 14 विधानसभाओं की पथरीली गलियों को भी पार करना होगा। एक-दूसरे से आगे निकलने और श्रेय लेने की होड़ में महिला आरक्षण विधेयक पर बेमन से ही सही, कांग्रेस, भाजपा और वामपंथियों ने जिस तरह से हाथ मिलाया है, उससे संख्याबल के लिहाज से लोकसभा में भी विधेयक का पारित होना आसान दिख रहा है, लेकिन वास्तव में राह बेहद मुश्किल है। मुलायम, लालू और शरद यादव के बाद ममता बनर्जी की पार्टी के सदस्यों का भी राज्यसभा से अनुपस्थित रहना इसका खुला संकेत है। सरकार को लोकसभा में नई चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। राज्यसभा में पटकनी खाने के बाद मुलायम सिंह यादव और लालू यादव जिस तरह से क्षेत्रीय दलों के नेताओं से संपर्क साध रहे हैं, उससे कयास लगाया जा रहा है कि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी है। जाहिर तौर पर यह सरकार के लिए यह बड़ी असहज और चुनौतीपूर्ण स्थिति हो सकती है। ध्यान रहे कि महिला बिल पर कांग्रेस के रुख से उसके कुछ सहयोगी भी खुश नहीं हैं। ममता ने तो अपनी असहमति छिपाई भी नहीं। ऐसे ही तमाम छोटे दल हैं, जिनमें आसमान छूती महंगाई पर सरकार के अनमने रुख से गुस्सा बढ़ रहा है। ऐसे में अविश्वास प्रस्ताव सरकार के लिए परेशानी बढ़ा सकता है। लालू, मुलायम और शरद जैसे विरोधियों को लगता है कि सरकार इसके बाद उन्हें अनसुना करने में असमर्थ होगी। सरकार से समर्थन वापसी की धमकी देकर मुलायम और लालू ने सोमवार को तो सरकार को रोक लिया था, लेकिन मंगलवार तक उसका असर खत्म हो गया। राज्यसभा में सख्ती के सहारे सरकार ने विधेयक पारित करवा लिया। यादव तिकड़ी नहीं चाहते कि लोकसभा में भी इसी तरह की चरम स्थिति पैदा हो। अविश्वास प्रस्ताव के जरिए सरकार को यही संकेत देने की कोशिश होगी। मान लीजिए किसी तरह से लोकसभा में भी विधेयक पारित हो जाता है, तो फिर इसे विधानसभाओं की ड्योढ़ी लांघनी होगी। ध्यान रहे कि कुल 50 फीसदी विधानसभाओं को इस विधेयक पर मुहर लगानी होगी। क्षेत्रीय क्षत्रपों के अब तक के तेवरों को देखते हुए यह आसान कतई नहीं है। कोई भी राजनीतिक दल नहीं चाहेगा कि महिला आरक्षण विधेयक की कीमत सियासी नुकसान के रूप में चुकानी पड़े। बंगाल में ममता तो बिहार में नीतीश और उत्तर प्रदेश में मायावती महिला आरक्षण पर अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त लेने में कोई हिचक दिखाने वाले नहीं हैं। ममता ने राज्यसभा में अध्यादेश के समर्थन से कन्नी काटने, तो नीतीश ने अपनी पार्टी की टूट के जोखिम पर भी इसके पक्ष में खड़े होने के और क्या निहितार्थ हैं? वहीं मायावती ने विरोध का तरीका ऐसा निकाला, जिससे वह सपा के साथ खड़ी कतई न दिखाई पड़े। उनकी पार्टी ने विरोध तो किया, लेकिन सपा के रुख के विपरीत विधेयक पर चर्चा में भाग लेकर अपने तर्क रखते हुए। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के कब्जे से मुस्लिम वोट बैंक खींचने का ममता को यह अच्छा मौका नजर आया। तब ही तो तृणमूल के दो सांसदों ने अंतिम क्षणों में मुस्लिम समुदाय का अलग कोटा मांगकर राज्यसभा में विधेयक पर वोटिंग से गैरहाजिर हो गए। निश्चित रूप से बिल को बिना बहस पारित कराने पर माकपा की मुहर के बाद ही ममता ने यह राजनीतिक दांव खेला। जहां ममता ने चुनाव से पहले बंगाल विधानसभा में महिला विधेयक पर वाममोर्चा सरकार को असहज करने के लिए आधार तैयार कर लिया, वहीं बिहार में सवर्ण वोट बैंक को खिसकने से बचाने के लिए नीतीश कुमार को भी चुनावी साल में यह विधेयक प्रभावी राजनीतिक अस्त्र समझ में आया। पंचायत में आरक्षण के जरिए पिछड़े वर्ग को पहले ही मोहपाश में बांध चुके बिहार के मुखिया सवर्णों की नाखुशी को नजरअंदाज नहीं कर सकते। राजद की राजनीति को पिछड़ों और अगड़ों दोनों के बीच निष्प्रभावी बनाने के लिए विधेयक के समर्थन का रास्ता ही नीतीश को भाया। इस विधेयक को कानून बनने में सियासी उलझनों के अलावा प्रक्रियागत उलझने भी कम पेचीदा नहीं हैं। लोकसभा की मंजूरी के बाद इसे राष्ट्रपति के पास अधिसूचना के लिए भेजा जायेगा। फिर इस सरकारी गजट को विधानसभाओं की मंजूरी जरूरी होगी। ध्यान रहे देश में कुल 28 विधानसभाएं हैं, जिनमें से कम से कम 14 में इस विधेयक को दो तिहाई बहुमत से मंजूरी मिलनी जरूरी है। यहां से मंजूरी मिलने के बाद संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की जाएंगी। केंद्रीय कानून मंत्री वीरप्पा मोइली इसके लिए एक अलग कानून बनाने की वकालत कर रहे हैं। महिला आरक्षण विधेयक में तीन बड़े प्रावधान किये गये हैं। विधेयक में संसद समेत राज्य विधानसभाओं की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। आरक्षण का प्रावधान 15 सालों के लिए होगा। चुनाव क्षेत्रों को रोटेशन प्रणाली के आधार पर आरक्षित किया जायेगा। चुनाव में पहले से ही अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति को मिल रहे आरक्षण कोटे में उसी जाति की महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण प्रदान किया जाएगा। यहां सवाल यह है कि देश की राजनीति इस अहम बदलाव से किस रूप में प्रभावित होगी। यदि संसद के स्तर पर ही बात करें तो, महिला आरक्षण के अमल के आने के बाद देश की सबसे बड़ी पंचायत की लगभग आधी सीटें आरक्षित हो जाएंगी। अनुसूचित जाति व जनजाति के लिए पहले से 131 सीटें आरक्षित हैं। दो सीटें एंग्लो इंडियन समुदाय के सदस्यों के नामांकन के जरिए भरी जाती हैं। इस तरह 545 के सदन में नामांकन से भरी जाने वाली दो सीटें हटाने के बाद 181 सीटें महिलाओं (अनुसूचित जाति-जनजाति समेत) के लिए आरक्षित होंगी। तब अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए 87 सीटें आरक्षित रह जाएंगी। इस तरह कुल 268 सीटें आरक्षित होंगी और 275 अनारक्षित होंगी। इससे भी ज्यादा एक और महत्वपूर्ण पहलू है- रोटेशन प्रणाली। यह निश्चित रूप से सांसदों को उनके दायित्व व निष्ठा के प्रति उदासीन भी करेगी। इस रोटेशन प्रणाली के तहत 362 सांसदों को हमेशा मालूम होगा कि अगले लोकसभा चुनाव में उन्हें अपने पुराने लोकसभा क्षेत्र से लडऩे का मौका नहीं मिलेगा। दरअसल रोटेशन प्रणाली लागू होने के बाद 181 महिला सांसदों का चुनाव क्षेत्र बदलेगा, तो दूसरे 181 सदस्य अपने आप प्रभावित होंगे। जाहिर तौर पर कुछ ही कद्दावर नेता ऐसे होंगे, जिन्हें दूसरे लोकसभा क्षेत्र से भी चुनाव लडऩे में बहुत दिक्कत नहीं आएगी। एक तरह से देखें तो एक पारी के बाद सांसदों का राजनीतिक भविष्य अधर में होगा। सबसे बड़ा खतरा यह है कि सांसदों को पता होगा कि पांच साल उन्हें कोई छूने वाला नहीं और अगले चुनाव में उन्हें टिकट मिलने वाला नहीं। ऐसे में वे अपने संसदीय क्षेत्र के प्रति कितनी प्रतिबद्धता दिखाएंगे और उसके विकास में कितनी रुचि लेंगे, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। हालांकि इन तर्कों को आधार बनाकर राजनीति में महिला आरक्षण को नकारा नहीं जा सकता। आरक्षण निश्चित रूप से मिले, लेकिन यह ध्यान रहे कि इससे महिलाओं की स्थिति और लोकतंत्र दोनों मजबूत हो, कमजोर नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6803929430046920439?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6803929430046920439/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6803929430046920439'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6803929430046920439'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='अभी दूर है दिल्ली'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S5jr_GTZM8I/AAAAAAAAADU/LvgtgbzKUpY/s72-c/womensBill.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6886087504155490683</id><published>2010-02-25T16:37:00.002+05:30</published><updated>2010-02-25T16:42:32.289+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सचिन'/><title type='text'>सचिन तुझे सलाम...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S4Za8Q1Tj3I/AAAAAAAAADM/x7eZoD-7WVY/s1600-h/kn2506ci.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5442137191081021298" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 193px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S4Za8Q1Tj3I/AAAAAAAAADM/x7eZoD-7WVY/s200/kn2506ci.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;रिकॉर्ड्स सचिन तेंदुलकर का परछाई की तरह पीछा करते हैं। ढेरों शतक, रनों का अंबार, बेहतरीन स्ट्राइक रेट और अब वन डे क्रिकेट के इतिहास में पहला दोहरा शतक! इन्हें देखकर आंख का अंधा भी कह सकता है कि सचिन जब तक खेलेंगे, कोई न कोई नया रिकॉर्ड उनके नाम के साथ जुड़ता रहेगा। दुनिया का कोई भी आलोचक 147 गेंदों पर तीने छक्कों और 25 चौकों से सजी 200 रन की उनकी ऐतिहासिक पारी में ऐसा नुक्स नहीं निकाल सकता जिससे कहा जा सके कि काश, सचिन ने कीर्तिमान बनाने की जगह टीम को जीत दिलाने की चिंता की होती।&lt;br /&gt;निश्चय ही क्रिकेट के हर पैमाने पर सचिन का मुकाबला सिर्फ और सिर्फ सचिन से ही है। पिछले कुछ सालों में टीम इंडिया को, खासकर छोटे संस्करणों वाली क्रिकेट के कुछ चमकदार खिलाड़ी मिले हैं, लेकिन सचिन के कद के सामने ये सब बौने ही दिखाई देते हैं। भारतीय टीम ही नहीं, पूरी दुनिया की टीमों में सचिन सा खिलाड़ी नहीं है। मैच विनर होने के लिए किसी भी खिलाड़ी में जो धैर्य, संतुलन और चुनौती झेलने का जज्बा होना चाहिए, वह सचिन में कूट-कूट कर भरा है। यह बिल्कुल संभव है कि किसी शहर-कस्बे की अनजान गली में खिड़कियों के शीशे चटकाते कई होनहारों में प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सचिन जैसा बनने के लिए प्रतिभा ही नहीं लगन और मेहनत भी जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बिताए उनके 20 सालों का अरसा देखें, तो सचिन तेंदुलकर एक क्रिकेटर की उम्र के लिहाज से आखिरी दौर में कहे जा सकते हैं, लेकिन उनके सतत प्रदर्शन से लगता है कि वे असल में सड़क की वैसी ढलान पर हैं, जहां स्पीड और तेज हो जाती है। अब कोई दूसरा बल्लेबाज उनके रिकॉर्ड्स के आसपास भी नहीं लगता, ऑस्ट्रेलिया के रिकी पोंटिंग टेस्ट में शतकों के साथ उनसे होड़ में हैं, लेकिन अब उनसे शतकों की ज्यादा उम्मीद नहीं बची है। अलबत्ता सचिन के प्रदर्शन से लगने लगा है कि वे अगले कई और साल क्रिकेट खेल सकते हैं, लिहाजा अब कुछ लोग उनमें वन डे और टेस्ट में शतकों का शतक लगाने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।&lt;br /&gt;शानदार प्रदर्शन के बावजूद अलग-अलग मौकों और मुद्दों को लेकर सचिन की तरफ काफी अंगुलियां भी उठ चुकी हैं। ग्रेग चैपल ने काफी पहले कहा था कि सचिन अपना सर्वश्रेष्ठ दे चुके हैं और उनमें वापसी की ज्यादा संभावना नहीं बची है, लेकिन सचिन ने हमेशा की तरह हर आलोचना का जवाब अपने बल्ले से दिया है। यह सचिन का खुद पर भरोसा ही है कि उन्होंने कभी भी क्रिकेट से विदाई का संकेत नहीं दिया। यह जरूर कहा कि आलोचक उनके बारे में कई फैसले खुद कर रहे हैं और शायद वे उनका खेल देखने का धीरज नहीं रख पा रहे हैं। 1999 के बाद एक लंबा दौर ऐसा अवश्य रहा, जब सचिन को लगातार टेनिस एल्बो और पीठ की मांसपेशियों के खिंचाव जैसी परेशानियों के कारण मैदान से दूर रहना पड़ा। इसी बीच टीम को युवा बनाने की जरूरत पर जोर देने और बढ़ी उम्र के खिलाडिय़ों से छुटकारा पाने की बात भी उठी। लेकिन आज भी जैसा प्रदर्शन सचिन कर रहे हैं, उसमें उनकी जगह पर नए खिलाड़ी के बारे में सोच पाना थोड़ा कठिन हो जाता है। तेंदुलकर सिर्फ इसलिए महान नहीं माने जाते कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में हजारों रन बनाए और दजर्नों विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए अनेक मील के पत्थर स्थापित किए हैं। वह महान हैं, क्योंकि उनके अंदर बचपन से ही सर्वश्रेष्ठ बनने की चाह रही है और इसके लिए वह किसी भी चुनौती से भागे नहीं, बल्कि उससे निपटने के लिए जी-तोड़ मेहनत की। क्रिकेट के प्रति खुद को पूरी तरह से समर्पित रखा। पिता रमेश तेंदुलकर महान संगीतकार और गायक सचिन देव बर्मन के मुरीद थे, इसलिए उन्होंने अपने छोटे बेटे का नाम सचिन रखा था। शायद उन्होंने सोचा होगा कि उनका सचिन भी बड़ा होकर संगीत की दुनिया में नाम कमाएगा, लेकिन जब सचिन की क्रिकेट के प्रति दीवानगी देखी तो बेटे को खूब प्रोत्साहित किया। सचिन ने उन्हें हमेशा उम्मीद से ज्यादा ही दिया।&lt;br /&gt;सचिन इसीलिए भी महान हैं कि वे खुद को नहीं बल्कि क्रिकेट के खेल को महान मानते हैं। अपने स्कूली क्रिकेट खेलने के दिनों से आज तक क्रिकेट के प्रति समर्पण, अनुशासन और जुनून को उन्होंने कम नहीं होने दिया है। वे जीतना चाहते हैं और इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देते हैं। हारना तो वह अपने बेटे के साथ खेलते हुए भी पसंद नहीं करते। वे टीम भावना में विश्वास रखते हैं और आलोचना पर घबराते नहीं, बल्कि उनके इरादे और दृढ़ हो जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6886087504155490683?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6886087504155490683/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_25.html#comment-form' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6886087504155490683'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6886087504155490683'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_25.html' title='सचिन तुझे सलाम...'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S4Za8Q1Tj3I/AAAAAAAAADM/x7eZoD-7WVY/s72-c/kn2506ci.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-3835527368779766836</id><published>2010-02-07T17:44:00.002+05:30</published><updated>2010-02-07T18:05:13.554+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुंबई'/><title type='text'>मैं मुंबई हूं...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S26zInfmI1I/AAAAAAAAADE/J5mb5vlIL_0/s1600-h/mumbai-chowpatty-beach-001-060414-chowpatty-139-sw.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5435478760904598354" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 150px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S26zInfmI1I/AAAAAAAAADE/J5mb5vlIL_0/s200/mumbai-chowpatty-beach-001-060414-chowpatty-139-sw.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;मैं मुंबई हूं। मैं पहले एक टापू थी। मुंबादेवी के नाम से मेरा नाम मुंबई पड़ा। पहले मेरी पहचान मछुआरों के गांव से अधिक कुछ नहीं थी। 'कोली' समाज के लोग तब यहां रहा करते थे। तांदले, नाखवा, भोईर, भांजी, सांधे, कलसे वगैरह सब कोली समाज के ही लोग हैं। मछली पकडऩा, समुद्र की पूजा करना और भाईचारे से रहना इन सबका धर्म है। वक्त बदला तो इन लोगों ने नमक के खेत छोड़ सारी जमीन बेच दी। ईरानी, पारसी, गुजराती, मारवाड़ी और उत्तर प्रदेश व बिहार से आए लोगों ने ये जमीनें खरीदीं और यहां मिलें बनवार्ईं, कल-कारखाने शुरू किए, अखबार निकाले, प्याऊ, मंदिर, स्कूल, अस्पताल, धर्मशालाएं और गैराज आदि बनवाए। गोवानीज, पुर्तगाली और ईसाइयों के चर्च यहां पहले से ही थे। अंग्रेजों ने रेल चलाई तो इसका संचालन करने वाले ज्यादातर लोग उत्तर व दक्षिण भारतीय लोग थे। पोर्ट ट्रस्ट में भी वे सेवा में थे। मुसलमान भी थे। तब मकान के मकान खाली पड़े रहते। मकान मालिक लोगों को पकड़-पकड़कर अपना मकान लेने के लिए बुलाते। बाकी जो जमीनें बची थीं वे लीज यानी पट्टे पर थीं। ट्रामें चलती थीं। तब उत्तर भारतीय दूध का कारोबार करते थे। कच्छी-गुजराती भी दूध व होटल के कारोबार में थे। पारसी और ईरानी केक और पेस्ट्री के साथ पाव का कारोबार करते थे। मस्का मार के ईरानी चाय बहुत चलती थी। एक पाव में लोगों का पेट भर जाता था। मिलों में तीन-तीन पालियां (पारी) चलती थीं। जो बेरोजगार थे, वे किसी के नागा करने पर, बदली कामगार का काम करते थे। दोपहर में फुटपाथ पर सिले हुए कपड़े, हरी सब्जियां-फल आदि का धंधा करते। अलग-अलग क्षेत्र, भाषा और संस्कृति के लोग मजे से रहते थे। पहले खानावल चलते थे। बना बनाया भोजन घर-घर मिलता। डिब्बेवाले उसी परंपरा से निकले हैं। वे दफ्तर में डिब्बा पहुंचाते और वापस ले आते। सुबह ग्यारह बजे के बाद लोकल गाड़ी के मालडिब्बे उनके डिब्बों से भर जाते। जब शाम को रेलवे के कारखाने छूटते और दोपहर में मिलें, तो आम जनता का अथाह समुद्र सड़कों पर गहरा जाता। एक-दो घंटे में ही सारी सब्जी बिक जाती। यहां के गरीब लोग चौका-बर्तन का काम करते। उनके जैसा मेहनती कोई दूसरा नहीं है। घर चमके या न चमके, बर्तन दप-दप चमकते। चाहें तो अपना मुंह देख लें। शॉर्टहैंड और टाइपिंग के साथ-साथ नर्स के कामों की वजह से दक्षिण के लोग यहां आते गए। कुछ तो केंद्र सरकार की नौकरियों में प्रमोशन और तबादले की वजह से आए। पूरी दुनिया कहने लगी कि मुंबई जैसा कोई दूसरा कॉस्मोपोलिटन शहर नहीं है। देश के नामी-गिरामी धनपतियों, फिल्मी सितारों, खिलाडिय़ों और राजनेताओं ने मेरी शान बढ़ाई। मेरे यहां की बसें, लोकल ट्रेनें, मस्का-पाव- सभी चीजें तो बेमिसाल हैं, बदल गए या यूं कहूं बहक गए हैं, तो वे लोग जो मेरे स्वयंभूं ठेकेदार बन बैठे हैं। कहते हैं- मैं केवल मराठियों की हूं। कहने वालों की याददाश्त शायद कमजोर हो गई है, क्योंकि वे तो एक समय मध्य प्रदेश से मेरी शरण में आए थे। वे एक आदिम नारे- जिसकी लाठी उसकी भैंस को चरितार्थ कर रहे हैं, लेकिन ऐ दुनिया वालो! भैंस और एक जीते-जागते शहर में बड़ा फर्क होता है। कोई है, जो मेरे इस दर्द को समझेगा?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-3835527368779766836?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/3835527368779766836/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_07.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3835527368779766836'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3835527368779766836'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post_07.html' title='मैं मुंबई हूं...'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S26zInfmI1I/AAAAAAAAADE/J5mb5vlIL_0/s72-c/mumbai-chowpatty-beach-001-060414-chowpatty-139-sw.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6999965309269108897</id><published>2010-02-03T13:00:00.002+05:30</published><updated>2010-02-03T13:06:45.258+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मुलायम सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समाजवादी पार्टी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमर सिंह'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उत्तर प्रदेश'/><title type='text'>'अमर कथा' का अंत</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S2knMtuEUOI/AAAAAAAAAC8/LIUFb-VFFzU/s1600-h/amar_singh_mulayam_20090209.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5433917524783943906" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 114px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S2knMtuEUOI/AAAAAAAAAC8/LIUFb-VFFzU/s200/amar_singh_mulayam_20090209.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;समाजवादी पार्टी से अमर सिंह और उनके समर्थकों की बर्खास्तगी आश्चर्यचकित करने वाली नहीं है, क्योंकि पार्टी में उनकी खिलाफत करने वालों की बढ़ती फेहरिस्त और मुलायम सिंह की 'चुप्पी' से इसके संकेत पहले ही मिल गए थे। पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने जिस तरह से मायावती और सोनिया गांधी की तारीफ की, उसी से साफ हो गया था कि न तो अमर सिंह समाजवादी पार्टी का हिस्सा बने रहना चाहते हैं और न ही मुलायम सिंह की उनमें कोई दिलचस्पी बची है। राजनीति को संभावनाओं का खेल बताने वाले अमर सिंह ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 14 साल तक एक पार्टी की 'सेवा' करने के बाद उन्हें अनुशासनहीनता का आरोप लगा रुखसत किया जाएगा और उम्र के इस पड़ाव में सियासी ठिकाना तलाशना पड़ेगा। 'अमर कथा' के अंत से दो सवाल बेहद मौजूं हो गए हैं- एक तो अमर सिंह किसके पहलू में अपनी राजनीति को आगे बढ़ाएंगे और दूसरा अपने पारिवारिक सदस्यों की महत्वाकांक्षाओं में उलझे मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी को किस दिशा में ले जाएंगे? अमर सिंह भले ही जनाधार वाले नेता कभी भी न रहे हों, लेकिन वर्तमान में देश की राजनीति जिस संक्रमण के दौर से गुजर रही है, उसमें उन जैसे नेताओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, यह किसी से छिपा नहीं है। चाहे महंगे होते चुनावों के लिए धन जुटाना हो या बहुमत लायक सीटों का इंतजाम करना, अमर सिंह इनमें उस्ताद रहे हैं। मुलायम सिंह को दूसरा अमर सिंह ढूंढने के लिए तो खासी मशक्कत करनी पड़ेगी ही, यह भी डर सताता रहेगा कि उनके 'हमराज' किसी दूसरी पार्टी में जाने पर मोर्चा न खोल दें। यह सही है कि मुलायम सिंह यादव एक जुझारू राजनेता हैं और उन्होंने यह साबित किया है कि कोई व्यक्ति कैसे अपने बलबूते सशक्त राजनीतिक दल खड़ा कर सकता है, लेकिन अब उन्हें इस पर विचार करना ही होगा कि समय के साथ उनके विश्वासपात्र सहयोगी एक-एक कर अलग क्यों होते जा रहे हैं? मौजूदा स्थितियों में सपा के समक्ष संकट इसलिए और अधिक गहरा नजर आता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस न केवल उसके जनाधार में सेंध लगाने के लिए तत्पर है, बल्कि इसके लिए कोई मौका भी नहीं छोड़ रही है। बहुत समय नहीं हुआ जब क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में सपा सबसे सशक्त नजर आती थी और संख्या बल के हिसाब से तो वह अभी भी कांग्रेस और भाजपा के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है, लेकिन उसके लिए यह चिंता का विषय बनना चाहिए कि वह अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में अपनी धार खोती जा रही है। अमर सिंह के निष्कासन के बाद सपा का वह खेमा तो शांत हो जाएगा, जो उन पर परंपरागत वोट बैंक को छिटकाने और पार्टी को अपनी बुनियादी जमीन से भटकाने सरीखे आरोप लगा रहा था, लेकिन इतने भर से पार्टी संकट से नहीं उबर जाएगी। वंशवाद के समक्ष घुटने टेकना मुलायम के लिए भविष्य में भारी पड़ सकता है। मुलायम को यह ध्यान रखना होगा कि एक समय परिवारवाद की राजनीति का मुखर विरोध करने वाली सपा अब वंशवाद की राजनीति का एक उदाहरण बन गई है और ऐसी पार्टियों के लिए जनाधार को बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है। अमर सिंह के साथ चलने के आदी हो चुके मुलायम इससे कैसे निपटते हैं, उनका और समाजवादी पार्टी का भविष्य इसी से तय होना है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6999965309269108897?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6999965309269108897/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6999965309269108897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6999965309269108897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='&apos;अमर कथा&apos; का अंत'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S2knMtuEUOI/AAAAAAAAAC8/LIUFb-VFFzU/s72-c/amar_singh_mulayam_20090209.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-5525568690049621117</id><published>2010-01-23T18:39:00.002+05:30</published><updated>2010-01-23T18:42:27.192+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमेरिका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तालिबान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भारत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाकिस्तान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आतंकवाद'/><title type='text'>पाकिस्तान का पागलपन</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1r1oBUA8yI/AAAAAAAAAC0/S3TUJ3iMeEE/s1600-h/051114_pakistan_blast_hmed9phmedium.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429922368644510498" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 128px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1r1oBUA8yI/AAAAAAAAAC0/S3TUJ3iMeEE/s200/051114_pakistan_blast_hmed9phmedium.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी ने यह कहकर एक बार फिर अपनी धूर्तता का परिचय दिया है कि वे भारत में मुंबई जैसे हमलों को रोकने की गारंटी नहीं ले सकते। उनके इस बयान पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए, लेकिन इस बार उन्होंने अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स के सामने यह राग अलापा है। पाकिस्तान गेट्स की मौजूदगी में यह कहने से भी नहीं चूका कि भारत ने मुंबई हमले के विश्वसनीय सुबूत उसे उपलब्ध नहीं कराए। स्पष्ट है कि पाकिस्तान ने जानबूझकर अपनी आंखों पर न केवल पट्टी बांध ली है, बल्कि फरेब को अपना हथियार भी बना लिया है। इसके संकेत इससे मिलते हैं कि वह बलूचिस्तान के आतंकवाद में भारत की कथित संलिप्तता दिखाने के लिए अमेरिका के कान भर रहा है। उसकी हरकतें काफी कुछ वैसी ही हैं, जैसी एक समय अफगानिस्तान पर कब्जा जमाए तालिबान के आतंकी शासन की थीं। एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान पागलपन दिखा रहा है। वह दिन प्रतिदिन लाइलाज होता जा रहा है। इसके लिए एक हद तक भारत भी जिम्मेदार है और रही-सही कसर विश्व समुदाय, खासकर अमेरिका ने पूरी कर दी है। भारत को इसका अहसास अच्छी तरह से हो जाना चाहिए कि पाकिस्तान की तरह से अमेरिका को भी हाल-फिलहाल सद्बुद्धि नहीं आने वाली। हालांकि यह शुभ संकेत है कि अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि मुंबई जैसा हमला हुआ, तो भारत के सब्र का बांध टूट जाएगा, लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका पलक झपकते ही सुर बदल लेता है। अब यह आवश्यक है कि भारत पाकिस्तान से तो कड़ाई से निपटे ही, अमेरिका से भी दो टूक बात करे। अमेरिकी एजेंसियों ने कई बार यह तथ्य उजागर किया कि पाकिस्तानी सेना और आईएसआई आतंकवादियों को संरक्षण और बढ़ावा दे रही है, लेकिन अमेरिका ने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया। वह इस बात पर गौर करने के लिए भी तैयार नहीं है कि आतंकवाद को रोकने के लिए पाकिस्तान को वित्तीय और सैन्य सहायता उपलब्ध कराए जाने के बावजूद तालिबान की ताकत में बढ़ोतरी हुई है। अमेरिका चाहता है कि अल कायदा के खिलाफ अभियान में उन्हें पाकिस्तान का सहयोग मिलता रहे, लेकिन उनका ध्यान इस बात पर नहीं है कि तालिबान अब लश्करे तैयबा जैसे संगठनों के जरिए दहशतगर्दी फैला रहे हैं। पाकिस्तान को उसके हुक्मरानों की दोहरी नीति की कीमत चुकानी पड़ रही है। इसी दोहरे रवैये ने आज ऐसी हालत पैदा कर दी है कि पाकिस्तान की सत्ता आतंकवादियों के सामने इस कदर असहाय नजर आती है। इस तेजी से फैल रही आग पर काबू पाने के लिए वहां के राजनीतिक नेतृत्व को अपनी दुविधा से उबरना होगा। वे भारत को नुकसान पहुंचाने के पागलपन में खुद को ही तबाह कर रहा है। निश्चित रूप से अमेरिका को भी अपना वह चश्मा बदलना होगा, जिससे उसे आतंकवाद सिर्फ दुनिया के उसी हिस्से में नजर आता है, जहां उसके सैनिक घिरे होते हैं। भारतीय नेतृत्व को विश्व समुदाय को सीधा संदेश देना चाहिए कि वह आखिर कब तक पाकिस्तान को माफ करता रहेगा? हमें यह साबित करना होगा कि पाकिस्तान का मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान आतंकवाद का समर्थक और संरक्षक हैं। पाकिस्तान की घेरेबंदी करने में युद्ध के अतिरिक्त अन्य सभी उपाय किए जाने चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-5525568690049621117?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/5525568690049621117/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5525568690049621117'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5525568690049621117'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_23.html' title='पाकिस्तान का पागलपन'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1r1oBUA8yI/AAAAAAAAAC0/S3TUJ3iMeEE/s72-c/051114_pakistan_blast_hmed9phmedium.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6551947127726694223</id><published>2010-01-22T17:31:00.002+05:30</published><updated>2010-01-22T17:36:34.767+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पार्क'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मायावती'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंबेडकर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मूर्ति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उत्तर प्रदेश'/><title type='text'>माया मेमसाब अब तो शर्म करो...</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1mUikrnmPI/AAAAAAAAACs/JLkroLEMUlo/s1600-h/mayawati.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429534147454933234" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 103px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1mUikrnmPI/AAAAAAAAACs/JLkroLEMUlo/s200/mayawati.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;स्मारकों, मूर्तियों और पार्र्कों के निर्माण में करोड़ों रुपये फूंकने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार का इनकी चौकीदारी के लिए 'स्टेट स्पेशल जोन सिक्युरिटी फोर्स' के गठन की कवायद यह साबित करने के लिए काफी है कि जनता के पैसे को कैसे बर्बाद किया जाता है। वैसे तो केंद्र से लेकर राज्यों तक कमोबेश सबकी यही कहानी है, लेकिन उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री इसमें निश्चित रूप से अव्वल हैं। वे पूरे राज्य को मूर्तियों, स्मारकों और पार्र्कों से पाटकर न जाने किसका भला करना चाहती हैं? आज यदि राज्य में सड़क-बिजली-पानी सरीखी आधारभूत सुविधाएं नहीं हैं, मजदूर-किसान बदहाल हैं, बेरोजगार युवकों को नौकरी नहीं है और उद्योग नहीं पनप रहे हैं, तो इसके लिए सूबे की मुखिया मायावती का मूर्ति प्रेम भी कम जिम्मेदार नहीं है। मायावती एक साथ दो मोर्र्चों पर गलती कर रही हैं। एक तो वे सरकारी खजाने को मूर्ति, पार्क और स्मारकों जैसे अनार्थिक क्षेत्रों पर खर्च कर रही हैं और दूसरे आर्थिक बदलाव के किसी बड़ी योजना को लागू नहीं कर रही हैं। उत्तर प्रदेश जैसे खस्ताहाल राज्य के मुखिया का यह रवैया किसी जुर्म से कम नहीं माना जाना चाहिए। वर्तमान में उत्तर प्रदेश का सारा राजस्व सरकारी खर्च में चला जाता है, उस पर कर्ज का भारी बोझ है और मानवीय या आर्थिक हर पैमाने पर वह देश के सबसे गए-बीते राज्यों में गिना जाता है। यदि सरकार इसी ढर्रे पर चलती रही, तो राजनीतिक रूप से देश के सर्वाधिक महत्वपूर्ण राज्य को दिवालिया होने से कोई नहीं बचा सकता। जाहिर तौर पर राजनेताओं का कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि बदहाली भी उसका एक हथियार है, लेकिन उत्तर प्रदेश के लोगों को जो झेलना पड़ेगा, वह सियासत कतई नहीं होगी, वह मानवीय त्रासदी होगी।&lt;br /&gt;यह तो समझ में आता है कि दलित हितों की पैरवी करने वाली मायावती अंबेडकर, महात्मा फुले या काशीराम आदि की मूर्तियां लगवाएं, लेकिन वे तो खुद की बुत भी लगवा रही हैं। इसमें संदेह नहीं कि मायावती आज देश के एक बड़े राज्य की मुख्यमंत्री हैं और दलित क्षमता व दलित उपलब्धि का एक प्रतीक हैं, लेकिन ये और ऐसे कारण उनकी आत्म-मुग्धता का औचित्य सिद्ध नहीं करते। यह सही है कि सवर्र्णों की तुलना में दलित महापुरुषों को देश में सम्मान नहीं मिला है, लेकिन यह मूर्तियों की संख्या से निर्धारित नहीं होगा। वह चाहे दलित हों, अल्पसंख्यक हों या फिर और कोई वंचित तबका, उनका भला करना है तो उन्हें प्रतीकात्मक रूप से शक्तिशाली दिखाने से कुछ नहीं होगा, उन्हें असल में वे सुविधाएं और संसाधन मुहैया कराने होंगे जिनसे वे बराबरी हासिल कर सकें। देश बदल रहा है, तो इसकी सबसे ज्यादा रोशनी उत्तर प्रदेश पर पडऩी चाहिए, लेकिन उजाला तब होगा जब उत्तर प्रदेश अपने पैरों पर खड़ा होगा। इतने बड़े राज्य का पिछड़ा रहना पूरे देश की तरक्की पर लगाम लगाता है। मायावती अक्सर केंद्र से मदद की गुहार करती हैं, लेकिन पहले वे खुद अपने खजाने का सही इस्तेमाल करना तो सीखें। वे जितना ध्यान सोशल इंजीनियरिंग के सहारे देश के बाकी हिस्सों में पैठ जमाने में लगाती हैं, यदि उसका थोड़ा भी उत्तर प्रदेश की तरक्की के लिए लगा दें, तो उत्तर प्रदेश की जनता उन्हें बिना मूर्ति के ही पूजने को तैयार हो जाएगी। इसका मंत्र सीखने के लिए उन्हें दूर जाने की जरूरत नहीं है। उनके पड़ोस में ही नीतिश कुमार बिहार का कायाकल्प करने में लगे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6551947127726694223?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6551947127726694223/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6551947127726694223'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6551947127726694223'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_22.html' title='माया मेमसाब अब तो शर्म करो...'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1mUikrnmPI/AAAAAAAAACs/JLkroLEMUlo/s72-c/mayawati.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-8857371065684152515</id><published>2010-01-21T18:35:00.002+05:30</published><updated>2010-01-21T18:44:49.861+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाल ठाकरे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='क्षेत्रवाद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='महाराष्ट्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज ठाकरे'/><title type='text'>इन नेताओं की टैक्सी पंचर करो</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1hTL36PaFI/AAAAAAAAACk/pFHF_P3lIec/s1600-h/2009092451851701.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5429180814247028818" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 138px" alt="" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1hTL36PaFI/AAAAAAAAACk/pFHF_P3lIec/s200/2009092451851701.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;यह विडंबना ही है कि महाराष्ट्र राजनीतिक दलों के लिए क्षेत्रवाद की प्रयोगशाला बनता जा रहा है और बाल ठाकरे व राज ठाकरे के पदचिह्नों पर चलते हुए सत्ताधारी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन भी इसका सहारा लेकर अपने राजनीतिक हित साधना चाहता है। स्थानीय निकाय चुनावों में बढ़त हासिल करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने यह निर्णय किया है कि टैक्सी का लाइसेंस अब उन्हीं को दिया जाएगा जिन्हें मराठी अच्छी तरह से आती है और राज्य में कम से कम 15 साल से रह रहे हों। सरकार यह तालिबानी फरमान जारी कर किसका भला करना चाहती है? चुनाव नजदीक आते ही उसे 'मराठी माणुस' की याद क्यों आई है? यदि पूरा देश महाराष्ट्र की तर्ज पर चले तो आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल में बंगाली, केरल में मलयाली, आंध्र प्रदेश में तेलगू, तमिलनाडु में तमिल और असम में असमिया ही रहेंगे? क्या यह देश के संघीय ढांचे को सीधे-सीधे चुनौती नहीं है? सत्ता के लिए देश का यह बंटवारा राजनीति की दुकान खोलकर बैठे जो लोग कर रहे हैं क्या उन्हें पता है कि अगर देश ही नहीं रहेगा तो वे खुद कैसे बचेंगे? राष्ट्रीय दलों का देश के पैमाने पर क्षेत्रीय दलों के सामने कमजोर पडऩा और बदले में की जा रही ओछी राजनीति ने देश को ऐसे चौराहे पर ला खड़ा किया हैं जहां राष्ट्रीय कानून के होते हुए भी राष्ट्रीयता की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। इसके लिए मौजूदा दौर की राजनीति के वे दलाल दोषी हैं, जिन्होंने कभी यह सोचा ही नहीं कि हिंदुस्तान की एकता को चुनौती देने के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाने चाहिए जिससे ऐसे तत्व कभी सिर ही नहीं उठा सकें। महाराष्ट्र क्षेत्रीयता की आग में कुछ ज्यादा ही झुलस रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से वर्तमान में पूरे देश में कमोबेश यही हालात हैं। पश्चिम बंगाल में कभी मारवाडिय़ों पर टिप्पणी की जाती है, तो असम से बंगालियों को खदेड़ा जाता है। बंगाल में हिंदी माध्यम से पढ़ रहे छात्रों को हिंदी में प्रश्नपत्र सिर्फ इसलिए नहीं दिए जाते हैं कि इससे बंगाली मानसिकता को सरकार भुनाती है। सुनील गंगोपाध्याय जैसे बांग्ला के प्रख्यात विद्वान-साहित्यकार हिंदी भाषियों को सरेआम खदेडऩे की बात करते हैं। दक्षिण में हिंदी व हिंदी भाषियों का विरोध जगजाहिर है। पंजाब और असम में सरेआम हिंदी भाषी मजदूरों को वहां के जातीय संगठन मार डालते हैं। लोग भागने और दरबदर होने को मजबूर होते रहते हैं, मगर इसे रोकने की जगह बड़े या क्षेत्रीय दल सिर्फ राजनीतिक लाभ उठाने की संभावनाएं तलाशते नजर आते हैं। क्या मानकर चला जाए कि एकछत्र भारत की अब किसी दल को जरूरत नहीं? शायद ऐसा ही लगता है। सभी राजनीतिक अवसरवादिता की रोटी सेक रहे हैं। आखिर हो क्यों नहीं? यही क्षेत्रीय क्षत्रप ही तो केंद्र में सरकारें चलवा रहे हैं और सत्ता के भागीदार हैं। मलेशिया जैसा छोटा देश भी आज भारत के सामने बड़ी आर्थिक ताकत इसलिए है, क्योंकि वहां किसी को राष्ट्रीय अस्मिता के साथ खिलवाड़ की छूट नहीं है। वहां ऐसे कानून हैं जो किसी को भी राष्ट्रविरोधी होने से पहले सौ बार सोचने पर मजबूर कर देते हैं। क्या भारत को ऐसे कानून पर विचार नहीं करना चाहिए। आखिर यहां भी तो ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि क्षेत्र, भाषा, धर्म और जाति के नाम पर चलाए जाने वाले राजनीतिक अभियान देश की अखंडता को सीधी चुनौती पेश करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-8857371065684152515?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/8857371065684152515/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_21.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8857371065684152515'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8857371065684152515'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_21.html' title='इन नेताओं की टैक्सी पंचर करो'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1hTL36PaFI/AAAAAAAAACk/pFHF_P3lIec/s72-c/2009092451851701.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-7809400789921499049</id><published>2010-01-20T13:00:00.001+05:30</published><updated>2010-01-20T13:04:25.012+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अभिनव बिंद्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ओलंपिक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राष्ट्रमंडल खेल'/><title type='text'>खेलों से खिलबाड़ कब बंद होगा?</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1ax1adaZNI/AAAAAAAAACc/USMCiXFaYTo/s1600-h/abhinavbindra.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5428721932035581138" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 176px; CURSOR: hand; HEIGHT: 200px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1ax1adaZNI/AAAAAAAAACc/USMCiXFaYTo/s200/abhinavbindra.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;br /&gt;बीजिंग ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रचने वाले निशानेबाज अभिनव बिंद्रा को विश्वकप व राष्ट्रमंडल खेलों की टीम से बाहर किया जाना घोर निंदनीय है। भारतीय राष्ट्रीय रायफल संघ (एनआरएआई) से यह पूछा जाना चाहिए कि उसने क्या सोचकर यह बेतुका फरमान जारी किया है? महज इस आधार पर बिंद्रा को टीम से बाहर नहीं किया जा सकता कि उन्होंने एनआरएआई के 'ट्रायल' में हिस्सा नहीं लिया। जिस खिलाड़ी ने ओलंपिक में दुनिया के धुरंधर निशानेबाजों को पछाड़ते हुए स्वर्ण पदक जीता हो, उसकी योग्यता पर सवाल नहीं उठाए जा सकते। रही बात नियमों की तो एनआरएआई किस मुंह से इनकी बात कर रही है? इसकी कार्यप्रणाली पर आए दिन अंगुलियां उठती रहती हैं। न्यायालय भी इस पर टिप्पणी कर चुका है। एनआरएआई ने खेल के विकास पर ध्यान दिया होता तो बिंद्रा को प्रशिक्षण के लिए जर्मनी जाने की जरूरत नहीं पड़ती। बिंद्रा के साथ हुए बर्ताव के लिए खेल मंत्रालय भी कम दोषी नहीं है। दरअसल, एनआरएआई भारतीय ओलंपिक संघ की प्राथमिकता सूची में आता है और सरकार उसकी प्रतियोगिताओं से लेकर विदेशी दौरों तक का पूरा खर्च उठाती है। खेल मंत्रालय की ओर से ऐसे सभी खेल संघों को आदेश दे रखा है कि टीमें ट्रायल से चुनी जाएं। ऐसे में एनआरएआई ने खुद को खेल मंत्रालय का वफादार साबित करने के लिए ट्रायल पर नहीं आए बिंद्रा को टीम से बाहर कर दिया। उसने यह भी नहीं सोचा कि यह वही अभिनव है, जिसने ओलंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धा में भारत के स्वर्ण पदक जीतने के इंतजार को खत्म कर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया।&lt;br /&gt;इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि विश्वकप और राष्ट्रमंडल खेलों सरीखी महत्वपूर्ण स्पर्धाओं में देश का शीर्ष निशानेबाज हिस्सा नहीं ले पाएगा? अगर बिंद्रा इनमें हिस्सा लेते तो निश्चित ही भारतीय टीम के पदकों की संख्या में इजाफा होता और कई नौजवान उन जैसा बनने की प्रेरणा लेते, लेकिन जिस देश में खेल संघ राजनीति का अखाड़ा हो और सरकार के पास कोई स्पष्ट खेल नीति नहीं, वहां ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। खेल मंत्रालय की अस्पष्ट नीति के कारण ही खिलाडिय़ों और खेल संघों के बीच मतभेद पैदा होते हैं, जिसका नुकसान खेल प्रतिभाओं को झेलना पड़ता है। नतीजतन एक अरब की आबादी का देश अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में एक अदद पदक और जीत के लिए तरसता रहता है। बिंद्रा मामले के बहाने देश की खेल नीति की बेशुमार कमजोर कडिय़ां एक बार फिर सामने आ गई हैं। खेल मंत्रालय कहता है कि बिना ट्रायल खिलाडिय़ों को टीम में न रखा जाए और बाद में उसके अधिकारी कहते हैं कि अगर संघ चाहे तो ऐसे खिलाडिय़ों को बिना ट्रायल के चुन सकते हैं, जबकि सबसे बड़ा पेच यही है। दुर्भाग्य से देश में खेल के साथ खिलवाड़ करने और खिलाडिय़ों के भविष्य को बर्बाद करने वाली ऐसी घटनाओं की फेहरिस्त दिनोंदिन लंबी होती जा रही है। यदि सरकार ने अपनी खेल नीति और खेल संघों ने अपने कामकाज के तरीके को नहीं सुधारा तो स्थिति और भयावह होगी। जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में प्रतिस्पर्धा कड़ी होती जा रही है, तब यदि हमें कहीं ध्यान देने की जरूरत है तो वह है सुविधाओं का विकास और खिलाडिय़ों को प्रोत्साहन, ताकि वे मैदान पर भी भारत की बुलंदी के झंडे गाड़ सकें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-7809400789921499049?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/7809400789921499049/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_20.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7809400789921499049'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7809400789921499049'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_20.html' title='खेलों से खिलबाड़ कब बंद होगा?'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1ax1adaZNI/AAAAAAAAACc/USMCiXFaYTo/s72-c/abhinavbindra.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-7375167560314735419</id><published>2010-01-16T16:23:00.002+05:30</published><updated>2010-01-16T16:32:57.258+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जम्मू-कश्मीर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुरक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सरहद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घुसपैठ'/><title type='text'>अब तो सरहद को संभाल लो</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GcgrcGrSI/AAAAAAAAACU/glgEfQw9TlI/s1600-h/02.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5427291111188507938" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 200px; CURSOR: hand; HEIGHT: 142px" alt="" src="http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GcgrcGrSI/AAAAAAAAACU/glgEfQw9TlI/s200/02.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;रक्षा मंत्री ए.के. एंटनी के बाद थलसेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर का यह कहना कि सरहद पार से बड़ी संख्या में आतंकी घुसपैठ की तैयारी में हैं, देश की सुरक्षा के सम्मुख गंभीर खतरा है, भले ही यह दावा किया जाए कि हम इनसे निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं। सुरक्षाबलों के तमाम दावों के बावजूद न केवल घुसपैठ बदस्तूर जारी है, बल्कि दिनोंदिन इसमें इजाफा भी हो रहा है। आखिर कड़े इंतजामों के बाद भी यह सिलसिला खत्म क्यों नहीं होता? अमूमन हर साल जिस तरह से सर्दियों में घुसपैठ बढ़ती है, उससे तो यही लगता है कि हाड कंपा देने वाली ठंड में भारतीय सीमा रक्षकों की मुस्तैदी भी ठंडी पड़ जाती है। मुमकिन है ऐसा न हो, लेकिन इसमें कोई दोराय नहीं है कि सरहद और खासकर जम्मू-कश्मीर में सैनिकों की तादाद कम करने की कवायद घुसपैठ बढ़ाती है। रक्षा मंत्री और थलसेना प्रमुख स्वीकार कर चुके हैं कि 2008 में जहां महज 57 आतंकियों ने घुसपैठ की थी, वहीं 2009 में 30 नवबंर तक यह आंकड़ा 110 तक पहुंच चुका है। इस अवधि के दरम्यान ही जम्मू-कश्मीर में सैनिकों की संख्या को लेकर सर्वाधिक हो-हल्ला हुआ था। तो क्या यह माना जाए कि सैनिकों की संख्या में कटौती से आतंकियों के लिए घुसपैठ का माहौल बना? राज्य में आतंकी हिंसा का स्तर घटाने में पुलिस सक्षम हुई होगी, लेकिन क्या महज इस आधार पर ही सीमा क्षेत्र में निगरानी कम कर दी जाए? सब चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के इस सर्वाधिक संवेदनशील राज्य के एक ओर पाकिस्तान और दूसरी ओर चीन गिद्ध दृष्टि गड़ाए बैठा है। खासकर पाकिस्तान यह कभी नहीं चाहेगा कि जम्मू-कश्मीर में जिंदगी पटरी पर लौटे। यदि सूबे के तेजी से सुधरते हालात देखकर पाकिस्तान में रहकर नेटवर्क संचालित कर रहे आतंकी संगठनों की बेचैनी बढ़ रही है, तो इस पर किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। उनसे और कोई उम्मीद भी नहीं की जा सकती, लेकिन मानवाधिकारों की दुहाई देकर सीमाओं की चौकसी कम कर देना उनका स्वागत करने जैसा है। जम्मू-कश्मीर की आवाम और उनके निजाम उमर अब्दुल्ला को यह समझना होगा कि सेना रात के अंधेरे में अपनी कार्रवाई इस बात की तस्दीक करते हुए नहीं कर सकती कि कौन घुसपैठिया है और कौन बेगुनाह। सेना की विवशता को भी समझना जरूरी है। उसकी नागरिकों से कोई दुश्मनी नहीं है। वह वहां आतंक के खात्मे के लिए तैनात है न कि आम आदमी की दुश्वारियां बढ़ाने के लिए। सैनिकों की संख्या में कटौती करने से पहले इस पहलू पर विचार कर लेना जरूरी है कि आतंकी इसका कोई फायदा तो नहीं उठाएंगे। पाकिस्तान से सटी सीमा पर ही पूरा ध्यान केंद्रित करना बड़ी भूल हो सकता है, क्योंकि चीन की चालें भी कम खतरनाक नहीं हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि भारतीय भूमि पर उसकी टेडी नजर है। चीनी हुक्मरानों ने कभी नहीं चाहा कि भारत में अमन-चैन रहे और वह तरक्की की राह पर चले। पाकिस्तान के साथ उसका गठजोड़ इसी का नतीजा है। दोनों ओर खतरा जिस तेजी से बढ़ रहा है, उससे निपटने के लिए न केवल सुरक्षाबलों की संख्या बढ़ाना जरूरी है, बल्कि उन्हें अत्याधुनिक संसाधन उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। शातिर आतंकियों को परंपरागत संसाधन बोने साबित हो रहे हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-7375167560314735419?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/7375167560314735419/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_1248.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7375167560314735419'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7375167560314735419'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_1248.html' title='अब तो सरहद को संभाल लो'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GcgrcGrSI/AAAAAAAAACU/glgEfQw9TlI/s72-c/02.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-6212561915888743641</id><published>2010-01-16T16:07:00.003+05:30</published><updated>2010-01-16T16:19:47.285+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हमले'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सुरक्षा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='ऑस्ट्रेलिया'/><title type='text'>फिर वही सुरक्षा का आवश्वासन</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GZdzgnI9I/AAAAAAAAACM/CNuDOK0UUTY/s1600-h/001.jpg"&gt;&lt;img id="BLOGGER_PHOTO_ID_5427287763280405458" style="FLOAT: left; MARGIN: 0px 10px 10px 0px; WIDTH: 320px; CURSOR: hand; HEIGHT: 320px" alt="" src="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GZdzgnI9I/AAAAAAAAACM/CNuDOK0UUTY/s320/001.jpg" border="0" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;ऑस्ट्रेलियाई सरकार का यह ताजा भरोसा कि भारतीयों के लिए ऑस्ट्रेलिया सुरिक्षत स्थान है, तब तक महज एक कोरा बयान माना जाएगा, जब तक भारतीय नागरिकों पर हो रहे हमले पूरी तरह से थम न जाएं। वहां की सरकार इस तरह के आश्वासन पहले भी दे चुकी है, लेकिन इसके बावजूद भी भारतीय लगातार निशाना बन रहे हैं। सरकार की ओर से अब तक भारतवासियों की सुरक्षा के लिए न तो कोई विशेष प्रबंध किए गए हैं और न ही ऐसा कुछ करने के संकेत दिए हैं। उल्टे कुछ दिन पहले दो नौजवानों का कत्ल होने पर सरकार की ओर से यह बयान आया कि हत्या होना कोई नई बात नहीं है, ऐसा दिल्ली और मुंबई में भी होता है। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार को भारतीयों की पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन देना पड़ा। दरअसल, भारतीय छात्र ऑस्ट्रेलिया के शिक्षा उद्योग की रीढ़ हैं और हमलों के बाद इनकी संख्या में भारी कमी आ रही है। वहां की सरकार को भारतीयों की सुरक्षा से ज्यादा इस बात की चिंता है कि कहीं देश के शिक्षा उद्योग को करोड़ों डॉलर का चूना न लग जाए। यही वजह है कि अपने तल्ख बयानों के लिए जानी जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई उप प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड का सुर बदला हुआ है और वे यहां तक कह रही हैं, 'मैं इस बात को समझ सकती हूं कि अगर भारत में आपका परिवार है और आप अपने किसी छोटे सदस्य को दूसरे देश में भेज रहे हैं, तो आप इस बात को लेकर सबसे अधिक चिंतित होंगे कि वह वहां कितना सुरक्षित है।' क्या उनके इतने कहने भर से ही भारतीयों पर हो रहे हमले रुक जाएंगे? ऑस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हमले की कोई एकाध घटना नहीं हुई है। पिछले एक साल में भारतीय छात्रों पर 100 से ज्यादा हमले हुए हैं। पिछले दिनों हमलावरों से दो छात्रों को तो जान से ही मार डाला। इस दौरान वहां की पुलिस एकाध मौकों पर सक्रिय दिखी और कुछ हमलावरों को पकड़ा भी गया, लेकिन ऑस्ट्रलियाई सरकार यह सफाई देने में ही उलझी रही कि ये नस्लवादी हमले नहीं हैं, ये अपराध की सामान्य घटनाएं हैं, जिनमें अपराधियों ने नाइट शिफ्ट में काम करने वाले और अपने महंगे आईपॉड, मोबाइल फोन और लैपटॉप का प्रदर्शन करने वाले भारतीय छात्रों को अपना निशाना बनाया है। यह जवाबदेही से मुंह चुराने जैसा है। जिस तरह ऑस्ट्रेलियाई के शिक्षण संस्थान भारत में कैंप लगाकर शिक्षा और रोजगार के सुहाने सपने दिखाकर भारतीय छात्रों को अपने यहां बुलाते हैं, उसी तरह यह जिम्मेदारी वहां की सरकार की है कि वह उनकी सुरक्षा का भी ख्याल रखे। ऐसा करना उसके हित में भी है। इस समय ऑस्टे्रलिया में लगभग एक लाख भारतीय छात्र हैं। इनकी फीस के रूप में वहां के शिक्षण संस्थानों को हर साल सीधे-सीधे करीब दो अरब डॉलर प्राप्त होते हैं। यह रकम उनके लिए संजीवनी से कम नहीं है, क्योंकि वैश्विक मंदी के कारण भारी वित्तीय दबावों से गुजर रही सरकार ने उन्हें दिए जाने वाले अनुदान में भारी कटौती की हुई है। ऑस्ट्रेलियाई सरकार यह तो चाहती है कि विदेशी छात्रों की आमद न रुके, लेकिन उनकी सुरक्षा का सवाल उठने पर वह इसका दोष छात्रों पर ही मढ़ देती है। यदि यही रवैया जारी रहा तो ऑस्टे्रलिया के शिक्षा उद्योग का ठप होना तय है। वहां के नीति-नियंताओं को चाहिए कि वे कोरे आश्वासन देना छोड़, दूर देश से पढऩे आने वाले छात्रों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करें।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-6212561915888743641?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/6212561915888743641/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_16.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6212561915888743641'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/6212561915888743641'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post_16.html' title='फिर वही सुरक्षा का आवश्वासन'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/S1GZdzgnI9I/AAAAAAAAACM/CNuDOK0UUTY/s72-c/001.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-7230726825543675128</id><published>2010-01-02T11:25:00.000+05:30</published><updated>2010-01-02T11:27:51.159+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संकल्प'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नया साल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उम्मीद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उमंग'/><title type='text'>आओ संकल्प करें</title><content type='html'>रफ्ता-रफ्ता समय की सीढिय़ों से गुजर गया साल 2009, छोड़ गया अपने पीछे उल्लास के अनगिनत पल। साथ ही दर्द और वेदनाओं की भी लंबी फेहरिस्त। अब हम नए साल 2010 में हैं। परंपरा रही है- बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध लेय, लेकिन बीते साल की कई घटनाओं ने हमें इतना झकझोरा कि उन्हें भुलाकर नए साल में बेहतरी की उम्मीद करना बेमानी है। ऐसे में यह हम सबकी जिम्मेदारी है कि पुरानी चूकों से सबक लेते हुए आगे बढऩे का ताना-बाना बुनें। जरूरत केवल संकल्प लेने की ही नहीं, बल्कि उन पर अमल करने की भी है। वो भी बिना वक्त गंवाए, आज ही से, या यूं कहें अभी से। इन दिनों पूरा देश रुचिका मामले पर उद्वेलित है, इसलिए पहला संकल्प न्यायपालिका से जुड़ा हुआ- न्याय में देरी न हो और कानून सबको एक ही चश्मे से देखे। यह फख्र की बात है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन जिन्हें इसे सींचने का जिम्मा दिया हुआ है वे ही उजाडऩे में लगे हैं। पिछले कुछ दिनों में ही राजनेताओं ने अपने व्यवहार से कई बार शर्मसार किया, लिहाजा दूसरा संकल्प राजनीति को सही राह पर लाने के लिए- नेता सत्ता के मोह में राष्ट्रहित को तिलांजलि न दें। देश की बात चली तो सुरक्षा का मसला भी चिंताजनक है। पाकिस्तान और चीन से तो खतरा था ही तेजी से पैर पसारते नक्सलवाद ने समस्या को और बढ़ा दिया है। इसलिए तीसरा संकल्प सुरक्षा के मोर्चे पर- चौकसी इतनी चाकचौबंद हो कि परिंदा भी पर न मार पाए। सीमाओं पर ही नहीं देश के भीतर भी सुरक्षा व्यवस्था में सुधार की बहुत गुंजाइश है।&lt;br /&gt;आम लोगों को हमेशा शिकायत रहती है कि प्रशासन रसूखदारों की अर्दली करता है, उसकी आवाज तो नक्कारखाने में तूती ही साबित होती है। जनता की इस पीड़ा को दूर करने का चौथा संकल्प लेना होगा- प्रशासन मुस्तैदी से रखे आम आदमी का ख्याल। बीते साल मीडिया भी खूब सवालों के घेरे में रहा। खबरों के स्तर पर हुई बहस को चुनाव के दौरान 'पेड न्यूज' के मुद्दे ने और तीखा कर दिया। पांचवां संकल्प मीडिया के लिए ही कि जिस तेजी से वह अपनी पहुंच बढ़ा रहा है, विश्वास की 'टीआरपी' भी उसी रफ्तार से बढ़े। 2009 में आम आदमी महंगाई से सबसे ज्यादा त्रस्त रहा। सरकार उपाय करने की बजाय मुद्रास्फीति के आंकड़ों में ही उलझी रही। यह स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि हमारी तरक्की की पूरी तस्वीर ही आंकड़ों में उलझी हुई है। छठा संकल्प अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में लेने की जरूरत है कि विकास आंकड़ों में ही न उलझा रहे, आमजन तक भी पहुंचे। भारतीय क्रिकेट टीम ने पिछले साल खूब धूम मचाई। टेस्ट क्रिकेट में बादशाहत कायम की। सातवां संकल्प खेल की दुनिया में कि ऐसी कामयाबी अन्य खेलों में भी मिले। मनोरंजन की दुनिया में देश ने पिछले साल खूब यश कमाया। बॉलीवुड की गूंज विदेश तक सुनाई दी। 2010 में इस स्वर को और ऊंचा करने के लिए आठवां संकल्प- हर विधा में सशक्त हो परदे की फंतासी। खुशी के हजार लम्हों के बीच स्वाइन फ्लू कहर बनकर आया। नवां संकल्प स्वास्थ्य के मोर्चे पर कि परंपरागत ढांचा तो सुधरे और कोई मर्ज देशवासियों पर भारी न पड़े। अंतिम दसवां और सर्वाधिक महत्वपूर्ण संकल्प यह कि बाकी नौ संकल्पों पर ईमानदारी से अमल हो। यदि हम ऐसा कर पाए तो देश का हर शख्स तो खुशहाल होगा ही भारत भी महाशक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हो जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-7230726825543675128?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/7230726825543675128/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7230726825543675128'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/7230726825543675128'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='आओ संकल्प करें'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-5825132134875694632</id><published>2009-12-14T21:30:00.003+05:30</published><updated>2009-12-14T21:54:56.927+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सांसद'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राज्‍यसभा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनीति'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सियासत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकसभा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अवधेश आकोदिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजनेता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संसद'/><title type='text'>अब तो शर्म करो चिकने घड़ों</title><content type='html'>&lt;span class=""&gt;संसद&lt;/span&gt; पर हमले की आठवीं बरसी की श्रद्धांजलि सभा में मात्र ग्यारह सांसदों की उपस्थिति अपने फर्ज से उदासीन होते राजनेताओं की एक और शर्मनाक दास्तां है। यह संसद और सदस्यों की रक्षार्थ अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले जांबाजों की शहादत का तो अपमान है ही, लोकतंत्र के लिए भी शुभ संकेत नहीं हैं। हालांकि माननीय सांसदों के लिए श्रद्धांजलि सभा में जाना अनिवार्य नहीं था, लेकिन वे जाते तो देश की हिफाजत करने वाले जवानों का हौसला बढ़ता और यह संदेश भी जाता कि आतंक के खिलाफ युद्ध में देश की संसद पूरी तरह से एकजुट है। पिछले कुछ दिनों में ही राजनेताओं के व्यवहार की बानगी पूरे देश ने देखी। सदस्यों की अनुपस्थिति के चलते लोक सभा में प्रश्नकाल स्थगित करना पड़ा, राज्यसभा में जब लगातार छह सांसद प्रश्नकाल में गैरहाजिर रहे, तो सभापति को कहना पड़ा कि लोक सभा का वायरस राज्यसभा में भी आ गया है और पंजाब विधानसभा में तो सदस्यों ने सदन को अखाड़ा ही बना दिया और आपस में ही पिल पड़े। अलबत्‍ता नेताओं ने लोक तंत्र को कलंकित करने वाली इनसे भी बड़ी ढेरों कारगुजारियां की हैं, लेकिन इन दिनों न केवल इनकी संख्‍या में इजाफा हुआ है, बल्कि इस मर्ज की गिरफ्त में आने वाले जनप्रतिनिधियों की संख्‍या में भी खासा इजाफा हुआ है। इस तरह के नेता अब कम ही बचे हैं, जिनके आचरण को मिसाल के तौर पर पेश कि या जा सके । ऐसा करके नेता जनता के धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं। आखिर जनता ऐसे नुमाइंदों को कब तक बर्दाश्त करेगी, जो अपने कर्तव्यों को निभाने की बजाय लोकतंत्र की मर्यादाओं को तार-तार कर रहे हैं।&lt;br /&gt;सवाल यह है कि जनप्रतिनिधि अपनी जिस्मेदारियों से मुंह क्‍यों चुरा रहे हैं? वे न तो सदन में नजर आते हैं, न ही सामाजिक ढांचे को सुदृढ़ करने वाले कार्यक्रमों की शोभा बढ़ाते हैं। यह देश की राजनीति के बदलते चेहरे और चरित्र की विसंगतियां हैं। सत्‍तर के दशक तक यह माना जाता था कि राजनीति सेवा का एक माध्यम है और राजनेता जनसेवक । चुनाव जीतने का एक ही नुस्खा था - जनता के बीच रहो और काम करो, लेकिन अब राजनीति, चुनाव और नेता तीनों के मायने बदल गए हैं। आम राजनेता का न तो उद्देश्य जनसेवा रह गया है और न ही उसके चरित्र में इतना बल बचा है कि वह काम और जनसंपर्क के दम पर चुनाव जीत लें। राजनीति में टिके रहने के लिए वे अपने कार्यों की बजाय हथकंडों पर निर्भर रहते हैं। ये हथकंडे तरह-तरह से मतदाताओं को लुभाने से लेकर शक्ति प्रदर्शन, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाडऩे और अंतत: बूथों पर कब्‍जे तक जाते हैं। हैरत इस बात पर होती है कि राजनेताओं का लोकतंत्र के विरुद्ध अमर्यादित आचरण रोकने के लिए मीडिया, आयोग या न्यायपालिका जितने उपाय निकालते हैं, राजनेता अमर्यादित आचरण करने के उससे ज्यादा तरीके निकाल लेते हैं। इस सांप-सीढ़ी के खेल से देश कब तक बच पाएगा? जब नेताओं के आचरण पर हो-हल्ला मचता है, तो वे ऐसा बहाना बनाते हैं कि उनकी बुद्धिमता पर हंसी आती है। जाहिर है, यह सच से मुंह मोडऩे का एक उपाय भर है। इससे उबरना तभी संभव है जब राजनेता खुद अपनी नैतिक जिस्मेदारी महसूस करें। आचरण और चरित्र की पवित्रता में वे रुचि लें और इसके लिए संकल्पबद्ध हों। अनुशासित होना इसकी पहली शर्त है। क्‍या देश के नेताओं से आम जनता को ऐसी उम्‍मीद करनी चाहिए?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-5825132134875694632?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/5825132134875694632/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post.html#comment-form' title='2 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5825132134875694632'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/5825132134875694632'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='अब तो शर्म करो चिकने घड़ों'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-2094738698587024981</id><published>2009-12-05T18:30:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:32:15.125+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उल्फा'/><title type='text'>फिर न हो पुरानी चूक</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUExEaV3II/AAAAAAAAAEc/9Y9rkHyJ0eQ/s1600/ulfa3.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUExEaV3II/AAAAAAAAAEc/9Y9rkHyJ0eQ/s200/ulfa3.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477789762810403970" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन उल्फा से बातचीत में केंद्र की ओर से बरती जा रही सावधानी पूरी तरह से जायज है। असम में आतंक के पर्याय रहे इस संगठन पर भरोसा करना खतरे से खाली नहीं है। सरकार 1992 के अपने कड़वे अनुभवों को दोहराना नहीं चाहती। उस समय बातचीत को जरिया बनाकर उल्फा ने अपने पांच नेताओं को रिहा करवा लिया था। अनूप चेतिया के नेतृत्व में वार्ता के लिए जेल से रिहा किए गए ये पांचों नेता तब बांग्लादेश भाग गए थे और आतंकी गतिविधियों को फिर से शुरू कर दिया था। अच्छी बात है कि सरकार ने अपनी पिछली गलती से सबक लिया है, लेकिन असम में शांति स्थापित करने के लिए इतना ही काफी नहीं है। यह वह समय है जब सरकार की चतुराई उल्फा को जमींदोज कर सकती है। संगठन के कमांडर इन चीफ परेश बरुआ को छोड़कर वर्तमान में इस संगठन के लगभग सभी शीर्ष नेता सुरक्षा एजेंसियों के कब्जे में हैं। उल्फा को खड़ा करने वाले अरविंद राजखोवा भी भारत के सामने हथियार डाल चुके हैं। उनका आत्मसमर्पण यह साबित करने के लिए काफी है कि लगातार कमजोर हो रहा यह संगठन अब समझौते की राह पर है। यह ऐसी स्थिति है जब सरकार अपनी शर्र्तों के आधार पर समझौता करवा सकती है। असम के मुख्यमंत्री के सुझाव पर भी गौर करना जरूरी है। वे चाहते हैं कि उल्फा नेताओं को सुरक्षित रास्ता दे दिया जाए, लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि वे आजाद होने के बाद फिर से उल्फा को मजबूत कर कत्लेआम नहीं मचाएंगे? क्या उल्फा के सरगनाओं को माफी देना उन लोगों के साथ नाइंसाफी नहीं है, जो बरसों से जारी हिंसा का शिकार हुए हैं? &lt;br /&gt;केंद्र सरकार ने इस मसले पर जो रुख अपना रखा है, उसे देखकर तो यह लगता है कि वह इस बार दबाव में कोई समझौता करने को तैयार नहीं है। वार्ता शुरू करने से पहले यह तय कर लेना समझदारी है कि बातचीत किनसे की जानी है और किन मुद्दों पर होनी है। जब तक अरविंद राजखोवा संप्रभुता की मांग को नहीं छोड़ते हैं, बातचीत का कोई अर्थ नहीं है। परेश बरुआ की भूमिका को भी सरकार नजरअंदाज नहीं कर सकती है। वे वर्तमान में सबसे अधिक ताकतवर हैं और अब तक भारत की पकड़ से बाहर हैं। इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि राजखोवा की ओर से किए गए समझौते को वे मानने से इनकार कर दें। ध्यान रहे ऐसा पहले भी हो चुका है। 2005 में उल्फा ने वार्ता के लिए 11 सदस्यीय दल पीपुल्स कंसल्टेटिव ग्रुप (पीसीजी) बनाया था। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस समूह के साथ तीन दौर की बातचीत की थी, लेकिन इसमें उल्फा के किसी बड़े नेता के शामिल नहीं होने से कोई नतीजा नहीं निकला। सरकार को पता होना चाहिए कि उल्फा अब इतना मजबूत नहीं रहा है कि उसकी शर्र्तों के सामने झुका जाए। सरकार को वार्ता के लिए तब ही तैयार होना चाहिए, जब उल्फा हिंसा और संप्रभुता की मांग छोड़ दे। असम में शांति स्थापित करने के लिए उन अपराधियों को माफी नहीं दी जा सकती, जिनके हाथ हजारों बेगुनाहों के खून से रंगे हैं। केंद्र सरकार को इसी रुख पर कायम रहना चाहिए कि आत्मसमर्पण करने वाले उल्फा नेताओं को न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और बातचीत संविधान के दायरे में रहकर ही की जाएगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-2094738698587024981?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/2094738698587024981/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_05.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/2094738698587024981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/2094738698587024981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_05.html' title='फिर न हो पुरानी चूक'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUExEaV3II/AAAAAAAAAEc/9Y9rkHyJ0eQ/s72-c/ulfa3.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-3371554672776469912</id><published>2009-12-04T18:26:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:28:31.999+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अमेरिका'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पाकिस्तान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अफगानिस्तान'/><title type='text'>पुरानी चाल का नया चोला</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUD4b1JVFI/AAAAAAAAAEU/xw4k_5L12FA/s1600/barack_obama.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUD4b1JVFI/AAAAAAAAAEU/xw4k_5L12FA/s200/barack_obama.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477788789844300882" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;अफगानिस्तान-पाकिस्तान मुद्दा अमेरिका के लिए गले की फांस बनता जा रहा है। उसने कभी नहीं सोचा होगा कि इन दोनों मुल्कों में संघर्ष इतना लंबा खिंचेगा। वह यहां पर कार्रवाई रोक भी नहीं सकता, क्योंकि ऐसा करने से उसकी प्रतिष्ठा मिट्टïी में मिल जाएगी। अपनी नाक बचाए रखने के लिए जीतना उसकी मजबूरी है। अमेरिका जीत सुनिश्चित करने के लिए पुराने ढर्रे पर लौट आया है। बराक ओबामा ने ना-नुकुर करते हुए आखिरकार अफगानिस्तान में सैनिक बढ़ाने की इजाजत दे दी है। नई अफ-पाक नीति बनाने में अमेरिकी रणनीतिकारों ने खूब माथापच्ची की है, लेकिन इसकी सफलता पर कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं।  &lt;br /&gt;अफगानिस्तान में तालिबान को मात देने के लिए अमेरिका ने 30 हजार नए सैनिक उतारने का फैसला किया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि इस बार लड़ाई निर्णायक होगी और जीतने पर डेढ़ साल में उनके सैनिक वापस घर लौट आएंगे। यह पहला मौका है, जब अमेरिका ने सैनिकों की तैनाती के साथ, उनकी वापसी के लिए कोई समय सीमा निर्धारित की है। अफगानिस्तान में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती से अमेरिकी सैनिकों की संख्या करीब एक लाख हो जाएगी। एक साल में इस पर 30 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 13 अरब रुपये) का खर्च आएगा। सैनिकों की तैनानी और बढ़ते खर्चे से ज्यादा चिंता अमेरिका को आठ साल से जारी जंग को जीतने की है। अफगानिस्तान में फतह हासिल करना अमेरिका के लिए नाक का सवाल बन गया है। ओबामा भी स्वीकार करते हैं कि अफगानिस्तान दूसरा वियतनाम नहीं है। जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वह इतिहास की गलत व्याख्या कर रहे हैं। अफगानिस्तान छोड़ देना अल-कायदा और तालिबान के हौसले को बुलंद करेगा। इससे अमेरिका और उसके सहयोगियों पर तथा हमलों का जोखिम पैदा हो जाएगा। &lt;br /&gt;ओबामा अफगानिस्तान में सैनिक बढ़ाने के हिमायती नहीं रहे हैं, पर उन्हें मजबूरी में यह फैसला लेना पड़ा। अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी सेना के शीर्ष कमांडर जनरल स्टैनली मैकक्रिस्टल ने चेतावनी दी थी कि तालिबान के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अभियान में यदि अतिरिक्त सैनिक नहीं भेजे गए तो अफगानिस्तान में अमेरिका का यह अभियान संभवत: असफल हो जाएगा। मैकक्रिस्टल ने ओबामा को भेजी गुप्त आकलन रिपोर्ट में कहा था कि अफगानिस्तान में तालिबान के साथ जारी संघर्ष में अमेरिका की असफलता बढ़ रही है और आने वाले समय में आतंकवादी गतिविधियां फिर से तेज हो सकती हैं। ओबामा प्रशासन ने मैकक्रिस्टल के तर्र्कों पर सहमत होते हुए सैनिकों की संख्या तो बढ़ा दी है, लेकिन डेढ़ साल के भीतर फतह हासिल करना उसके लिए आसान नहीं है। अफगानिस्तान में स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। पाकिस्तान में छिपे आतंकियों ने दुबारा मोर्चा संभाल लिया है। फिलहाल उनके निशाने पर नाटो सेना के अड्डे और विदेशी दूतावास हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पिछले एक साल में ही 500 से ज्यादा नाटो सैनिक आत्मघाती हमलों में हताहत हो चुके हैं। अमेरिका द्वारा सैनिकों की संख्या बढ़ाने से ये हमले और बढ़ सकते हैं। ओबामा प्रशासन को अफगान नागरिकों के गुस्से की चिंता भी खाए जा रही है। पिछले दस साल से हिंसा का दंश झेल रही जनता अमेरिका की भूमिका से कतई खुश नहीं है। मैकक्रिस्टल ने अपनी रिपोर्ट में भी इसका खुलासा किया था। इसी का नतीजा है कि अमेरिका ने सैनिक बढ़ाने के फैसले के साथ इस तर्क को जोड़ा है कि वे अफगानी नागरिकों को बेहतर जीवन सुनिश्चित करने की दिशा में काम करेंगे। अमेरिका ने राष्ट्रपति हामिद करजई को भी चेतावनी भरे लहजे में कह दिया है कि वे नतीजे दें या हटने को तैयार रहें।  &lt;br /&gt;अमेरिका पाकिस्तान की स्थिति पर भी खासा परेशान है। ओबामा ने अपने भाषण में जिस तरह से कहा कि पाकिस्तान आतंकियों का सुरक्षित ठिकाना बन गया है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि वह अब नरमी बरतने वाला नहीं है। अमेरिका को यह अहसास होने लगा है कि पाकिस्तान हुक्मरान भलमनसाहत के लायक नहीं हैं। अमेरिका ने आतंकियों के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए ड्रोन हमले बढ़ाने के आदेश तो दे दिए हैं, लेकिन इसका विपरीत असर भी पड़ सकता है। आतंकी पलटवार करते हुए आत्मघाती हमलों की संख्या में और इजाफा कर सकते हैं। पहले ही यहां की जनता हिंसा से त्रस्त है और अमेरिका से नाराज है। आने वाले वक्त में यह गुस्सा और भड़क सकता है। ओबामा प्रशासन भी इस खतरे से वाकिफ है। वो आतंकियों का सफाया करने के साथ-साथ आम जनता से हमदर्दी जताना नहीं भूल रहे हैं। पाकिस्तान को दी जानी वाली सहायता मेें की गई भारी वृद्धि को इस रूप में देखा जा सकता है। पाकिस्तानी जनता और सेना इस बात को अच्छी तरह जानती है कि अमेरिका से मिलने वाली आर्थिक सहायता का क्या मतलब है? यदि मदद नहीं मिलती है, तो पाकिस्तान की स्थिति क्या हो सकती है? अमेरिका के लिए परेशानी की बात यह है कि पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों को जिन्हें पहले आईएसआई बढ़ावा दे रही थी, अब कई राज्यों में विद्रोह कर रहे हैं। पाकिस्तानी सेना और आईएसआई इस बात को लेकर काफी आत्मविश्वास में थे कि वे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी संगठनों को काबू में कर लेंगे, लेकिन आतंकवादी संगठनों का इतिहास बताता है कि इस तरह के संगठनों को लंबे समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। अमेरिका इस बात की काफी नजदीक से जांच-पड़ताल करेगा कि आईएसआई इस तरह के संगठनों को किसी तरह की आर्थिक सहायता न पहुंचा पाए। साथ ही इस बात को भी देखेगा कि इस तरह के संगठन जनता से पैसों की उगाही के लिए कोई खतरनाक तरीका न अपना सकें। यदि पाकिस्तानी सेना और सरकार अमेरिका और दूसरे अन्य देशों से आर्थिक सहायता हासिल करना चाहती है, तो उसे जिहादी संगठनों के खिलाफ प्रतिबंध लगाना होगा। &lt;br /&gt;नई अफ-पाक नीति में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत का संदर्भ भले ही न दिया हो, लेकिन दोनों मुल्कों को आतंक का सुरक्षित ठिकाना बताकर उन्होंने दिल्ली को राहत पहुंचाई है। यही नहीं पाकिस्तान में मौजूद परमाणु अस्त्र आतंकियों के हाथ लगने की आशंका जताकर भी ओबामा ने वही किया है, जिसकी उम्मीद भारतीय खेमे को थी। अफगानिस्तान क्षेत्र में सैन्य दबाव बढ़ाने के अमेरिकी फैसले पर भारत को संतोष होना चाहिए। भारत फिलहाल यही चाहता है कि अमेरिका कहीं से भी पाक और अफगानिस्तान में अपना दबाव कम न करे, जहां आतंकी भारत विरोधी करतूतों की साजिश रच रहे हैं। यह तय है कि अफ-पाक नीति में भारत की दिलचस्पी दो स्तर पर ज्यादा होती है। पहला, पाक में मौजूद आतंकी संगठनों पर अमेरिकी शिकंजा कसने की झलक इस नीति में भारत हमेशा तलाशता है। दूसरा, अफगानिस्तान में भारत की भूमिका को लेकर अमेरिका की प्रतिक्रिया। इस लिहाज से ओबामा की नई अफ-पाक नीति भारत की इच्छा के मुताबिक है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-3371554672776469912?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/3371554672776469912/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_7205.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3371554672776469912'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3371554672776469912'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_7205.html' title='पुरानी चाल का नया चोला'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUD4b1JVFI/AAAAAAAAAEU/xw4k_5L12FA/s72-c/barack_obama.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-4285226131344778592</id><published>2009-12-04T18:24:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:25:57.880+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जलवायु परिवर्तन'/><title type='text'>पृथ्वी को बचाने की पहल</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUDSQl0MaI/AAAAAAAAAEM/43embI7X0cM/s1600/global_warmingmatch.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 120px; height: 200px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUDSQl0MaI/AAAAAAAAAEM/43embI7X0cM/s200/global_warmingmatch.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477788133992182178" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 25 फीसदी कमी करने की घोषणा कर साबित कर दिया है कि वह धरती को बढ़ते ताप से बचाने की दिशा में पूरी ईमानदारी से जुटा हुआ है। यह कमी 2005 की तुलना में होगी और इसके लिए 2020 तक का समय तय किया गया है। कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन पर होने वाले अहम सम्मेलन से पहले भारत का कार्बन उत्सर्जन में कटौती का फैसला मायने रखता है। हालांकि इसकी इस आधार पर आलोचना की जा सकती है कि भारत अमेरिका और चीन के दबाव के सामने झुक गया है, फिर भी व्यापक दृष्टिकोण से भारत की सराहना होनी चाहिए। कार्बन उत्सर्जन की दृष्टि से भारत दुनिया में चौथे पायदान पर है, लेकिन वह ग्लोबल वार्र्मिंग पर लगाम कसने के लिए शीर्ष तीनों देशों- चीन, अमेरिका और रूस से न केवल ज्यादा फ्रिकमंद है, बल्कि संजीदा भी है। भारत इस दिशा में पहले से ही नेशनल एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (एनएपीसीसी) पर काम कर रहा है, जिसमें आठ अभियान - सौर, उन्नत ऊर्जा दक्षता, हिमालय के पर्यावरण को बनाए रखने, हरा-भरा भारत, कृषि और तापमान परिवर्तन के लिए रणनीतिक ज्ञान शामिल है। इसके विपरीत चीन और अमेरिका कार्बन उत्सर्जन में कटौती के मसले पर गाहेबगाहे आनाकानी करते रहे हैं। हालांकि उन्होंने कटौती के लक्ष्य निर्धारित कर दिए हैं, लेकिन इन्हें हासिल कैसे किया जाएगा, यह स्पष्ट नहीं है। क्या जलवायु परिवर्तन इतनी छोटी समस्या है कि इससे निपटने के लिए महज दिखावा किया जाए? आखिर चीन और अमेरिका अपनी जिम्मेदारी कब समझेंगे? क्या ये देश नाममात्र का कार्बन उत्सर्जन करने वाले मुल्कों पर दबाव बनाकर दुनिया को विनाश की ओर नहीं धकेल रहे हैं? &lt;br /&gt;अमेरिका ने 2020 तक उत्सर्जन में 17 फीसदी तक की कटौती का लक्ष्य रखा है, जो 2005 के स्तर से कम है। चीन ने कहा है कि वह 2020 तक सकल घरेलू उत्पाद की प्रति यूनिट ऊर्जा तीव्रता में 40-45 फीसदी तक की कमी करेगा। अगर 1990 के स्तर की बात करें, तो अमेरिका द्वारा उत्सर्जन में की गई यह कटौती महज तीन फीसदी बैठती है। इसके अलावा अमेरिका घरेलू लक्ष्यों तक ही सीमित बना हुआ है और बहुराष्ट्रीय कानूनी बाध्यता को लेकर किए गए समझौते से दूरी बनाए हुए है। चीन का भी यही हाल है। उसने संकेत दिया है कि कार्बन उत्सर्जन में इजाफा तो बरकरार रहेगा, लेकिन इसकी रफ्तार में कमी आएगी। इसमें चीनी अर्थव्यवस्था के विकास की गति की शर्त अलग से जुड़ी हुई है। यदि चीन की अर्थव्यवस्था सात फीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ती है, तो उसका उत्सर्जन 50 फीसदी तक बढ़ेगा जो 2005 के स्तर से अधिक है। अगर अर्थव्यवस्था 10 फीसदी की दर से विकास करती है, तो यह उत्सर्जन 150 फीसदी तक बढ़ेगा जो 2005 के स्तर से काफी अधिक है। क्या ये आंकड़े साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं कि चीन और अमेरिका पृथ्वी को बचाने के लिए कोरी गप्पबाजी कर रहे हैं? यदि इन दोनों मुल्कों का यही रवैया रहा, तो कोपेनहेगन में भी कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है। ऐसी स्थिति में जब जब पृथ्वी के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है, तो विकसित देशों को संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठते हुए बढ़ते ताप पर लगाम कसने के लिए ईमानदार प्रयास करने चाहिए। इसमें जितनी देर होगी खतरा उतना ही बड़ा होता जाएगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-4285226131344778592?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/4285226131344778592/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_04.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4285226131344778592'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4285226131344778592'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_04.html' title='पृथ्वी को बचाने की पहल'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUDSQl0MaI/AAAAAAAAAEM/43embI7X0cM/s72-c/global_warmingmatch.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-3386985623545019156</id><published>2009-12-03T18:19:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:22:48.821+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गहलोत सरकार'/><title type='text'>चिंतन से आगे</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUCisoj51I/AAAAAAAAAD8/N9E_Dv71Om8/s1600/Ashok+gehlot.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 167px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUCisoj51I/AAAAAAAAAD8/N9E_Dv71Om8/s200/Ashok+gehlot.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477787316886169426" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;गहलोत सरकार की ओर से दो दिन के चिंतन के बाद की गई घोषणाएं सुशासन के स्वप्न को साकार करने में मददगार साबित हो सकती हैं, बशर्ते इन पर ईमानदारी से अमल हो। यह अच्छी बात  है कि सरकार अपने एक साल के कामकाज की समीक्षा कर रही है, लेकिन इसकी सार्थकता खामियों को दुरुस्त करने की दिशा में पहल करने पर ही है। सरकार ने गांव, गरीब और किसान को केंद्र में रखते हुए हर क्षेत्र में विकास का इरादा जाहिर किया है। भले ही इसका मकसद पंचायत चुनावों में मतदाताओं का लुभाना हो, लेकिन इनके दम पर राज्य में विकास को गति तो दी ही जा सकती है। अच्छा काम कर राजनीतिक लाभ हासिल करने में बुराई ही क्या है? सरकार की ओर से की गई घोषणाओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण 'नई कृषि नीतिÓ बनाने का फैसला है। राज्य में किसान जिस तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं, उन्हें देखते हुए लंबे समय से पृथक कृषि नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। देर से ही सही सरकार ने किसानों की सुध तो ली। इस घोषणा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सरकार इसमें ऐसे उपायों को शामिल करे, जिससे किसानों को अपना जीवन त्रासद नहीं लगे। हर गांव के लिए अलग मास्टर प्लान बनाने का निर्णय भी अपने आप में ऐतिहासिक है। जनसंख्या की बढ़ती रफ्तार को देखते हुए गांवों का नियोजित विकास समय की मांग है। मास्टर प्लान बनने से गांवों की बसावट तो व्यवस्थित होगी ही, पानी के निकास की भी समुचित व्यवस्था होगी। निजी अस्पतालों में गरीबों के ऑपरेशन की घोषणा कर सरकार ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि राज्य में इलाज की कमी की वजह से किसी की मौत नहीं हो। &lt;br /&gt;सरकार ने नगरीय विकास की प्रतिबद्धता को भी दोहराया है। हर शहर के लिए 'सिटी डवलपमेंट प्लानÓ बनाने की घोषणा बेतरतीब ढंग से बढ़ रहे शहरों को नियोजित करने में कारगर साबित हो सकती है। अवैध रूप से विकसित हो रही कॉलोनियों पर लगाम कसने के लिए 'नई टाउनशिप पॉलिसीÓ की घोषणा भी एक स्वागतयोग्य कदम है। इससे न केवल भूमाफियाओं पर लगाम कसेगी, बल्कि शहरों को योजनाबद्ध ढंग से विकसित करने में भी मदद मिलेगी। सरकार 26 जनवरी से 'प्रशासन शहरों के संगÓ अभियान भी शुरू करने जा रही है। यह एक सफल प्रयोग है, जिसमें आम जनता को छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों में चक्कर नहीं काटने पड़ते। क्या सरकार हमेशा के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं कर सकती कि लोगों को प्रशासन एक ही स्थान पर सहज रूप से उपलब्ध हो जाए? शहरों में ही नहीं, गांवों में भी ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, क्योंकि प्रशासन गांवों से ही सबसे अधिक दूर होता है। पटवारियों और ग्रावसेवकों को मोबाइल देने से संवाद जरूर कायम होगा, लेकिन महज इससे दूरी पटने वाली नहीं है। दो दिन के गहन चिंतन-मनन के बाद लोकलुभावन घोषणाएं करने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखना होगा कि इन्हें पूरा नहीं करना आत्मघाती साबित होता है। जनता वोट की चोट से एक बार में ही हिसाब बराबर कर लेती है। सरकार का मुखिया होने के नाते यह उनकी जिम्मेदारी है कि वह मंत्रियों और अधिकारियों को इन घोषणाओं को मूर्त रूप देने के लिए पाबंद करें। सिर्फ उनके जवाबदेह बनने से काम नहीं चलेगा, सरकार से जुड़े हर शख्स की जिम्मेदारी तय करना भी उन्हीं का काम है। जब तक यह नहीं होगा न तो चिंतन का कोई अर्थ है और न ही घोषणाओं का।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-3386985623545019156?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/3386985623545019156/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_03.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3386985623545019156'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/3386985623545019156'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_03.html' title='चिंतन से आगे'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUCisoj51I/AAAAAAAAAD8/N9E_Dv71Om8/s72-c/Ashok+gehlot.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-4371898935271994104</id><published>2009-12-02T18:16:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:18:44.713+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एस.के. सिंह'/><title type='text'>अपूरणीय क्षति</title><content type='html'>&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUBk95g5zI/AAAAAAAAAD0/62X1gEXl6so/s1600/SK-SINGH.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 166px; height: 200px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUBk95g5zI/AAAAAAAAAD0/62X1gEXl6so/s200/SK-SINGH.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477786256368789298" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;राज्यपाल एस.के. सिंह का निधन न केवल राजस्थान, बल्कि समूचे देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है। राजस्थान के राज्यपाल के तौर पर वे यह साबित करने में कामयाब रहे कि राज्यपाल का पद महज संवैधानिक प्रधान का नहीं होता। वे मुख्यमंत्री व मंत्रियों को शपथ दिलाने और राजकीय मेहमानों के स्वागत-सत्कार तक ही नहीं सिमटे, बल्कि राज्य के जनजीवन से जुडऩे में सफल रहे। इस उपक्रम में उन्होंने सरकार का विरोध झेलने से भी परहेज नहीं किया। जनहित से जुड़े मुद्दों पर बेबाकी और साफगोई से बोलने का साहस उनके पास ही था। चाहे प्रदेश में शिक्षा के स्तर की बात हो या आरक्षण का मुद्दा, वे पूरी शिद्दत से सक्रिय रहे। विश्वविद्यालयों में शोध के स्तर पर वे खासे चिंतित थे। उन्होंने इसके सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी प्रस्तुत किए थे। शोध ही नहीं, शिक्षण पद्धति, परीक्षा प्रणाली आदि पर वे समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहे। निजी विश्वविद्यालयों की बेतरतीब स्थापना पर उन्होंने कड़ा एतराज जताते हुए कहा था कि इससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होगी। आरक्षण व्यवस्था में आई विकृतियों पर उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किए, उनसे असहमत तो हुआ जा सकता है, लेकिन नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वे इस मायने में भी खास थे कि वे शिकायत करने से ज्यादा ध्यान समस्या के समाधान करने पर देते थे। उनका मकसद जनमानस को उद्वेलित करने तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे उसे बदलाव के  लिए भी तैयार करते थे। असल में उन्होंने राजस्थान के राज्यपाल रहते हुए भारतीय लोकतंत्र के इस पद की गरिमा व मान बढ़ाने के साथ-साथ इसकी प्रासंगिकता को भी सिद्ध किया। &lt;br /&gt;एस. के. सिंह जहां भी रहे, उन्होंने अपने काम की छाप छोड़ी। उनकी गिनती देश के शीर्ष राजनयिकों में होती थी। विदेश सेवा में रहते हुए उन्होंने शानदार काम किया। जिस समय कश्मीर मसले पर पाकिस्तान ने राजनीति शुरू की थी, तो सिंह अमेरिका जाकर इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र को तटस्थ बनाने में न केवल कामयाब हुए, बल्कि यह आश्वासन लेने में भी सफल रहे कि संयुक्त राष्ट्र  संघ शिमला समझौते का समर्थक है, जिसमें सभी मुद्दों पर द्विपक्षीय चर्चा का प्रावधान है। सिंह पाकिस्तान में सर्वाधिक समय तक राजदूत रहे, वह भी उस दौर में जब दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव चरम पर था। उन्होंने न केवल कश्मीर में पाकिस्तान की दखलंदाजी से संबंधित कई महत्वपूर्ण सूचनाएं भारत को दीं, बल्कि दोनों के संबंधों को पटरी पर लाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। चीन को कूटनीतिक मोर्चे पर घेरने में भी उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए उन्होंने इस क्रम को बरकरार रखा। अरुणाचल समेत समूचे पूर्वोत्तर में आधारभूत ढांचे के विकास में उनका सक्रिय योगदान रहा। महात्मा गांधी के विचारों को अपने जीवन में आत्मसात कर उन्होंने पूरी दुनिया में मानवाधिकार के क्षेत्र में काम किया। एक मायने में उन्होंने गांधी के दूत के रूप में कार्य करते हुए गांधी दर्शन को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया। अपने काम के दम पर उन्होंने पाकिस्तान, अफगानिस्तान, जॉर्डन, लेबनान व साइप्रस में भारतीय राजदूत रहते हुए इन देशों अपने अनगिनत शुभचिंतक पैदा किए। व्यापक कार्यक्षेत्र और बहुमुखी प्रतिभा के धनी एस. के. सिंह का असामयिक निधन से जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भर पाना नामुमकिन है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-4371898935271994104?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/4371898935271994104/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_02.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4371898935271994104'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4371898935271994104'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_02.html' title='अपूरणीय क्षति'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUBk95g5zI/AAAAAAAAAD0/62X1gEXl6so/s72-c/SK-SINGH.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-4770889017807381072</id><published>2009-12-01T18:05:00.000+05:30</published><updated>2010-06-01T18:15:41.991+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लोकतंत्र'/><title type='text'>जनप्रतिनिधियों का आचरण</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUAr9RCYnI/AAAAAAAAADs/C_elZAICrZA/s1600/090108090425_Parliyament.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 121px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUAr9RCYnI/AAAAAAAAADs/C_elZAICrZA/s200/090108090425_Parliyament.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5477785276946473586" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;भारतीय संसदीय लोकतंत्र के इतिहास में सोमवार को लोकसभा में प्रश्नकाल के दौरान पहली बार कार्यवाही इसलिए स्थगित करनी पड़ी, क्योंकि प्रश्न पूछने वाले अधिकांश सांसद अपने सवाल का जवाब जानने के लिए सदन में उपस्थित नहीं थे। सांसदों का बंक मारना अब कोई नई बात नहीं रही है, लेकिन कम से कम उनसे यह उम्मीद तो की जाती है कि अपने प्रश्न का जवाब सुनने के लिए वे सदन में हाजिर रहें। माननीय सदस्यों के सवाल का जवाब तैयार करने के लिए सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ती है और इसके लिए संबंधित विभागों के मंत्रियों को तैयारी भी करनी पड़ती है। इस समूचे प्रकरण का शर्मनाक पहलू यह रहा कि माननीय सदस्यों ने लोकसभा अध्यक्ष को अपने नहीं आने की सूचना देना भी उचित नहीं समझा। इस संदर्भ में देखा जाए तो देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद से लेकर राज्य विधानसभा और ग्राम पंचायत तक में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का यह गैर जिम्मेदाराना आचरण एक 'फैशनÓ का रूप अख्तियार कर चुका है, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए एक खतरनाक बीमारी से किसी तरह कम नहीं है। नेताओं की इस प्रवृत्ति से सभी दल दुखी हैं और कांग्रेस व भाजपा सहित सभी दलों के प्रमुख अपनी पार्टी से चुनकर आने वाले सभी सदस्यों को सदन में उपस्थित रहने की कई बार सख्त हिदायतें दे चुके हैं। लोकसभा अध्यक्ष और राज्य विधानसभा के अध्यक्ष भी निर्वाचित सदस्यों को बार-बार चेता रहे हैं कि उनकी अनुपस्थिति से कई महत्वपूर्ण निर्णय अटक जाते हैं। इन तमाम प्रयासों के बावजूद नेताओं के आचरण में सुधार नहीं आना चिंता का विषय है। &lt;br /&gt;नेताओं के इसी आचरण से दुखी होकर सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष रहते हुए कहा था, 'संसद में अब न तो कोई प्रश्न करता है और न ही कोई किसी मुद्दे पर बहस करता है। बस शोर-शराबा करता है और धरना देता है, क्योंकि सांसदों को ऐसा लगता है कि शोर-शराबा करने और धरना देने से मीडिया का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित होगा और इसका उन्हें राजनीतिक फायदा मिलेगा।Ó संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर औसतन  26,035 रुपए खर्च आता है। ऐसे में समय और जनता के धन की कीमत हमारे जनप्रतिनिधियों को भलीभांति समझनी चाहिए। बेलगाम होते जनप्रतिनिधियों के इस आचरण का उपचार न तो दंडात्मक कार्रवाई में है और न ही पार्टी प्रमुखों की हिदायतों में। आम मतदाता ही नेताओं की बैठकों से नदारद रहने की गैर जिम्मेदाराना प्रवृत्ति को सुधार सकता है। अब लोगों के पास सूचना के अधिकार का एक ऐसा हथियार है, जिसके जरिए अपने प्रतिनिधि की पाई-पाई का हिसाब रखा जा सकता है। जब लोगों में जागरुकता आएगी और वे ऐसे लोगों को चुनाव में नकारना शुरू करेंगे, तो नेताओं की अक्ल अपने आप ठिकाने आ जाएगी। जनता को प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, लेकिन वापस बुलाने का अधिकार नहीं है। ऐसे में वापस बुलाने का अधिकार भी दिया जाना चाहिए, ताकि जनहित की अनदेखी करने वाले प्रतिनिधियों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सके। मतदाताओं की जागरुकता और जनप्रतिनिधियों की कर्तव्यनिष्ठा के बिना भारत के महाशक्ति बनने के देशवासियों के सपने को पूरा नहीं किया जा सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-4770889017807381072?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/4770889017807381072/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_01.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4770889017807381072'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4770889017807381072'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/12/blog-post_01.html' title='जनप्रतिनिधियों का आचरण'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_KN3n9I8r4ss/TAUAr9RCYnI/AAAAAAAAADs/C_elZAICrZA/s72-c/090108090425_Parliyament.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-4766207490699628220</id><published>2009-09-10T11:40:00.005+05:30</published><updated>2009-09-10T11:49:15.024+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हम साथ-साथ हैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तेरा मेरा साथ'/><title type='text'>मैं अधूरा तुम बिन</title><content type='html'>&lt;p&gt;सफलता के कंगूरों को देखते वक्त क्या आपके मन में यह नहीं आता कि इसके नींव के पत्थर से मुलाकात की जाए कहा जाता है कि हर इंसान की जिंदगी में उसकी पत्नी कहीं प्रेरणा बनकर, कहीं साथ चलकर तो कहीं सहयोग देकर नींव के पत्थर का काम करती है। पति के मंजिल तक पहुंचने के बाद भी न तो ये थकी हैं, और न ही रूकी है। पूरी शिद्दत से जुटी हैं, अपने पतियों को और आगे बढाने में। आइए रूबरू होते हैं अलग-अलग क्षेत्रों की ऎसी ही कुछ दिग्गज हस्तियों से-&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;गायक बनाया आपने &lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;गीतों को अपनी मखमली आवाज से हिट बनाने वाले गायक रूपकुमार राठौड को इस मुकाम तक पहुंचाने में उनकी पत्नी और मशहूर गायिका सोनाली राठौड का खास योगदान रहा है। अपने गायन के शुरूआती दिनों को याद करते हुए वे कहते हैं, 'संगीत की दुनिया में मैंने जितना भी नाम कमाया है, सब मेरी पत्नी सोनाली की वजह से है। यदि सोनाली मेरी जिंदगी में नहीं आती, तो मैं कभी भी गायक नहीं बन पाता। मेरी रूचि तो तबला वादन में थी। गजलों के स्वर्णिम काल यानी अस्सी के दशक में मैं मशहूर गजल गायकों का चहेता तबला वादक था। सोनाली ने मुझे गाने के लिए प्रेरित किया। मैंने शुरूआत की और आज सबकुछ आपके सामने है। यह सोनाली की मेहनत का ही नतीजा है कि हमारी जोडी संगीत की दुनिया में हिट है। हमने 1991 में साथ काम करना शुरू किया था और अब तक पच्चीस से ज्यादा एलबम निकाल चुके हैं।' &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;हर जीत के पीछे अरुणा है&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;शतरंज की दुनिया के शहंशाह विश्वनाथन आनंद की चतुर चालों से विपक्षी खिलाडी हैरत में पड जाते हैं। शतरंज के क्षेत्र की हर ऊंचाई को साथ देने में साथ छुपा है उनकी पत्नी अरूणा का। अपनी सफलता में अरूणा के योगदान के बारे में आनंद कहते हैं, 'अरूणा को शतरंज की बारीकियों का ज्यादा ज्ञान नहीं है, लेकिन मेरा कॉन्फिडेंस बढाना उन्हें अच्छे-से आता है। मुझे अच्छी तरह याद है पिछले साल वल्र्ड रेपिड चैंपियनशिप के फाइनल में मेरा मुकाबला क्रैमेनिक से था। मैं बेहद घबराया हुआ था। अरूणा ने मुझे समझाना शुरू किया तो क्रैमेनिक का हौवा मेरे दिमाग से निकल गया और मुझे केवल मेरी ताकत ही याद रही। इसी का नतीजा था कि मैंने कै्रमेनिक को खिताबी दौर की तीन बाजियों में मात दी, जबकि वे पूरे साल में भी तीन बाजियां नहीं हारते हैं। अरूणा ने ऎसा पहली बार नहीं किया था। मेरी हर जीत में उनका योगदान होता है।' अरूणा ने पब्लिक रिलेशंस में मास्टर डिग्री हासिल की है और वे आनंद का हौसला बढाने के अलावा इस काम को भी बखूबी अंजाम दे रही हैं। &lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;strong&gt;वो संवारती है मेरा &lt;span class=""&gt;  अभिनय&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;आशुतोष राणा ने अपने दमदार डायलॉग और शानदार अभिनय से बॉलीवुड में अलग जगह बनाई है। राणा थिएटर से निकले हुए कलाकार हैं, पर बडी साफगोई से स्वीकार करते हैं कि उन्हें अभिनय सिखाने वाली सबसे बडी टीचर उनकी पत्नी रेणुका शहाणे हैं। वे कहते हैं, 'मैंने थिएटर से अभिनय सीखा, लेकिन उसे तराशा रेणुका ने। उन्होंने बडी सहजता से मेरे कमजोर और मजबूत पक्षों के बारे में बताया। रियल चैनल के चर्चित शो 'सरकार की दुनिया' में मेरे किरदार के पीछे रेणुका की कडी मेहनत है। इसी के चलते मैं सरकार के कैरेक्टर के साथ न्याय कर पाया। मैं उनसे हर रोज कुछ न कुछ सीखता हूं। वे मेरी सबसे बडी मार्गदर्शक हैं।' मोहक मुस्कान से अपने जलवे बिखरने वाली रेणुका शहाणे खुद एक मंझी हुई कलाकार हैं। टेलीविजन इतिहास के सबसे चर्चित धारावाहिकों में से एक 'सुरभि' में उनकी एंकरिंग आज तक लोगों को याद है। 'हम आपके हैं कौन' फिल्म में उनका निभाया भाभी का किरदार लंबे समय तक लोगों को याद रहेगा। रेणुका इन दिनों निर्देशन का काम भी कर रही हैं और अपने पति को ध्यान में रखकर एक फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिख रही हैं। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-4766207490699628220?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/4766207490699628220/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/09/blog-post.html#comment-form' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4766207490699628220'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4766207490699628220'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='मैं अधूरा तुम बिन'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-4587581883526525564</id><published>2009-08-15T12:50:00.002+05:30</published><updated>2009-08-15T13:06:54.237+05:30</updated><title type='text'>अधूरा अफसाना</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;वतन आजाद हुआ, तो हर शख्स ने चुन-चुनकर इसकी राहों में कुछ ख्वाब बिछाए। और जिन लोगों ने हमें आजादी की मंजिल तक पहुंचाया, उनकी भी ख्वाहिश थी कि हर ख्वाब को हकीकत में बदला जाए, हर आंख के आंसू को मुस्कान में बदला जाए......लेकिन तब से अब तक एक लंबा अर्सा गुजर चुका है.... और आज ज्यादातर लोगों का यही मानना है कि यह वो मुल्क नहीं है, जिसका सपना कभी बापू या नेहरू ने देखा था या जिसके लिए हमारे वीर सिपाही हंसते-हंसते शहीद हो गए थे। क्या आजादी वाकई एक ऎसा अधूरा अफसाना है, जिसके हर लफ्ज में कोई दर्दभरी दास्तान छिपी है इसी अहम सवाल का जवाब तलाशने के लिए आजादी की सालगिरह पर हमने तीन ऎसे लोगों को चुना, जिनका आजादी की लडाई के साथ सीधा रिश्ता रहा है। ये हैं महात्मा गांधी के पडपोते तुषार गांधी, सुभाषचंद्र बोस के पडपोते सूर्यकुमार बोस और भगतसिंह के भांजे प्रो। जगमोहन। उनके जवाब में हमें देश और समाज की एक धुंधली तस्वीर तो नजर आती है, पर साथ ही यह उम्मीद भी मौजूद है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो कोहरे के पार एक विशाल नीले आसमान को भी हम छू सकते हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;बापू, सुभाष और भगत के सपनों का देश&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;तुषार गांधी-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; आजादी के बाद हमने बापू के सिद्धांतों की उपेक्षा करते हुए विकास का जो मॉडल अपनाया, उसने देश के भीतर ही दो देश बना दिए हैं। एक तरफ कुछ ऎसे लोग हैं, जो करोडों रूपए की बेंटले कार चला रहे हैं, तो दूसरी तरफ बैलगाडी चलाने वाले लोग भी हैं। लेकिन जहां पहले वर्ग की तादाद बेहद सीमित है, वहीं दूसरा वर्ग तेजी से बढ रहा है। इस खाई को पाटने के लिए हमें बापू के कहे मुताबिक शासन की नीतियां अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को ध्यान में रखकर बनानी होंगी। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सूर्यकुमार बोस-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; मेरा भी कुछ ऎसा ही मानना है। नेताजी सरीखे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों के सपने का भारत अभी तक नहीं बन पाया है। आतंकी हमलों से दहशत का माहौल है। राजनेता आतंकवाद पर लगाम कसने की बजाय अपने व्यक्तिगत हितों को पूरा करने और जेब भरने में लगे हुए हैं। संसद और विधानसभाओं को तो इन्होंने अखाडा बना दिया है। सिस्टम की खामियों को देखकर मन में कभी-कभी विद्रोह का विचार आता है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;प्रो.जगमोहन-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;मुझे दुख तो इस बात का है कि इस बार हमारे सामने अंग्रेज नहीं, बल्कि अपने ही लोग हैं। कहने को तो भारत आजाद हो गया है, लेकिन देश के नीति-निर्माता अभी भी इसे गुलाम रखना चाहते हैं। अंग्रेजों के अपने फायदे के लिए चलाई गई परिपाटियों को हम आज तक ढोते आ रहे हैं। हम अपने शहीदों के लिए अलग से स्मारक तक नहीं बना पाए और इंडिया गेट को वह दर्जा देने की भूल करते चले जा रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;समाज की दशा और दिशा&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;&lt;span class=""&gt;तुषार गांधी&lt;/span&gt;-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; बेहद शर्मनाक है कि हम अभी तक समाज से कुरीतियों को खत्म नहीं कर पाए। समाज धर्म और जाति के दुष्चक्र में फंसता चला जा रहा है। इस तरह का वैमनस्य देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है। हमें यह याद रखना चाहिए कि हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने समाज का यह वीभत्स रूप देखने के लिए कुर्बानी नहीं दी थी और आज हम इसी का नाम लेकर देश के टुकडे-टुकडे कर रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सूर्यकुमार बोस-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; देखिए, समाज का ताना-बाना जितना सुलझा हुआ होगा, देश उतना ही आगे बढेगा। विकास की रफ्तार को बढाने के लिए हमें बदलते वक्त के मुताबिक चलना होगा। ऎसी घटनाएं देखकर ठेस पहुंचती है कि आज इक्कीसवीं सदी में एक युवक को उन्मादी भीड ने पीट-पीट कर महज इसलिए मार डाला, क्योंकि उसने अपने गौत्र की लडकी से शादी कर ली थी। समाज के ठेकेदारों को परंपराओं के नाम पर रूढियों को थोपना बंद करना चाहिए। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;प्रो.जगमोहन-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;मैं सोचता हूं कि समाज का विकास तभी होता है, जब उसमें स्वनियंत्रण हो। पश्चिम की संस्कृति ने समाज को उन्मुक्त तो बनाया है, लेकिन कई विकारों के साथ। रिश्ते जिम्मेदारी के बोझ से मुक्त होना चाहते हैं। इस भटकाव से समाज का पूरा ढांचा चरमरा गया है। नाउम्मीदी के बीच यह राहत की बात है कि देश की आत्मा कहे जाने वाले गांवों में स्थिति फिर भी ठीक है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;महिला अधिकारों की बात &lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;तुषार गांधी-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; अब महिलाओं की स्थिति पहले की अपेक्षा सुधरी है, लेकिन अभी लंबी लडाई लडना बाकी है। महिलाओं को शासन के स्तर पर ही नहीं, समाज के स्तर पर भी सच्ची भागीदारी सुनिश्चित करने की जरूरत है। हालांकि यह सब इतना सहज नहीं है। पीढियों से समाज के जिस तबके को अबला समझते आए हों, उसे बराबरी का दर्जा देने में जोर तो आएगा। सुकून की बात है कि महिलाएं अपने हकों को हासिल करने के लिए उठ खडी हुई हैं। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सूर्यकुमार बोस-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; मेरे मुताबिक देश की आबादी के आधे हिस्से को दरकिनार कर विकास के बारे में सोचना बेमानी है। आज की नारी यह साबित कर चुकी है कि वह कमजोर और लाचार नहीं है। ऎसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां महिलाओं ने अपनी कामयाबी के झंडे नहीं गाडे हों, फिर क्यों उसे बराबरी का हक देने में आनाकानी की जा रही है। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का मामला चंद नेताओं की जिद की वजह से लंबे समय से अटका पडा है। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;प्रो.जगमोहन-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण हम सबके सामने है। उन्होंने ऎसे समय में गुलामी की जंजीरों को तोडने का हौसला दिखाया था, जब पूरा देश निराशा में डूबा हुआ था। देश में लक्ष्मीबाई आज भी हैं, बस हम उन्हें अपना जौहर दिखाने का मौका नहीं देते। कितने शर्म की बात है कि लोग लडकी को जन्म लेने से पहले ही मार डालने का पाप करने से भी नहीं हिचकते हैं। समाज में संतुलन बनाए रखने के लिए कन्या भू्रण हत्या पर जल्द से जल्द लगाम लगाना जरूरी है।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;strong&gt;&lt;span style="color:#ff0000;"&gt;हमारा एक सपना है&lt;/span&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;तुषार गांधी-&lt;/span&gt; &lt;/em&gt;मैं तो चाहता हूं कि देश में समानता आधारित समाज की स्थापना हो। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के नाम पर लोगों से भेदभाव नहीं किया जाए। यह भेदभाव समाप्त हो जाएगा तो आधी समस्याएं तो वैसे ही हल हो जाएंगी। हमें देश की 'विविधता में एकता' को बरकरार रखना होगा। इसके अलावा मेरा प्रयास रहेगा कि बापू से जुडी हर चीज को देश में लाया जाए, ताकि उनकी अनमोल धरोहर को नीलामी जैसी शर्मसार करने वाली प्रक्रिया से नहीं गुजरना पडे। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;सूर्यकुमार बोस-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt; इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि हर क्षेत्र में देश का विकास हो। यहां की प्रतिभाएं देश के विकास में अपना योगदान दें। सरकार इस तरह के इंतजाम करे कि प्रतिभाशाली युवा देश से पलायन नहीं करें। युवा भी इस ओर ध्यान दें। वे महज ऊंचे वेतन के आकर्षण में अपना वतन नहीं छोडें। यदि मजबूरी में बाहर जाना भी पडे, तो अपनी मातृभूमि को नहीं भूलें। बाहर रहते हुए भी अपने देश की तरक्की में भागीदार बनने का प्रयास करें। &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;em&gt;&lt;span style="color:#000066;"&gt;प्रो.जगमोहन-&lt;/span&gt;&lt;/em&gt;आप यूं क्यों नहीं सोचते कि यदि हम शहीदों के सपनों को पूरा कर पाएं, तो देश का कल्याण तो अपने आप हो जाएगा। लोगों को यह बताने की जिम्मेदारी हमारी है कि स्वतंत्रता सेनानी देश के बारे में क्या सोचते थे। स्वतंत्रता संग्राम का आधा-अधूरा सच ही लोगों का पता है। इतिहास का यह अनछुआ पक्ष बहुत रोमांचक है। और हां, हमें आजादी की जंग में कुर्बान हुए वीरों की याद में ऎसे स्मारक को मूर्त रूप देना है जो हमारी जमीन पर, हमने ही बनाया हो।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-4587581883526525564?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/4587581883526525564/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/08/blog-post_15.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4587581883526525564'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/4587581883526525564'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/08/blog-post_15.html' title='अधूरा अफसाना'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-841952263540183132</id><published>2009-08-08T15:48:00.000+05:30</published><updated>2009-08-08T15:59:35.062+05:30</updated><title type='text'>सिमटता संघ</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ऐसी उम्मीद कभी न थी। आठ दशक से भी ज्यादा पुराने इस दरख्त की हर शाख दरकने लगी है। हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन राह भटक गया है, शाखाएं सूनी हो गई हैं, अनुशासन खो गया है, बुद्धिजीवियों ने मुंह मोड़ लिया है और भाजपा का एक धड़ा अकेले चलने पर आमादा है। संघ चक्रव्यूह में फंसता ही चला जा रहा है। वह इससे निकलने के लिए एक रास्ता ढूंढ़ता है तो कई नए घेरों में फंस जाता है। क्या संघ सिमटने लगा है? क्या संघ को जंग लग गई है। संघ के अंदरूनी हालातों का जायजा लेती आवरण कथा।&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;मोहन राव भागवत। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के छठे सर संघचालक। इसी साल 21 मार्च को जब उन्हें के. सुदर्शन का उत्तराधिकारी बनाया गया था तो उम्मीद थी कि वे संघ के कील-कांटों को दुरुस्त करने में कामयाब होंगे। भागवत के सामने सबसे बड़ी चुनौती संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों, विशेषकर भाजपा से बिगड़ते रिश्तों को पटरी पर लाना और संगठनों में फैली अराजकता, वैचारिक भटकाव, व्यक्तिवादी राजनीति के चलते सत्ता संघर्ष और एक-दूसरे के खिलाफ गलाकाट प्रतिद्वंदिता पर लगाम लगाना था। भागवत में संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की छवि देखने वाले प्रचारकों को उम्मीद थी कि जल्दी ही भाजपा और संघ के ऐसे नेताओं को हाशिए पर डाला जाएगा जिन्होंने हिंदुत्व पर व्यक्तित्व को हावी कर रखा है। संघ के भीतर तो उन्होंने इसकी कवायद भी शुरू की, पर लोकसभा चुनावों के चलते भाजपा में नेताओं का कद छांटने की प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई। चुनाव हुए तो परिणामों से मामला और उलझ गया। हार के हाहाकार के बीच भाजपा के कई नेताओं ने संघ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। संघ से तौबा कर करने की वकालत करने वाले भाजपाईयों की फेहरिस्त बढऩे लगी। इस पूरे घटनाक्रम से भागवत की उस मुहिम को विराम लग गया जिसे वे संघ को संवारने के मकसद से शुरू कर चुके थे।&lt;br /&gt;भाजपा के साथ रिश्तों को अपने हाल पर छोड़ दें तो भी संघ के लिए समस्याएं कम नहीं हैं। संघ की स्थापना 1925 में हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन के साथ हुई थी, लेकिन आठ दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी यह अपने अंजाम तक पहुंच पाया। दरअसल, यह आंदोलन कभी एक दिशा में नहीं चल पाया। शुरूआत में इसके अंतर्गत हिंदू धर्म का एक ऐसा नया स्वरूप उभारने की कोशिश की गई जो राष्ट्र की यूरोपीय अवधारणा के एकदम अनुरूप था। इसमें धर्म के एक ऐसे पहलू को विकसित करने की कोशिश की गई जिससे जुडऩा पूरे भारत के लिए सहज हो। शुरूआत में तो यह सफल रहा, लेकिन जब यह आंदोलन हिंदू राष्ट्रवाद की ओर मुडऩे लगा तो दिक्कतें बढऩा शुरू हो गईं। जल्दी ही यह सांप्रदायिक राष्ट्रवाद की ओर मुड गया। यह ऐसा समय था जब देश में जाति व्यवस्था तेजी से मजबूत हो रही थी। हिंदू समाज जाति के अलावा क्षेत्र और भाषा के आधार पर तेजी से बंट रहा था। संघ ने इस दिशा में ध्यान नहीं दिया और वह हिंदुओं को अन्य धर्मों का भय दिखाकर संगठित करने का असफल प्रयास करता रहा।&lt;br /&gt;1951 में जनसंघ की स्थापना के बाद हिंदुत्व की जो व्याख्या प्रस्तुत की जाने लगी वह हिंदू समाज के बड़े वर्ग को स्वीकार्य नहीं है। राम जन्मभूमि आंदोलन के बाद उपजे हालातों से ऐसे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी। अब तो हालात यह हैं कि संघ तय नहीं कर पा रहा है कि आखिर उसके लिए हिंदुत्व के क्या मायने हैं। इसकी संगठन स्तर पर व्याख्या होने की बजाय संघ से जुड़ा हर व्यक्ति इसकी अलग ढंग से व्याख्या करता है। कोई गुजराज और कंधमाल में जो हुआ, उसे हिंदुत्व कहता है तो कोई इसकी व्यापक और सकारात्मक अर्थों में व्याख्या करता है। संघ के प्रवक्ता राम माधव तो यहां तक कहते हैं कि हिंदुत्व को बनाने वाल संघ नहीं है। वे बताते हैं, 'हिंदुत्व को बनाने वाले हम नहीं हैं। ऐसे में हम इसमें कोई बदलाव कैसे कर सकते हैं। संघ ने हिंदुत्व को स्वामी विवेकानंद, श्री अरबिंदो और दयानंद सरस्वती से लिया है। यह भारत की खास पहचान है जिसे हम हिंदुत्व कहते हैं। यह हजारों साल से चली आ रही है, हम तो इसे मजबूत बनाने का काम कर रहे हैं। हिंदुत्व के जिस अर्थ की बात राम माधव कर रहे हैं, संघ शायद ही कभी उस पर चला हो।&lt;br /&gt;यह तय है कि संघ किसी भी कीमत पर हिंदुत्व को नहीं छोड़ेगा, लेकिन सवाल यह है कि वह कितने समय तक इस मुद्दे को जीवित रख पाएगा। क्या वह उस हिंदुत्व के आगे बढ़ाने के लिए काम करेगा जिसकी व्याख्या राम माधव कर रहे हैं या फिर उस पर जिसकी बात बजरंग दल और विश्व हिंदु परिषद करते हैं। दबे स्वर में ही सही संघ अब यह स्वीकारने लगा है कि गुजराज और कंधमाल वाला हिंदुत्व वर्तमान परिस्थितियों में ज्यादा लंबे समय तक नहीं चल सकता। इसकी बानगी वरुण गांधी के भाषण के बाद आए बयानों में देखी जा सकती है। संघ ने वरुण गांधी के भाषण पर असहमति प्रकट करते हुए इससे पूरी तरह से पल्ला झाड़ लिया था। विवादों से रहे अभिनव भारत, श्रीराम सेना, हिंदू जागृति मंच और सनातन प्रभात सरीखे कट्टर हिंदुवादी संगठनों के बारे में संघ पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि इनसे संघ का कोई वास्ता नहीं है। संघ के रवैये में आए इस परिवर्तन से एक बात तो स्पष्ट है कि वह अब हिंदुत्व के नाम पर अन्य धर्मों के खिलाफ गैर कानूनी तरीके से लामबंद होने के खिलाफ है।&lt;br /&gt;राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठन शाखातंत्र पर चलता है। इसी के दम पर संघ ने अपनी पहचान कायम की। देश में आई आपदाओं और संकटों में फंसे नागरिकों की स्वयंसेवकों ने खूब सेवा की। यह दौर अभी भी जारी है, पर इसकी धार कुंद हो चुकी है। वहज है, शाखातंत्र का विफल होना। देश में शाखाओं की संख्या और उनमें आने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या तेजी से गिर रही है। संघ ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में माना है कि शाखाओं की संख्या में कमी आ रही है। दरअसल, संघ नए खून को शाखाओं से जोडऩे में बुरी तरह से विफल रहा है। युवाओं को शाखाओं में जाने से कोई फायदा होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। वहां जो चीजें बताई और सिखाई जाती हैं, वे उसके मानसिक स्तर से ऊपर निकल जाती हैं। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि आठ दशक से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी संघ ने अपनी शाखा प्रणाली में कोई खास तब्दीली नहीं की है। शाखाओं की घटती संख्या के बारे में संघ से जुड़े देवेंद्र स्वरूप बताते हैं, 'जिस शाखातंत्र को संघ ने मनुष्य निर्माण और संगठन का मुख्य साधन बनाया था, वह स्वयं अपनी गतिशीलता और तेज खोकर जड़ता का बंदी बनता जा रहा है। शाखा प्रक्रिया में बीते आठ दशकों में निर्मित स्वयंसेवकों का एक बड़ा वर्ग काल कलवित हो चुका है और जो विद्यमान हैं, उनमें से ज्यादातर दैनिक शाखातंत्र में सहभागी नहीं हैं। यद्यपि वे गुरूदक्षिणा के कार्यक्रम में आग्रहपूर्वक उपस्थित होकर अपनी संघनिष्ठा का प्रमाण देते हैं। टूटते बिखरते और चारित्रिक भ्रष्टता की दलदल में धंसते समाज में संघ का शाखातंत्र एक बहुत छोटा द्वीप बनकर रह गया है।&lt;br /&gt;शाखातंत्र का विफल होना संघ के लिए खतरे की घंटी है। हालांकि संघ को भी इस बात का अहसास है, पर इससे निपटने के लिए ज्यादा कुछ नहीं किया जा रहा है। यदि समय रहते इस दिशा में ध्यान नहीं दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब संघ प्रौढ़ और वृद्ध लोगों की जमात बन जाएगा। शाखातंत्र की विफलता के अलावा संघ को बौद्धिक स्वरूप को बचाए रखने के लिए भी जूझना पड़ रहा है। वैचारिक दृष्टि से संघ की बेहद समृद्ध परंपरा रही है। संघ के सर संघचालक सदैव से बौद्धिक जगत के आकर्षण का केंद्र रहे हैं। वर्तमान सर संघचालक मोहन भागवत उच्च शिक्षा प्राप्त हैं। उन्होंने प्रचारक बनने से पहले कुछ समय तक डॉक्टर के रूप में अपनी सेवाएं भी दी हैं। के. सुदर्शन तो देश के उन गिने-चुने बुद्धिजीवियों में से हैं जो भाषा की सीमा को लांघ चुके हैं। सुदर्शन 13 भाषाओं के ज्ञाता हैं। उनसे पहले सर संघचालक रहे डॉ. हेडगेवार, माधव गोलवकर और बाला साहब देवरस भी बड़े विचारक रहे हैं। बुद्धिजीवियों के बड़े वर्ग का सीधे तौर पर भी संघ से जुड़ाव रहा है, लेकिन लंबे समय से इसमें आशातीत वृद्धि नहीं हुई है। इस तबके के जो लोग संघ से जुड़ रहे हैं उनका मकसद दूसरा है। वे भाजपा में अपना ग्राउंड तैयार करने के लिए संघ को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना चाहते हैं।&lt;br /&gt;शाखातंत्र के कमजोर होने और बुद्धिजीवियों की घटती संख्या के कारण समाज पर संघ प्रभाव धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। किसी भी संगठन की सफलता में अनुशासन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। कड़ा अनुशासन संघ की विशेषता रही है, लेकिन अब ये ढीला पड़ता जा रहा है। संघ के आला व्यक्ति भी स्वयंसेवकों के लिए नजीर पेश नहीं कर पा रहे हैं। कई ऐसे प्रचारकों के मामले सामने आए हैं जिन्होंने संघ के नियमों को तोड़ अनुशासन को तार-तार किया। प्रचारकों की इस व्यवहार का स्वयंसेवकों पर बेहद बुरा असर पड़ा है। स्वयंसेवक को निष्क्रिय होना संघ के लिए घातक हो सकता है, क्योंकि आम लोगों के बीच तो वहीं जाकर काम करता है। बातचीत में संघ प्रवक्ता राम माधव ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि हिंदू समाज में संघ का प्रभाव कम हो रहा है। हालांकि वे यह भी कहते हैं कि संघ की विचारधारा किसी भी नजरिए से कमजोर नहीं हुई है। वे बताते हैं, 'शाखाएं संघ का कार्यक्रम है न कि विचारधारा। कहीं-कहीं शहरी क्षेत्रों में शाखाओं में कार्यकर्ताओं की संख्या कम होने का अर्थ यह नहीं कि लोगों ने संघ की विचारधारा को ठुकरा दिया है। साध्वी उमा भारती भी उनकी बात में सुर में सुर मिलाते हुए कहती हैं कि 'संघ में लोगों का गहरा विश्वास है। इतने बड़े संगठन में इस तरह की छोटी-मोटी बातें चलती रहती हैं। इन सबसे संगठन कमजोर होने की बजाय परिष्कृत होकर मजबूत होता है।&lt;br /&gt;संघ की कमजोरियों की चर्चा हो रही हो और भाजपा को जिक्र नहीं हो तो बात अधूरी रहती है। 1951 में जनसंघ की स्थापना उन्हीं लोगों ने की जो संघ द्वारा चलाए जा रहे हिंदू राष्ट्रीयता आंदोलन में शरीक थे। कुछ सक्रिय स्वयंसेवकों के दबाव में एक सामाजिक संगठन राजनीति में कूद पड़ा। चाहे भारतीय जनसंघ हो या भारतीय जनता पार्टी, दोनों की कमान संघ ने हमेशा अपने पास रखी। सत्ता का स्वाद चखने का बाद भी यह नियंत्रण जारी रहा। अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे संघ के वफादार शख्स की सरकार के समय भी यह धारणा स्थिर और सिद्ध थी कि संघ की अनुमति के बिना कोई बड़ा काम नहीं हो सकता। याद कीजिए संघ के दबाव में किस तरह से वाजपेयी को जसवंत सिंह का मंत्रालय बदलना पड़ा। वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए इस बात की पूरी कोशिश की कि वे ऐसा कोई काम नहीं करें जिससे संघ की नाराजगी झेलनी पड़े। इतना कुछ करने के बाद भी संघ उनके कार्यकाल से संतुष्ट नहीं हुआ। बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद ने तो अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के कामकाज की खूब बखिया उधेड़ी।&lt;br /&gt;लालकृष्ण आडवाणी द्वारा जिन्ना को सेकुलर बताना संघ को इतनी बुरी तरह अखर गया कि आडवाणी को अध्यक्ष पद से हटाकर ही मानें। ऐसे कई उदाहरण है जब संघ भाजपा नेताओं के सामने नहीं झुके और अपनी बात मनवाकर ही दम लिया। संघ की राजनीति में इस अति सक्रियता ने उस सामाजिक संगठन का गला घोंटने का काम किया जो लाखों स्वयंसेवकों की वर्षों की मेहनत से खड़ा हुआ था। संघ में सक्रिय रहने वाले कई स्वयंसेवकों को भी सत्ता का स्वाद मुंह लगा तो सेवा दूसरे पायदान पर चली गई। धीरे-धीरे कार्यकर्ता भी इसी ओर अग्रसर होने लगा। संघ के नेता अब मानने लगे हैं कि राजनीति में ज्यादा दखलंदाजी से संगठन को नुकसान ही हुआ। भविष्य में भाजपा के साथ रिश्तों को लेकर संघ में बहस तेज हो गई है। संघ का एक बड़ा समूह राजनीति से तौबा करने की वकालत कर रहा है। के.एन. गोविंदाचार्य की मानें तो संघ अब आंख मूंद कर भाजपा को समर्थन नहीं देगा। वे कहते हैं, 'अब संघ, भाजपा से साफ शब्दों में बात करके पूछेगा कि पार्टी भविष्य में उसके साथ किस तरह का संबंध रखना चाहती है। वर्तमान में दोनों के बीच जो रिश्ता है, उस पर नए सिरे से चर्चा करना जरूरी है। यदि भाजपा अकेले आगे चलना चाहती है तो संघ को इससे कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन यदि हमारे साथ चलना है तो हमारे हिसाब से ही चलना होगा। दोनों में से किसी को बोझ ढोने की जरूरत नहीं है। संघ को भाजपा की बेखासी न तो आज चाहिए न कल।&lt;br /&gt;भाजपा और संघ के रिश्तों में जारी द्वंद्व का नुकसान संघ को ही ज्यादा हो रहा है। मोहन भागवत अपना पूरा ध्यान संघ की गतिविधियों पर नहीं लगा पा रहे हैं। उन्होंने चुनाव के बाद अपनी टीम बनाने का निश्चय किया था, पर सबकुछ अटका पड़ा है। भाजपा के कई नेता लोकसभा चुनावों में हार का ठीकरा संघ के सिर फोड़ संगठन की छवि को अलग से नुकसान पहुंचा रहे हैं। इन नेताओं का मानना है कि यदि भाजपा संघ के बिना चुनावों में ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकती है। संघ के लिए चिंता की बात यह है कि पिछले 15 सालों में भाजपा के भीतर ऐसे लोगों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। पंद्रहवीं लोकसभा में भाजपा के टिकट पर जीतकर आए सांसदों की सूची पर नजर डाले तो कुल 116 में से 40 से 50 सांसद ही ऐसे हैं जिनका संघ से कोई जुड़ाव रहा है। बाकी 65 से 75 सांसद तो संघ की विचारधारा से भी वाकिफ नहीं है। ये सांसद भविष्य में संघ की मानने और सुनने वाले नहीं हैं। कुल मिलाकर जिस भाजपा को संघ ने खड़ा किया, अब वही उसके गले की फांस बनता जा रहा है। संघ को स्वयंसेवकों के सत्ता के प्रति रुझान को नियंत्रित करने में पसीना आ रहा है। स्वयंसेवकों को अनुभव होता है कि संघ की मेहनत के कारण ही बीजेपी और हिंदूवादी राजनीतिक दल सत्ता का सुख भोग रहे हैं और उसका भाग उन्हें भी मिलना चाहिए। संघ से जुड़े लोग जिस तरह से सत्ता के पीछे भाग रहे हैं उससे संगठन के दूसरे सर संघचालक गोलवलकर की सत्ता को समाज का टॉयलट मानने की बात सही साबित हो गई है। उनका मानना था कि व्यक्ति घर में कहीं भी फिसल सकता है, लेकिन टॉइलट में फिसलने की आशंका ज्यादा होती है। इसी वजह से वह राजनीतिक पार्टी बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। ऐसे में यह कई संकटों से जूझ रहे संघ को तय करना है कि वह भाजपा के साथ भविष्य में किस तरह का रिश्ता रखता है और बाकी समस्याओं को हल करने के लिए किस तरह के कदम उठाता है।&lt;br /&gt;भागवत की लचीली कार्यशैली उनके लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। उनसे पहले जितने भी सर संघचालक रहे हैं वे विचारधारा और प्रक्रिया पर अडिग रहे हैं जबकि मोहन भागवत विचारधारा के साथ ही निर्णय लेने में लचीलापन रखते हैं और किसी भी प्रकरण को उसकी परिणति तक पहुंचाने में विश्वास रखते हैं। यह मोहन भागवत ही थे कि जिनके सुझाव पर संघ के नेता विवाद सुलझाने के लिए आडवाणी के निवास पर गए। उससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि संघ अपने पारिवारिक घटकों के नेताओं के घर गया हो। संघ नेतृत्व की परंपरा रही है कि 'अपनी बात कह दो और आपकी बात कोई माने या न माने, यह उस पर छोड़ दो। मोहन भागवत इसके विपरीत धारा पर चलते हैं। उनका मानना है कि 'स्वयंसेवक, चाहे वह कद या आयु में कितना भी ऊंचा क्यों न हो, उसे इस बात की समझ होनी चाहिए कि उसे जो कहा गया है, वह आज्ञा ही है। संघ में आ रहे परिवर्तन पर राम माधव कहते हैं कि 'हिंदुस्तान हिंदू राष्ट्र है, इस सिद्धांत को छोड़कर संघ में कोई भी परिवर्तन हो सकता है। इसमें मुख्य रूप से आईटी प्रोफशनलों की रात्रिकालीन शाखाएं ध्यान आकर्षित करती हैं। ये पारंपरिक शाखाओं से हट कर हैं। ऐसी शाखाओं में रात को ग्यारह से बारह बजे तक विचार विमर्श होता है और आईटी को अधिक से अधिक संपर्क का साधन बनाने पर विचार होता है। इस प्रकार की शाखाओं के मोहन भागवत पूरी तरह से पक्षधर रहे हैं जो मोहन भागवत की आधुनिकता को स्वीकार करने की छवि की ओर संकेत करती है। लेकिन इन सबके उलट मोहन भागवत की कार्यशैली संघ परिवार के घटकों के बीच होने वाले तनाव को कम करने में कितना सहायक होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;strong&gt;साक्षात्कार । के. सुदर्शन । पूर्व सर संघचालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ&lt;br /&gt;&lt;/strong&gt;के.एस. सुदर्शन संघ के लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हैं। नौ साल तक सर संघचालक रहे सुदर्शन स्वाभाव में लचीलापन और विमर्श में तत्परता के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर संघ के शारीरिक प्रमुख और बौद्धिक प्रमुख, दोनों रूपों में कार्य किया है। संघ के हालातों पर अवधेश आकोदिया ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं बातचीत के संपादित अंश -&lt;br /&gt;लोकसभा चुनावों में हार के लिए भाजपा के कई नेता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को जिम्मेदार बता रहा हैं। इस बारे में आपकी क्या प्रतिक्रिया है?&lt;br /&gt;- जो ऐसा कह रहे हैं वे संघ की विचारधारा को जानते और समझते ही नहीं हैं। संघ भाजपा को क्यों हराएगा? वैसे भी इन चुनावों में मतदाता की तो कोई अहमियत रही ही नहीं। यह चुनाव पूरी तरह से इलोक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का गड़बड़ी का खेल था जिसे कांग्रेस ने पूरी तरह से अपनी इच्छानुसार खेला। कांग्रेस को जितनी सीटें मिली, उनका अनुमान किसी विश्लेषक ने यहां तक स्वयं कांग्रेस ने भी नहीं लगाया था। कांग्रेस इवीएम मशीनों के दुरूपयोग से जीती है। मैं आपको कई उदाहरण दे सकता हूं कि जहां यह साबित हो जाता है। पी. चिदंबरम के मामले में भी ऐसा ही हुआ।&lt;br /&gt;यदि ऐसा है तो आपकी ओर से शिकायत क्यों नहीं की गई?&lt;br /&gt;- इसके कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद जल्दी ही ऐसा किया जाएगा। हम तो चाहते हैं कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां इवीएम की बजाय मतपत्रों से ही मतदान हो।&lt;br /&gt;क्या भाजपा संघ और हिंदुत्व से तौबा करना चाहती है?&lt;br /&gt;- इसमें से ज्यादातर वे लोग है जो सत्ता के आकर्षण से भाजपा में हैं न कि विचारधारा से प्रभावित होकर। यह उनकी मर्जी है। हमने किसी को बांध थोड़े ही रख रखा है। यदि उन्हें लगता है कि संघ और हिंदुत्व के बिना वे सत्ता में आ सकते हैं तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। जो भी हो, सभी बातें स्पष्ट रूप से हो जाएं तो अच्छा है। किसी के मन में शंका नहीं रहनी चाहिए। शंका समस्या पैदा करती है। उसे जितना जल्दी हल कर लें उतना अच्छा है। जहां तक हिंदुत्व की बात है तो यह तो एक जीवन पद्धति है, भाजपा इसे क्यों छोडऩा चाहेगी।&lt;br /&gt;आप हिंदुत्व को कैसे परिभाषित करते हैं?&lt;br /&gt;- हिंदुत्व पांच मूल तत्वों से बना है। पहला, उपासना की प्रत्येक पद्धति का सम्मान करना। दूसरा, जड़ है या चेतन सब बराबर हैं। तीसरा, मनुष्य प्रकृति का हिस्सा है न कि स्वामी। चौथा, महिलाओं का सम्मान और पांचवा जीवन का मकसद भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करने तक ही सीमित नहीं है। इन पांचों तत्वों का समग्र रूप हिंदुत्व है।&lt;br /&gt;भाजपा इस पर कहां तक खरी उतरी है?&lt;br /&gt;जाहिर तौर पर पूरी तरह से तो खरी नहीं उतरी है। यदि वह ऐसा कर पाती तो देश में उसके समर्थन में कमी नहीं आती। कहीं न कहीं तो चूक हुई है। मेरे ख्याल से भाजपा यह तय नहीं कर पाई कि उसे किसी दिशा में चलना है। मूल विचार के विपरीत काम करने का प्रयास हुआ। यह सब उन लोगों की वजह से हुआ जो सत्ता की खातिर भाजपा में आए हैं।&lt;br /&gt;भाजपा के अलावा संघ की और क्या समस्याएं हैं?&lt;br /&gt;- पहली बात तो भाजपा हमारे लिए कोई समस्या नहीं है। जहां तक संघ की अन्य समस्याओं का प्रश्न है तो इतने विशाल संगठन में सब कुछ एक साथ ठीक रखना मुश्किल काम है। फिलहाल कोई बड़ी समस्या तो नहीं है। कुछ कार्यक्रमों में उतार-चढ़ाव चलता रहता है।&lt;br /&gt;संघ की वार्षिक रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि शाखाओं व उनमें आने वाले लोगों की संख्या...&lt;br /&gt;- शहरी क्षेत्रों की कुछ शाखाओं में ऐसा हुआ है, लेकिन आप इसका सामान्यीकरण नहीं कर सकते हैं। आप ये भी तो देखिए कि हमारी ज्यादातर शाखाएं बहुत अच्छी तरह से संचालित हो रही हंै। हर आयु और वर्ग के लोग इनमें आ रहे हैं। शहरों की कुछ शाखाओं का ठीक ढंग से नहीं चलना चिंता का विषय है। जल्दी ही इसका समाधान निकाल लिया जाएगा।&lt;br /&gt;युवा और बुद्धिजीवी वर्ग आपसे दूर क्यों होता जा रहा है?&lt;br /&gt;- हमसे न युवा दूर हो रहे हैं और न ही बुद्धिजीवी। दोनों वर्ग हमसे निरंतर जुड़ रहे हैं। हां, यह जरूरी कहा जा सकता है कि जीवन में कड़ी प्रतिस्पर्धा के चलते युवा अब उतनी सक्रियता से हमारे कार्यक्रमों में हिस्सा नहीं ले रही है। हमारा प्रयास है कि वे प्रतिस्पर्धा और अपने सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन बनाते हुए कार्य करें।&lt;br /&gt;संघ के भीतर अनुशासनहीनता बढऩे की क्या वजह है?&lt;br /&gt;- अनुशासन तो संघ का आधार है। कई जगह पर अनुशासनहीनता की जानकारी मुझे भी मिली है। अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लोगों का पूर्णत: आप पर विश्वास हो। अनुसरणकर्ता का नीतियों और तौर-तरीकों से सहमत होना जरूरी है। हम देख रहे हैं कि दिक्कत कहां पर है।&lt;br /&gt;संघ को राजनीति में सक्रिय होने का कितना नुकसान हुआ?&lt;br /&gt;राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक सामाजिक संगठन है। हम राजनीति में कभी सक्रिय नहीं हुए। सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जरूर जनसंघ और जनता पार्टी बनी। इनमें ज्यादातर संघ से जुड़े हुए ही लोग थे। हमारी विचाराधारा भी समान थी, इसलिए संघ ने इनका समर्थन किया। इसका मकसद राजनीति करने का बिल्कुल नहीं था। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-841952263540183132?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/841952263540183132/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/08/blog-post.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/841952263540183132'/><link rel='self' type='application/atom+xml' 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तेज हो गया है। पार्टी का कोई भी बड़ा नेता उन्हें स्वीकार करने के मूड में दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में क्या चतुर्वेदी भाजपा के कील-कांटों को दुरुस्त कर पाएंगे? एक रिपोर्ट!&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अरुण चतुर्वेदी। राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी के नए निजाम। हाईकमान ने उन्हें नियुक्त तो किया सूबे में पार्टी को पटरी पर लाने के लिए, लेकिन उनके आते ही असंतोष थमने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है। उन्हें अध्यक्ष बनाए जाने से नाराज नेताओं की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। विधायक व पूर्व मंत्री देवी सिंह भाटी ने तो चतुर्वेदी की नियुक्ति का विरोध करते हुए भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से ही इस्तीफा दे दिया है। भाटी के बाद विधायक रोहिताश्व ने भी बागी तेवर दिखाते हुए कहा है कि नए अध्यक्ष एक कमजोर व्यक्ति हैं उनकी राजस्थान में कोई राजनीतिक पहचान नहीं है। चतुर्वेदी को पूरे प्रदेश के भूगोल तक का ज्ञान नहीं है। पार्टी उनके नेतृत्व में मजबूत नहीं हो सकती। हालांकि चतुर्वेदी सबको साथ लेकर चलने का प्रयास कर रहे हैं। वे पार्टी के आला नेताओं से मिलकर सहयोग करने की गुजारिश कर रहे हैं, पर संघ के अलावा कोई भी उनके साथ चलने को तैयार नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;हम पहले ही बता चुके है कि राजस्थान में भाजपा वसुंधरा राजे, वसुंधरा विरोधी और संघ के रूप में तीन खेमों में बंटी है। अरुण चतुर्वेदी संघ खेमे से हैं। प्रदेशाध्यक्ष पद के लिए संघ ने ही उनका नाम भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के पास भेजा था। हालांकि उनके साथ मदन दिलावर और सतीश पूनिया का नाम भी शामिल था, लेकिन मुहर चतुर्वेदी के नाम पर लगी। संघ और पार्टी के प्रति वफादारी के अलावा युवा होने का फायदा उन्हें मिला। विवादों से दूर रहना भी उनके काम आया। गौरतलब है कि प्रदेशाध्यक्ष बनने से पहले वे पार्टी उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रवक्ता भी थे। उनके इन पदों पर रहते हुए पार्टी के भीतर खूब घमासान मचा। खेमेबंदी भी जमकर हुई, पर चतुर्वेदी ने इनसे दूरी ही बनाए रखी। वे 'सबके साथ और किसी के साथ नहीं वाली नीति पर चले। संघ के प्रति जरूर उनका 'साफ्ट कॉर्नर' रहा। राज्य में संघ के भीतर भी कई धड़े बने हुए हैं, पर चतुर्वेदी के सभी से अच्छे संबंध हैं। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;अरुण चतुर्वेदी को जिनती आसानी से पार्टी अध्यक्ष पद मिला है, काम करना उतना ही मुश्किल है। वे स्वयं भी मानते हैं कि इस जिम्मेदारी को संभालना आसान नहीं है। विशेष बातचीत में उन्होंने माना कि लगातार दो हार झेलने के बाद पार्टी में शक्ति का संचार करना आसान काम नहीं है। वे कहते हैं, 'हार का ज्यादा असर कार्यकर्ताओं पर पड़ता है। वे बहुत जल्दी मायूस हो जाते हैं। सबसे ज्यादा जरूरी काम कार्यकर्ताओं को ही सक्रिय करना है, क्योंकि पार्टी के उन्हीं के दम पर कायम है। कार्यकर्ताओं में जोश भरने का पूरी योजना मेरे दिमाग में है। स्थानीय निकायों के चुनावों को देखते हुए हम जल्दी ही इस पर काम शुरू करेंगे।' चतुर्वेदी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में भले ही कामयाब हो जाएं, लेकिन बड़े नेताओं के बीच लगातार चौड़ी खाई को भरने में उन्हें पसीना आ जाएगा। उन्हें पद संभालने से पहले ही इसका ट्रेलर मिल गया। आमतौर पर नए अध्यक्ष की नियुक्ति की घोषणा होते ही बधाई देने और स्वागत करने के लिए नेताओं मजमा लगना शुरू हो जाता है, लेकिन चतुर्वेदी के साथ ऐसा नहीं हुआ। पार्टी का कोई भी आला नेता उन्हें बधाई देने नहीं पहुंचा। बाद में वे स्वयं एक-एक करके सभी नेताओं के यहां गए और सहयोग मांगा। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;सूबे में भाजपा के नए निजाम के लिए कदम-कदम पर मुश्किलें हैं। उनके सामने सबसे पहली चुनौती नियुक्ति के बाद पनपे असंतोष को थामना है। चतुर्वेदी के लिए देवी सिंह भाटी का पार्टी छोड़ देना और रोहिताश्व की खुली खिलाफत से ज्यादा घातक उन्हें पटकनी देने के लिए अंदरखाने बन रही रणनीतियां हैं। उनके विरोधियों, खासतौर पर वसुंधरा खेमे में नए अध्यक्ष को लेकर खलबली मची हुई है। सूत्रों से जो जानकारियां मिल रही हैं वे चतुर्वेदी के लिए खतरनाक हैं। महारानी इस मसले पर केंद्रीय नेतृत्व के संपर्क में हैं और उन्होंने अपने समर्थकों को फिलहाल चुप रहने को कहा है। साथ ही चतुर्वेदी की अध्यक्षता में होने वाली बैठकों से दूर रहने को कहा है। जरूरत पडऩे पर वे अपने लमावजे के साथ दिल्ली भी जा सकती हैं। यहां हालत कुछ-कुछ वैसे ही हो रहे जो ओम माथुर के अध्यक्ष बनने के समय हुए थे। उस समय वसुंधरा नहीं चाहती थीं कि उनके विश्वस्त डॉ। महेश शर्मा को हटाकर ओम माथुर को प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी जाए, लेकिन राजनाथ सिंह ने माथुर को राजस्थान भेज दिया। महारानी ने उनकी वापसी के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, पर वे सफल नहीं हुईं। इस मामले में आडवाणी भी उनकी कुछ मदद नहीं कर पाए। माथुर राजस्थान आ तो गए, लेकिन महारानी ने उन्हें ज्यादा तवज्जों नही दी। पार्टी के नितिगत निर्णयों में माथुर की ज्यादा नहीं चली। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;महारानी अच्छी तरह जानती हैं कि एक बार नियुक्ति हो जाने के बाद पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व फिलहाल अपना फैसला नहीं बदलेगा। नए अध्यक्ष का विरोध वे उन्हें हटाने के लिए नहीं, बल्कि उन पर दबाव बनाने के लिए कर रही हैं। वे हाईकमान के सामने ये साबित करना चाहती हैं कि चतुर्वेदी को अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले से राज्य में पार्टी के ज्यादातर लोग सहमत नहीं हैं। इससे केंद्रीय नेताओं के सामने चतुर्वेदी का कद छोटा हो जाएगा, महारानी चाहती भी यही हैं। सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा खेमा चतुर्वेदी के लिए ओम माथुर से भी बदतर हालात पैदा करने की योजना बना रहा है। इसके तहत उन पर एक साथ हमला बोलने की बजाय धीरे-धीरे वार किया जाएगा। वे जितने समय भी अध्यक्ष पद पर रहे, असंतोष बरकरार रहे। जरूरत के हिसाब से यह कम-ज्यादा होता रहे। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;महारानी खेमे को अपनी जगह छोड़ दें तो भी चतुर्वेदी की राह आसान नही हैं। वसुंधरा विरोधी खेमा उनके लिए दिक्कतें खड़ी कर सकता है। हालांकि इनमें से कई नेताओं से चतुर्वेदी के अच्छे संबंध हैं। पक्का संघी होने के कारण भैरों सिंह शेखावत, हरिशंकर भाभड़ा और ललित किशोर चतुर्वेदी सरीखे वरिष्ठ नेता भी उनका विरोध नहीं करेंगे। इन दिग्गजों के कहने से और भी कई नेता नए अध्यक्ष का सहयोग कर सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक वसुंधरा विरोधी ज्यादातर नेता चतुर्वेदी का सहयोग करने तो तैयार हैं, लेकिन इस शर्त पर कि वे वसुंधरा को राजस्थान से रुखसत करने की उनकी मुहीम का हिस्सा बनें। गौरतलब है कि ये नेता लंबे समय से महारानी के खिलाफ सक्रिय है। इनकी लाख कोशिशों के बाद भी वसुंधरा ने मुख्यमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल पूरा किया और फिर चुनावों में पार्टी की हार के बाद वे नेता प्रतिपक्ष बनने में सफल रही। वसुंधरा के विरोधी उन्हें पटकनी देने का कोई मौका नहीं चूकना चाहते। यदि प्रदेशाध्यक्ष उनके पक्ष का रहा तो वे महारानी हटाओ मुहिम को अंजाम तक पहुंचाने में सफल हो सकते हैं। वसुंधरा विरोधी खेमें में एक ही व्यक्ति हैं जो चतुर्वेदी के लिए समस्या खड़ी कर सकते हैं। वे हैं घनश्याम तिवाड़ी। तिवाड़ी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं किसी से छिपी नहीं हैं। जिस समय महारानी मुख्यमंत्री थीं और प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन की बात चल रही थी तो तिवाड़ी कुर्सी की दौड़ में सबसे आगे थे। प्रदेशाध्यक्ष को लेकर उनके नाम की चर्चा इस बार तो थी ही ओम माथुर के समय भी रही। यदि वे लोकसभा चुनाव नहीं हारते तो अध्यक्ष पद के लिए वे ही सबसे तगड़े दावेदार थे। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;वैसे भले ही अरुण चतुर्वेदी आते ही मुश्किलों में घिर गए हों, पर मुसीबतें महारानी के लिए भी कम नहीं है। जिस तरह से अन्य राज्यों में भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व परिवर्तन कर रहा है, उसी क्रम में राजस्थान से वसुंधरा का नंबर भी आ सकता है। ओम माथुर के इस्तीफे के बाद नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़े जाने को दबाव उन पर पहले से ही है। पार्टी में यह स्वर मुखर होने लगा है कि हार के लिए ओम माथुर से ज्यादा जिम्मेदार वसुंधरा हैं। इसलिए माथुर की तर्ज पर उन्हें भी इस्तीफा देना चाहिए। वसुंधरा को भी इसका अहसास है। वे इस बात के लिए लॉबिंग कर रही है कि राजस्थान में एक साथ दो परिवर्तन पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होंगे। अरुण चतुर्वेदी के खिलाफ असंतोष को हवा देकर वे पार्टी के आला नेताओं को यह संदेश देना चाहती हैं कि यदि उन्हें बदलकर किसी और को जिम्मेदारी दी गई तो इसी तरह से विरोध के स्वर उभरेंगे। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह के करीबियों की मानें तो राजस्थान की जिम्मेदारी अरुण चतुर्वेदी को सौंपकर पार्टी ने वसुंधरा को भविष्य के कदम का संकेत दे दिया है। राजनाथ सिंह तो महारानी को हटाने के लिए पूरा मन बना चुके हैं, पर लालकृष्ण आडवाणी इसके लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। आडवाणी के आशीर्वाद से महारानी भले ही नेता प्रतिपक्ष पद पर बनी रहें, लेकिन राज्य भाजपा में मचा घमासान कम होने वाला नहीं है। &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-8971923264328538076?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/8971923264328538076/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/07/blog-post_13.html#comment-form' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8971923264328538076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/8971923264328538076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/07/blog-post_13.html' title='नए निजाम, पुरानी मुसीबतें'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-352128284475254656</id><published>2009-07-11T19:16:00.002+05:30</published><updated>2009-07-11T19:58:46.953+05:30</updated><title type='text'>आदर्श नहीं बन पाए माइकल जैक्सन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt; &lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;संगीत और डांस के अनूठे संगम से समां बांध देने वाले माइकल जैक्सन की मृत्यु के बाद कला जगत को हुई क्षति की भरपाई शायद ही कभी हो पाए। इसमें कोई दोराय नहीं है कि माइकल जैक्सन एक बेहतरीन कलाकार थे। उनकी द थ्रिलर एलबम हो या डेंजरस टूर या फिर उनका मून वॉक डांस, सबने रिकॉर्ड बनाए और खूब लोकप्रियता हासिल की। उनकी सभी एलबमों को मिला दिया जाए तो साढ़े सात करोड़ से ज्यादा प्रतियां तो उनके रहते हुए बिक चुकी थीं। संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा पुरस्कार 'ग्रेमी अवॉर्ड' उन्होंने 13 बार जीता। दुनिया का ऐसा कोई कोना नहीं है जहां उन्हें दीवानगी की हद तक चाहने वाले नहीं हों। वे जहां भी जाते छा जाते। इतना कुछ होते हुए माइकल जैक्सन का जीवन लोगों के लिए आदर्श नहीं बन पाया। उनके जीवन से संगीत को निकाल दिया जाए तो याद करने लायक शायद ही कुछ बचे।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;माइकल जैक्सन और विवादों का चोली दामन का साथ रहा। कॅरियर के शुरूआती दौर में जब उन्होंने अपना रंग-रूप बदलने के लिए सर्जरी करवाई तो उनकी काफी आलोचना हुई। यह सर्जरी उनके लिए सिरदर्द ही साबित हुई। शरीर में कई तरह के विकार पैदा हो गए। इन्हें ठीक करवाने के लिए उन्होंने खासी मशक्कत की, पर सफलता नहीं मिली। पिछले कुछ सालों से तो वे दवाईयों के सहारे ही जिंदा थे। 1993 में एक 13 साल के लड़के ने माइकल जैक्सन पर यौन शोषण का आरोप लगाया। हालांकि बाद में यह मामला आपसी समझौते में सुलझ गया। बताया जाता है कि इसके लिए माइकल को बड़ी रकम चुकानी पड़ी। 2003 में टेलीविजन पर प्रसारित एक डोक्यूमेंट्री में माइकल जैक्सन द्वारा किए गए यौन उत्पीडनों को सिलसिलेवार ढंग से दिखाया गया। इसके प्रसारण के बाद उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि वे ऐसा करते रहे हैं। 2005 में उनके लिखाफ एक 11 साल के लड़के का अपहरण कर यौन दुराचार करने का मामला दर्ज हुआ। माइकल जैक्सन नशे के भी आदी थे। इसी के चलते उन्हें अपने मशहूर एलबम 'डेंजरस' का वर्ल्‍ड टूर भी रद्द करना पड़ा। माइकल जैक्सन का वैवाहिक जीवन भी सफल नहीं रहा वे अपनी पत्नियों के साथ बहुत कम समय तक रहे। अपने अनाप-शनाप खर्चों के चलते वे एक बार तो दिवालिया होने की स्थिति में आ गए थे। कुल मिलाकर विवादों का बंवडर हमेशा उनके साथ चला। उन्होंने विवादों से स्वयं को बचाने की खूब कोशिश की, पर विवाद थमने की बजाय बढ़ते ही गए।&lt;/div&gt;&lt;div align="justify"&gt;&lt;br /&gt;दुनिया की चर्चित शख्शियतों में माइकल जैक्सन अकेले नही हैं जो अपने विवादास्पद क्रियाकलापों के चलते किसी के 'आइडियल' नहीं बन पाए। इस फेहरिस्त में कई बड़े नाम शामिल हैं। इन लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र में तो खूब नाम कमाया, पर जिंदगी के बाकी मोर्चों पर ये फिसड्डी साबित हुए। सवाल यह उठता है कि ऐसी कौनसी वजह हैं कि ये लोग विवादों में फंसते चले जाते हैं? जितना अनुशासन ये अपने काम में दिखाते हैं, उतना बाकी जगह क्यों नहीं दिखा पाते? इसका बड़ा वजह यह है कि ऊंचा मुकाम हासिल करने के बाद इन लोगों को किसी की फ्रिक नहीं होती है। इतनी शोहरत पाने के बाद वे दुनिया के हिसाब से नहीं बल्कि दुनिया को अपने हिसाब से चलाने के बारे में सोचते हैं। समाज के नियम-कायदों की इनकी नजर में कोई अहमियत नहीं होती है। कई लोग जानबूझकर विवाद पैदा करते हैं। उन्हें लगता है कि इससे कम से कम वे 'लाइम लाइट' में तो रहते हैं। हालांकि माइकल जैक्सन के मामले में ऐसा नहीं है। उन्होंने शायद ही कभी सुर्खिया बटोरने के लिए किसी विवाद को जन्म दिया हो। उन पर तो सफल होने का जूनून सवार था, लेकिन जब सफल हुए तो जीवन जीना ही भूल गए। इसी का नतीजा है कि आज जब वे इस दुनिया में नहीं हैं तो उन्हें श्रद्धांजलि देने वाली करोड़ों नम आंखों के साथ विवादों के किस्सों, संपत्ति, कर्ज और बेटे-बेटियों के भरण-पोषण को लेकर ढेरों सवाल भी हैं। इन सवालों के बीच उन जैसा कलाकार तो हर कोई बनना चाहेगा, पर उन जैसा विवादों से भरा व कष्‍टप्रद जीवन कोई नहीं जीना चाहेगा।&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;em&gt;(11 जुलाई को डेली न्‍यूज़ में प्रकाशित)&lt;/em&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1242141959182465150-352128284475254656?l=meraroznamcha.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/feeds/352128284475254656/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html#comment-form' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/352128284475254656'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1242141959182465150/posts/default/352128284475254656'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://meraroznamcha.blogspot.com/2009/07/blog-post_11.html' title='आदर्श नहीं बन पाए माइकल जैक्सन'/><author><name>अवधेश आकोदिया</name><uri>http://www.blogger.com/profile/02254385166061210513</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://2.bp.blogspot.com/-64ganWsPFM0/TiFpAy43lRI/AAAAAAAAAII/fxLsytisgo0/s220/Avadhesh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1242141959182465150.post-437020508977251047</id><published>2009-07-09T13:58:00.000+05:30</published><updated>2009-07-09T14:02:55.856+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='राजस्‍थान'/><title type='text'>सक्रिय हुए सूरमा</title><content type='html'>&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;em&gt;ओम माथुर का प्रदेशाध्यक्ष पद से मोहभंग क्या हुआ उनकी जगह लेने वालों की कतार लग गई। कई धड़ों में बंटी भाजपा के आला नेता एकाएक सक्रिय हो गए हैं। सब किसी अपने को जिम्मेदारी दिलाना चाहते हैं। सूबे की भाजपा में अध्यक्ष पद के लिए चल रही रस्साकशी के छोर खोजती रिपोर्ट!&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;&lt;em&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/em&gt;भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश कार्यालय। पहले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद यहां सन्नाट पसरा रहता था, पर पिछले कुछ दिनों से अचानक पुरानी रौनक लौट आई है। नेताओं की आवाजाही तो बढ़ी ही है, कार्यकर्ताओं का आना-जाना भी शुरू हो गया है। पार्टी दफ्तर में हुई इस हलचल की वजह प्रदेशाध्यक्ष ओम माथुर की विदाई तय होना है। कोई उनकी जगह लेने के लिए तो कोई नए निजाम की टीम में शामिल होने के लिए लाबिंग में जुटा है। आलाकमान ने भी राजस्थान में पार्टी का नया कप्तान तलाशने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी किसी ऐसे चेहरे की तलाश में है जो महारानी की मर्जी का हो, जिसके नाम पर संघ मुहर लगाए, जिसे भैरों सिंह शेखावत का भी आशीर्वाद प्राप्त हो और जो वसुंधरा विरोधियों की नजरों में भी नहीं खटकता हो। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वैसे भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व अभी राजस्थान में बदलाव करने के मूड में नहीं था, लेकिन ओम माथुर काम करने को राजी नहीं हुए। उन्होंने मौजूदा हालातों में पद पर बने रहने से साफ तौर पर इंकार कर दिया। माथुर को मनाने में नाकाम रहने के बाद पार्टी नए प्रदेशाध्यक्ष को लेकर पशोपेश में है। आलाकमान ऐसे नेता को राजस्थान की जिम्मेदारी देना चाहता है जिससे किसी को ऐतराज नहीं हो और जो पार्टी में चल रही खींचतान को खत्म करने की दिशा में काम कर सके, पर फिलहाल ऐसे किसी नाम पर सहमति बनती दिखाई नहीं दे रही है। प्रदेशाध्यक्ष के चयन को लेकर भाजपा तीन खेमों वसुंधरा राजे, संघ और संघ समर्थित वरिष्ठ नेताओं में बंटी हुई है। इनमें से महारानी का खेमा अभी भी सबसे मजबूत है। विरोधी मान रहे थे कि दो चुनावों में मिली हार और माथुर के इस्तीफे के बाद महारानी पर नेता प्रतिपक्ष पद छोडऩे का दबाव बनेगा, लेकिन पार्टी राज्य में दोहरा बदलाव करना नहीं चाहती है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;वर्तमान परिस्थितियों इस बात की संभावना ज्यादा है कि प्रदेशाध्यक्ष पद महारानी की मर्जी से ही किसी को दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक वे किसी जाट पर दांव खेलना चाहती हैं। गौरतलब है कि चुनावों में भाजपा की पराजय के पीछे जाटों की नाराजगी को बड़ी वजह माना जा रहा है। प्रदेशाध्यक्ष पद पर जाट नेताओं के तौर पर डॉ। दिगंबर सिंह, रामपाल जाट और सुभाष महरिया के नामों की चर्चा है। दोनों वसुंधरा के करीबी हैं, पर महरिया के नाम पर संघ ऐतराज कर सकता है। ऐसे में दिगंबर सिंह का दावा मजबूत है। वसुंधरा के करीबियों की मानें तो महारानी ने दिगंबर को अध्यक्ष बनने के लिए तैयार रहने को कहा है। इसी के चलते पार्टी कार्यालय में उनका आना-जाना अचानक बढ़ गया है। आजकल वे अपना ज्यादातर वक्त यहीं बिता रहे हैं। दिगंबर के साथ दिक्कत एक ही है कि जाटों पर उनका प्रभाव भरतपुर तक ही सीमित है। शेखावाटी क्षेत्र में उनकी इतनी पकड़ नहीं है। यही परेशानी रामपाल जाट के साथ भी है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;यदि किसी गैर जाट को मौका दिया जाता है तो महारानी के विश्वस्तों में से रामदास अग्रवाल की लॉटरी खुल सकती है। सूत्रों के मुताबिक वे इसके लिए लॉबिंग भी कर रहे हैं। उन्हें महारानी का समर्थन तो हासिल है ही, संघ से भी उनके अच्छे संबंध हैं। भैरों सिंह शेखावत से उनकी ट्युनिंग उस जमाने से है जब बाबोसा मुख्यमंत्री और वे स्वयं प्रदेशाध्यक्ष थे। डॉ। किरोड़ी लाल मीणा के भाजपा छोड़ देने के बाद वसुंधरा विरोधियों में उनकी खिलाफत करने वाले ज्यादा नहीं हैं। केंद्रीय नेताओं से मधुर रिश्ते अग्रवाल के लिए फायदेमंद हो सकते हैं। अग्रवाल के लिए उम्र एक बाधा हो सकती है। पार्टी नेतृत्व अग्रवाल सरीखे पुरानी पीढ़ी के नेता को जिम्मेदारी देने की बजाय किसी नए नेता को राज्य का जिम्मा सौंपना ज्यादा पसंद करेगा। संघ ने भी पार्टी को यही राय दी है कि राजस्थान में भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले बेहतर खड़ा करने के लिए किसी नए चेहरे को दायित्व सौंपा जाए। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;संघ समर्थक दावेदारों की बात करें तो पूर्व मंत्री मदन दिलावर, प्रदेश उपाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी और सतीश पूनिया का नामों की चर्चा है। संघ के सूत्रों की मानें तो ये तीन नाम पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भेज दिए गए हैं। संघ ने सूबे की 'कास्ट केमिस्ट्री' और पार्टी के भीतर अब तक के कामकाज की समीक्षा के आधार पर ये नाम भेजे हैं। इन नामों से में मदन दिलावर को दलित होने का फायदा मिल सकता है। लेकिन पार्टी के आला नेताओं का एक धड़ा उनके नाम पर हामी भरने को तैयार नहीं है। इनका मानना है कि दिलावर की धार्मिक कट्टरता पार्टी के लिए कभी भी संकट खड़ा कर सकती है। वसुंधरा के शासनकाल में मंत्री रहते हुए वे कई मर्तबा सरकार को परेशानी में डाल चुके हैं। स्वाभाव से तल्ख दिलावर के लिए वसुंधरा के साथ कड़वे संबंध नुकसानदायक साबित हो सकती है। अरुण चतुर्वेदी के साथ भी यही है। महारानी से उनका शुरू से छत्तीस का आंकड़ा है। विधानसभा चुनावों के समय चतुर्वेदी ने सिविल लाइन क्षेत्र से टिकट हासिल करने में अपना पूरा दम लगा दिया, पर कामयाब नहीं हुउ। वसुंधरा ने उनकी जगह युवा मोर्चा के अध्यक्ष अशोक लाहोटी को उम्मीदवार बना दिया, जो भैरों सिह शेखावत के भतीजे और कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप सिंह खाचरियावास से हार गए। चतुर्वेदी पार्टी उपाध्यक्ष होने के साथ-साथ प्रवक्ता भी है, पर शायद ही ऐसा कोई मौका हो जब उन्होंने वसुंधरा की तारीफ की हो। ऐसे में यदि आलाकमान चतुर्वेदी को जिम्मेदारी देता है तो खींचतान कम होने की बजाय और बढ़ जाएगी। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;जहां तक सतीश पूनिया की दावेदारी का सवाल है तो इनके साथ भी वही दिक्कत है जो मदन दिलावर और अरुण चतुर्वेदी के साथ है। पांच साल मुख्यमंत्री रहते हुए महारानी ने पूनिया को किनारे करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। दरअसल, पूनिया चूरु क्षेत्र की राजनीति से निकल कर आए हैं। यहां राजेंद्र सिंह राठौड़ और उनके बीच शुरू से ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है। वसुंधरा ने इसका फायदा उठाने की रणनीति पर काम किया। पूनिया का पटकनी देने के लिए उन्होंने राजेंद्र राठौड़ को अपने खेमें में शामिल कर लिया। महारानी का वरदहस्त प्राप्त होते ही राठौड़ ने पूनिया की जड़े खोदना शुरू किया। राठौड़ की मुहीम कामयाब रही और आज हालत यह है कि पूनिया खुद की ही पार्टी में पूरी तरह से हाशिए पर हैं। वसुधंरा कभी नहीं चाहेंगी कि पूनिया प्रदेशाध्यक्ष बन पहले से भी ज्यादा ताकतवर बन जाएं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनकी हालत जख्मी शेर सरीखी है। मौका मिला तो शिकार को बख्शने का सवाल ही पैदा नहीं होता। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;इन तीन नामों के अलावा संघ की ओर से घनश्याम तिवाड़ी और गुलाबचंद कटारिया का नाम लंबे समय से चल रहे हैं। ये दोनों नेता वसुंधरा विरोधी खेमे का अहम हिस्सा हैं। जसवंत सिंह को इनका सरदार माना जाता है और भैरों सिंह शेखावत को सलाहकार। इस खेमें लंबे से समय से महारानी के खिलाफ मुहीम छेड़ रखी है। प्रदेशाध्यक्ष पद से माथुर के इस्तीफे के बाद यह खेमा फिर से सक्रिय हो गया है। ये लोग पार्टी के आला नेताओं से मिलकर वसुंधरा पर नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफे के लिए दबाव बना रहे हैं। इनका कहना है कि जिस तरह से माथुर ने पार्टी की हार की जिम्मेदारी ली है, उसी तरह से महारानी को भी जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे देना चाहिए। आलाकमान से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं, उन्हें देखकर लगता नहीं कि महारानी से इस्तीफा देने के लिए कहा जाएगा। ऐसे में वसुंधरा के विरोधियों ने अपना पूरा ध्यान प्रदेशाध्यक्ष के पद को झटकने में लगा दिया है। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;लोकसभा चुनाव से पहले तक गुलाबचंद कटारिया और घनश्याम तिवाड़ी में से तिवाड़ी की दावेदारी ज्यादा मजबूत नजर आ रही थी, पर जयपुर से गिरधारी लाल भार्गव की विरासत बचाने में नाकाम रहने के बाद वे कमजोर पड़ गए हैं। हालांकि अभी भी उन्हें संघ का समर्थन प्राप्त है, लेकिन उनके काम करने के तरीके से खिन्न होकर कल तक उनके साथ रहने वाले कई लोग खिलाफत करने लगे हैं। लोकसभा चुनावों में अतिआत्मविश्वास तिवाड़ी को अब तक दुख दे रहा है। दरअसल, अपनी जीत के प्रति आश्वस्त होने के कारण तिवाड़ी ने दूसरी पंक्ति के नेताओं और कार्यकर्ताओं को ज्यादा तवज्जों नहीं दी। चुनाव परिणाम तो उनके लिए निराशाजनक रहे ही, समर्थक भी नाराज हो गए। वसुंधरा विरोधी होने का ठप्पा तो उन पर पहले से ही लगा हुआ है। इन हालातों में आलाकमान तिवाड़ी को मौका देकर खींचतान का नया मैदान तैयार करने की भूल शायद ही करे। &lt;/p&gt;&lt;p align="justify"&gt;&lt;br /&gt;ओम माथुर के विकल्प के तौर पर गुलाबचंद कटारिया की दावेदारी की चर्चा भले ही आखिर में की जा रही हो, पर वर्तमान में वे सबसे मजबूत स्थिति में हैं। कल तक जिस 'भोली छवि' और 'ढुलमुल व्यक्तित्व' को उनकी कमजोरी बताया जाता था, अब वही उन्हे सूबे में भाजपा का मुखिया बनवा सकती है। संघ तो उनका साथ देने के लिए पहले से ही तैयार है। कई गुटों में बंटी पार्टी समझौते के रूप में कटारिया के नाम पर सहमत हो सकती है। कटारिया भले ही वसुंधरा विरोधी मुहीम में शामिल रहे हो, लेकिन उन्होंने कभी उनसे व्यक्तिगत बैर नहीं बांधा। वसुंधरा उनके नाम पर इसलिए राज
